विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| [ विष्णुपर्व ] | त्रयोदशोऽध्यायः | २५१ |
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दामोदरकी यह बात सुनकर रोहिणीनन्दन बलराम हँसते हुए-से पके हुए तालफलोंको गिरानेके उद्देश्यसे उन वृक्षोंको हिलाने लगे ॥ १० ॥
तत्तु तालवनं नृणामसेव्यं दुरतिक्रमम् ।
निर्मांणभूतमिरिणं पुरुषादालयोपमम् ॥ ११ ॥
उस तालवनका सेवन मनुष्योंके लिये असम्भव हो गया था। उस वनको इस पारसे उस पारतक सकुशल लाँघ जाना अत्यन्त कठिन था। यद्यपि वह सारभूत स्थान था, तथापि राक्षसके घरकी भाँति मनुष्योंसे शून्य दिखायी देता था ॥ ११ ॥
दारुणो धेनुको नाम दैत्यो गर्दभरूपधृक् ।
खरयूथेन महता वृतः समनुसेवते ॥ १२ ॥
गर्दभरूपधारी धेनुक नामक दारुण दैत्य विशाल गदहोंकी टोलीसे घिरा हुआ उस वनमें रहता था ॥ १२ ॥
स तु तालवनं घोरं गर्दभः परिरक्षति ।
नृपक्षिश्वापदगणांस्त्रासयानः सुदुर्मतिः ॥ १३ ॥
वह गदहा असुर उस तालवनकी सब ओरसे रक्षा करता था। उसकी बुद्धि बहुत ही खोटी थी। वह मनुष्यों, पक्षियों तथा हिंसक जन्तुओंको भी आतंकित किये रहता था ॥ १३ ॥
तालशब्दं स तं श्रुत्वा संघुष्टं फलपातनात् ।
नामर्षयत् स संक्रुद्धस्तालखनमिव द्विपः ॥ १४ ॥
उन तालफलोंके गिरानेसे जो धमाकेकी आवाज होती थी, उसे सुनकर धेनुकासुर सहन न कर सका। जैसे ताल ठोंकनेकी आवाज सुनकर हाथी कुपित हो उठता है, उसी प्रकार वह भी अत्यन्त क्रोधमे भर गया ॥ १४ ॥
शब्दानुसारी संक्रुद्धो दर्पाद्विद्धसटाननः ।
स्तब्धाक्षो ह्रेषितपटुः खुरैर्विदारयन्महीम् ॥ १५ ॥
आविद्धपुच्छो हृषितो व्याप्तानन इवान्तकः ।
आपतन्नेव ददृशे रौहिणेयमुपस्थितम् ॥ १६ ॥
वह उस धमाकेके शब्दका अनुसरण करता हुआ बड़े रोषके साथ चला। घमंडमें भरकर अपने अयाल और सिरको घुमाता आ रहा था। उसकी आँखें स्तब्ध हो गयी थीं। वह बड़ी पटुताके साथ रेंक रहा था और अपनी टापोंसे पृथ्वीको विदीर्ण-सा किये देता था। उसकी पूँछ घूम रही थी, रोंगटे खड़े हो गये थे, वह मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ता था। उसने आते ही रोहिणीनन्दन बलरामको वहाँ उपस्थित देखा ॥ १५-१६ ॥
तालानां तमधो दृष्ट्वा स ध्वजाकारमव्ययम् ।
रौहिणेयं खरो दुष्टः सोऽदशद् दशनायुधः ॥ १७ ॥
ध्वजाकी-सी आकृतिवाले अविनाशी रोहिणीकुमारको ताड़ोंके नीचे खड़ा देख दाँतोंसे ही शस्त्रका काम लेनेवाले उस दुष्ट गदहेने उन्हें दाँतसे काट लिया ॥ १७ ॥
पद्भ्यामुभाभ्यां च पुनः पश्चिमाभ्यां पराङ्मुखः ।
जघानोरसि दैत्येन्द्रो रौहिणेयं निरायुधम् ॥ १८ ॥
फिर दूसरी ओर मुँह करके उस दैत्यराज धेनुकने बिना हथियार लिये खड़े हुए रोहिणीकुमारकी छातीमें अपने पिछले दो पैरोंद्वारा चोट पहुँचायी ॥ १८ ॥
ताभ्यामेव स जग्राह पद्भ्यां तं दैत्यगर्दभम् ।
आवर्तितमुखस्कन्धं प्रेरयंस्तालमूर्धनि ॥ १९ ॥
तब बलरामजीने उस गर्दभरूपधारी दैत्यके उन्हीं दोनों पैरोंको पकड़ लिया तथा उसके मुँह और कंधोंको घुमाते हुए उसे ताड़वृक्षके ऊपर दे मारा ॥ १९ ॥
सम्भग्नोरुकटीग्रीवो भग्नपृष्ठो दुराकृतिः ।
खरस्तालफलैः सार्धं पपात धरणीतले ॥ २० ॥
उसकी दोनों जाँघे, कमर और गर्दन टूट गयीं। पीठकी हड्डी भी चूर-चूर हो गयी। उसकी आकृति बहुत बिगड़ गयी और वह गर्दभासुर तालफलोंके साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २० ॥
तं गतासुं गतश्रीकं पतितं वीक्ष्य गर्दभम् ।
ज्ञातींस्तथापरांस्तस्य तृणराजानि सोऽक्षिपत् ॥ २१ ॥
धेनुकासुरको प्राणशून्य और श्रीहीन होकर पृथ्वीपर पड़ा देख बलरामजीने उसके दूसरे भाई-बन्धुओंको भी उसी प्रकार ताड़वृक्षपर दे मारा ॥ २१ ॥
सा भूर्गर्दभदेहैश्च तालैः पक्वेश्च पातितैः ।
बभासे छन्नजलदा द्यौरिवाव्यक्तशारदी ॥ २२ ॥
वहाँकी भूमि गदहोंकी लाशों तथा गिराये गये परिपक्व तालफलोंसे आच्छादित हो, जिसमे शरद् ऋतुके लक्षण प्रकट न हुए हों और बादल छा रहे हों, ऐसे आकाशके समान सुशोभित होने लगी ॥ २२ ॥
तस्मिन् गर्दभदैत्ये तु सानुगे विनिपातिते ।
रम्यं तालवनं तद्धि भूयो रम्यतरं बभौ ॥ २३ ॥
सेवकोंसहित उस गर्दभरूपधारी दैत्यके मारे जानेपर वह सुरम्य तालवन और अधिक रमणीय प्रतीत होने लगा ॥ २३ ॥
विप्रमुक्तभयं शुभ्रं विविक्ताकारदर्शनम् ।
चरन्ति स्म सुखं गावस्तत् तालवनमुत्तमम् ॥ २४ ॥
उस शुभ्र तालवनका सारा भय दूर हो गया। उसके एकान्त प्रदेशका भी सबको दर्शन होने लगा तथा उस उत्तम वनमे गौएँ सुखपूर्वक चरने लगीं ॥ २४ ॥
ततः प्रविष्टास्ते सर्वे गोपा वनविचारिणः ।
वीतशोकभयायासाश्चञ्चूर्यन्ते समन्ततः ॥ २५ ॥
तदनन्तर वनमें विचरनेवाले सभी गोप उस तालवनमें जा घुसे। उनका शोक, भय और आयास दूर हो गया था, अतः वे वहाँ सब ओर बारंबार विचरण करने लगे ॥ २५ ॥