विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 271, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्वादशोऽध्यायः २४९
इमे नो बान्धवास्तात त्वां मत्वा मानुषं विभो।
परिदेवन्ति करुणं सर्वे मानुषबुद्धयः ॥ ३१ ॥
'तात ! प्रभो ! ये हमारे समस्त बन्धु-बान्धव तुममें मानव-बुद्धि ही रखते हैं और तुम्हे मनुष्य मानकर ही करुणाजनक विलाप करते हैं' ॥ ३१ ॥
तच्छ्रुत्वा रौहिणेयस्य वाक्यं संज्ञासमीरितम्।
विक्रम्यास्फोटयद् बाहू भित्त्वा तन्नागबन्धनम् ॥ ३२ ॥
रोहिणीनन्दन संकर्षणका यह सांकेतिक वचन सुनकर श्रीकृष्णने सर्पोंके उस बन्धनको तोड़ डाला और पराक्रम दिखाते हुए अपनी बाँहोंपर ताल ठोका ॥ ३२ ॥
तस्य पद्ध्यामाक्रम्य भोगराशिं जलोत्थितम्।
शिरस्तु कृष्णो जग्राह स्वहस्तेनावनाम्य च ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् जलके ऊपर उठे हुए उस सर्पके भारी शरीर-को अपने दोनों पैरोंसे दबाकर श्रीकृष्णने अपने हाथसे ही उसके मस्तकको झुकाकर पकड़ लिया ॥ ३३ ॥
तस्यारुरोह सहसा मध्यमं तन्महच्छिरः।
सोऽस्य मूर्ध्नि स्थितः कृष्णो ननर्त रुचिराङ्गदः ॥ ३४ ॥
फिर श्रीकृष्ण सहसा उसके विचले विशाल सिरपर चढ़ गये और उसीपर खड़े हो नृत्य करने लगे। उस समय उनकी भुजाओंमें सुन्दर बाजूबंद शोभा पा रहे थे ॥ ३४ ॥
मृद्यमानः स कृष्णेन शान्तमूर्धा भुजङ्गमः।
आस्यैः सरुधिरोद्गारैः कातरो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा मस्तकके कुचल दिये जानेपर उस सर्पका दिमाग ठंडा हो गया—उसके मस्तिष्ककी गर्मी शान्त हो गयी। वह अपने मुखोंसे खून उगलता हुआ कातर भावसे बोला—॥ ३५ ॥
अविज्ञानान्मया कृष्ण रोषोऽयं सम्प्रदर्शितः।
दमितोऽहं हतविषो वशगस्ते वरानन ॥ ३६ ॥
'सुमुख श्रीकृष्ण ! मैंने अज्ञानवश आपके सामने इस क्रोधका प्रदर्शन किया है। आपने मेरा दमन कर दिया। मेरा सारा विष नष्ट हो गया। अब मैं आपके अधीन हूँ ॥
तदाज्ञापय किं कुर्यां सदा सापत्यबान्धवः।
कस्य वा वशतां यामि जीवितं मे प्रदीयताम् ॥ ३७ ॥
'अतः आज्ञा दीजिये, मैं सदा ही अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित आपकी क्या सेवा करूँ ? अथवा किसके अधीन हो जाऊँ ? मुझे जीवन-दान दीजिये' ॥ ३७ ॥
पञ्चमूर्द्धानतं दृष्ट्वा सर्पं सर्पारिकेतनः।
अक्रुद्ध एव भगवान् प्रत्युवाचोरगेश्वरम् ॥ ३८ ॥
उस सर्पको अपने पाँचों मस्तकोंसे प्रणत हुआ देख भगवान् गरुडध्वजने क्रोध न करके नागराज कालियसे इस प्रकार कहा—॥ ३८ ॥
तवास्मिन् यमुनातोये नैव स्थानं ददाम्यहम्।
गच्छार्णवजलं सर्प सभार्यः सहबान्धवः ॥ ३९ ॥
'ओ सर्प ! मैं तुम्हे इस यमुनाजीके जलमे नहीं रहने दूँगा। तुम अपनी पत्नी तथा भाई-बन्धुओंके साथ समुद्रके जलमे चले जाओ ॥ ३९ ॥
यश्चेह भूयो दृश्येत स्थाने वा यदि वा जले।
तव भृत्यस्तनूजो वा क्षिप्रं वध्यः स मे भवेत् ॥ ४० ॥
'अब फिर यहाँ इस स्थानपर या जलमे यदि कोई भी सर्प दिखायी देगा तो वह तुम्हारा भृत्य हो या पुत्र, मेरे हाथसे शीघ्र मार डाला जायगा ॥ ४० ॥
शिवं चास्य जलस्यास्तु त्वं च गच्छ महार्णवम्।
स्थाने त्विह भवेद् दोषस्तवान्तकरणो महान् ॥ ४१ ॥
'इस जलकी शुद्धि हो जाय—यह लोगोंके लिये मङ्गल-कारी हो, इसलिये तुम महासागरमें चले जाओ। यहाँ रहनेपर तुम्हारे जीवनका अन्त कर देनेवाला महान् दोष प्राप्त होगा ॥
मत्पदानि च ते सर्प दृष्ट्वा मूर्धसु सागरे।
गरुडः पन्नगरिपुस्त्वयि न प्रहरिष्यति ॥ ४२ ॥
'सर्प ! समुद्रमें रहते समय भी तुम्हारे पाँचों मस्तकोंपर मेरे चरण-चिह्न देखकर सर्पोंके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं करेंगे' ॥ ४२ ॥
गृह्य मूर्ध्ना तु चरणौ कृष्णयोरगपुङ्गवः।
पश्यतामेव गोपानां जगामादर्शनं ह्रदात् ॥ ४३ ॥
तब नागप्रवर कालिय भगवान् श्रीकृष्णके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाकर गोपोंके देखते-देखते उस कुण्डसे अदृश्य हो गया ॥ ४३ ॥
निर्जिते तु गते सर्पे कृष्णसुत्तीर्य धिष्ठितम्।
विस्मितास्तुष्टुवुर्गोपाश्चक्रुश्चैव प्रदक्षिणम् ॥ ४४ ॥
जब वह सर्प हार मानकर चला गया और श्रीकृष्ण जलसे निकलकर किनारे खड़े हो गये, तब सब गोप आश्चर्यसे चकित हो उनकी स्तुति और परिक्रमा करने लगे ॥ ४४ ॥
ऊचुः सर्वे च सम्प्रीता नन्दगोपं वनेचराः।
धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यस्य ते पुत्र ईदृशः ॥ ४५ ॥
समस्त वनचारी गोपोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर नन्दगोपसे कहा—'गोपराज ! आप धन्य हैं, आपपर भगवान्की बड़ी भारी कृपा है, जिससे आपको ऐसा पुत्र मिला ॥ ४५ ॥
अद्यप्रभृति गोपानां गवां गोष्ठस्य चानघ।
आपत्सु शरणं कृष्णः प्रभुश्चायतलोचनः ॥ ४६ ॥
'निष्पाप नन्द ! आजसे सभी आपदाओके समय गोपों, गौओं और गोष्ठ (व्रज) के लिये ये विशाललोचन भगवान् श्रीकृष्ण ही शरणदाता और स्वामी हैं ॥ ४६ ॥