भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 279
विष्णुपर्व ]षोडशोऽध्यायः२५७

क्षीरवत्यस्विमा गावो वत्सवत्यश्च निर्वृताः ।
तेन संवर्धितास्तात तृणैः पुष्टाः सपुङ्गवाः ॥ १० ॥

'तात ! उस वर्षासे बढ़ी हुई घासोंद्वारा ही साँड़ोंसहित ये गौएँ हृष्ट-पुष्ट होकर बछड़े देतीं और दूध देनेवाली होती हैं ॥ १० ॥

नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुक्षाऽर्दितो जनः ।
दृश्यते यत्र दृश्यन्ते तृप्तिमन्तो वलाहकाः ॥ ११ ॥

'जहाँ वर्षा करनेवाले मेघ दिखायी देते हैं, उस भूमिपर कभी अनाज और तृणका अभाव नहीं होता तथा वहाँके लोग कभी भूखसे पीड़ित नहीं देखे जाते हैं ॥ ११ ॥

दुदोह सवितुर्गा वै शक्रो दिव्याः पयस्विनीः ।
ताः क्षरन्ति नवं क्षीरं मेध्यं मेघौघधारितम् ॥ १२ ॥

'सूर्यदेवकी दिव्य किरणें पृथ्वीका जल सोखकर पयस्विनी (गौ अथवा जलवती) हो जाती हैं, तब इन्द्रदेव उनका दोहन करते हैं। उनके दोहन करनेपर वे किरणमयी गौएँ नूतन एवं पवित्र जलरूपी दूध प्रकट करती हैं, जिसे मेघोंकी घटारूप दुग्धपात्रमें संचित किया जाता है ॥ १२ ॥

वाय्वीरितं तु मेघेषु करोति निनदं महत् ।
जवेनावर्तितं चैव गर्जतीति जना विदुः ॥ १३ ॥

'वही वायुसे प्रेरित होकर वेगसे आवर्तित होनेपर मेघोंके भीतर अत्यन्त गम्भीर शब्द उत्पन्न करता है, जिसे लोग समझते हैं कि मेघ गर्जना कर रहा है ॥ १३ ॥

तस्य चैवोह्यमानस्य वायुयुक्तैर्वलाहकैः ।
वज्राशनिसमाः शब्दाः श्रूयन्ते नगभेदिनः ॥ १४ ॥

'वायुयुक्त मेघोंद्वारा ढोयी जाती हुई उस जलराशिका पर्वतभेदी शब्द ही वज्र एवं बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देता है ॥ १४ ॥

तज्जलं वज्रनिष्पेषैर्विमुञ्चति नभोगतैः ।
बहुभिः कामगैर्मेघैः शक्रो भृत्यैरिवेश्वरः ॥ १५ ॥

'जैसे राजा अपने सेवकोंसे काम लेता है, उसी प्रकार देवराज इन्द्र आकाशमें फैले हुए तथा इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाले बहुसंख्यक मेघोंद्वारा वज्रकी गड़गड़ाहटकी आवाजके साथ उस जलको इस भूतलपर बरसाते हैं ॥ १५ ॥

कचिद् दुर्दिनसंकाशैः क्वचिच्छिन्नाभ्रसंनिभैः ।
क्वचिद् भिन्नाञ्जनाकारैः क्वचिच्छीकरवर्षिभिः ॥ १६ ॥
मण्डयतीव देवेन्द्रो विश्वमेवं नभो घनैः ।
क्वचिच्छीकरमुक्ताभं कुरुते गगनं घनः ॥ १७ ॥

'कहीं वे मेघ दुर्दिन-से होकर सारे आकाशमें छा जाते हैं। कहीं फटे हुए बादलोंके रूपमें दिखायी देते हैं। कहीं खानसे काटकर निकाले गये कोयलेके समान काले होते हैं और कहीं जलकी छोटी-छोटी बूँदें बरसाते रहते हैं। इस तरह विभिन्न प्रकारके बादलोंद्वारा देवराज इन्द्र आकाश एवं विश्वको अलंकृत-सा करते रहते हैं। कहीं-कहीं तो बादल पानी बरसाकर आकाशको जलबिन्दुरूपी मोतियोंसे प्रकाशित कर देता है ॥ १६-१७ ॥

एवमेतत् पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः ।
पर्जन्यः सर्वभूतानां भवाय भुवि वर्षति ॥ १८ ॥

'इस प्रकार पर्जन्यदेव (इन्द्र) इस पृथ्वीके जलको सूर्यकी किरणोंद्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धिके लिये उसे मेघोंद्वारा भूतलपर बरसा देते हैं ॥ १८ ॥

यस्मात् प्रावृडियं कृष्ण शक्रस्य भुवि भाविनी ।
तस्मात् प्रावृषि राजानः सर्वे शक्रं मुदा युताः ।
महैः सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवाः ॥ १९ ॥

'श्रीकृष्ण! इसीलिये यह वर्षा ऋतु भूतलपर इन्द्रदेवकी पूजाका समय है; अतएव समस्त राजा वर्षा ऋतुमें बड़ी प्रसन्नताके साथ नाना प्रकारके उत्सवोंद्वारा देवराजकी पूजा करते हैं। हम तथा दूसरे मनुष्य भी ऐसा ही करते हैं' ॥१९॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां गोपवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णकी बाललीलाके प्रसंगमें गोपका वाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥


षोडशोऽध्यायः

श्रीकृष्णके द्वारा गिरियज्ञ एवं गोपूजनका प्रस्ताव करते हुए शरद् ऋतुका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
गोपवृद्धस्य वचनं श्रुत्वा शक्रपरिग्रहे ।
प्रभावज्ञोऽपि शक्रस्य वाक्यं दामोदरोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इन्द्र-महोत्सवको स्वीकार करनेके सम्बन्धमे उस बड़े-बूढ़े गोपका वचन सुनकर इन्द्रके प्रभावको जानते हुए भी श्रीकृष्णने यह बात कही—॥ १ ॥

वयं वनचरा गोपाः सदा गोधनजीविनः ।
गावोऽस्मद्दैवतं विद्धि गिरयश्च वनानि च ॥ २ ॥

'आर्य ! हमलोग वनमे रहनेवाले गोप हैं और सदा