विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जाता शिवजला सर्वा यमुना मुनिसेविता ।
तीरे चास्याः सुखं गावो विचरिष्यन्ति नः सदा ॥ ४७ ॥
'मुनियोंसे सेवित समस्त यमुनाका जल अब सबके लिये सुखद एवं मङ्गलमय हो गया । अब हमारी गौएँ सदा इसके तटपर चरती-फिरती रहेंगी ॥ ४७ ॥
व्यक्तमेव वयं गोपा वने यत् कृष्णमीदृशम् ।
महद्गतं न जानीमश्छन्नमग्निमिव व्रजे ॥ ४८ ॥
'हम वनमें रहनेवाले गँवार ग्वारिये हैं'—यह बात स्पष्ट ही सत्य दिखायी देती है; क्योंकि ऐसे महान् आत्मा श्रीकृष्ण राखमें छिपी हुई आगकी तरह व्रजमें विद्यमान हैं, परंतु हम इनके महत्त्वको समझते ही नहीं हैं' ॥ ४८ ॥
एवं ते विस्मिताः सर्वे स्तुवन्तः कृष्णमव्ययम् ।
जग्मुर्गोपगणा घोषं देवाश्चैत्ररथं यथा ॥ ४९ ॥
इस प्रकार वे विस्मित हुए समस्त गोपगण अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए गोष्ठमें चले गये; मानो देवता चैत्ररथ वनमें गये हों ॥ ४९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां कालियदमने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसंगमें कालियदमनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
बलरामद्वारा धेनुकासुरका वध और भयरहित तालवनमें गौओं तथा गोपोंका विचरण
वैशम्पायन उवाच
दमिते सर्पराजे तु कृष्णेन यमुनाह्रदे ।
तमेव चेरतुर्देशं सहितौ रामकेशवौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब श्रीकृष्णने यमुनाजीके कुण्डमें रहनेवाले नागराज कालियका दमन कर दिया, उसके बादसे वे दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण प्रायः उसी प्रदेशमें साथ-साथ विचरण करते थे ॥ १ ॥
आजग्मतुस्तौ सहितौ गोधनैः सह गामिनौ ।
गिरिं गोवर्द्धनं रम्यं वसुदेवसुतावुभौ ॥ २ ॥
एक दिन वसुदेवके वे दोनों पुत्र गोधनके साथ विचरते हुए परम रमणीय गोवर्धन पर्वतके निकट आये ॥ २ ॥
गोवर्द्धनस्योत्तरतो यमुनातीरमाश्रितम् ।
ददृशाते च तौ वीरौ रम्यं तालवनं महत् ॥ ३ ॥
वहाँ उन दोनों वीरोंने देखा—गोवर्धनसे उत्तर दिशामें यमुनाके तटका आश्रय लेकर एक विशाल एवं रमणीय ताल-वन शोभा पा रहा है ॥ ३ ॥
तौ तालपर्णप्रतते रम्ये तालवने रतौ ।
चेरतुः परमप्रीतौ वृषपोताविवोद्धतौ ॥ ४ ॥
ताड़के पत्तोंसे विस्तारको प्राप्त हुए उस रमणीय तालवन-में क्रीडापरायण हो वे दोनों भाई दो उद्दण्ड बछड़ोंके समान बड़ी प्रसन्नताके साथ विचरने लगे ॥ ४ ॥
स तु देशः सदा स्निग्धो लोष्टपाषाणवर्जितः ।
दर्भप्रायस्थलीभूतः सुमहान् कृष्णमृत्तिकः ॥ ५ ॥
वह विशाल प्रदेश सदा ही स्निग्ध (चिकना) रहता था, वहाँ ढेले और पत्थरोंके रोड़े नहीं थे। वहाँके स्थलोंपर प्रायः दर्भ (कुश, दूर्वा आदि) फैले हुए थे । उस स्थान-की मिट्टी काले रंगकी थी ॥ ५ ॥
तालैस्तैर्विपुलस्कन्धैरुच्छ्रितैः श्यामपर्वभिः ।
फलाग्रशाखिभिर्भाति नागहस्तैरिवोच्छ्रितैः ॥ ६ ॥
वहाँ जो ताड़के वृक्ष थे, उनके तने मोटे थे । वे सभी वृक्ष बहुत ऊँचे थे । उनके पर्वस्थान (गाँठ) काले रंगके थे और उनकी शाखाएँ फलोंसे भरी-पूरी थीं। उन तालवृक्षों-से उस स्थानकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो वहाँ अपनी सूँड ऊपरको उठाये बहुत-से हाथी खड़े हों ॥ ६ ॥
तत्र दामोदरो वाक्यमुवाच वदतां वरः ।
अहो तालफलैः पक्वैर्र्वासितेयं वनस्थली ॥ ७ ॥
स्वादून्यार्य सुगन्धीनि श्यामानि रसवन्ति च ।
पक्वतालानि सहितौ पातयावो लघुक्रमौ ॥ ८ ॥
वहाँ वक्ताओंमें श्रेष्ठ दामोदर (श्रीकृष्ण) ने संकर्षणसे कहा—'आर्य ! यहाँकी वनस्थली तो इन पके हुए तालफलों-की सुगन्धसे महक उठी है। ये काले और सुगन्धित ताल फल अवश्य ही स्वादिष्ट और सरस होंगे। हम दोनों भाई साथ-साथ रहकर शीघ्रतापूर्वक कदम उठाते हुए इन फलोंको यहाँ गिरावें ॥ ७-८ ॥
यद्येषामीदृशो गन्धो माधुर्यंघ्राणतर्पणः ।
रसेनामृतकल्पेन भवितव्यं च मे मतिः ॥ ९ ॥
'यदि इनकी गन्ध ऐसी है, जो अपनी मधुरतासे हमारी घ्राणेन्द्रियोंको तृप्त किये देती है तो मेरा विश्वास है कि इन फलोंको अमृततुल्य रससे युक्त होना चाहिये' ॥ ९ ॥
दामोदरवचः श्रुत्वा रौहिणेयो हसन्निव ।
पातयन् पक्वतालानि चालयामास तांस्तरूनू ॥ १० ॥