भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 264
२४२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे
द्यावापृथिव्योः संसर्गः सततं विततैः कृतः।<br>अव्यवच्छिन्नधारौघैः समुद्रौघसमैर्घनैः॥ ३३ ॥<br>‘आकाशमें फैलकर समुद्रके जलप्रवाह-से प्रतीत होनेवाले इन बादलोंने अविच्छिन्नरूपसे जलकी धाराएँ गिराकर आकाश और पृथ्वीको मानो सदाके लिये एक दूसरेके साथ जोड़ दिया है ॥ ३३ ॥समुद्रोद्धूतजनिता लोलशाद्वलकम्पिनः।<br>शीताः सपृषतोद्दामः कर्कशा वान्ति मारुताः॥ ३९ ॥<br>‘समुद्रके हिलोरे लेनेसे उत्पन्न हो चञ्चल घासोंको कम्पित करती हुई जलविन्दुओंसहित उद्दाम गतिसे चलनेवाली शीतल एवं कर्कश वायु बह रही है ॥ ३९ ॥
नीपार्जुनकदम्बानां पृथिव्यां चातिवृष्टिभिः।<br>गन्धैः कोलाहला वान्ति वाता मदनदीपनाः॥ ३४ ॥<br>‘पृथ्वीपर अत्यन्त वर्षा होनेके कारण नीप, अर्जुन और कदम्बोंकी गन्धसे वासित हुई कोलाहलयुक्त वायु कामियोंका कामोद्दीपन करती हुई बह रही है ॥ ३४ ॥निशासु सुप्तचन्द्रासु मुक्ततोयासु तोयदैः।<br>मग्नसूर्यस्य नभसो न विभान्ति दिशो दश ॥ ४० ॥<br>‘जिनमें चन्द्रमा भी सोये हुएके समान अदृश्य हो गये हैं, बादलोंनें पानी बरसाना आरम्भ कर दिया है और आकाशके सूर्य भी डूब चुके हैं, ऐसी बरसाती रातोंमें दसों दिशाओंका कुछ पता नहीं चलता है ॥ ४० ॥
सप्रवृत्तमहावर्षे लम्बमानमहाम्बुदम्।<br>भात्यगाधमपर्यन्तं ससागरमिवाम्बरम्॥ ३५ ॥<br>‘बड़े जोरसे वर्षा आरम्भ हो गयी है। बड़े-बड़े मेघ बरसनेके लिये नीचेको झुक आये हैं, जिनसे यह आकाश अथाह अनन्त महासागरसे संयुक्त-सा प्रतीत होता है ॥३५॥चेतनं पुष्करं कोशैः क्षुधाध्मातैः समन्ततः।<br>न घृणीनां न रम्याणां विवेकं यान्ति कृष्टयः॥ ४१ ॥<br>‘सब ओर वायुसे मेघोंद्वारा उपलक्षित आकाश चेतन-सा प्रतीत होता है, किसानोंको न दिनका पता चलता है न रातका ॥ ४१ ॥
धारानिर्मलनाराचं विद्युत्कवचवर्मिणम्।<br>शक्रचापायुधधरं युद्धसज्जमिवाम्बरम्॥ ३६ ॥<br>‘जलकी धाराओंका निर्मल नाराच, विद्युतरूपी कवच तथा इन्द्रधनुषरूपी आयुधको धारण किये हुए यह आकाश युद्धके लिये सुसज्जित हुआ-सा जान पड़ता है ॥ ३६ ॥घर्मदोषपरित्यक्तं मेघतोयविभूषितम्।<br>पश्य वृन्दावनं कृष्ण वनं चैत्ररथं यथा ॥ ४२ ॥<br>‘श्रीकृष्ण ! देखो, घामरूपी दोषसे रहित और मेघोंके बरसाये हुए जलसे विभूषित हुआ वृन्दावन चैत्ररथ वनके समान शोभा पा रहा है’ ॥ ४२ ॥
शैलानां च वनानां च द्रुमाणां च वरानन।<br>प्रतिच्छन्नानि भासन्ते शिखराणि घनैर्घनैः॥ ३७ ॥<br>‘सुमुख श्रीकृष्ण ! पर्वतोंके शिखर तथा वनों और वहाँके वृक्षोंकी शिखाएँ घने बादलोंसे आच्छादित होकर कैसी शोभा पा रही हैं ॥ ३७ ॥एवं प्रावृड्गुणान् सर्वाञ्छ्रीमान् कृष्णस्य पूर्वजः।<br>कथयन्नेव वलवान् व्रजमेव जगाम ह ॥ ४३ ॥<br>इस प्रकार श्रीकृष्णके बड़े भ्राता महाबली श्रीमान् बलराम वर्षाकालके गुणोंका वर्णन करते हुए ही उनके साथ व्रजमें चले गये ॥ ४३ ॥
गजानीकैरिवाकीर्णं सलिलोद्गारिभिर्घनैः।<br>वर्णसारूप्यतां याति गगनं सागरस्य च ॥ ३८ ॥<br>‘अपनी सूँड़ोंसे जल छोड़नेवाले गजसमूहोंकी भाँति इन काले घने बादलोंसे आच्छादित हुआ आकाश रंग-रूपमें समुद्रके समान हो गया है ॥ ३८ ॥अन्योन्यं रममाणौ तु कृष्णसंकर्षणावुभौ।<br>तत्कालज्ञातिभिः सार्द्धं चेरतुस्तद् वनं महत् ॥ ४४ ॥<br>एक दूसरेके साथ खेलते और घूमते हुए दोनों भाई श्रीकृष्ण और संकर्षण उस समयके भाई-बन्धुओंके साथ उस विशाल वनमें विचरने लगे ॥ ४४ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रावृड्वर्णने दशमोऽध्यायः॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वर्षाका वर्णनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥


एकादशोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी अङ्गच्छटा, भाण्डीर वट, यमुना और कालियदहका वर्णन तथा श्रीकृष्णद्वारा कालियनागके निग्रहका विचार

वैशम्पायन उवाच
कदाचित् तु तदा कृष्णो विना संकर्षणेन वै।
बभार तद् वनं रम्यं कामरूपी वराननः॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! एक दिन इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुमुख श्रीकृष्ण अपने भाई संकर्षणके बिना ही उस रमणीय वृन्दावनमें विचरने लगे ॥१॥