भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 270
२४८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

एतस्मिन्नन्तरे भीता गोपालाः सर्व एव ते।
क्रन्दमाना व्रजं जग्मुर्बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १५ ॥

इसी बीचमें समस्त ग्वालबाल भयभीत हो रोते हुए व्रजमें गये और अश्रुगद्गद वाणीमे इस प्रकार बोले ॥ १५ ॥

गोपा ऊचुः

एष मोहं गतः कृष्णो मग्नो वै कालिये हृदे।
भक्ष्यते सर्पराजेन तदागच्छत मा चिरम् ॥ १६ ॥

गोपोंने कहा—ये श्रीकृष्ण कालीदहमें डूबकर मूर्च्छित हो गये हैं और नागराज इन्हें खाये जाता है; अतः जल्दी आओ, देर न करो ॥ १६ ॥

नन्दगोपाय वै क्षिप्रं सबलाय निवेद्यताम्।
एष ते कृष्यते कृष्णः सर्पेणेति महाह्रदे ॥ १७ ॥

बल-बलसहित नन्दगोपसे कोई शीघ्र जाकर कह दो कि 'तुम्हारे कृष्णको सर्प महान् कुण्डमें खींचे लिये जाता है' ॥

नन्दगोपस्तु तच्छ्रुत्वा वज्रपातोपमं वचः।
आर्तः स्खलितविक्रान्तस्तं जगाम ह्रदोत्तमम् ॥ १८ ॥

वह वज्रपातके समान दारुण वचन सुनकर नन्दगोप शोकसे व्याकुल हो लड़खड़ाते हुए उस विशाल ह्रदके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥

सबालयुवतीवृद्धः स च संकर्षणो युवा।
आक्रीडं पन्नगेन्द्रस्य जलस्थं समुपागमत् ॥ १९ ॥

उनके साथ व्रजके बहुत-से बालक, वृद्ध और युवतियाँ भी थीं। रोहिणीके युवक पुत्र संकर्षण भी आ पहुँचे थे। ये सब-के-सब नागराजकी जलस्थ क्रीड़ाभूमिके पास आये ॥

नन्दगोपमुखा गोपास्ते सर्वे साश्रुलोचनाः।
हाहाकारं प्रकुर्वन्तस्तस्थुस्तीरे ह्रदस्य वै ॥ २० ॥

नन्द आदि वे सभी गोप नेत्रोंसे आँसू बहाते और हाहाकार करते हुए कालियदहके तटपर खड़े हो गये ॥२०॥

व्रीडिता विस्मिताश्चैव शोकार्ताश्च पुनः पुनः।
केचित् तु पुत्र हा हेति हा धिगित्यपरे पुनः ॥ २१ ॥

वे अपनी विवशतापर लज्जित थे। श्रीकृष्णका साहस देख-सुनकर आश्चर्यमें पड़े थे और उनके जीवनकी आशंकासे बारंबार शोकार्त हो जाते थे। कोई 'हाय बेटा ! हाय !' कहकर रो देते और दूसरे 'हाय ! धिक्कार है हम सबके जीवनको' ऐसा कहते हुए चिन्तामग्न हो जाते थे ॥ २१ ॥

अपरे हा हताः स्मेति रुरुदुर्भृशदुःखिताः।
स्त्रियश्चैव यशोदां तां हा हतासीति चुक्रुशुः ॥ २२ ॥
या पश्यसि प्रियं पुत्रं सर्पराजवशं गतम्।
स्पन्दितं सर्पभोगेन कृष्यमाणं यथा मृतम् ॥ २३ ॥

दूसरे लोग अत्यन्त दुखी हो 'हाय ! हम मारे गये।' ऐसा कहते हुए जोर-जोरसे रोते थे। व्रजकी स्त्रियाँ यशोदाकी ओर देख चिल्ला-चिल्लाकर कहती थीं—'हाय यशोदे ! तू बेमौत मारी गयी, क्योंकि अपने प्यारे लालाको आज इस नागराजके वशमें पड़ा हुआ देख रही हो। हाय ! वह सर्पके शरीरसे आबद्ध हो मृतककी भाँति घसीटा जा रहा है॥

अश्मसारमयं नूनं हृदयं ते विलक्ष्यते।
पुत्रं कथमिमं दृष्ट्वा यशोदे नावदीर्यसे ॥ २४ ॥

'यशोदे ! निश्चय ही तुम्हारा हृदय लोहेका बना हुआ दिखायी देता है। अरी ! पुत्रको इस दशामें देखकर तुम्हारी छाती फट क्यों नहीं जाती ? ॥ २४ ॥

दुःखितं बत पश्यामो नन्दगोपं ह्रदान्तिके।
न्यस्य पुत्रमुखे दृष्टिं निश्चेतनमवस्थितम् ॥ २५ ॥

'हाय ! हम देखते हैं, नन्दबाबा अत्यन्त दुखी हो कालियदहके निकट लाला कन्हैयाके मुखपर अपनी दृष्टि जमाये अचेत-से खड़े हैं ॥ २५ ॥

यशोदामनुगच्छन्त्यः सर्पावासमिमं ह्रदम्।
प्रविशामो न यास्यामो विना दामोदरं व्रजम् ॥ २६ ॥

'हम सब-की-सब यशोदाजीके पीछे-पीछे सर्पोंके निवास-स्थान इस ह्रदमें प्रवेश कर जायँगी, किंतु दामोदर (श्रीकृष्ण) को साथ लिये बिना व्रजको नहीं लौटेंगी ॥२६॥

दिवसः को विना सूर्ये विना चन्द्रेण का निशा।
विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को व्रजः।
विना कृष्णं न यास्यामो विवत्सा इव धेनवः ॥ २७ ॥

'सूर्यके बिना दिन कैसा ? चन्द्रमाके बिना रात्रि कैसी ? साँड़के बिना गौएँ क्या ? तथा श्रीकृष्णके बिना व्रज कैसा ? बिना बछड़ेकी धेनुओके समान हम श्रीकृष्णके बिना व्रजको नहीं लौटेंगी' ॥ २७ ॥

तासां विलपितं श्रुत्वा तेषां च व्रजवासिनाम्।
विलापं नन्दगोपस्य यशोदारुदितं तथा ॥ २८ ॥
एकभावशरीरज्ञ एकदेहो द्विधा कृतः।
संकर्षणस्तु संक्रुद्धो बभाषे कृष्णमव्ययम् ॥ २९ ॥

उन गोपियोंका, व्रजवासियोंका तथा नन्दबाबाका विलाप और यशोदाजीका करुणापूर्ण रोदन सुनकर श्रीकृष्णके साथ अपने एक भाव और एक शरीरके सम्बन्धको जाननेवाले संकर्षण, जो वास्तवमे एक ही देहके दो भागोमेसे एक थे, कुपित हो अविनाशी श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले—॥२८-२९॥

कृष्ण कृष्ण महाबाहो गोपानां नन्दवर्धन।
दम्यतामेष वै क्षिप्रं सर्पराजो विषायुधः ॥ ३० ॥

'गोपोंका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण ! कृष्ण ! विष ही जिसका अस्त्र-शस्त्र है, उस सर्पराजका अब शीघ्र दमन करो ॥ ३० ॥