विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २५२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ततः सुखं प्रकीर्णासु गोषु नागेन्द्रविक्रमौ ।
द्रुमपर्णासनं कृत्वा तौ यथार्हं निषीदतुः ॥ २६ ॥
तदनन्तर जब गौएँ सुखपूर्वक सब ओर फैलकर चरने लगीं, तब गजराजके समान पराक्रमी श्रीकृष्ण और बलराम वृक्षोंके पत्तोंका आसन लगाकर यथोचित रीतिसे बैठ गये ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां धेनुकवधे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसंगमें धेनुकासुरका वधविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः
बलरामद्वारा प्रलम्बासुरका वध
वैशम्पायन उवाच
अथ तौ जातहर्षौ तु वसुदेवसुतावुभौ ।
तत् तालवनमुत्सृज्य भूयो भाण्डीरमागतौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर हर्षमें भरे हुए वे दोनों वसुदेवकुमार उस तालवनको छोड़कर पुनः भाण्डीरवटके पास आ गये ॥ १ ॥
चारयन्तौ विवृद्धानि गोधनानि शुभानि च ।
स्फीतसस्यप्ररूढानि वीक्षमाणौ वनानि च ॥ २ ॥
वहाँ वे हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर गोधनोंको चराते तथा बढ़ी हुई खेतीसे सम्पन्न वनस्थलियाँकी शोभा निहारते हुए विचरने लगे ॥ २ ॥
क्ष्वेडयन्तौ प्रगायन्तौ प्रचिन्वन्तौ च पादपान् ।
नामभिर्व्याहरन्तौ च सवत्सा गाः परंतपौ ॥ ३ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों भाई कभी ताल ठोंकते, कभी गीत गाते, कभी वृक्षोंके फल-फूल और पत्ते तोड़ते और कभी बछड़ेवाली गौओंको उनके नाम ले-लेकर पुकारते थे ॥ ३ ॥
निर्योणपाशैरासक्तैः स्कन्धाभ्यां शुभलक्षणौ ।
वनमालाकुलोरोस्कौ बालशृङ्गाविवर्षभौ ॥ ४ ॥
कंधेपर गौ बाँधनेकी रस्सी डाले, सुन्दर लक्षणोंसे सम्पन्न तथा वनमालासे विभूषित वक्षःस्थलवाले वे दोनों वीर नये सींगोंवाले बछड़ोंके समान शोभा पाते थे ॥ ४ ॥
सुवर्णाञ्जनचूर्णाभावन्वोन्यसदृशाम्बरौ ।
महेन्द्रायुधसंसक्तौ शुक्लकृष्णाविवाम्बुदौ ॥ ५ ॥
उन दोनोंमेंसे एकके शरीरकी कान्ति सुवर्ण-चूर्णके समान गौर थी, तो दूसरेकी अञ्जन-चूर्णके समान श्याम। वे दोनों एक दूसरेके अङ्गोंके समान रंगवाले वस्त्र धारण करते थे (अर्थात् गोरे बलभद्रका वस्त्र श्रीकृष्णकी अङ्गकान्तिके समान नीला था और श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका वस्त्र बलभद्रकी अङ्ग-प्रभाके समान सुनहरा एवं पीला था )। वे दोनों इन्द्रधनुषसे सटे हुए श्वेत और काले रंगके दो बादलोंके समान जान पड़ते थे ॥ ५ ॥
कुशाग्रकुसुमानां च कर्णपूरौ मनोरमौ ।
वनमार्गेषु कुर्वाणौ वन्यवेषधरावुभौ ॥ ६ ॥
वे दोनों वनके मार्गोंपर कुशोंके अग्रभाग तथा फूलोंके मनोरम कर्णपूर बनाकर धारण करते और वन्य वेष ग्रहण करके शोभा पाते थे ॥ ६ ॥
गोवर्धनस्यानु चरौ वने सानुचरौ तु तौ ।
चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ॥ ७ ॥
वनमें उन दोनोंके पीछे चलनेवाले बहुत-से गोप-बालक थे । उन्हें साथ लेकर वे दोनों भाई गोवर्धनके आस-पास विचरा करते थे । वे कभी किसीसे पराजित होनेवाले नहीं थे । भाण्डीरवटके पास लोक-प्रचलित बालकीडाओंद्वारा मन बहलाते हुए श्रीकृष्ण और बलराम विचरण करने लगे ॥
तावेवं मानुषीं दीक्षां वहन्तौ सुरपूजितौ ।
तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥ ८ ॥
इस प्रकार देवताओंद्वारा पूजित होनेपर भी वे दोनों मानवी दीक्षा ग्रहण करके मनुष्य-जातिके गुणोंसे युक्त क्रीडाएँ करते हुए वनमें घूमने लगे ॥ ८ ॥
तौ तु भाण्डीरमाश्रित्य बालक्रीडानुवर्तिनौ ।
प्राप्तौ परमशाखाढ्यं न्यग्रोधं शाखिनां वरम् ॥ ९ ॥
भाण्डीरके निकट आकर बालोचित क्रीड़ामे लगे हुए वे दोनों भाई उस उत्तम शाखाओंसे सम्पन्न एवं वृक्षोंमें श्रेष्ठ वटके नीचे आ गये ॥ ९ ॥
तत्र त्वान्दोलिकाभिश्च युद्धमार्गविशारदौ ।
अश्मभिः क्षेपणीयैश्च तौ व्यायाममकुर्वताम् ॥ १० ॥
युद्धकी प्रणालीमें परम चतुर वे दोनों भाई वहाँ कभी झूला झूलकर और कभी फेंकनेयोग्य पत्थर फेंककर व्यायाम करने लगे ॥ १० ॥
युद्धमार्गांश्च विविधैर्गोपालैः सहितावुभौ ।
मुदितौ सिंहविक्रान्तौ यथाकामं विचेरतुः ॥ ११ ॥