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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
२४८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

एतस्मिन्नन्तरे भीता गोपालाः सर्व एव ते।
क्रन्दमाना व्रजं जग्मुर्बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १५ ॥

इसी बीचमें समस्त ग्वालबाल भयभीत हो रोते हुए व्रजमें गये और अश्रुगद्गद वाणीमे इस प्रकार बोले ॥ १५ ॥

गोपा ऊचुः

एष मोहं गतः कृष्णो मग्नो वै कालिये हृदे।
भक्ष्यते सर्पराजेन तदागच्छत मा चिरम् ॥ १६ ॥

गोपोंने कहा—ये श्रीकृष्ण कालीदहमें डूबकर मूर्च्छित हो गये हैं और नागराज इन्हें खाये जाता है; अतः जल्दी आओ, देर न करो ॥ १६ ॥

नन्दगोपाय वै क्षिप्रं सबलाय निवेद्यताम्।
एष ते कृष्यते कृष्णः सर्पेणेति महाह्रदे ॥ १७ ॥

बल-बलसहित नन्दगोपसे कोई शीघ्र जाकर कह दो कि 'तुम्हारे कृष्णको सर्प महान् कुण्डमें खींचे लिये जाता है' ॥

नन्दगोपस्तु तच्छ्रुत्वा वज्रपातोपमं वचः।
आर्तः स्खलितविक्रान्तस्तं जगाम ह्रदोत्तमम् ॥ १८ ॥

वह वज्रपातके समान दारुण वचन सुनकर नन्दगोप शोकसे व्याकुल हो लड़खड़ाते हुए उस विशाल ह्रदके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥

सबालयुवतीवृद्धः स च संकर्षणो युवा।
आक्रीडं पन्नगेन्द्रस्य जलस्थं समुपागमत् ॥ १९ ॥

उनके साथ व्रजके बहुत-से बालक, वृद्ध और युवतियाँ भी थीं। रोहिणीके युवक पुत्र संकर्षण भी आ पहुँचे थे। ये सब-के-सब नागराजकी जलस्थ क्रीड़ाभूमिके पास आये ॥

नन्दगोपमुखा गोपास्ते सर्वे साश्रुलोचनाः।
हाहाकारं प्रकुर्वन्तस्तस्थुस्तीरे ह्रदस्य वै ॥ २० ॥

नन्द आदि वे सभी गोप नेत्रोंसे आँसू बहाते और हाहाकार करते हुए कालियदहके तटपर खड़े हो गये ॥२०॥

व्रीडिता विस्मिताश्चैव शोकार्ताश्च पुनः पुनः।
केचित् तु पुत्र हा हेति हा धिगित्यपरे पुनः ॥ २१ ॥

वे अपनी विवशतापर लज्जित थे। श्रीकृष्णका साहस देख-सुनकर आश्चर्यमें पड़े थे और उनके जीवनकी आशंकासे बारंबार शोकार्त हो जाते थे। कोई 'हाय बेटा ! हाय !' कहकर रो देते और दूसरे 'हाय ! धिक्कार है हम सबके जीवनको' ऐसा कहते हुए चिन्तामग्न हो जाते थे ॥ २१ ॥

अपरे हा हताः स्मेति रुरुदुर्भृशदुःखिताः।
स्त्रियश्चैव यशोदां तां हा हतासीति चुक्रुशुः ॥ २२ ॥
या पश्यसि प्रियं पुत्रं सर्पराजवशं गतम्।
स्पन्दितं सर्पभोगेन कृष्यमाणं यथा मृतम् ॥ २३ ॥

दूसरे लोग अत्यन्त दुखी हो 'हाय ! हम मारे गये।' ऐसा कहते हुए जोर-जोरसे रोते थे। व्रजकी स्त्रियाँ यशोदाकी ओर देख चिल्ला-चिल्लाकर कहती थीं—'हाय यशोदे ! तू बेमौत मारी गयी, क्योंकि अपने प्यारे लालाको आज इस नागराजके वशमें पड़ा हुआ देख रही हो। हाय ! वह सर्पके शरीरसे आबद्ध हो मृतककी भाँति घसीटा जा रहा है॥

अश्मसारमयं नूनं हृदयं ते विलक्ष्यते।
पुत्रं कथमिमं दृष्ट्वा यशोदे नावदीर्यसे ॥ २४ ॥

'यशोदे ! निश्चय ही तुम्हारा हृदय लोहेका बना हुआ दिखायी देता है। अरी ! पुत्रको इस दशामें देखकर तुम्हारी छाती फट क्यों नहीं जाती ? ॥ २४ ॥

दुःखितं बत पश्यामो नन्दगोपं ह्रदान्तिके।
न्यस्य पुत्रमुखे दृष्टिं निश्चेतनमवस्थितम् ॥ २५ ॥

'हाय ! हम देखते हैं, नन्दबाबा अत्यन्त दुखी हो कालियदहके निकट लाला कन्हैयाके मुखपर अपनी दृष्टि जमाये अचेत-से खड़े हैं ॥ २५ ॥

यशोदामनुगच्छन्त्यः सर्पावासमिमं ह्रदम्।
प्रविशामो न यास्यामो विना दामोदरं व्रजम् ॥ २६ ॥

'हम सब-की-सब यशोदाजीके पीछे-पीछे सर्पोंके निवास-स्थान इस ह्रदमें प्रवेश कर जायँगी, किंतु दामोदर (श्रीकृष्ण) को साथ लिये बिना व्रजको नहीं लौटेंगी ॥२६॥

दिवसः को विना सूर्ये विना चन्द्रेण का निशा।
विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को व्रजः।
विना कृष्णं न यास्यामो विवत्सा इव धेनवः ॥ २७ ॥

'सूर्यके बिना दिन कैसा ? चन्द्रमाके बिना रात्रि कैसी ? साँड़के बिना गौएँ क्या ? तथा श्रीकृष्णके बिना व्रज कैसा ? बिना बछड़ेकी धेनुओके समान हम श्रीकृष्णके बिना व्रजको नहीं लौटेंगी' ॥ २७ ॥

तासां विलपितं श्रुत्वा तेषां च व्रजवासिनाम्।
विलापं नन्दगोपस्य यशोदारुदितं तथा ॥ २८ ॥
एकभावशरीरज्ञ एकदेहो द्विधा कृतः।
संकर्षणस्तु संक्रुद्धो बभाषे कृष्णमव्ययम् ॥ २९ ॥

उन गोपियोंका, व्रजवासियोंका तथा नन्दबाबाका विलाप और यशोदाजीका करुणापूर्ण रोदन सुनकर श्रीकृष्णके साथ अपने एक भाव और एक शरीरके सम्बन्धको जाननेवाले संकर्षण, जो वास्तवमे एक ही देहके दो भागोमेसे एक थे, कुपित हो अविनाशी श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले—॥२८-२९॥

कृष्ण कृष्ण महाबाहो गोपानां नन्दवर्धन।
दम्यतामेष वै क्षिप्रं सर्पराजो विषायुधः ॥ ३० ॥

'गोपोंका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण ! कृष्ण ! विष ही जिसका अस्त्र-शस्त्र है, उस सर्पराजका अब शीघ्र दमन करो ॥ ३० ॥

विष्णुपर्व ] द्वादशोऽध्यायः २४९


इमे नो बान्धवास्तात त्वां मत्वा मानुषं विभो।
परिदेवन्ति करुणं सर्वे मानुषबुद्धयः ॥ ३१ ॥
'तात ! प्रभो ! ये हमारे समस्त बन्धु-बान्धव तुममें मानव-बुद्धि ही रखते हैं और तुम्हे मनुष्य मानकर ही करुणाजनक विलाप करते हैं' ॥ ३१ ॥

तच्छ्रुत्वा रौहिणेयस्य वाक्यं संज्ञासमीरितम्।
विक्रम्यास्फोटयद् बाहू भित्त्वा तन्नागबन्धनम् ॥ ३२ ॥
रोहिणीनन्दन संकर्षणका यह सांकेतिक वचन सुनकर श्रीकृष्णने सर्पोंके उस बन्धनको तोड़ डाला और पराक्रम दिखाते हुए अपनी बाँहोंपर ताल ठोका ॥ ३२ ॥

तस्य पद्ध्यामाक्रम्य भोगराशिं जलोत्थितम्।
शिरस्तु कृष्णो जग्राह स्वहस्तेनावनाम्य च ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् जलके ऊपर उठे हुए उस सर्पके भारी शरीर-को अपने दोनों पैरोंसे दबाकर श्रीकृष्णने अपने हाथसे ही उसके मस्तकको झुकाकर पकड़ लिया ॥ ३३ ॥

तस्यारुरोह सहसा मध्यमं तन्महच्छिरः।
सोऽस्य मूर्ध्नि स्थितः कृष्णो ननर्त रुचिराङ्गदः ॥ ३४ ॥
फिर श्रीकृष्ण सहसा उसके विचले विशाल सिरपर चढ़ गये और उसीपर खड़े हो नृत्य करने लगे। उस समय उनकी भुजाओंमें सुन्दर बाजूबंद शोभा पा रहे थे ॥ ३४ ॥

मृद्यमानः स कृष्णेन शान्तमूर्धा भुजङ्गमः।
आस्यैः सरुधिरोद्गारैः कातरो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा मस्तकके कुचल दिये जानेपर उस सर्पका दिमाग ठंडा हो गया—उसके मस्तिष्ककी गर्मी शान्त हो गयी। वह अपने मुखोंसे खून उगलता हुआ कातर भावसे बोला—॥ ३५ ॥

अविज्ञानान्मया कृष्ण रोषोऽयं सम्प्रदर्शितः।
दमितोऽहं हतविषो वशगस्ते वरानन ॥ ३६ ॥
'सुमुख श्रीकृष्ण ! मैंने अज्ञानवश आपके सामने इस क्रोधका प्रदर्शन किया है। आपने मेरा दमन कर दिया। मेरा सारा विष नष्ट हो गया। अब मैं आपके अधीन हूँ ॥

तदाज्ञापय किं कुर्यां सदा सापत्यबान्धवः।
कस्य वा वशतां यामि जीवितं मे प्रदीयताम् ॥ ३७ ॥
'अतः आज्ञा दीजिये, मैं सदा ही अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित आपकी क्या सेवा करूँ ? अथवा किसके अधीन हो जाऊँ ? मुझे जीवन-दान दीजिये' ॥ ३७ ॥

पञ्चमूर्द्धानतं दृष्ट्वा सर्पं सर्पारिकेतनः।
अक्रुद्ध एव भगवान् प्रत्युवाचोरगेश्वरम् ॥ ३८ ॥
उस सर्पको अपने पाँचों मस्तकोंसे प्रणत हुआ देख भगवान् गरुडध्वजने क्रोध न करके नागराज कालियसे इस प्रकार कहा—॥ ३८ ॥

तवास्मिन् यमुनातोये नैव स्थानं ददाम्यहम्।
गच्छार्णवजलं सर्प सभार्यः सहबान्धवः ॥ ३९ ॥
'ओ सर्प ! मैं तुम्हे इस यमुनाजीके जलमे नहीं रहने दूँगा। तुम अपनी पत्नी तथा भाई-बन्धुओंके साथ समुद्रके जलमे चले जाओ ॥ ३९ ॥

यश्चेह भूयो दृश्येत स्थाने वा यदि वा जले।
तव भृत्यस्तनूजो वा क्षिप्रं वध्यः स मे भवेत् ॥ ४० ॥
'अब फिर यहाँ इस स्थानपर या जलमे यदि कोई भी सर्प दिखायी देगा तो वह तुम्हारा भृत्य हो या पुत्र, मेरे हाथसे शीघ्र मार डाला जायगा ॥ ४० ॥

शिवं चास्य जलस्यास्तु त्वं च गच्छ महार्णवम्।
स्थाने त्विह भवेद् दोषस्तवान्तकरणो महान् ॥ ४१ ॥
'इस जलकी शुद्धि हो जाय—यह लोगोंके लिये मङ्गल-कारी हो, इसलिये तुम महासागरमें चले जाओ। यहाँ रहनेपर तुम्हारे जीवनका अन्त कर देनेवाला महान् दोष प्राप्त होगा ॥

मत्पदानि च ते सर्प दृष्ट्वा मूर्धसु सागरे।
गरुडः पन्नगरिपुस्त्वयि न प्रहरिष्यति ॥ ४२ ॥
'सर्प ! समुद्रमें रहते समय भी तुम्हारे पाँचों मस्तकोंपर मेरे चरण-चिह्न देखकर सर्पोंके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं करेंगे' ॥ ४२ ॥

गृह्य मूर्ध्ना तु चरणौ कृष्णयोरगपुङ्गवः।
पश्यतामेव गोपानां जगामादर्शनं ह्रदात् ॥ ४३ ॥
तब नागप्रवर कालिय भगवान् श्रीकृष्णके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाकर गोपोंके देखते-देखते उस कुण्डसे अदृश्य हो गया ॥ ४३ ॥

निर्जिते तु गते सर्पे कृष्णसुत्तीर्य धिष्ठितम्।
विस्मितास्तुष्टुवुर्गोपाश्चक्रुश्चैव प्रदक्षिणम् ॥ ४४ ॥
जब वह सर्प हार मानकर चला गया और श्रीकृष्ण जलसे निकलकर किनारे खड़े हो गये, तब सब गोप आश्चर्यसे चकित हो उनकी स्तुति और परिक्रमा करने लगे ॥ ४४ ॥

ऊचुः सर्वे च सम्प्रीता नन्दगोपं वनेचराः।
धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यस्य ते पुत्र ईदृशः ॥ ४५ ॥
समस्त वनचारी गोपोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर नन्दगोपसे कहा—'गोपराज ! आप धन्य हैं, आपपर भगवान्की बड़ी भारी कृपा है, जिससे आपको ऐसा पुत्र मिला ॥ ४५ ॥

अद्यप्रभृति गोपानां गवां गोष्ठस्य चानघ।
आपत्सु शरणं कृष्णः प्रभुश्चायतलोचनः ॥ ४६ ॥
'निष्पाप नन्द ! आजसे सभी आपदाओके समय गोपों, गौओं और गोष्ठ (व्रज) के लिये ये विशाललोचन भगवान् श्रीकृष्ण ही शरणदाता और स्वामी हैं ॥ ४६ ॥

२५० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

जाता शिवजला सर्वा यमुना मुनिसेविता ।
तीरे चास्याः सुखं गावो विचरिष्यन्ति नः सदा ॥ ४७ ॥

'मुनियोंसे सेवित समस्त यमुनाका जल अब सबके लिये सुखद एवं मङ्गलमय हो गया । अब हमारी गौएँ सदा इसके तटपर चरती-फिरती रहेंगी ॥ ४७ ॥

व्यक्तमेव वयं गोपा वने यत् कृष्णमीदृशम् ।
महद्गतं न जानीमश्छन्नमग्निमिव व्रजे ॥ ४८ ॥

'हम वनमें रहनेवाले गँवार ग्वारिये हैं'—यह बात स्पष्ट ही सत्य दिखायी देती है; क्योंकि ऐसे महान् आत्मा श्रीकृष्ण राखमें छिपी हुई आगकी तरह व्रजमें विद्यमान हैं, परंतु हम इनके महत्त्वको समझते ही नहीं हैं' ॥ ४८ ॥

एवं ते विस्मिताः सर्वे स्तुवन्तः कृष्णमव्ययम् ।
जग्मुर्गोपगणा घोषं देवाश्चैत्ररथं यथा ॥ ४९ ॥

इस प्रकार वे विस्मित हुए समस्त गोपगण अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए गोष्ठमें चले गये; मानो देवता चैत्ररथ वनमें गये हों ॥ ४९ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां कालियदमने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसंगमें कालियदमनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥


त्रयोदशोऽध्यायः

बलरामद्वारा धेनुकासुरका वध और भयरहित तालवनमें गौओं तथा गोपोंका विचरण

वैशम्पायन उवाच

दमिते सर्पराजे तु कृष्णेन यमुनाह्रदे ।
तमेव चेरतुर्देशं सहितौ रामकेशवौ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब श्रीकृष्णने यमुनाजीके कुण्डमें रहनेवाले नागराज कालियका दमन कर दिया, उसके बादसे वे दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण प्रायः उसी प्रदेशमें साथ-साथ विचरण करते थे ॥ १ ॥

आजग्मतुस्तौ सहितौ गोधनैः सह गामिनौ ।
गिरिं गोवर्द्धनं रम्यं वसुदेवसुतावुभौ ॥ २ ॥

एक दिन वसुदेवके वे दोनों पुत्र गोधनके साथ विचरते हुए परम रमणीय गोवर्धन पर्वतके निकट आये ॥ २ ॥

गोवर्द्धनस्योत्तरतो यमुनातीरमाश्रितम् ।
ददृशाते च तौ वीरौ रम्यं तालवनं महत् ॥ ३ ॥

वहाँ उन दोनों वीरोंने देखा—गोवर्धनसे उत्तर दिशामें यमुनाके तटका आश्रय लेकर एक विशाल एवं रमणीय ताल-वन शोभा पा रहा है ॥ ३ ॥

तौ तालपर्णप्रतते रम्ये तालवने रतौ ।
चेरतुः परमप्रीतौ वृषपोताविवोद्धतौ ॥ ४ ॥

ताड़के पत्तोंसे विस्तारको प्राप्त हुए उस रमणीय तालवन-में क्रीडापरायण हो वे दोनों भाई दो उद्दण्ड बछड़ोंके समान बड़ी प्रसन्नताके साथ विचरने लगे ॥ ४ ॥

स तु देशः सदा स्निग्धो लोष्टपाषाणवर्जितः ।
दर्भप्रायस्थलीभूतः सुमहान् कृष्णमृत्तिकः ॥ ५ ॥

वह विशाल प्रदेश सदा ही स्निग्ध (चिकना) रहता था, वहाँ ढेले और पत्थरोंके रोड़े नहीं थे। वहाँके स्थलोंपर प्रायः दर्भ (कुश, दूर्वा आदि) फैले हुए थे । उस स्थान-की मिट्टी काले रंगकी थी ॥ ५ ॥

तालैस्तैर्विपुलस्कन्धैरुच्छ्रितैः श्यामपर्वभिः ।
फलाग्रशाखिभिर्भाति नागहस्तैरिवोच्छ्रितैः ॥ ६ ॥

वहाँ जो ताड़के वृक्ष थे, उनके तने मोटे थे । वे सभी वृक्ष बहुत ऊँचे थे । उनके पर्वस्थान (गाँठ) काले रंगके थे और उनकी शाखाएँ फलोंसे भरी-पूरी थीं। उन तालवृक्षों-से उस स्थानकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो वहाँ अपनी सूँड ऊपरको उठाये बहुत-से हाथी खड़े हों ॥ ६ ॥

तत्र दामोदरो वाक्यमुवाच वदतां वरः ।
अहो तालफलैः पक्वैर्र्वासितेयं वनस्थली ॥ ७ ॥
स्वादून्यार्य सुगन्धीनि श्यामानि रसवन्ति च ।
पक्वतालानि सहितौ पातयावो लघुक्रमौ ॥ ८ ॥

वहाँ वक्ताओंमें श्रेष्ठ दामोदर (श्रीकृष्ण) ने संकर्षणसे कहा—'आर्य ! यहाँकी वनस्थली तो इन पके हुए तालफलों-की सुगन्धसे महक उठी है। ये काले और सुगन्धित ताल फल अवश्य ही स्वादिष्ट और सरस होंगे। हम दोनों भाई साथ-साथ रहकर शीघ्रतापूर्वक कदम उठाते हुए इन फलोंको यहाँ गिरावें ॥ ७-८ ॥

यद्येषामीदृशो गन्धो माधुर्यंघ्राणतर्पणः ।
रसेनामृतकल्पेन भवितव्यं च मे मतिः ॥ ९ ॥

'यदि इनकी गन्ध ऐसी है, जो अपनी मधुरतासे हमारी घ्राणेन्द्रियोंको तृप्त किये देती है तो मेरा विश्वास है कि इन फलोंको अमृततुल्य रससे युक्त होना चाहिये' ॥ ९ ॥

दामोदरवचः श्रुत्वा रौहिणेयो हसन्निव ।
पातयन् पक्वतालानि चालयामास तांस्तरूनू ॥ १० ॥

[ विष्णुपर्व ]त्रयोदशोऽध्यायः२५१

दामोदरकी यह बात सुनकर रोहिणीनन्दन बलराम हँसते हुए-से पके हुए तालफलोंको गिरानेके उद्देश्यसे उन वृक्षोंको हिलाने लगे ॥ १० ॥

तत्तु तालवनं नृणामसेव्यं दुरतिक्रमम् ।
निर्मांणभूतमिरिणं पुरुषादालयोपमम् ॥ ११ ॥

उस तालवनका सेवन मनुष्योंके लिये असम्भव हो गया था। उस वनको इस पारसे उस पारतक सकुशल लाँघ जाना अत्यन्त कठिन था। यद्यपि वह सारभूत स्थान था, तथापि राक्षसके घरकी भाँति मनुष्योंसे शून्य दिखायी देता था ॥ ११ ॥

दारुणो धेनुको नाम दैत्यो गर्दभरूपधृक् ।
खरयूथेन महता वृतः समनुसेवते ॥ १२ ॥

गर्दभरूपधारी धेनुक नामक दारुण दैत्य विशाल गदहोंकी टोलीसे घिरा हुआ उस वनमें रहता था ॥ १२ ॥

स तु तालवनं घोरं गर्दभः परिरक्षति ।
नृपक्षिश्वापदगणांस्त्रासयानः सुदुर्मतिः ॥ १३ ॥

वह गदहा असुर उस तालवनकी सब ओरसे रक्षा करता था। उसकी बुद्धि बहुत ही खोटी थी। वह मनुष्यों, पक्षियों तथा हिंसक जन्तुओंको भी आतंकित किये रहता था ॥ १३ ॥

तालशब्दं स तं श्रुत्वा संघुष्टं फलपातनात् ।
नामर्षयत् स संक्रुद्धस्तालखनमिव द्विपः ॥ १४ ॥

उन तालफलोंके गिरानेसे जो धमाकेकी आवाज होती थी, उसे सुनकर धेनुकासुर सहन न कर सका। जैसे ताल ठोंकनेकी आवाज सुनकर हाथी कुपित हो उठता है, उसी प्रकार वह भी अत्यन्त क्रोधमे भर गया ॥ १४ ॥

शब्दानुसारी संक्रुद्धो दर्पाद्विद्धसटाननः ।
स्तब्धाक्षो ह्रेषितपटुः खुरैर्विदारयन्महीम् ॥ १५ ॥
आविद्धपुच्छो हृषितो व्याप्तानन इवान्तकः ।
आपतन्नेव ददृशे रौहिणेयमुपस्थितम् ॥ १६ ॥

वह उस धमाकेके शब्दका अनुसरण करता हुआ बड़े रोषके साथ चला। घमंडमें भरकर अपने अयाल और सिरको घुमाता आ रहा था। उसकी आँखें स्तब्ध हो गयी थीं। वह बड़ी पटुताके साथ रेंक रहा था और अपनी टापोंसे पृथ्वीको विदीर्ण-सा किये देता था। उसकी पूँछ घूम रही थी, रोंगटे खड़े हो गये थे, वह मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ता था। उसने आते ही रोहिणीनन्दन बलरामको वहाँ उपस्थित देखा ॥ १५-१६ ॥

तालानां तमधो दृष्ट्वा स ध्वजाकारमव्ययम् ।
रौहिणेयं खरो दुष्टः सोऽदशद् दशनायुधः ॥ १७ ॥

ध्वजाकी-सी आकृतिवाले अविनाशी रोहिणीकुमारको ताड़ोंके नीचे खड़ा देख दाँतोंसे ही शस्त्रका काम लेनेवाले उस दुष्ट गदहेने उन्हें दाँतसे काट लिया ॥ १७ ॥

पद्भ्यामुभाभ्यां च पुनः पश्चिमाभ्यां पराङ्मुखः ।
जघानोरसि दैत्येन्द्रो रौहिणेयं निरायुधम् ॥ १८ ॥

फिर दूसरी ओर मुँह करके उस दैत्यराज धेनुकने बिना हथियार लिये खड़े हुए रोहिणीकुमारकी छातीमें अपने पिछले दो पैरोंद्वारा चोट पहुँचायी ॥ १८ ॥

ताभ्यामेव स जग्राह पद्भ्यां तं दैत्यगर्दभम् ।
आवर्तितमुखस्कन्धं प्रेरयंस्तालमूर्धनि ॥ १९ ॥

तब बलरामजीने उस गर्दभरूपधारी दैत्यके उन्हीं दोनों पैरोंको पकड़ लिया तथा उसके मुँह और कंधोंको घुमाते हुए उसे ताड़वृक्षके ऊपर दे मारा ॥ १९ ॥

सम्भग्नोरुकटीग्रीवो भग्नपृष्ठो दुराकृतिः ।
खरस्तालफलैः सार्धं पपात धरणीतले ॥ २० ॥

उसकी दोनों जाँघे, कमर और गर्दन टूट गयीं। पीठकी हड्डी भी चूर-चूर हो गयी। उसकी आकृति बहुत बिगड़ गयी और वह गर्दभासुर तालफलोंके साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २० ॥

तं गतासुं गतश्रीकं पतितं वीक्ष्य गर्दभम् ।
ज्ञातींस्तथापरांस्तस्य तृणराजानि सोऽक्षिपत् ॥ २१ ॥

धेनुकासुरको प्राणशून्य और श्रीहीन होकर पृथ्वीपर पड़ा देख बलरामजीने उसके दूसरे भाई-बन्धुओंको भी उसी प्रकार ताड़वृक्षपर दे मारा ॥ २१ ॥

सा भूर्गर्दभदेहैश्च तालैः पक्वेश्च पातितैः ।
बभासे छन्नजलदा द्यौरिवाव्यक्तशारदी ॥ २२ ॥

वहाँकी भूमि गदहोंकी लाशों तथा गिराये गये परिपक्व तालफलोंसे आच्छादित हो, जिसमे शरद् ऋतुके लक्षण प्रकट न हुए हों और बादल छा रहे हों, ऐसे आकाशके समान सुशोभित होने लगी ॥ २२ ॥

तस्मिन् गर्दभदैत्ये तु सानुगे विनिपातिते ।
रम्यं तालवनं तद्धि भूयो रम्यतरं बभौ ॥ २३ ॥

सेवकोंसहित उस गर्दभरूपधारी दैत्यके मारे जानेपर वह सुरम्य तालवन और अधिक रमणीय प्रतीत होने लगा ॥ २३ ॥

विप्रमुक्तभयं शुभ्रं विविक्ताकारदर्शनम् ।
चरन्ति स्म सुखं गावस्तत् तालवनमुत्तमम् ॥ २४ ॥

उस शुभ्र तालवनका सारा भय दूर हो गया। उसके एकान्त प्रदेशका भी सबको दर्शन होने लगा तथा उस उत्तम वनमे गौएँ सुखपूर्वक चरने लगीं ॥ २४ ॥

ततः प्रविष्टास्ते सर्वे गोपा वनविचारिणः ।
वीतशोकभयायासाश्चञ्चूर्यन्ते समन्ततः ॥ २५ ॥

तदनन्तर वनमें विचरनेवाले सभी गोप उस तालवनमें जा घुसे। उनका शोक, भय और आयास दूर हो गया था, अतः वे वहाँ सब ओर बारंबार विचरण करने लगे ॥ २५ ॥

२५२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ततः सुखं प्रकीर्णासु गोषु नागेन्द्रविक्रमौ ।
द्रुमपर्णासनं कृत्वा तौ यथार्हं निषीदतुः ॥ २६ ॥

तदनन्तर जब गौएँ सुखपूर्वक सब ओर फैलकर चरने लगीं, तब गजराजके समान पराक्रमी श्रीकृष्ण और बलराम वृक्षोंके पत्तोंका आसन लगाकर यथोचित रीतिसे बैठ गये ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां धेनुकवधे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसंगमें धेनुकासुरका वधविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥


चतुर्दशोऽध्यायः

बलरामद्वारा प्रलम्बासुरका वध

वैशम्पायन उवाच

अथ तौ जातहर्षौ तु वसुदेवसुतावुभौ ।
तत् तालवनमुत्सृज्य भूयो भाण्डीरमागतौ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर हर्षमें भरे हुए वे दोनों वसुदेवकुमार उस तालवनको छोड़कर पुनः भाण्डीरवटके पास आ गये ॥ १ ॥

चारयन्तौ विवृद्धानि गोधनानि शुभानि च ।
स्फीतसस्यप्ररूढानि वीक्षमाणौ वनानि च ॥ २ ॥

वहाँ वे हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर गोधनोंको चराते तथा बढ़ी हुई खेतीसे सम्पन्न वनस्थलियाँकी शोभा निहारते हुए विचरने लगे ॥ २ ॥

क्ष्वेडयन्तौ प्रगायन्तौ प्रचिन्वन्तौ च पादपान् ।
नामभिर्व्याहरन्तौ च सवत्सा गाः परंतपौ ॥ ३ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों भाई कभी ताल ठोंकते, कभी गीत गाते, कभी वृक्षोंके फल-फूल और पत्ते तोड़ते और कभी बछड़ेवाली गौओंको उनके नाम ले-लेकर पुकारते थे ॥ ३ ॥

निर्योणपाशैरासक्तैः स्कन्धाभ्यां शुभलक्षणौ ।
वनमालाकुलोरोस्कौ बालशृङ्गाविवर्षभौ ॥ ४ ॥

कंधेपर गौ बाँधनेकी रस्सी डाले, सुन्दर लक्षणोंसे सम्पन्न तथा वनमालासे विभूषित वक्षःस्थलवाले वे दोनों वीर नये सींगोंवाले बछड़ोंके समान शोभा पाते थे ॥ ४ ॥

सुवर्णाञ्जनचूर्णाभावन्वोन्यसदृशाम्बरौ ।
महेन्द्रायुधसंसक्तौ शुक्लकृष्णाविवाम्बुदौ ॥ ५ ॥

उन दोनोंमेंसे एकके शरीरकी कान्ति सुवर्ण-चूर्णके समान गौर थी, तो दूसरेकी अञ्जन-चूर्णके समान श्याम। वे दोनों एक दूसरेके अङ्गोंके समान रंगवाले वस्त्र धारण करते थे (अर्थात् गोरे बलभद्रका वस्त्र श्रीकृष्णकी अङ्गकान्तिके समान नीला था और श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका वस्त्र बलभद्रकी अङ्ग-प्रभाके समान सुनहरा एवं पीला था )। वे दोनों इन्द्रधनुषसे सटे हुए श्वेत और काले रंगके दो बादलोंके समान जान पड़ते थे ॥ ५ ॥

कुशाग्रकुसुमानां च कर्णपूरौ मनोरमौ ।
वनमार्गेषु कुर्वाणौ वन्यवेषधरावुभौ ॥ ६ ॥

वे दोनों वनके मार्गोंपर कुशोंके अग्रभाग तथा फूलोंके मनोरम कर्णपूर बनाकर धारण करते और वन्य वेष ग्रहण करके शोभा पाते थे ॥ ६ ॥

गोवर्धनस्यानु चरौ वने सानुचरौ तु तौ ।
चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ॥ ७ ॥

वनमें उन दोनोंके पीछे चलनेवाले बहुत-से गोप-बालक थे । उन्हें साथ लेकर वे दोनों भाई गोवर्धनके आस-पास विचरा करते थे । वे कभी किसीसे पराजित होनेवाले नहीं थे । भाण्डीरवटके पास लोक-प्रचलित बालकीडाओंद्वारा मन बहलाते हुए श्रीकृष्ण और बलराम विचरण करने लगे ॥

तावेवं मानुषीं दीक्षां वहन्तौ सुरपूजितौ ।
तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥ ८ ॥

इस प्रकार देवताओंद्वारा पूजित होनेपर भी वे दोनों मानवी दीक्षा ग्रहण करके मनुष्य-जातिके गुणोंसे युक्त क्रीडाएँ करते हुए वनमें घूमने लगे ॥ ८ ॥

तौ तु भाण्डीरमाश्रित्य बालक्रीडानुवर्तिनौ ।
प्राप्तौ परमशाखाढ्यं न्यग्रोधं शाखिनां वरम् ॥ ९ ॥

भाण्डीरके निकट आकर बालोचित क्रीड़ामे लगे हुए वे दोनों भाई उस उत्तम शाखाओंसे सम्पन्न एवं वृक्षोंमें श्रेष्ठ वटके नीचे आ गये ॥ ९ ॥

तत्र त्वान्दोलिकाभिश्च युद्धमार्गविशारदौ ।
अश्मभिः क्षेपणीयैश्च तौ व्यायाममकुर्वताम् ॥ १० ॥

युद्धकी प्रणालीमें परम चतुर वे दोनों भाई वहाँ कभी झूला झूलकर और कभी फेंकनेयोग्य पत्थर फेंककर व्यायाम करने लगे ॥ १० ॥

युद्धमार्गांश्च विविधैर्गोपालैः सहितावुभौ ।
मुदितौ सिंहविक्रान्तौ यथाकामं विचेरतुः ॥ ११ ॥

विष्णुपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः २५३ .. नाना प्रकारके युद्धके पैंतरे दिखाते हुए वे दोनो सिंहके समान पराक्रमी वीर ग्वालबालोंके साथ रहकर अपनी इच्छाके अनुसार सानन्द विचरने लगे ॥ ११ ॥ तयो रमयतोरेव तल्लिप्तुरसुरोत्तमः । प्रलम्बोऽभ्यागमत् तत्र छिद्रान्वेषी तयोस्तदा ॥ १२ ॥ गोपालवेषमास्थाय वन्यपुष्पविभूषितः । लोभयानः स तौ वीरौ हास्यैः क्रीडनकैस्तथा ॥ १३ ॥ वे दोनों जब इस प्रकार खेलका आनन्द ले रहे थे, उसी समय उन्हें उठा ले जानेकी इच्छासे असुरोंमें श्रेष्ठ प्रलम्ब एक गोपबालकका वेष धारण करके वहाँ आया । उसने वन्य-पुष्पोंसे अपने-आपको विभूषित कर रखा था। वह उस समय उनका छिद्र (उन्हें उठा ले जानेका अवसर) ढूँढ़ रहा था और उन दोनों वीरोंको अपने हँसी-खेलसे लुभा रहा था ॥ सोऽवगाहत निश्शङ्कस्तेषां मध्यममानुषः । मानुषं वपुरास्थाय प्रलम्बो दानवोत्तमः ॥ १४ ॥ दानवप्रवर प्रलम्ब मनुष्य न होनेपर भी मनुष्यका शरीर धारण करके निःशङ्कभावसे उन बालकोंके बीच घुस गया ॥ प्रक्रीडिताश्च ते सर्वे सह तेनामरातिणा । गोपालवपुषं गोपा मन्यमानाः स्वबान्धवम् ॥ १५ ॥ वे सब बालक उस देवद्रोहीके साथ खेलने लगे । वह ग्वाल-बालका वेष धारण करके आया था, इसलिये समस्त गोप उसे अपना भाई-बन्धु ही मानते थे ॥ १५ ॥ स तु छिद्रान्तरप्रेप्सुः प्रलम्बो गोपतां गतः । दृष्टिं प्रणिदधे कृष्णे रौहिणेये च दारुणाम् ॥ १६ ॥ परंतु गोपवेशमें आया हुआ प्रलम्ब उन दोनों वीरोंकी दुर्बलताका अवसर ढूँढ़ रहा था, इसलिये उसने श्रीकृष्ण और बलरामपर क्रूरतापूर्ण दृष्टि डाली ॥ १६ ॥ अविषह्यं ततो मत्वा कृष्णमद्भुतविक्रमम् । रौहिणेयवधे यत्नमकरोद् दानवोत्तमः ॥ १७ ॥ श्रीकृष्णका पराक्रम अद्भुत था, इसलिये उन्हें अजेय मानकर उस दानवराजने रोहिणीकुमार बलरामजीको मारनेका प्रयत्न किया ॥ १७ ॥ हरिणाक्रीडनं नाम बालकीडनकं ततः । प्रक्रीडितास्तु ते सर्वे द्वौ द्वौ युगपदुत्पतन् ॥ १८ ॥ तदनन्तर वे सब ग्वाल-बाल हरिणाक्रीडनं नामक बालोचित खेल खेलने लगे । उसमें दो-दो बालक एक साथ उछलते हुए कुछ दूर जाते थे ॥ १८ ॥ १. एक निश्चित लक्ष्यके पास एक साथ दो-दो बालक हिरनकी भाँति उछलते हुए जाते हैं । जो दोनोंमें पहले पहुँच जाता है, वह विजयी होता है । हारा हुआ बालक जीते हुएको अपनी पीठपर चढ़ाकर मुख्य स्थानतक ले आता है, यही हरिणाक्रीडन है । कृष्णः श्रीदामसहितः पुप्लुवे गोपसूनुना । संकर्षणस्तु प्लुतवान् प्रलम्बेन सहानघ ॥ १९ ॥ गोपालास्त्वपरे द्वन्द्वं गोपालैरपरैः सह । प्रद्रुता लङ्घयन्तो वै तेऽन्योन्यं लघुविक्रमाः ॥ २० ॥ निष्पाप जनमेजय ! श्रीदामाके साथ श्रीकृष्ण और ग्वालबालके वेषमे आये हुए प्रलम्बके साथ संकर्षण कूद-कूद- कर चलने लगे। इसी तरह दूसरे ग्वालबाल अन्य ग्वालबालोंके साथ दो-दोकी जोड़ी बनाकर एक-दूसरेकों लाँघ जानेका प्रयत्न करते हुए शीघ्र गतिसे उछलते हुए चलने लगे ॥ श्रीदाममजयत् कृष्णः प्रलम्बं रोहिणीसुतः । गोपालैः कृष्णपक्षीयैर्गोपालास्त्वपरे जिताः ॥ २१ ॥ उस खेलमें श्रीकृष्णने श्रीदामाको, रोहिणीनन्दन बलरामने प्रलम्बको तथा अन्यान्य कृष्णपक्षीय गोपोंने दूसरे पक्षके गोपोंको पराजित कर दिया ॥ २१ ॥ ते वाहयन्तस्त्वन्योन्यं संहर्षात् सहसा द्रुताः । भाण्डीरस्कन्धमुद्दिश्य मर्यादां पुनरागमन् ॥ २२ ॥ जो-जो बालक हारे थे, वे अपने साथके विजयी बालकों- को पीठपर ढोते हुए हर्षके साथ सहसा दौड़े और भाण्डीर वृक्षके तनेतक पहुँचनेकी नियत सीमापर पहुँचकर फिर लौट आये ॥ संकर्षणं तु स्कन्धेन शीघ्रमुत्क्षिप्य दानवः । द्रुतं जगाम विमुखः सचन्द्र इव तोयदः ॥ २३ ॥ परंतु दानव प्रलम्ब बलरामजीको शीघ्र ही अपने कंधे- पर चढ़ाकर वहाँसे विमुख हो तीव्र गतिसे आकाशकी ओर चल दिया । उस समय वह ऊपरी भागमें चन्द्रमाको धारण किये काले मेघके समान जान पड़ता था ॥ २३ ॥ स भारमसहंस्तस्य रौहिणेयस्य धीमतः । ववृधे सुमहाकायः शक्राक्रान्त इवाम्बुदः ॥ २४ ॥ बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामके भारको सहन न कर सकनेके कारण वह दानव बढ़ने लगा । बढ़ते-बढ़ते वह विशालकाय हो इन्द्रका वाहन बने हुए मेघके समान प्रतीत होने लगा ॥ २४ ॥ स भाण्डीरवटप्रख्यं दग्धाञ्जनगिरिप्रभम् । स्वं वपुर्दर्शयामास प्रलम्बो दानवोत्तमः ॥ २५ ॥ दानवराज प्रलम्बने वहाँ अपने शरीरको भाण्डीरवट तथा जले हुए कजलगिरिके समान दिखाया ॥ २५ ॥ पञ्चस्तबकयुक्तेन मुकुटेनार्कवर्चसा । दीप्यमानाननो दैत्यः सूर्याक्रान्त इवाम्बुदः ॥ २६ ॥ उस दैत्यका मुख पाँच पुष्पगुच्छोंसे युक्त सूर्य-तुल्य तेजस्वी मुकुटसे देदीप्यमान था । उस मुकुटको धारण करके वह सूर्यसे आक्रान्त हुए काले मेघके समान जान पड़ता था ॥

२५४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे महाननो महाग्रीवः सुमहानान्तकोपमः । तत्र रोहिणीनन्दन बलरामके चरित्र और बलको भली- रौद्रः शकटचक्राक्षो नमयंश्चरणैर्महीम् ॥ २७ ॥ भाँति जाननेवाले श्रीकृष्णने मुसकराकर हर्षभरी सान्त्वना- उसका मुख बहुत बड़ा था, गरदन भी वैसी ही थी। युक्त वाणीमें उनसे कहा—॥ ३४ ॥ वह महाकाय दैत्य यमराजके समान भयंकर दिखायी देता अहोऽयं मानुषो भावो व्यक्तमेवानुपाल्यते । था। उसकी आँखें गाड़ीके पहिये-सी घूम रही थीं। वह अपने यस्त्वं जगन्मयं देवं गुह्याद् गुह्यतरं गतः ॥ ३५ ॥ पैरोंसे पृथ्वीको झुका देता था ॥ २७ ॥ स्मर नारायणात्मानं लोकानां त्वं विपर्यये । स्रग्दामलम्बाभरणः प्रलम्वाम्बरभूषणः । अवगच्छात्मानमऽऽत्मानं समुद्राणां समागमे ॥ ३६ ॥ वीरः प्रलम्बः प्रययौ लम्बतोय इवाम्बुदः ॥ २८ ॥ 'अहो ! आप तो स्पष्ट ही मानव-भावका अवलम्बन उसके गलेमें फूलोंकी लंबी माला शोभा दे रही थी। एवं पालन करते जा रहे हैं। आपका स्वरूप तो अखिल उसके वस्त्र और आभूषण भी बहुत बड़े-बड़े थे। वह वीर विश्वमय है। आप दिव्यस्वरूप तथा गुह्यसे भी गुह्यतर हैं। प्रलम्ब नीचेको गिरते हुए जलवाले मेघके समान तीव्र गतिसे आप ही समस्त लोकोंका संहार होनेपर नारायणरूपसे स्थित चला जा रहा था ॥ २८ ॥ होते हैं। आप अपने उस स्वरूपका स्मरण तो कीजिये। स जहाराथ वेगेन रौहिणेयं महासुरः । प्रलयकालमें जब सारे समुद्र मिलकर एक हो जाते हैं, उस सागरोपप्लवगतं कृत्स्नं लोकमिवान्तकः ॥ २९ ॥ समय आप जिस शेषशायी नारायणरूपसे विराजमान होते उस महान् असुरने रोहिणीनन्दन बलरामको बड़े वेगसे हैं, उसका स्वयं ही अनुभव कीजिये ॥ ३५-३६ ॥ हर लिया, ठीक उसी तरह जैसे प्रलयंकर काल एकार्णवमें पुरातनानां देवानां ब्रह्मणः सलिलस्य च । डूबे हुए समस्त लोकका अपहरण कर लेता है ॥ २९ ॥ आत्मवृत्तप्रभावाणां संस्मराद्यं च वै वपुः ॥ ३७ ॥ ह्रियमाणः प्रलम्बेन स तु संकर्षणो बभौ । 'पुरातन देवता, ब्रह्मा, जल तथा अपने चरित्र और उद्यमान इवाकाशे कालमेघेन चन्द्रमाः ॥ ३० ॥ प्रभाव—इन सबका आदि कारण तथा जो आपका शाश्वत प्रलम्बासुरके द्वारा हरकर ले जाये जाते हुए संकर्षण स्वरूप है, उसका स्मरण कीजिये ॥ ३७ ॥ आकाशमें ऐसे जान पड़ते थे; मानो कोई काला मेघ शिरः खं ते जलं मूर्त्तिः पादौ भूर्दहनो मुखम् । चन्द्रमाको अपने ऊपर बिठाकर लिये जा रहा हो ॥ ३० ॥ वायुर्लोकायुरुच्छ्वासो मनः सोमो ह्यभूत् तव ॥ ३८ ॥ स संदिग्धमिवात्मानं मेने संकर्षणस्तदा । 'आकाश आपका सिर है, जल मूर्ति है, पृथ्वी पैर है, दैत्यस्कन्धगतः श्रीमान् कृष्णं चेदमुवाच ह ॥ ३१ ॥ अग्नि मुख है, लोकोंको जीवन देनेवाली वायु आपका उस समय बलरामने अपने आपको प्राण-संशयकी उच्छ्वास है और चन्द्रमा आपका मन है ॥ ३८ ॥ स्थितिमें पड़ा हुआ समझा। तब दैत्यके कंधेपर बैठे हुए सहस्रास्यः सहस्राङ्गः सहस्रचरणेक्षणः । उन श्रीमान् संकर्षणने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ ३१ ॥ सहस्रपद्मनाभस्त्वं सहस्रांशुधरोऽरिहा ॥ ३९ ॥ हियेऽहं कृष्ण दैत्येन पर्वतोदग्रवर्मणा । 'आपके सहस्रों मुख, सहस्रों शरीर, सहस्रों हाथ-पैर प्रदर्शयित्वा महतीं मायां मानुषरूपिणीम् ॥ ३२ ॥ और सहस्रों नेत्र हैं। आपकी नाभिसे सहस्रों कमल प्रकट हो 'श्रीकृष्ण ! यह देखो ! मुझे कोई पर्वतके समान चुके हैं। आप सहस्र किरणोंवाले सूर्यको चक्ररूपसे धारण विशालकाय दैत्य हरकर लिये जाता है। इसने मनुष्यरूप- करके शत्रुओंका संहार करते हैं ॥ ३९ ॥' धारिणी महती मायाका प्रदर्शन करके मुझे भ्रममें डाल यत्त्वया दर्शितं लोके तत् पश्यन्ति दिवौकसः । दिया था ॥ ३२ ॥ यत् त्वया नोक्तपूर्वं हि कस्तदन्वेष्टुमर्हति ॥ ४० ॥ कथमस्य मया कार्यं शासनं दुष्टचेतसः । 'आपने पूर्वकालमें जो कुछ दिखाया है, संसारमे उसीको प्रलम्बस्य प्रवृद्धस्य दर्पाद् द्विगुणवर्चसः ॥ ३३ ॥ देवता लोग देखते हैं। आपने पहले जिसकी चर्चा नहीं की 'यह दुष्टात्मा दैत्य बढ़कर बहुत लंबा हो गया है। बलके है, उसका अनुसंधान कौन कर सकता है ? ॥ ४० ॥ मदसे इसकी कान्ति दुगुनी हो गयी है। मुझे किस तरह यद् वेदितव्यं लोकेऽस्मिंस्तत्त्वया समुदाहृतम् । इसका दमन करना चाहिये' ॥ ३३ ॥ विदितं यत् तवैकस्य देवा अपि न तद् विदुः ॥ ४१ ॥ तमाह सस्मितं कृष्णः साम्ना हर्षाकुलेन वै । 'जगत्में जो कुछ जानने योग्य है, उसका आपने अभिज्ञो रौहिणेयस्य वृत्तस्य च बलस्य च ॥ ३४ ॥ प्रतिपादन कर दिया है। एकमात्र आपको जो तत्त्व ज्ञात है, उसे देवता भी नहीं जानते ॥ ४१ ॥

विष्णुपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः - २५५

आत्मजं ते वपुर्व्योम्नि न पश्यन्त्यात्मसम्भवम् । यत् तु ते कृत्रिमं रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः ॥ ४२ ॥ 'आपका जो सहज, आकाशमे भी व्यापक एवं स्वयम्भू रूप है, उस (विशुद्ध सनातन एवं निर्गुण-निराकार रूप) को देवता भी देख या समझ नहीं पाते हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये आप जो सगुण-साकार रूपसे अवतार ग्रहण करते हैं, उसीकी देवता लोग पूजा एवं आराधना करते हैं॥४२॥

देवैर्न दृष्टश्रान्तस्ते तेनानन्त इति स्मृतः । त्वं हि सूक्ष्मो महानेकः सूक्ष्मैरपि दुरासदः ॥ ४३ ॥ 'देवताओंने भी आपका अन्त नहीं देखा है, इसलिये आप अनन्त माने गये हैं। आप ही सूक्ष्म, महान् और एक हैं। सूक्ष्म बुद्धि-इन्द्रियादिके द्वारा भी आपको जानना या पाना अत्यन्त कठिन है ॥ ४३ ॥

त्वय्येव जगतः स्तम्भे शाश्वती जगती स्थिता । अचला प्राणिनां योनिर्धारयत्यखिलं जगत् ॥ ४४ ॥ 'आप ही इस जगत्‌के आधारस्तम्भ हैं। आपपर प्रतिष्ठित होकर ही यह सनातन पृथ्वी अविचल भावसे सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करती है और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका स्थान बनती है ॥ ४४ ॥

चतुःसागरभोगस्त्वं चातुर्वर्ण्यविभागवित् । चतुर्युगेषु लोकानां चातुर्होत्रफलाशनः ॥ ४५ ॥ 'चारों समुद्र आपके स्वरूप हैं। आप चारों वर्णोंके विभागको जाननेवाले हैं। चारों युगोंमे लोकोंके चातुर्होत्र यज्ञका जो फल है, उसका उपभोग करनेवाले भी आप ही हैं ॥ ४५ ॥

यथाहमपि लोकानां तथा त्वं तच्च मे मतम् । उभावेकशरीरौ स्वो जगदर्थे द्विधाकृतौ ॥ ४६ ॥ 'जैसे मैं समस्त लोकोंका अन्तर्यामी आत्मा हूँ, वैसे ही आप भी हैं, यह मेरा मत है। हम दोनों ही एक शरीरवाले हैं, केवल जगत्‌के हितके लिये दो रूपोंमे प्रकट हुए हैं ॥ ४६ ॥

अहं वा शाश्वतः कृष्णस्त्वं वा शेषः पुरातनः । लोकानां शाश्वतो देवस्त्वं हि शेषः सनातनः । आवयोर्देहमात्रेण द्विधेदं धार्यते जगत् ॥ ४७ ॥ 'मैं सनातन विष्णु हूँ और आप पुरातन शेष हैं; तीनों लोकोंके सनातन देवता तथा सनातन शेष आप ही हैं; हमारा चिन्मय शरीरमात्र ही (विष्णु या अनन्तरूपसे) इस जड चेतनमय द्विविध जगत्‌को धारण करता है ॥ ४७॥

अहं यः स भवानेव यस्त्वं सोऽहं सनातनः । द्वावेव विहितौ ह्यावामेकदेहौ महाबलौ ॥ ४८ ॥ 'जो मैं हूँ, वह आप ही है। जो आप हैं, वह सनातन पुरुष मैं ही हूँ। हम दोनों ही एक आत्मा हैं, किंतु इस समय दो महाबली स्वरूपोंमें प्रकट हुए हैं ॥ ४८ ॥

तदास्से मूढवत् त्वं किं प्राणेन जहि दानवम् । मूर्ध्नि देवरिपुं देव वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ ४९ ॥ 'देव ! आप किंकर्तव्यविमूढ़की भाँति क्यों चुपचाप बैठे हैं ? बलपूर्वक इस दानवको मार डालिये। अपने वज्र-तुल्य मुक्केसे इस देवद्रोहीके मस्तकपर प्रहार कीजिये' ॥ ४९ ॥

वैशम्पायन उवाच

संस्मारितस्तु कृष्णेन रौहिणेयः पुरातनम् । बलेनापूर्यत तदा त्रैलोक्यान्तरचारिणा ॥ ५० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णने जब इस प्रकार पुरातन रहस्यका स्मरण दिलाया, तब रोहिणीनन्दन बलराम त्रिलोकीके भीतर व्याप्त हुए अनन्त बलसे परिपूर्ण हो गये ॥ ५० ॥

ततः प्रलम्बं दुर्वृत्तं स बद्धेन महाभुजः । मुष्टिना वज्रकल्पेन मूर्ध्नि चैनं समाहनत् ॥ ५१ ॥ तब उन महाबाहु वीरने दुराचारी प्रलम्बासुरके मस्तकपर अपनी बँधी हुई वज्रतुल्य मुष्टिकासे प्रहार किया ॥ ५१ ॥

तस्योत्तमाङ्गं स्वे काये विकपालं विवेश ह । जानुभ्यां चाहतः शेते गतासुर्दानवोत्तमः ॥ ५२ ॥ इससे उसकी खोपड़ी उड़ गयी और शेष मस्तक उसके धड़में ही धँस गया । फिर वह घायल हुआ दानवराज पृथ्वीपर घुटने टेककर गिर पड़ा और प्राणहीन होकर सदाके लिये सो गया ॥ ५२ ॥

जगत्यां विप्रकीर्णस्य तस्य रूपमभूत् तदा । प्रलम्बस्याम्बरस्थस्य मेघस्येव विदीर्यतः ॥ ५३ ॥ जैसे आकाशमे स्थित हुए मेघकी घटा जब छिन्न भिन्न होकर बिखर जाती है, उस समय उसका जैसा रूप दिखायी देता है, पृथ्वीपर टूक-टूक होकर बिखरे हुए प्रलम्बासुरका रूप भी वैसा ही दृष्टिगोचर हुआ ॥ ५३ ॥

तस्य भग्नोत्तमाङ्गस्य देहात् सुस्राव शोणितम् । बहुगैरिकसंयुक्तं शैलशृङ्गादिवोदकम् ॥ ५४ ॥ कटे-फटे मस्तकवाले उस असुरके शरीरसे खूनकी धारा बह चली, मानो पर्वतके शिखरसे अधिक गेरू मिला हुआ जल प्रवाहित हो रहा हो ॥ ५४ ॥

तं निहत्य प्रलम्बं तु संहृत्य बलमात्मनः । पर्यष्वजत वै कृष्णं रौहिणेयः प्रतापवान् ॥ ५५ ॥ इस प्रकार प्रलम्बासुरको मारकर अपने बलको पुनः समेट लेनेके बाद प्रतापी रोहिणीकुमार बलरामने श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया ॥ ५५ ॥

२५६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तं तु कृष्णश्च गोपाश्च दिविस्थाश्च दिवौकसः ।
तुष्टुवुर्निहते दैत्ये जयाशीर्भिर्महाबलम् ॥ ५६ ॥
उस समय उस दैत्यके मारे जानेपर श्रीकृष्ण, गोपगण तथा आकाशमें खड़े हुए देवता विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाबली बलरामजीकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥

बलेनायं हतो दैत्यो बालेनाक्लिष्टकर्मणा ।
विवदन्त्यशरीरिण्यो वाचः सुरसमीरिताः ॥ ५७ ॥
'अनायास ही महान् कर्म करनेवाले इस बालकने ऐसे महान् दैत्यको बलपूर्वक मार गिराया' इस प्रकार देवताओंकी कही हुई आकाशवाणी बारंबार प्रकट होने लगी ॥ ५७ ॥

बलदेवेति नामास्य देवैरुक्तं दिवि स्थितैः ।
बलं तु बलदेवस्य तदा भुवि जना विदुः ॥ ५८ ॥
उस समय आकाशमें खड़े हुए देवताओंने उनका नाम बलदेव रख दिया। तभीसे भूतलके मनुष्य बलदेवजीके बलको जानने लगे ॥ ५८ ॥

कर्मजं निहते दैत्ये देवैरपि दुरासदे ॥ ५९ ॥
जो देवताओंके लिये भी दुर्जय था, उस प्रलम्ब नामक दैत्यके मारे जानेपर बलरामजीको उनके पराक्रमके अनुसार वह (बलदेव) नाम प्राप्त हुआ था ॥ ५९ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां प्रलम्बवधे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसङ्गमें प्रलम्भासुरका वधविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥


पञ्चदशोऽध्यायः

इन्द्रोत्सवके विषयमें श्रीकृष्णकी जिज्ञासा तथा एक वृद्ध गोपके द्वारा उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच
तयोः प्रवृत्तयोरेवं कृष्णस्य च बलस्य च ।
वने विचरतोर्मासौ व्यतियातौ स्म वार्षिकौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! श्रीकृष्ण और बलराम दोनोंके इस प्रकार बाललीलामें प्रवृत्त होकर वनमें विचरते हुए वर्षाके दो मास व्यतीत हो गये ॥ १ ॥

व्रजमाजग्मतुस्तौ तु व्रजे शुश्रुवतुस्तदा ।
प्राप्तं शक्रमहं वीरौ गोपांश्चोत्सवलालसान् ॥ २ ॥
एक दिन जब वे दोनों वीर ब्रजमें आये, तब उन्होंने सुना कि इन्द्रयागके उत्सवका समय आ गया है और समस्त गोप उस उत्सवको देखनेके लिये लालायित हैं ॥ २ ॥

कौतूहलादिदं वाक्यं कृष्णः प्रोवाच तत्र तान् ।
कोऽयं शक्रमहो नाम येन वो हर्ष आगतः ॥ ३ ॥
तब श्रीकृष्णने कौतूहलवश उनसे यह बात पूछी—'यह इन्द्रयागका उत्सव क्या है ? जिससे तुमलोगोंको इतना हर्ष हो रहा है, ॥ ३ ॥

तत्र वृद्धतमस्त्वेको गोपो वाक्यमुवाच ह ।
श्रूयतां तात शक्रस्य यदर्थं ध्वज इज्यते ॥ ४ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर उन गोपोंमें सबसे बड़े-बूढ़े एक गोपने इस प्रकार कहा—'तात ! सुनो ! हमारे यहाँ इन्द्रके ध्वजकी पूजा किसलिये की जाती है, यह बताता हूँ ॥ ४ ॥

देवानामीश्वरः शक्रो मेघानां चारिसूदन ।
तस्य चायं महः कृष्ण लोकनाथस्य शाश्वतः ॥ ५ ॥
'शत्रुसूदन कृष्ण ! देवताओं और मेघोंके स्वामी देवराज इन्द्र हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्के सनातन रक्षक हैं। उन्हींका यह उत्सव मनाया जाता है ॥ ५ ॥

तेन संचोदिता मेघास्तस्य चायुधभूषिताः ।
तस्यैवाज्ञाकराः सस्यं जनयन्ति नवाम्बुभिः ॥ ६ ॥
'उन्हींसे प्रेरित हो उन्हींके आयुध (इन्द्रधनुष) से विभूषित हुए मेघ उनकी ही आज्ञाका पालन करते हुए नूतन जलकी वर्षा करके खेतीको उपजाते हैं ॥ ६ ॥

मेघस्य पयसो दाता पुरुहूतः पुरंदरः ।
सम्प्रहृष्टः स भगवान् प्रीणयत्यखिलं जगत् ॥ ७ ॥
'अनेक नामोंसे विभूषित भगवान् पुरन्दर (इन्द्र) मेघ और जलके दाता हैं। वे प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण जगत्को तृप्त करते हैं ॥ ७ ॥

तेन सम्पादितं सस्यं वयमन्ये च मानवाः ।
वर्तयामोपयुञ्जानास्तर्पयामश्च देवताः ॥ ८ ॥
'उनके द्वारा सम्पन्न की हुई खेतीसे जो अन्न पैदा होता है, उसीको हम तथा दूसरे मनुष्य खाते हैं, उसीका धर्मके कार्यमें भी उपयोग करते हुए देवताओंको यज्ञ आदिके द्वारा तृप्त करते हैं ॥ ८ ॥

देवे वर्षति लोकेऽस्मिंस्ततः सस्यं प्रवर्धते ।
पृथिव्यां तर्पितायां तु सामृतं लक्ष्यते जगत् ॥ ९ ॥
'इस संसारमें जब इन्द्रदेव वर्षा करते हैं, तब उसीसे खेतीकी उपज बढ़ती है। वर्षासे ही पृथ्वीके तृप्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् सजल दिखायी देता है ॥ ९ ॥

विष्णुपर्व ]षोडशोऽध्यायः२५७

क्षीरवत्यस्विमा गावो वत्सवत्यश्च निर्वृताः ।
तेन संवर्धितास्तात तृणैः पुष्टाः सपुङ्गवाः ॥ १० ॥

'तात ! उस वर्षासे बढ़ी हुई घासोंद्वारा ही साँड़ोंसहित ये गौएँ हृष्ट-पुष्ट होकर बछड़े देतीं और दूध देनेवाली होती हैं ॥ १० ॥

नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुक्षाऽर्दितो जनः ।
दृश्यते यत्र दृश्यन्ते तृप्तिमन्तो वलाहकाः ॥ ११ ॥

'जहाँ वर्षा करनेवाले मेघ दिखायी देते हैं, उस भूमिपर कभी अनाज और तृणका अभाव नहीं होता तथा वहाँके लोग कभी भूखसे पीड़ित नहीं देखे जाते हैं ॥ ११ ॥

दुदोह सवितुर्गा वै शक्रो दिव्याः पयस्विनीः ।
ताः क्षरन्ति नवं क्षीरं मेध्यं मेघौघधारितम् ॥ १२ ॥

'सूर्यदेवकी दिव्य किरणें पृथ्वीका जल सोखकर पयस्विनी (गौ अथवा जलवती) हो जाती हैं, तब इन्द्रदेव उनका दोहन करते हैं। उनके दोहन करनेपर वे किरणमयी गौएँ नूतन एवं पवित्र जलरूपी दूध प्रकट करती हैं, जिसे मेघोंकी घटारूप दुग्धपात्रमें संचित किया जाता है ॥ १२ ॥

वाय्वीरितं तु मेघेषु करोति निनदं महत् ।
जवेनावर्तितं चैव गर्जतीति जना विदुः ॥ १३ ॥

'वही वायुसे प्रेरित होकर वेगसे आवर्तित होनेपर मेघोंके भीतर अत्यन्त गम्भीर शब्द उत्पन्न करता है, जिसे लोग समझते हैं कि मेघ गर्जना कर रहा है ॥ १३ ॥

तस्य चैवोह्यमानस्य वायुयुक्तैर्वलाहकैः ।
वज्राशनिसमाः शब्दाः श्रूयन्ते नगभेदिनः ॥ १४ ॥

'वायुयुक्त मेघोंद्वारा ढोयी जाती हुई उस जलराशिका पर्वतभेदी शब्द ही वज्र एवं बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देता है ॥ १४ ॥

तज्जलं वज्रनिष्पेषैर्विमुञ्चति नभोगतैः ।
बहुभिः कामगैर्मेघैः शक्रो भृत्यैरिवेश्वरः ॥ १५ ॥

'जैसे राजा अपने सेवकोंसे काम लेता है, उसी प्रकार देवराज इन्द्र आकाशमें फैले हुए तथा इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाले बहुसंख्यक मेघोंद्वारा वज्रकी गड़गड़ाहटकी आवाजके साथ उस जलको इस भूतलपर बरसाते हैं ॥ १५ ॥

कचिद् दुर्दिनसंकाशैः क्वचिच्छिन्नाभ्रसंनिभैः ।
क्वचिद् भिन्नाञ्जनाकारैः क्वचिच्छीकरवर्षिभिः ॥ १६ ॥
मण्डयतीव देवेन्द्रो विश्वमेवं नभो घनैः ।
क्वचिच्छीकरमुक्ताभं कुरुते गगनं घनः ॥ १७ ॥

'कहीं वे मेघ दुर्दिन-से होकर सारे आकाशमें छा जाते हैं। कहीं फटे हुए बादलोंके रूपमें दिखायी देते हैं। कहीं खानसे काटकर निकाले गये कोयलेके समान काले होते हैं और कहीं जलकी छोटी-छोटी बूँदें बरसाते रहते हैं। इस तरह विभिन्न प्रकारके बादलोंद्वारा देवराज इन्द्र आकाश एवं विश्वको अलंकृत-सा करते रहते हैं। कहीं-कहीं तो बादल पानी बरसाकर आकाशको जलबिन्दुरूपी मोतियोंसे प्रकाशित कर देता है ॥ १६-१७ ॥

एवमेतत् पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः ।
पर्जन्यः सर्वभूतानां भवाय भुवि वर्षति ॥ १८ ॥

'इस प्रकार पर्जन्यदेव (इन्द्र) इस पृथ्वीके जलको सूर्यकी किरणोंद्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धिके लिये उसे मेघोंद्वारा भूतलपर बरसा देते हैं ॥ १८ ॥

यस्मात् प्रावृडियं कृष्ण शक्रस्य भुवि भाविनी ।
तस्मात् प्रावृषि राजानः सर्वे शक्रं मुदा युताः ।
महैः सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवाः ॥ १९ ॥

'श्रीकृष्ण! इसीलिये यह वर्षा ऋतु भूतलपर इन्द्रदेवकी पूजाका समय है; अतएव समस्त राजा वर्षा ऋतुमें बड़ी प्रसन्नताके साथ नाना प्रकारके उत्सवोंद्वारा देवराजकी पूजा करते हैं। हम तथा दूसरे मनुष्य भी ऐसा ही करते हैं' ॥१९॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां गोपवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णकी बाललीलाके प्रसंगमें गोपका वाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥


षोडशोऽध्यायः

श्रीकृष्णके द्वारा गिरियज्ञ एवं गोपूजनका प्रस्ताव करते हुए शरद् ऋतुका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
गोपवृद्धस्य वचनं श्रुत्वा शक्रपरिग्रहे ।
प्रभावज्ञोऽपि शक्रस्य वाक्यं दामोदरोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इन्द्र-महोत्सवको स्वीकार करनेके सम्बन्धमे उस बड़े-बूढ़े गोपका वचन सुनकर इन्द्रके प्रभावको जानते हुए भी श्रीकृष्णने यह बात कही—॥ १ ॥

वयं वनचरा गोपाः सदा गोधनजीविनः ।
गावोऽस्मद्दैवतं विद्धि गिरयश्च वनानि च ॥ २ ॥

'आर्य ! हमलोग वनमे रहनेवाले गोप हैं और सदा

२५८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गोधनसे अपनी जीविका चलाते हैं; अतः आपको मालूम होना चाहिये कि गौएँ, पर्वत और वन-ये ही हमारे देवता हैं ॥२॥
कर्षुकाणां कृषिवृत्तिः पण्यं विपणिजीविनाम् ।
गावोऽस्माकं परा वृत्तिरेतत् त्रैविद्यमुच्यते ॥ ३ ॥
'किसानोंकी जीविका है खेती, व्यापारसे जीवननिर्वाह करनेवाले वैश्योंकी जीविका-वृत्ति है खरीद-बिक्री और हमलोगोंकी सर्वोत्तम वृत्ति है गौओंका पालन । ये वार्तारूप विद्याके तीन भेद कहलाते हैं ॥ ३ ॥
विद्या यो यया युक्तस्तस्य सा दैवतं परम् ।
सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिणी ॥ ४ ॥
'जो जिस विद्यासे युक्त है, उसके लिये वही सर्वोत्तम देवता है, वही पूजा-अर्चाके योग्य है और वही उसके लिये उपकारिणी है ॥ ४ ॥
योऽन्यस्य फलमश्नानः करोत्यन्यस्य सत्क्रियाम् ।
द्वावनर्थौ स लभते प्रेत्य चेह च मानवः ॥५॥
'जो मनुष्य एक व्यक्तिसे फल पाकर उसे भोगता है और दूसरेकी पूजा (आदर-सत्कार) करता है, वह इस लोक और परलोकमें दो अनर्थोंका भागी होता है ॥ ५ ॥
कृष्यन्ता प्रथिता सीमा सीमान्तं श्रूयते वनम् ।
वनान्ता गिरयः सर्वे ते चास्माकं गतिर्ध्रुवा ॥ ६ ॥
'जहाँतक खेती होती है, वहाँतक ब्रजकी सीमा विख्यात है । सीमाके अन्तमें वन सुना जाता है और वनके अन्तमें समस्त पर्वत हैं । वे पर्वत ही हमारे अविचल आश्रय हैं ॥६॥
श्रूयन्ते गिरयश्चापि वनेऽस्मिन् कामरूपिणः ।
प्रविश्य तास्तास्तनवो रमन्ते स्वेषु सानुषु ॥ ७ ॥
'सुना जाता है कि इस वनमें रहनेवाले पर्वत भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं । वे भिन्न-भिन्न शरीरोंमें प्रवेश करके अपने शिखरोंपर मौजसे घूमते-फिरते हैं ॥ ७ ॥
भूत्वा केसरिणः सिंहा व्याघ्राश्च नखिनां वराः ।
वनानि खानि रक्षन्ति त्रासयन्तो वनच्छिदः ॥ ८ ॥
'वे ही अयालोंसे विभूषित सिंह और नखधारी जन्तुओंमें श्रेष्ठ व्याघ्र बनकर वनको काटने या हानि पहुँचानेवाले लोगोंको त्रास देते हुए अपने-अपने वनोंकी रक्षा करते हैं ॥ ८ ॥
यदा चैपां विकुर्वन्ति ते वनालयजीविनः ।
घ्नन्ति तानेव दुर्घृत्तान् पौरुषादेन कर्मणा ॥ ९ ॥
'जब वनके आश्रयमें रहकर जीवननिर्वाह करनेवाले लोग इन वनों या वनदेवताओंको हानि पहुँचाते हैं, तब वे कामरूपी देवता राक्षसोचित हिंसाकर्मके द्वारा उन दुराचारी मनुष्योंको निश्चय ही मार डालते हैं ॥ ९ ॥
मन्त्रयज्ञपरा विप्राः सीतायज्ञाश्च कर्षुकाः ।
गिरियज्ञास्तथा गोपा इज्योऽस्माभिर्गिरिर्वने ॥ १० ॥
'ब्राह्मणलोग मन्त्रयज्ञमें तत्पर रहते हैं, किसान सीता-यज्ञ करते हैं अर्थात् खेतोंको अच्छी तरह जोतते और हल जोतनेसे जो रेखा बन जाती है, उसकी तथा हलकी पूजा करते हैं तथा गोपगण गिरियज्ञ करते हैं; अतः हमलोगोंको इस वनमें गिरियज्ञ करना चाहिये ॥ १० ॥
तन्मह्यं रोचते गोपा गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् ।
कर्म कृत्वा सुखस्थाने पादपेष्वथवा गिरौ ॥११॥
तत्र हत्वा पशून् मेध्यान् वृत्तत्यायतने शुभे ।
सर्वघोषस्य संदोहः क्रियतां किं विचार्यते ॥ १२॥
'गोपगण ! मुझे तो वही अच्छा लगता है कि गिरियज्ञका आरम्भ हो । स्वस्तिवाचन आदि कर्म करके वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतके समीप किसी सुखद स्थानपर पवित्र पशुओंको एकत्र करके उनके पास जाकर उनका विस्तारपूर्वक पूजन किया जाय और एक शुभ मन्दिरमें सारे ब्रजके दूधका संग्रह कर लिया जाय । इस विषयमें आपलोग क्या विचार कर रहे हैं ॥ ११-१२ ॥
तं शरत्कुसुमापीडाः परिवार्थ प्रदक्षिणम् ।
गावो गिरिवरं सर्वास्ततो यान्तु पुनर्व्रजम् ॥ १३ ॥
'फिर शरद् ऋतुके फूलोंसे जिनके मस्तकका शृङ्गार किया गया हो, ऐसी समस्त गौएँ गिरिवर गोवर्धनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करके पुनः ब्रजमें जायें ॥ १३ ॥
प्राप्ता किलेयं हि गवां स्वादुतोयतृणा गुणैः ।
शरत् प्रमुदिता रम्या गतमेघजलाशया ॥ १४ ॥
'इस समय प्रमोदनूर्ण रमणीय शरद्-ऋतु आ गयी है, जब कि जल और घास गौओंके लिये स्वादुताके गुणोंसे सम्पन्न हो जाते हैं । अब जलाशयोंमें पानी बरसानेवाले बादल छँट गये ॥ १४ ॥
प्रियकैः पुष्पितैर्गौरं श्यामं वाणासनैः क्वचित् ।
कठोरतृणमभाति निर्मयूररुतं वनम् ॥ १५ ॥
'खिले हुए कदम्ब-पुष्पोंके कारण वन गौरवर्णका प्रतीत होता है । कहीं कहीं वाणासनों—झाड़-झंखाड़ोंके कारण वह श्याम रंगका दिखायी देता है । अब घासें कोमल नहीं रहीं—कुछ कठोर हो गयी हैं । वनमे मोरोंकी मधुर वाणी नहीं सुनायी देती है ॥ १५ ॥
विजला विमला व्योम्नि विबलाका विविद्युतः ।
विवर्धन्ते जलधरा विदन्ता इव कुञ्जराः ॥ १६ ॥
'आकाशमे जल, मल, बलाका और विद्युत्‌से रहित बादल दन्तहीन हाथियोंके समान बढ़ रहे हैं ॥ १६ ॥
पदुना मेघवातेन नवतोयानुकारिणा ।
पर्णोत्करधनाः सर्वे प्रसादं यान्ति पादपाः ॥ १७ ॥
'( वर्षा ऋतुमे ) नूतन जलको खींच लानेवाले शक्ति-

विष्णुपर्व ] षोडशोऽध्यायः २५९ शाली मेघयुक्त वायुसे अभिषिक्त होनेके कारण जो पत्तोंके के-सब अनुपम शोभा-सम्पत्तिसे प्रकाशित हो उठे हैं ॥ २३ ॥ बाहुल्यसे घने दिखायी देते थे, वे सभी वृक्ष अब पत्तोंके पङ्कजानि च ताम्राणि तथान्यानि सितान्यपि । विरल हो जानेसे प्रसादको प्राप्त हो रहे हैं (पहले वहाँ उत्पलानि च नीलानि भेजिरे वारिजां श्रियम् ॥ २४ ॥ अन्धकार छाया रहता था अब प्रकाश हो गया है) ॥ १७ ॥ 'लाल कमल, अन्यान्य श्वेत-पीत आदि कमल तथा नील सितवर्णाम्बुदोष्णीषं हंसचामरवीजितम् । उत्पल भी जलजनित शोभाके भागी हुए हैं ॥ २४ ॥ पूर्णचन्द्रामलच्छत्रं साभिषेकमिवाम्बरम् ॥ १८ ॥ मदं जहुः सितापाङ्गा मन्दं ववुरिरेऽनिलाः । अभवद् व्यभ्रमाकाशमभूच्च निभृतोऽर्णवः ॥ २५ ॥ 'इस समय आकाश मूर्धाभिषिक्त राजाके समान जान पड़ता है। सफेद बादल ही उसकी श्वेत पगड़ी या उज्ज्वल

२६० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे 'शरद् ऋतुमें गौएँ पहलेसे दूना दूध देने लगी हैं। साँड़ दुगुने मतवाले हो उठे हैं। वनोंकी शोभा-सम्पत्ति दुगुनी बढ़ गयी है और पकी हुई खेतीके कारण यह पृथ्वी अनन्त गुणोंसे सम्पन्न हो गयी है ॥ ३१ ॥ ज्योतींषि घनमुक्तानि प्रसन्नवन्ति जलानि च। मनांसि च मनुष्याणां प्रसादमुपयान्ति वै ॥ ३२ ॥ 'बादलोंके आवरणसे मुक्त हुए ग्रह-नक्षत्र, कमल- मण्डित जल तथा मनुष्योंके मन प्रसाद ( स्वच्छता एवं प्रसन्नता ) को प्राप्त हो रहे हैं ॥ ३२ ॥ असृजत् सविता व्योम्नि निर्मुक्तो जलदैर्भृशम् । शरत्प्रज्वलितं तेजस्तीक्ष्णरश्मिर्विशोषयन् ॥ ३३ ॥ 'आकाशमें मेघमुक्त हुआ सूर्य शरद् ऋतुके प्रभावसे अधिक प्रज्वलित तेज ( धूप ) की सृष्टि करता है तथा अपनी किरणोंको और भी तीखी करके वसुधाके रसका शोषण कर रहा है ॥ ३३ ॥ नीराजयित्वा सैन्यानि प्रयान्ति विजिगीषवः । अन्योन्यराष्ट्राभिमुखाः पार्थिवाः पृथिवीक्षितः ॥ ३४ ॥ 'भूतलके नरेश अपने सैनिकोंसे उनके अस्त्रोंका मार्जन करवाकर ( उन्हें साथ ले ) विजयकी इच्छासे एक दूसरेके राष्ट्रकी ओर जा रहे हैं ॥ ३४ ॥ बन्धुजीवाभिताम्रासु बद्धपङ्कवतीषु च। मनस्तिष्ठति कान्तासु चित्रासु वनराजिषु ॥ ३५ ॥ 'बन्धुजीव ( बन्धूक ) के लाल फूलोंसे सुशोभित हो जो सब ओरसे लाल-लाल दिखायी देती हैं तथा जिनकी कीचड़ सूख गयी है, ऐसी विचित्र एवं कमनीय वनश्रेणियोंमें ( उनकी शोभा निहारनेके लिये ) मन आसक्त हो रहा है ॥ ३५ ॥ वनेषु च विराजन्ते पादपा वनशोभिनः । असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः ॥ ३६ ॥ इषुसाह्वा निकुम्भाश्च प्रियकाः स्वर्णकास्तथा । भूमराः पेचकाश्चैव केतक्यश्च समन्ततः ॥ ३७ ॥ 'वनकी शोभा बढ़ानेवाले असन, छितवन, कोविदार, बाणासन, निकुम्भ, प्रियक और स्वर्णक नामवाले वृक्ष वनोंमें फूलोंसे लदकर अधिक शोभा पा रहे हैं। केतकी ( केवड़े ) के वृक्ष भी सब ओर खिले हुए हैं। भूमर ( एक प्रकारके मृग ) और उल्लू भी सर्वत्र सानन्द विचरते हैं ॥ ३६-३७ ॥ व्रजेषु च विशेषेण गर्गरोद्गारहासिषु । शरत्प्रकाशयोपेव गोष्ठेष्वटति रूपिणी ॥ ३८ ॥ 'दूध-दहीके मटों या घड़ोंसे जो माखन आदि ढाले जाते हैं, वे ही जिनकी हंसी हैं, उन व्रजों एवं गोष्ठोंमें तो यह शरद् ऋतु मूर्तिमती सुन्दरी युवतीकी भाँति घूम -रही है ॥ ३८ ॥ नूनं त्रिदशभूयिष्ठं मेघकालसुखोषितम् । पतत्त्रिकेतनं देवं बोधयन्ति दिवौकसः ॥ ३९ ॥ 'निश्चय ही देवतालोग इस समय देवश्रेष्ठ भगवान् गरुडध्वजको, जो वर्षाकालमे सुखपूर्वक शयन कर चुके हैं, जगा रहे हैं ॥ ३९ ॥ शरद्येवं सुसस्यायां प्राप्तायां प्रावृषः क्षये । नीलचन्द्रार्कवर्णैश्च रचितं बहुभिर्द्विजैः ॥ ४० ॥ फलैः प्रवालैश्च घनमिन्द्रचापघनोपमम् । भवनाकारविटपं लतापरममण्डितम् ॥ ४१ ॥ विशालमूलावन्तं पवनाभोगमण्डितम् । अर्चयामो गिरिं देवं गाश्चैव च विशेषतः ॥ ४२ ॥ 'वर्षा बीत जानेपर ऐसी सुन्दर खेतीसे सुशोभित शरद् ऋतुका शुभागमन हुआ है। इस समय ( मेर्यके समान ) नीले, चन्द्रमाके समान श्वेत तथा सूर्यके सदृश सुनहरे रंगवाले बहुत-से पक्षियोंने जिसे बहुरंगा बना दिया है, जो विविध प्रकारके फलों और नूतन पल्लवोंसे घना हो रहा है और इसलिये जो इन्द्रधनुषसे युक्त श्याम मेघकी-सी शोभा धारण करता है, जिसके वृक्षोंकी एक-एक शाखा घरके समान जान पड़ती है, जो लता और वल्लारियोंसे भलीभाँति अलंकृत है, जिसका विशाल मूलभाग बहुत दूरतक फैला हुआ है तथा जो वायुके विस्तारसे सुशोभित होता है, वह गोवर्धन पर्वत ही हमारा देवता है। हम उसकी तथा इन गौओंकी विशेष रूपसे पूजा करें ॥ ४०-४२ ॥ सावतंसैर्विषाणैश्च वर्हापीडैश्च दंशितैः । घण्टाभिश्च प्रलम्बाभिः पुष्पैः शारदिकैस्तथा ॥ ४३ ॥ शिवाय गावः पूज्यन्तां गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् । पूज्यतां त्रिदशैः शक्रो गिरिरस्माभिरिज्यताम् ॥ ४४ ॥ 'गायोंके सींगोंमें मुकुट और मोरपंखके समान बने हुए आभूषण बाँधे जायँ । उनके गलेमें बड़ी घंटियाँ लटका दी जायँ और व्रजके कल्याणके लिये शरद्में सुलभ होनेवाले पुष्पोंद्वारा गौओंकी पूजा की जाय। साथ ही 'गिरियज्ञ' आरम्भ कर दिया जाय । देवतालोग इन्द्रकी पूजा करें और हमलोग गिरिराज गोवर्धनकी ॥ ४३-४४ ॥ कारयिष्यामि गोयज्ञं बलादपि न संशयः । यद्यस्ति मयि वः प्रीतिर्यदि वा सुहृदो वयम् । गावो हि पूज्याः सततं सर्वेषां नात्र संशयः ॥ ४५ ॥ 'यदि आपलोगोंका मुझपर प्रेम है और यदि हमलोग एक दूसरेके हितैषी सुहृद् हैं तो मैं आपके द्वारा हठ एवं बलपूर्वक गोयज्ञ कराऊँगा । गौएँ सदा ही सबके लिये पूजनीय हैं-इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥

विष्णुपर्व ]सप्तदशोऽध्यायः२६१

यदि साम्ना भवेत् प्रीतिर्भवतां वैभवाय च।
एतन्मम वचस्तथ्यं क्रियतामविचारितम् ॥ ४६ ॥

'यदि मेरे समझानेसे आपको प्रसन्नता होती हो तो आपलोग अपने ही वैभव (अभ्युदय) के लिये मेरी इस सच्ची बातको बिना विचारे मान लें और इसके अनुसार कार्य करें' ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शरद्वर्णने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शरद्वर्णनविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥


सप्तदशोऽध्यायः

गोपोंद्वारा श्रीकृष्णकी बातको स्वीकार करके गिरियज्ञका अनुष्ठान तथा भगवान्‌का दिव्य रूप धारण करके उनकी पूजा ग्रहण करनेके पश्चात् उन्हें वर देना

वैशम्पायन उवाच
दामोदरवचः श्रुत्वा हृष्टास्ते गोपजीविनः।
तद्वागमृतमासाद्य प्रत्युचुर्विशङ्कया ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दामोदर (श्रीकृष्ण) की बात सुनकर गौओंपर ही अपनी जीविका निर्भर करनेवाले वे गोपगण प्रसन्नतापूर्वक उनके वचनामृतका आस्वादन करके निःशङ्क होकर बोले—॥ १ ॥

तवैषा बाल महती गोपानां हितवर्द्धिनी।
प्रीणयत्येव नः सर्वान् बुद्धिवृद्धिकरी गवाम् ॥ २ ॥

'हमारे बाल-गोपाल ! तुम्हारी यह बुद्धि—यह विचार-धारा महत्त्वपूर्ण होनेके साथ ही गोपोंके लिये हितकर तथा गौओंकी वृद्धि करनेवाली है। यह हम सब लोगोंको तृप्ति ही प्रदान करती है ॥ २ ॥

त्वं गतिस्त्वं रतिश्चैव त्वं वेत्ता त्वं परायणम्।
भयेष्वभयदस्त्वं नस्त्वमेव सुहृदां सुहृत् ॥ ३ ॥

'तुम्हीं हमारी गति हो, तुम्हीं रति (आनन्द) हो, तुम्हीं सर्वज्ञ और तुम्हीं हमारे सबसे बड़े आश्रय हो। भयके अवसरोंपर तुम्हीं हमें अभय देनेवाले हो तथा तुम्हीं हमारे लिये सुहृदोंके भी सुहृद् हो ॥ ३ ॥

त्वत्कृते कृष्ण घोषोऽयं क्षेमी मुदितगोकुलः।
कृत्स्नो वसति शान्तारिर्यथा स्वर्गे गतस्तथा ॥ ४ ॥

'श्रीकृष्ण ! तुम्हारे कारण ही यह गोष्ठ सकुशल है। यहाँकी गौओंका समुदाय प्रसन्न है। सारे शत्रु शान्त हो गये हैं तथा समस्त व्रज, जैसे स्वर्गमें रह रहा हो, इस तरह यहाँ सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ४ ॥

जन्मप्रभृति कर्मैतद् देवैरसुकरं भुवि।
बोद्धव्याद्याभिमानाच्च विस्मितानि मनांसि नः ॥ ५ ॥

'जन्मकालसे ही तुमने जो यह शकट-भंग और पूतना-वध आदि कार्य किया है, यह इस भूतलपर देवताओंके लिये भी सुकर नहीं है। यह सब देखकर तथा समझमें आने योग्य तुम्हारा जो अभिमानपूर्ण वचन है (कि मैं बलपूर्वक गो-यज्ञ आदि कराऊँगा) उसपर ध्यान देकर हमारे चित्त चकित हो उठे हैं ॥ ५ ॥

बलेन च परार्ध्येन यशसा विक्रमेण च।
उत्तमस्त्वं मनुष्येषु देवेष्विव पुरंदरः ॥ ६ ॥

'तुम अपने परम उत्कृष्ट बल, सुयश और पराक्रमद्वारा मनुष्योंमें सबसे उत्तम हो। ठीक उसी तरह जैसे देवताओंमें इन्द्र सबसे श्रेष्ठ हैं ॥ ६ ॥

प्रतापेन च तीक्ष्णेन दीप्त्या पूर्णतयापि च।
उत्तमस्त्वं च मर्त्येषु देवेष्विव दिवाकरः ॥ ७ ॥

'तुम अपने तीक्ष्ण प्रताप, अनुपम दीप्ति तथा पूर्णता-की दृष्टिसे भी मनुष्योंमें उसी प्रकार सर्वश्रेष्ठ हो, जैसे देवताओं-में दिवाकर (सूर्य) ॥ ७ ॥

कान्त्या लक्ष्म्या प्रसादेन वदनेन स्मितेन च।
उत्तमस्त्वं च मर्त्येषु देवेष्विव निशाकरः ॥ ८ ॥

'मनोरम कान्ति, शोभा-सम्पत्ति, प्रसाद, सुन्दर मुख और मुसकराहटके कारण भी तुम देवताओंमें चन्द्रमाकी भाँति मनुष्योंमें सबसे उत्तम हो ॥ ८ ॥

बलेन वपुषा चैव बाल्येन चरितेन च।
स्यात् ते शक्तिधरस्तुल्यो न तु कश्चन मानुषः ॥ ९ ॥
यत् त्वयाभिहितं वाक्यं गिरियज्ञं प्रति प्रभो।
कस्तल्लङ्घयितुं शक्तो वेलामिव महोदधिः ॥ १० ॥

'बल, शरीर, बचपन और मनोहर चरित्रकी दृष्टिसे भी तुम्हारे समान शक्तिशाली मनुष्य दूसरा कोई नहीं है। प्रभो ! तुमने गिरियज्ञके विषयमें जो बात कही है, उसका उल्लङ्घन कौन कर सकता है? क्या महासागर कभी तटभूमिको लाँघ सका है ॥ ९-१० ॥

स्थितः शक्रमहस्तात श्रीमान् गिरिमहस्त्वयम्।
त्वत्प्रणीतोऽद्य गोपानां गवां हेतोः प्रवर्त्यताम् ॥ ११ ॥

'तात ! आजसे इन्द्र-यागका उत्सव स्थगित हो गया।

२६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


अब यह शोभासम्पन्न गिरियज्ञ, जिसे तुमने चालू किया है, गौओं और गोपोंके हितके लिये सम्पादित हो ॥ ११ ॥

भाजनान्युपकल्प्यन्तां पयसः पेशलानि च।
कुम्भाश्च विनिवेश्यन्तामुदपानेषु शोभनाः ॥ १२ ॥
पुर्यन्तां पयसा नद्यो द्रोण्यश्च विपुलायताः।
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च तत् सर्वमुपनीयताम् ॥ १३ ॥
भाजनानि च मांसस्य न्यस्यन्तामोदनस्य च।
त्रिरात्रं चैव संदोहः सर्वघोपस्य गृह्यताम् ॥ १४ ॥
विशस्यन्तां च पशवो भोज्या ये महिषादयः।
प्रवर्त्यतां च यज्ञोऽयं सर्वगोपसुसंकुलः ॥ १५ ॥

'दूधसे भरे हुए सुन्दर-सुन्दर पात्र एकत्र किये जायें। कुओंपर सुन्दर-सुन्दर घड़े स्थापित किये जायें। नयी बनायी हुई नहरों तथा बड़े-बड़े कुण्डोंको दूधसे भर दिया जाय। भक्ष्य-भोज्य और पेय सब कुछ तैयार कर लिया जाय। फलोंके गूदों तथा भातसे भरे हुए पात्र रखे जायें। सारे ब्रजका तीन दिनोंका सारा दूध संगृहीत कर लिया जाय। भोजन करानेयोग्य जो भैंस-गाय आदि ब्रजके पशु हैं, उन्हें बड़े आदरके साथ उत्तमोत्तम पदार्थ खिलाये जायें और इस प्रकार समस्त गोपोंके सहयोगसे सम्पन्न होनेवाले इस यज्ञका आरम्भ हो' ॥ १२-१५ ॥

आनन्दजननो घोषो महान् मुदितगोकुलः।
तूर्यप्रणादघोषैश्च वृषभाणां च गर्जितैः ॥ १६ ॥
हुम्भारवैश्च वत्सानां गोपानां हर्षवर्धनः।

फिर तो ब्रजमें आनन्दजनक महान् कोलाहल होने लगा। सारा गोकुल हर्षोल्लासमें मग्न हो गया। वाद्योंके गम्भीर घोष, साँड़ोंकी गर्जना और बछड़ोंके रँभानेसे जो सम्मिलित शब्द प्रकट हुआ, वह गोपोंका हर्ष बढ़ाने लगा ॥

दध्नो ह्रदो घृतावर्तः पयःकुल्यासमाकुलः ॥ १७ ॥
मांसराशिः प्रभूताढ्यः प्रकाशाौदनपर्वतः।
सम्प्रावर्तत यज्ञोऽस्य गिरेर्गोभिः समाकुलः।
तुष्टगोपजनाकीर्णो गोपनारीमनोहरः ॥ १८ ॥

दहीके कुण्डमें ऊपर-ऊपर घी छा रहा था। दूधकी अनेकों नहरें बहने लगीं। फलोंके गूदोंकी बड़ी भारी राशि जमा हो गयी। बहुत-से संस्कारक द्रव्य संचित हो गये और उज्ज्वल भातोंका पर्वताकार पुञ्ज प्रकाशित होने लगा। इस प्रकार गौओंसे भरा हुआ श्रीकृष्णका गिरियज्ञ चालू हो गया। संतुष्ट हुए समस्त गोपगण उसमें सम्मिलित होकर आवश्यक कार्य करते थे। गोपाङ्गनाओंने अपनी उपस्थितिसे उस महोत्सवको मनोहर बना दिया था ॥ १७-१८ ॥

भक्ष्याणां राशयस्तत्र शतशश्चोपकल्पिताः।
गन्धमाल्यैश्च विविधैर्धूपैरुच्चावचैस्तथा ॥ १९ ॥

वहाँ भक्ष्य पदार्थोंके सैकड़ों ढेर लगाये गये थे। नाना प्रकारके गन्ध, माल्य तथा भाँति-भाँतिके धूपोंसे वह यज्ञ सुशोभित होता था ॥ १९ ॥

अथाधिष्टत्तपर्यन्ते सम्प्राप्ते यज्ञसंधिधौ।
यज्ञं गिरेस्तिथौ सौम्ये चक्रुर्गोपा द्विजैः सह ॥ २० ॥

अग्निके समीप जो आज्यस्थाली और चरुस्थाली आदि रखी गयी थीं, वे उस यज्ञका विधान आरम्भ होते ही आगपर चढ़ा दी गयीं। ब्राह्मणोंसहित गोपोंने किसी शुभ तिथिको उस यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया था ॥ २० ॥

यजनान्ते तदन्नं तु तत् पयो दधि चोत्तमम्।
मांसं च मायया कृष्णो गिरिर्भूत्वा समश्नुते ॥ २१ ॥

यज्ञके अन्तमें श्रीकृष्ण स्वयं ही मायासे पर्वतके अधिष्ठाता देवता बनकर उस अन्न, दूध, दही और फलोंके गूदोंको भोग लगाने लगे ॥ २१ ॥

तर्पिताश्चापि विप्राग्र्यास्तुष्टाः सम्पूर्णमानसाः।
उत्तस्थुः प्रीतमनसः स्वस्ति वाच्यं यथासुखम् ॥ २२ ॥

उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अन्न-पानसे तृप्त और दक्षिणा से संतुष्ट किया गया था। उन सबके मनोरथ पूर्ण हो गये थे। वे सुखपूर्वक स्वस्तिवाचन करके प्रसन्नचित्त होकर उठे थे ॥ २२ ॥

भुक्त्वा चावभृथे कृष्णः पयः पीत्वा च कामतः।
संतुष्टोऽस्मीति दिव्येन रूपेण प्रजहास वै ॥ २३ ॥

यज्ञान्तस्नानके समय गिरिदेवके रूपमें प्रकट हुए श्रीकृष्ण अपनेको अर्पित किये गये भोज्य-पदार्थोंको खाकर और इच्छानुसार दूध पीकर बोले—'मैं पूर्णतः तृप्त हो गया।' ऐसा कहकर वे उस दिव्यरूपके द्वारा जोर-जोरसे हँसने लगे ॥

तं गोपाः पर्वताकारं दिव्यस्रगनुलेपनम्।
गिरिमूर्ध्नि स्थितं दृष्ट्वा कृष्णं जग्मुः प्रधानतः ॥ २४ ॥

दिव्य माला और अनुलेप धारण किये उन पर्वताकार देवताको पर्वतके शिखरपर खड़ा देख सब लोगोंने उन्हें प्रधानतः श्रीकृष्ण ही समझकर उनकी शरण ली ॥ २४ ॥

भगवानपि तेनैव रूपेणाच्छादितः प्रभुः।
सहितैः प्रणतो गोपैर्ववन्दात्मानमात्मना ॥ २५ ॥

प्रभावशाली भगवान् श्रीकृष्णने भी उसी रूपसे अपनेको छिपाये रखकर वहाँ एकत्र हुए गोपोंके साथ नतमस्तक हो स्वयं ही अपने-आपको प्रणाम किया ॥ २५ ॥

तमूचुर्विस्मिता गोपा देवं गिरिवरे स्थितम्।
भगवंस्त्वद्वशे युक्ता दासाः किं कुर्म किङ्कराः ॥ २६ ॥

गिरिराजके शिखरपर खड़े हुए उन पर्वत देवतासे समस्त गोपोंने विस्मित होकर कहा—'भगवन् ! हम आपके वशमें हैं; आपके दास एवं सेवक हैं, बताइये ! हम आपकी क्या सेवा करें' ॥ २६ ॥

[विष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६३


स उवाच ततो गोपान् गिरिप्रभवया गिरा ।
अद्यप्रभृति चेज्योऽहं गोषु यद्यस्तु वो दया ॥ २७ ॥
तब उन्होंने पर्वतसे प्रकट हुई वाणीद्वारा उन गोपोंसे कहा—‘यदि तुमलोगोंमें दयाभाव विद्यमान हो, तो आजसे तुम्हें गौओंके भीतर मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ २७ ॥

अहं वः प्रथमो देवः सर्वकामरः शुभः ।
मम प्रभावाच्च गवामयुतान्येव भोक्ष्यथ ॥ २८ ॥
‘मैं तुमलोगोंका प्रथम देवता हूँ, तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और शुभचिन्तक हूँ। तुम मेरे प्रभावसे दस हजार गौओंके स्वामी एवं (उनके दूध-दही आदि-के) उपभोक्ता बने रहोगे ॥ २८ ॥

शिवश्च वो भविष्यामि मद्‌भक्तानां वने वने ।
रंस्ये च सह युष्माभिर्यथा दिविगतस्तथा ॥ २९ ॥
‘मुझमें भक्ति रखनेवाले तुम गोपोंके लिये मैं प्रत्येक वनमें कल्याणकारी होऊँगा और तुमलोगोंके साथ मैं उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहूँगा, जैसे दिव्य धाममे रहा करता हूँ॥

ये चेमे प्रथिता गोपा नन्दगोपपुरोगमाः ।
एषां प्रीतः प्रयच्छामि गोपानां विपुलं धनम् ॥ ३० ॥
‘ये जो नन्द आदि विख्यात गोप हैं, मैं प्रसन्न होकर इन सबको प्रचुर धन-सम्पत्ति प्रदान करूँगा ॥ ३० ॥

पर्याप्नुवन्तु क्षिप्रं मां गावो वत्ससमाकुलाः ।
एवं मम परा प्रीतिर्भविष्यति न संशयः ॥ ३१ ॥
‘अब बछड़ोंसहित गौएँ शीघ्र मेरी परिक्रमा करें। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३१ ॥

ततो नीराजनार्थं हि वृन्दशो गोकुलानि तम् ।
परिवव्रुर्गिरिवरं सवृषाणि समन्ततः ॥ ३२ ॥
फिर तो झुंड-की-झुंड गौएँ साँड़ोंके साथ आकर परिक्रमाके लिये गिरिराजको सब ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं ॥

ता गावः प्रद्रुता हृष्टाः सापीड़स्तवकाङ्गदाः ।
सस्रजापीड़शृङ्गाग्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३३ ॥
उनके मस्तकपर फूलोंके आभूषण बँधे हुए थे, चारो पैरोंमें पुष्पगुच्छोंके ही बने हुए बाजूबंद पहनाये गये थे, सींगोंके अग्रभागमें फूलोंके गजरे और शिरोभूषण शोभा पा रहे थे, ऐसी सैकड़ों और हजारों गौएँ हर्षमें भरकर एक साथ परिक्रमाके पथपर दौड़ीं ॥ ३३ ॥

अनुजग्मुश्च गोपालाः कालयन्तो धनानि च ।
भक्तिच्छेदानुलिप्ताङ्गा रक्तपीतसिताम्बराः ॥ ३४ ॥
गोपगण अपने उन गोधनोको हाँकते हुए उनके पीछे-पीछे चले। उन गोपोके विभिन्न अङ्गोंमें विभागपूर्वक नाना रंगोंके अनुलेप लगे थे। वे लाल, पीले और सफेद कपड़ोंसे सुशोभित थे ॥ ३४ ॥

मयूरचित्राङ्गदिनो भुजैः प्रहरणावृतैः ।
'मयूरपत्रवृन्तानां केशबन्धैः सुयोजितैः ॥ ३५ ॥
वभ्राजुरधिकं गोपाः समवाये तदाद्भुते ।
उनकी भुजाओमे मोरपत्रके विचित्र बाजूवंद बँधे हुए थे और उन्हीं हाथोमे डंडे भी शोभा पा रहे थे। उनके सुन्दर ढंगसे बँधे हुए केशोंमे मोरपंखके वृन्त खोसे गये थे। इन सबके कारण उस अद्भुत समुदाय या मेलेमें उन गोपोंकी अधिक शोभा हो रही थी ॥ ३५ १/२ ॥

अन्ये वृषानाबुरुहुर्नृत्यन्ति स्म परे मुदा ॥ ३६ ॥
गोपालास्त्वपरे गांश्च जगृहुर्वेगगामिनः ।
कुछ अन्य गोप बैलोपर चढ़े थे। दूसरे ग्वाले हर्षमे भरकर नाच रहे थे तथा अन्य बहुत-से गोपाल वेगपूर्वक भागी जाती हुई गौओको पकड़ते थे ॥ ३६ १/२ ॥

तस्मिन् पर्यायनिवृत्ते गवां नीराजनोत्सवे ॥ ३७ ॥
अन्तर्धानं जगामाशु तेन देहेन सोऽचलः ।
गौओंद्वारा नीराजना (परिक्रमा) का वह उत्सव बारी-बारीसे सम्पन्न हो जानेपर वे पर्वतदेवता अपने उस दिव्य शरीरसे शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये ॥ ३७ १/२ ॥

कृष्णोऽपि गोपसहितो विवेश व्रजमेव ह ॥ ३८ ॥
गिरियज्ञप्रवृत्तेन तेनाश्चर्येण विस्मिताः ।
गोपाः सबालवृद्धा वै तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३९ ॥
इधर श्रीकृष्ण भी गोपोंके साथ व्रजमे ही चले गये। गिरियज्ञके अनुष्ठानसे प्राप्त हुए उस महान् आश्चर्यसे चकित हो बालकों और वृद्धोंसहित सम्पूर्ण गोप मधुसूदन श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे ॥ ३८-३९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गिरियज्ञप्रवर्तने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गिरियज्ञका अनुष्ठानविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥


अष्टादशोऽध्यायः

इन्द्रका संवर्तक मेघोंद्वारा वर्षा कराकर गौओं और गोपोंको कष्टमें डालना, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धनधारण तथा उसके नीचे गौओं और गोपोंसहित व्रजवासियोंका जाना

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
महे प्रतिहते शक्रः सक्रोधस्त्रिदशेश्वरः ।<br>संवर्तकं नाम गणं तोयदानामथाब्रवीत् ॥ १ ॥जनमेजय ! अपना उत्सव रोक दिये जानेके कारण देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने मेघोंके संवर्तक नामक गणको बुलाकर इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

२६४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे ]

भो वलाहकमातङ्गाः श्रूयतां मम भाषितम् ।
यदि वो मत्प्रियं कार्यं राजभक्तिपुरस्कृतम् ॥ २ ॥
'मतवाले हाथियोंके समान श्रेष्ठ मेघगण ! यदि तुम्हें राजभक्तिको सामने रखते हुए मेरा प्रिय कार्य करना उचित जान पड़े, तो मेरी यह बात सुनो ॥ २ ॥

एते वृन्दावनगता दामोदरपरायणाः ।
नन्दगोपादया गोपा विद्विषन्ति ममोत्सवम् ॥ ३ ॥
'ये वृन्दावनमें गये हुए जो नन्द आदि गोप हैं, वे दामोदर श्रीकृष्णको ही सबसे बड़ा सहारा मानकर मेरे उत्सव-से द्वेष रखने लगे हैं ॥ ३ ॥

आजीवो यः परस्तेषां गोपत्वं च यतः स्मृतम् ।
ता गावः सप्तरात्रेण पीड्यन्तां वर्षमारुतैः ॥ ४ ॥
'अतः मेरी आज्ञा है कि उन गोपोंकी जो सबसे बड़ी आजीविका है तथा जिनका पालन करनेके कारण उनका गोपत्व सार्थक माना गया है, नन्द आदिकी उन गौओंको तुम लगातार सात रातोंतक भारी वर्षा और वायुके द्वारा पीड़ित करो ॥ ४ ॥

ऐरावतगतश्चाहं स्वयमेवाम्बु दारुणम् ।
स्रक्ष्यामि वृष्टिं वातं च वज्राशनिसमप्रभम् ॥ ५ ॥
'मैं भी ऐरावतपर आरूढ़ हो चलता हूँ और स्वयं ही वज्र एवं बिजलीके साथ-साथ प्रकाशित होनेवाले भयानक जल-की वर्षा एवं वायुकी सृष्टि करूँगा ॥ ५ ॥

भवद्भिश्चण्डवर्षेण चरता मारुतेन च ।
हतास्ताः सब्रजा गावस्त्यक्ष्यन्ति भुवि जीवितम् ॥ ६ ॥
'तुमलोग प्रचण्ड वायुके साथ विचरते हुए जब घोर वर्षा करोगे, तब उससे आहत एवं पीड़ित हुई गौएँ भूतलपर ब्रजवासियोंसहित अपने प्राण त्याग देंगी' ॥ ६ ॥

एवमाज्ञापयामास सर्वान्जलधरान् प्रभुः ।
प्रत्याहते वै कृष्णेन शासने पाकशासनः ॥ ७ ॥
श्रीकृष्णद्वारा अपने उत्सव एवं शासनका विघात हो जानेपर प्रभावशाली पाकशासन इन्द्रने समस्त जलधरोंको इस प्रकार अपनी आज्ञा सुना दी ॥ ७ ॥

ततस्ते जलदाः कृष्णा घोरनादा भयावहाः ।
आकाशं छादयामासुः सर्वतः पर्वतोपमाः ॥ ८ ॥
तब वे घोर गर्जना करनेवाले पर्वताकार भयंकर काले मेघ आकाशमें सब ओर छा गये ॥ ८ ॥

विद्युत्सम्पातजननाः शक्रचापविभूषिताः ।
तिमिरावृतमाकाशं चक्रुस्ते जलदास्तदा ॥ ९ ॥
उस समय इन्द्रधनुषसे विभूषित हो बिजली गिराते हुए उन मेघोंने आकाशको अन्धकारपूर्ण कर दिया ॥ ९ ॥

गजा इवान्यसंयुक्ताः केचिन्मकरवर्चसः ।
नागा इवान्ये गगने चेरुर्जलदपुङ्गवाः ॥ १० ॥
कुछ मेघ दूसरे हाथियोंसे सटकर चलते हुए हाथियों-के समान प्रतीत होते थे। दूसरे मगरोंके समान प्रकाशित होते थे तथा अन्य बड़े-बड़े बादल आकाशमे नागोंके समान विचरने लगे ॥ १० ॥

तेऽन्योन्यं वपुषा बद्धा नागयूथायुतोपमाः ।
दुर्दिनं विपुलं चक्रुश्छादयन्तो नभस्तलम् ॥ ११ ॥
जैसे हजारों हाथियोंके झुंड एक दूसरेसे अपने शरीरको आवद्ध करके चल रहे हों, वैसे ही प्रतीत होनेवाले उन जलधरों ने आकाशको आच्छादित करके वहाँ बड़ा भारी दुर्दिन उपस्थित कर दिया ॥ ११ ॥

नृहस्तनागहस्ताभ्यां वेणूनां चैव संहतैः ।
धाराभिस्तुल्यरूपामिर्ववृषुस्ते वलाहकाः ॥ १२ ॥
मनुष्योंके हाथ, हाथियोंके शुण्डदण्ड तथा बाँसके तुल्य मोटी धाराएँ प्रकट करके वे मेघ वहाँ सब ओर वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥

समुद्रं मेनिरे तं हि खमारूढं नृचक्षुषः ।
दुर्विगाह्यमपर्यन्तमगाधं दुर्दिनं महत् ॥ १३ ॥
मनुष्योंकी आँखोंने आकाशमें छाये हुए उस दुरवगाह अनन्त अगाध एवं महान् दुर्दिनको समुद्रके समान ही माना ॥ १३ ॥

नैवापतन् वै खगमा दुद्रुवुर्मृगजातयः ।
पर्वताभेषु मेघेषु खे नदत्सु समन्ततः ॥ १४ ॥
आकाशमे चारों ओर पर्वताकार मेघ गर्जना कर रहे थे। उस समय पक्षियोंने उड़ना बंद कर दिया तथा विभिन्न जाति-के पशु इधर-उधर भागने लगे ॥ १४ ॥

नष्टसूर्येन्दुसदशैर्मेघैर्नभसि दारुणैः ।
अतिवृष्टेन लोकस्य विरूपमभवद् वपुः ॥ १५ ॥
चन्द्रमा और सूर्यको भी नष्ट कर देनेवाले प्रलयकालके समान आकाशमें छाये हुए उन भयंकर मेघोंने अपनी अति-वृष्टिके कारण समस्त पार्थिव जगत्के रूपको विकृत कर दिया ॥ १५ ॥

मेघौघैर्निष्प्रभाकारमदृश्यग्रहतारकम् ।
चन्द्रसूर्यांशुविरहितं खं बभूवातिनिष्प्रभम् ॥ १६ ॥
मेघोंकी घटाएँ घिर आनेसे व्योम-मण्डल प्रभाशून्य हो गया। ग्रह और तारे दृष्टिथसे ओझल हो गये। चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंका पता नहीं चलता था। अतः सारा आकाश अन्धकारसे आच्छन्न हो गया ॥ १६ ॥

वारिणा मेघमुक्तेन मुच्यमानेन चासकृत् ।
आबभौ सर्वतस्तत्र भूमिस्तोयमयी यथा ॥ १७ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६५

मेघोंके बरसाये हुए तथा बारंबार बरसाये जाते हुए जलसे आवृत हो वहाँ सब ओरकी भूमि जलमयी-सी प्रतीत होने लगी ॥ १७ ॥

विनेदुर्वर्हिणस्तत्र तोककन्दरुताः खगाः। विवृद्धिं निम्नगा याताः प्लवगाः सम्प्लवं गताः ॥ १८ ॥

उस समय वहाँ मोर जोर-जोरसे बोलने लगे। पक्षियोंकी आवाज बहुत कम हो गयी। नदियोंमें बाढ़ आ गयी और किनारेके वृक्ष प्रवाहमें बह गये ॥ १८ ॥

गर्जितेन च मेघानां पर्जन्यनिनदेन च। तर्जितानीव कम्पन्ते तृणानि तरुभिः सह ॥ १९ ॥

मेघोंकी गर्जना तथा पर्जन्यदेवके गम्भीर नादसे डाँटे गयेकी भाँति वृक्षोंसहित तृण काँपने लगे ॥ १९ ॥

प्राप्तोऽन्तकालो लोकानां व्यक्तमेकार्णवा मही । इति गोपगणा वाक्यं व्याहरन्ति भयार्दिताः ॥ २० ॥

उस समय भयसे पीड़ित हुए गोप आपसमें कहने लगे कि 'निश्चय ही समस्त लोकोंका अन्तकाल आ पहुँचा है और पृथ्वी एकार्णवमें मग्न हो रही है' ॥ २० ॥

तेनोत्पाताम्बुवर्षेण गावो विप्रहता भृशम् । हम्भारवैः क्रन्दमाना न चेलुः स्तम्भितोपमाः ॥ २१ ॥

उस उत्पातस्वरूप जलकी भारी वर्षासे अत्यन्त ताड़ित एवं पीड़ित हुई गौएँ रँभानेकी ध्वनिसे करुणक्रन्दन करती हुई हिल-डुल भी न सकीं। ऐसा जान पड़ता था, उनके सारे अङ्ग अकड़ गये हैं ॥ २१ ॥

निष्कम्पसक्थिचरणा निष्प्रयत्नखुराननाः । हृष्टरोमार्द्रतनवः क्षामकुक्षिपयोधराः ॥ २२ ॥

उनकी जाँघें और पैर हिल नहीं पाते थे, खुर और मुख निश्चेष्ट थे, भीगे हुए शरीरमें रोंगटे खड़े हो गये थे और पेट तथा थन अत्यन्त दुबले होकर सिकुड़ गये थे ॥२२॥

काश्चित् प्राणाञ्जहुः श्रान्ता निपेतुः काश्चिदातुराः । काश्चित्सवत्साः पतिता गावः शीकरवेजिताः ॥ २३ ॥

कुछ गौओंने पीड़ासे श्रान्त होकर अपने प्राण त्याग दिये। कुछ आतुर होकर गिर पड़ीं और कितनी ही गौएँ जलके छींटोंसे उद्विग्न होकर बछड़ोंसहित धराशायिनी हो गयीं ॥ २३ ॥

काश्चिदाक्रम्य क्रोडेन वत्सांस्तिष्ठन्ति मातरः । विमुखाः श्रान्तसक्थ्यश्च निराहाराः कृशोदराः। पेतुराता॑ वेपमाना गावो वर्षपराजिताः ॥ २४ ॥

कुछ गौमाताएँ बछड़ोंको अपने अङ्कमें छिपाकर खड़ी थीं, कितनी ही बछड़ोंकी ओरसे विमुख हो गयी थीं, उनकी जाँघें शिथिल हो रही थीं, कुछ दाना-घास न मिलनेके कारण उनके पेट भीतरको धँस गये थे। वर्षासे परास्त होकर पीड़ित हुई गौएँ थर-थर काँपती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ती थीं ॥ २४॥

वत्साश्चोन्मुखका बाला दामोदरमुखाः स्थिताः । त्राहीति वदनैर्दीनैः कृष्णमूचुरिवार्दिताः ॥ २५ ॥

छोटे-छोटे बछड़े मुँह ऊपर उठाकर दामोदरकी ओर देखते हुए खड़े थे, मानो वे पीड़ित बछड़े अपने दीन मुखों- से श्रीकृष्णको सम्बोधित करके कह रहे थे कि 'प्रभो ! हमारी रक्षा कीजिये' ॥ २५ ॥

गवां तत् कदनं दृष्ट्वा दुर्दिनागमजं महत् । गोपांश्चासन्ननिधनान् कृष्णः कोपं समादधे ॥ २६ ॥

इस दुर्दिनके आनेसे गौओंका वह महासंहार होता देख और गोपोंको भी मौतके निकट पहुँचा हुआ जान श्रीकृष्णने इन्द्रके प्रति महान् कोप धारण किया ॥ २६ ॥

स चिन्तयित्वा संरब्धो दृष्टो योगो मयेति च । आत्मानमात्मना वाक्यमिदमूचे प्रियंवदः ॥ २७ ॥

प्रिय वचन बोलनेवाले श्रीकृष्णने कुछ देर सोच- विचारकर रोषावेशसे युक्त हो स्वयं ही अपने-आपसे इस प्रकार कहा— 'इस वर्षासे बचनेका उपाय मैंने देख लिया ॥ २७ ॥

अद्याहमिममत्पाट्य सकाननवनं गिरिम् । कल्पयेयं गवां स्थानं वर्षत्राणाय दुर्धरम् ॥ २८ ॥

'आज मैं वन और काननोंसहित इस दुर्धर गोवर्धन पर्वतको उखाड़कर गौओंको वर्षासे बचानेके लिये सुरक्षित स्थानका निर्माण करूँगा ॥ २८ ॥

अयं धृतो मया शैलः पृथ्वीगृहनिभोपमः । त्रास्यते सव्रजा गा वै मद्ध्वयस्थ भविष्यति ॥ २९ ॥

'मेरे द्वारा धारण किया हुआ यह पर्वत पृथ्वीपर बने हुए घरके समान होकर व्रजसहित समूची गौओंका परित्राण करेगा और मेरे अधीन हो जायगा' ॥ २९ ॥

एवं स चिन्तयित्वा तु कृष्णः सत्यपराक्रमः । वाह्रोर्बलं दर्शयिष्यन् समीपं तं महीधरम् । दोर्भ्यामुत्पाटयामास कृष्णो गिरिरिवापरः ॥ ३० ॥

इस प्रकार सोच-विचारकर सत्यपराक्रमी श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंका बल दिखाते हुए उस निकटवर्ती पर्वतको दोनों हाथोंसे पकड़कर उखाड़ लिया। उस समय श्रीकृष्ण दूसरे पर्वतके समान ही जान पड़ते थे ॥ ३० ॥

स धृतः संगतो मेघैर्गिरिः सव्येन पाणिना। गृहभावं गतस्तत्र गृहाकारेण वर्चसा ॥ ३१ ॥

भगवान्‌के बाये हाथसे धारण किया गया और मेघोंसे सटा हुआ वह पर्वत उनके गृहाकारक तेज या संकल्पसे वहाँ गृहभावको प्राप्त हो गया ॥ ३१ ॥

२६६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


भूमेरुत्पाट्यमानस्य तस्य शैलस्य सानुषु।
शिलाः प्रशिथिलाश्चेलुर्वनिपेतुश्च पादपाः॥ ३२ ॥

जिस समय वह पर्वत पृथ्वीसे उखाड़ा जाने लगा, उस समय उसके शिखरोंपर जो टूटी-फूटी शिलाएँ थीं, वे खिसककर गिरने लगीं और बहुत-से वृक्ष भी धराशायी हो गये॥ ३२ ॥

शिखरैर्घूर्ण्यमानैश्च सीदमानैश्च पादपैः।
विधूतैश्चोच्छ्रितैः शृङ्गैर्नगमः खगमोऽभवत् ॥ ३३॥

उस समय चक्कर काटते हुए शिखरों, खण्डित होते हुए वृक्षों तथा काँपती हुई ऊँची चोटियोंके कारण वह अविचल पर्वत आकाशचारी पक्षीके समान प्रतीत होने लगा॥ ३३ ॥

चलत्प्रस्रवणैः पार्श्वैर्मेघौघैरकतां गतैः।
भिद्यमानाश्मनिचयश्चचाल धरणीधरः ॥ ३४ ॥

पार्श्ववर्ती चञ्चल झरने मेघोंके समूहोंसे मिलकर एकताको प्राप्त हो गये। वह पर्वत हिलने लगा और उसकी प्रस्तरराशि विदीर्ण होकर बिखरने लगी ॥ ३४ ॥

न मेघानां प्रवृत्तानां न शैलस्याश्मवर्षिणः।
विविदुस्ते जना रूपं वायोस्तस्य च गर्जतः ॥ ३५ ॥

उस पर्वतके नीचे गर्भगृहमें बैठे हुए वे सब लोग न तो बरसते हुए मेघोंका, न पत्थर बरसानेवाले पर्वतका और न गरजती हुई वायुका ही स्वरूप जान सके ॥ ३५ ॥

मेघैः सशैलसंस्थानैर्नीलैः प्रस्रवणार्पितैः।
मिश्रीकृत इवाभाति गिरिरुद्धमवर्हवान् ॥३६॥

झरनोंसे मिले हुए पर्वताकार नील मेघोंसे मिश्रित हुआ वह पर्वत पंख उठाये हुए मोरके समान प्रतीत होता था ॥ ३६ ॥

आप्लुतोऽयं गिरिः पक्षैरिति विद्याधरोरगाः।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव वाचो मुञ्चन्ति सर्वशः ॥ ३७॥

विद्याधर, नाग गन्धर्व और अप्सराएं सब ओर ऐसी चर्चा करते थे कि यह पर्वत अपने मेघरूपी पंखोंमें ऊपरको उड़नेके लिये उद्यत-सा प्रतीत होता है ॥ ३७ ॥

सहस्ततलविन्यस्तो मुक्तमूलः क्षितेस्तलात्।
रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥३८॥

वह पर्वत श्रीकृष्णकी हथेलीपर टिका हुआ था। भूतलसे उसके मूल-भागका सम्बन्ध टूट चुका था। उस दशामे वह सोने, कोयले, चाँदी तथा गेरू आदि धातुओंको प्रकट करने लगा ॥ ३८ ॥

कानिचिच्छिथिलानीव संच्छिन्नाद्धानि कानिचित्।
गिरेर्मेघप्रविष्टानि तस्य शृङ्गाणि चाभवन् ॥ ३९ ॥

उस पर्वतके कुछ शिखर शिथिल-से हो गये थे, कुछ आधे भागसे टूट गये थे और कितने ही शिखर बादलोंके भीतर घुस गये थे ॥ ३९ ॥

गिरिणा कम्पमानेन कम्पितानां तु शाखिनाम्।
पुष्पमुच्चयचं भूमौ व्यशीर्यत समन्ततः ॥ ४०॥

पर्वतके हिलनेके साथ ही उसके ऊपरके वृक्ष कम्पित हो उठे और उनके नाना प्रकारके फूल पृथ्वीपर सब ओर बिखर गये ॥ ४० ॥

निःसृताः पृथुसूर्धानः स्वस्तिकार्धविभूषिताः।
द्विजिह्वपततः क्रुद्धाः खेचराः खे समन्ततः ॥ ४१ ॥

उस समय मोटे-मोटे मस्तकवाले सर्पराज, जो आकाशमें उड़नेकी शक्ति रखते थे, कुपित होकर आकाशमें सब ओर निकल पड़े। उनके शरीर आधे स्वस्तिकसे विभूषित थे ॥ ४१ ॥

आर्तिं जग्मुः खगगणा वर्षेण च भयेन च।
उत्पत्योत्पत्य गगनात् पुनः पेनुरवाङ्मुखाः ॥४२॥

पक्षियोंके समुदाय वर्षा और भयसे बड़े कष्टमें पड़ गये। वे उड़-उड़कर आकाशमें जाते और वहाँसे पुनः नीचे मुख किये गिर पड़ते थे ॥ ४२ ॥

रेसूरारोषिताः सिंहाः सजला इव तोयदाः।
गर्गरा इव मथ्यन्तो नेदुः शार्दूलपुङ्गवाः ॥ ४३ ॥

बहुत-से सिंह रोषमें भरकर सजल जलधरोंके समान दहाड़ रहे थे। बड़े-बड़े बाघ मथे जानेवाले मटोंके समान गम्भीर घोष करते थे ॥ ४३ ॥

विषमैश्च समीभूतैः समैश्चात्यन्तदुर्गमैः।
व्यावृत्तदेहः स गिरिरन्य एवोपलक्ष्यते ॥ ४४ ॥

उस पर्वतकी विषम भूमि सम हो गयी और समभूमि विषम होकर अत्यन्त दुर्गम हो गयी, इससे उसके स्वरूपमें इतना उलट-फेर हो गया कि वह किसी और ही पर्वत-सा दिखायी देता था ॥ ४४ ॥

अतिवृष्टस्य तैर्मेघैस्तस्य रूपं बभूव ह।
स्तम्भितस्येव रुद्रेण त्रिपुरस्य विहायसि ॥ ४५ ॥

उन मेघोंके द्वारा अतिवृष्टि होनेसे उस पर्वतका रूप वैसा ही हो गया, जैसा कि आकाशमें भगवान् रुद्रके द्वारा स्तम्भित किये गये त्रिपुरका रूप दिखायी देता था ॥४५॥

बाहुदण्डेन कृष्णस्य विधृतं सुमहत् तद्।
नीलाभ्रपटलच्छन्नं तद्गिरिच्छत्रमावभौ ॥ ४६ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके बाहुदण्डसे धारण किया गया तथा काले मेघ-समूहोंसे आच्छादित हुआ वह पर्वतरूपी छत्र बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ४६ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६७


स्वप्रायमानो जलदैर्निमीलितगुहामुखः ।
बाहूपधाने कृष्णस्य प्रसुप्त इव खे गिरिः ॥ ४७ ॥
सोनेकी इच्छा-सी रखनेवाला वह पर्वत आकाशमें श्रीकृष्णकी बाँहका तकिया लगाकर सोया हुआ-सा जान पड़ता था। उस समय उसका गुफारूपी मुख बादलोंकी चादरसे ढका हुआ था ॥ ४७ ॥

निर्विहङ्गरुतैर्वृक्षैर्निर्मयूरुतैर्वनैः ।
निरालम्ब इवाभाति गिरिः शिखिरवैर्वृतः ॥ ४८ ॥
उस पर्वतपर जो वृक्ष थे, उनपर पक्षियोंकी बोली नहीं सुनायी देती थी। वहाँके वन मयूरोंकी केका-ध्वनिसे शून्य हो गये थे। ऐसे वृक्षों और वनोंसे घिरा हुआ वह पर्वत अपने शिखरोंके साथ निरालम्ब-सा प्रतीत होता था ॥ ४८ ॥

पर्यस्तैर्घूर्णमानैश्च प्रचलद्भिश्च सानुभिः ।
सज्वराणीव शैलस्य वनानि शिखराणि च ॥ ४९ ॥
उसके श्रृंग अस्त-व्यस्त होकर चक्कर काटते और जोर-जोरसे हिलते थे। उनके कारण उस पर्वतके वन और शिखर ज्वरसे पीड़ित हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ४९ ॥

उत्तमाङ्गगतास्तस्य मेघाः पवनवाहनाः ।
त्वर्यमाणा महेन्द्रेण तोयं मुमुचुरक्षयम् ॥ ५० ॥
उस पर्वतके मस्तक (शिखर) पर पहुँचे हुए वायुरूपी वाहनवाले मेघ देवराज इन्द्रके द्वारा शीघ्रता करनेके लिये प्रेरित होनेपर अक्षय जलकी वर्षा करने लगे ॥ ५० ॥

स लम्बमानः कृष्णस्य भुजाग्रे सघनो गिरिः ।
चक्रारूढ इवाभाति देशो नृपतिपीडितः ॥ ५१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णकी भुजाके अग्रभागमें लटकता हुआ मेघोंसहित वह पर्वत किसी शत्रु राजाके द्वारा पीड़ित हुए देशकी भाँति चक्रपर चढ़ा हुआ-सा प्रतीत होता था* ॥ ५१ ॥

स मेघनिचयस्तस्थौ गिरिं तं परिवार्य ह ।
पुरं पुरस्कृत्य यथा स्फीतो जनपदो महान् ॥ ५२ ॥
वह मेघोंका समुदाय उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर उसी तरह खड़ा था, जैसे समृद्धिशाली महान् जनपद नगर या राजधानीको अपने सामने रखकर चारों ओर निवास करता है ॥ ५२ ॥

निवेश्य तं करे शैलं तोलयित्वा च सस्मितम् ।
प्रोवाच गोप्ता गोपानां प्रजापतिरिव स्थितः ॥ ५३ ॥
उस पर्वतको अपने हाथपर रखकर उसे संतुलित रखते हुए प्रजापतिके समान खड़े हुए गोपरक्षक भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराते हुए कहा— ॥ ५३ ॥

एतद् देवैरसम्भाव्यं दिव्येन विधिना मया ।
कृतं गिरिगृहं गोपा निर्वातं शरणं गवाम् ॥ ५४ ॥
'गोपगण ! मैंने दिव्य विधिसे यह पर्वतका घर बना दिया है, जिसे बनाना देवताओंके लिये भी असम्भव था। इसमें वर्षा और वायुका प्रवेश नहीं है। यह गौओंके लिये उत्तम आश्रय है ॥ ५४ ॥

क्षिप्रं विशन्तु यूथानि गवामिह हि शान्तये ।
निर्वातेषु च देशेषु निवसन्तु यथासुखम् ॥ ५५ ॥
'यहाँ शान्ति पानेके लिये गौओंके यूथ शीघ्र प्रवेश करें और इन वायुरहित स्थानोंमें सुखपूर्वक निवास करें ॥ ५५॥

यथाश्रेष्ठं यथायूथं यथासारं यथासुखम् ।
विभज्यन्तामयं देशः कृतं वर्षनिवारणम् ॥ ५६ ॥
'जो जैसे बड़े-छोटे हों, जिनके जैसे यूथ हों, जिनके पास जैसी साधन-सामग्री हो, उसके अनुसार तुम सब लोग सुखपूर्वक इस स्थानका बटवारा कर लो। मैंने वर्षाका भली-भाँति निवारण कर दिया है ॥ ५६ ॥

शैलोत्पाटनभूरेषा महती निर्मिता मया ।
पञ्चक्रोशप्रमाणेण क्रोशैकविस्तरो महान् ।
त्रैलोक्यमप्युत्सहते रक्षितुं किं पुनर्व्रजम् ॥ ५७ ॥
'मैंने पर्वतको उखाड़कर यहाँ रहने योग्य विशाल भूमि-का निर्माण कर दिया है। इसकी लंबाई पाँच कोस और चौड़ाई एक कोसकी है। यह महान् भूभाग तीनों लोकोंकी आँधी-पानीसे रक्षा कर सकता है, फिर व्रजकी तो बात ही क्या है ?' ॥ ५७ ॥

ततः किलकिलाशब्दो गवां हम्भारवैः सह ।
गोपानां तुमुलो जज्ञे मेघनादश्च वाह्यतः ॥ ५८ ॥
यह सुनकर भीतरकी ओर गौओंके रँभानेके साथ ही गोपोंकी किलकारियोंका तुमुल नाद गूँज उठा और बाहरकी ओर मेघोंकी गम्भीर गर्जना होने लगी ॥ ५८ ॥

प्राविशन्त ततो गावो गोपैर्यूथप्रकल्पिताः ।
तस्य शैलस्य विपुलं प्रदरं गह्वरोदरम् ॥ ५९ ॥
तदनन्तर गोपोंद्वारा एक-एक यूथके रूपमें विभक्त की हुई गौएँ उस पर्वतकी विशाल गुफामें, जिसका भीतरी भाग बहुत बड़ा था, प्रवेश करने लगीं ॥ ५९ ॥

कृष्णोऽपि मूले शैलस्य शैलस्तम्भ इवोच्छ्रितः ।
दधारैकेन हस्तेन शैलं प्रियमिवातिथिम् ॥ ६० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण भी उस पर्वतके मूलभागमे प्रस्तरनिर्मित ऊँचे खम्भके समान खड़े हो गये। उन्होंने उस पहाड़को


* शत्रु राजाद्वारा आक्रान्त देशके लोग रथ, शकट आदि वाहनोंपर आरूढ होकर जब पलायन करने लगते हैं, उस समय उन्हें चक्रारूढ कहा जाता है; उसी प्रकार इन्द्रसे पीडित पर्वत भगवान् श्रीकृष्णके हाथरूपी चक्रपर आरूढ हुआ दिखायी देता था ।