भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 280
२५८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गोधनसे अपनी जीविका चलाते हैं; अतः आपको मालूम होना चाहिये कि गौएँ, पर्वत और वन-ये ही हमारे देवता हैं ॥२॥
कर्षुकाणां कृषिवृत्तिः पण्यं विपणिजीविनाम् ।
गावोऽस्माकं परा वृत्तिरेतत् त्रैविद्यमुच्यते ॥ ३ ॥
'किसानोंकी जीविका है खेती, व्यापारसे जीवननिर्वाह करनेवाले वैश्योंकी जीविका-वृत्ति है खरीद-बिक्री और हमलोगोंकी सर्वोत्तम वृत्ति है गौओंका पालन । ये वार्तारूप विद्याके तीन भेद कहलाते हैं ॥ ३ ॥
विद्या यो यया युक्तस्तस्य सा दैवतं परम् ।
सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिणी ॥ ४ ॥
'जो जिस विद्यासे युक्त है, उसके लिये वही सर्वोत्तम देवता है, वही पूजा-अर्चाके योग्य है और वही उसके लिये उपकारिणी है ॥ ४ ॥
योऽन्यस्य फलमश्नानः करोत्यन्यस्य सत्क्रियाम् ।
द्वावनर्थौ स लभते प्रेत्य चेह च मानवः ॥५॥
'जो मनुष्य एक व्यक्तिसे फल पाकर उसे भोगता है और दूसरेकी पूजा (आदर-सत्कार) करता है, वह इस लोक और परलोकमें दो अनर्थोंका भागी होता है ॥ ५ ॥
कृष्यन्ता प्रथिता सीमा सीमान्तं श्रूयते वनम् ।
वनान्ता गिरयः सर्वे ते चास्माकं गतिर्ध्रुवा ॥ ६ ॥
'जहाँतक खेती होती है, वहाँतक ब्रजकी सीमा विख्यात है । सीमाके अन्तमें वन सुना जाता है और वनके अन्तमें समस्त पर्वत हैं । वे पर्वत ही हमारे अविचल आश्रय हैं ॥६॥
श्रूयन्ते गिरयश्चापि वनेऽस्मिन् कामरूपिणः ।
प्रविश्य तास्तास्तनवो रमन्ते स्वेषु सानुषु ॥ ७ ॥
'सुना जाता है कि इस वनमें रहनेवाले पर्वत भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं । वे भिन्न-भिन्न शरीरोंमें प्रवेश करके अपने शिखरोंपर मौजसे घूमते-फिरते हैं ॥ ७ ॥
भूत्वा केसरिणः सिंहा व्याघ्राश्च नखिनां वराः ।
वनानि खानि रक्षन्ति त्रासयन्तो वनच्छिदः ॥ ८ ॥
'वे ही अयालोंसे विभूषित सिंह और नखधारी जन्तुओंमें श्रेष्ठ व्याघ्र बनकर वनको काटने या हानि पहुँचानेवाले लोगोंको त्रास देते हुए अपने-अपने वनोंकी रक्षा करते हैं ॥ ८ ॥
यदा चैपां विकुर्वन्ति ते वनालयजीविनः ।
घ्नन्ति तानेव दुर्घृत्तान् पौरुषादेन कर्मणा ॥ ९ ॥
'जब वनके आश्रयमें रहकर जीवननिर्वाह करनेवाले लोग इन वनों या वनदेवताओंको हानि पहुँचाते हैं, तब वे कामरूपी देवता राक्षसोचित हिंसाकर्मके द्वारा उन दुराचारी मनुष्योंको निश्चय ही मार डालते हैं ॥ ९ ॥
मन्त्रयज्ञपरा विप्राः सीतायज्ञाश्च कर्षुकाः ।
गिरियज्ञास्तथा गोपा इज्योऽस्माभिर्गिरिर्वने ॥ १० ॥
'ब्राह्मणलोग मन्त्रयज्ञमें तत्पर रहते हैं, किसान सीता-यज्ञ करते हैं अर्थात् खेतोंको अच्छी तरह जोतते और हल जोतनेसे जो रेखा बन जाती है, उसकी तथा हलकी पूजा करते हैं तथा गोपगण गिरियज्ञ करते हैं; अतः हमलोगोंको इस वनमें गिरियज्ञ करना चाहिये ॥ १० ॥
तन्मह्यं रोचते गोपा गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् ।
कर्म कृत्वा सुखस्थाने पादपेष्वथवा गिरौ ॥११॥
तत्र हत्वा पशून् मेध्यान् वृत्तत्यायतने शुभे ।
सर्वघोषस्य संदोहः क्रियतां किं विचार्यते ॥ १२॥
'गोपगण ! मुझे तो वही अच्छा लगता है कि गिरियज्ञका आरम्भ हो । स्वस्तिवाचन आदि कर्म करके वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतके समीप किसी सुखद स्थानपर पवित्र पशुओंको एकत्र करके उनके पास जाकर उनका विस्तारपूर्वक पूजन किया जाय और एक शुभ मन्दिरमें सारे ब्रजके दूधका संग्रह कर लिया जाय । इस विषयमें आपलोग क्या विचार कर रहे हैं ॥ ११-१२ ॥
तं शरत्कुसुमापीडाः परिवार्थ प्रदक्षिणम् ।
गावो गिरिवरं सर्वास्ततो यान्तु पुनर्व्रजम् ॥ १३ ॥
'फिर शरद् ऋतुके फूलोंसे जिनके मस्तकका शृङ्गार किया गया हो, ऐसी समस्त गौएँ गिरिवर गोवर्धनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करके पुनः ब्रजमें जायें ॥ १३ ॥
प्राप्ता किलेयं हि गवां स्वादुतोयतृणा गुणैः ।
शरत् प्रमुदिता रम्या गतमेघजलाशया ॥ १४ ॥
'इस समय प्रमोदनूर्ण रमणीय शरद्-ऋतु आ गयी है, जब कि जल और घास गौओंके लिये स्वादुताके गुणोंसे सम्पन्न हो जाते हैं । अब जलाशयोंमें पानी बरसानेवाले बादल छँट गये ॥ १४ ॥
प्रियकैः पुष्पितैर्गौरं श्यामं वाणासनैः क्वचित् ।
कठोरतृणमभाति निर्मयूररुतं वनम् ॥ १५ ॥
'खिले हुए कदम्ब-पुष्पोंके कारण वन गौरवर्णका प्रतीत होता है । कहीं कहीं वाणासनों—झाड़-झंखाड़ोंके कारण वह श्याम रंगका दिखायी देता है । अब घासें कोमल नहीं रहीं—कुछ कठोर हो गयी हैं । वनमे मोरोंकी मधुर वाणी नहीं सुनायी देती है ॥ १५ ॥
विजला विमला व्योम्नि विबलाका विविद्युतः ।
विवर्धन्ते जलधरा विदन्ता इव कुञ्जराः ॥ १६ ॥
'आकाशमे जल, मल, बलाका और विद्युत्‌से रहित बादल दन्तहीन हाथियोंके समान बढ़ रहे हैं ॥ १६ ॥
पदुना मेघवातेन नवतोयानुकारिणा ।
पर्णोत्करधनाः सर्वे प्रसादं यान्ति पादपाः ॥ १७ ॥
'( वर्षा ऋतुमे ) नूतन जलको खींच लानेवाले शक्ति-