विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 282, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे 'शरद् ऋतुमें गौएँ पहलेसे दूना दूध देने लगी हैं। साँड़ दुगुने मतवाले हो उठे हैं। वनोंकी शोभा-सम्पत्ति दुगुनी बढ़ गयी है और पकी हुई खेतीके कारण यह पृथ्वी अनन्त गुणोंसे सम्पन्न हो गयी है ॥ ३१ ॥ ज्योतींषि घनमुक्तानि प्रसन्नवन्ति जलानि च। मनांसि च मनुष्याणां प्रसादमुपयान्ति वै ॥ ३२ ॥ 'बादलोंके आवरणसे मुक्त हुए ग्रह-नक्षत्र, कमल- मण्डित जल तथा मनुष्योंके मन प्रसाद ( स्वच्छता एवं प्रसन्नता ) को प्राप्त हो रहे हैं ॥ ३२ ॥ असृजत् सविता व्योम्नि निर्मुक्तो जलदैर्भृशम् । शरत्प्रज्वलितं तेजस्तीक्ष्णरश्मिर्विशोषयन् ॥ ३३ ॥ 'आकाशमें मेघमुक्त हुआ सूर्य शरद् ऋतुके प्रभावसे अधिक प्रज्वलित तेज ( धूप ) की सृष्टि करता है तथा अपनी किरणोंको और भी तीखी करके वसुधाके रसका शोषण कर रहा है ॥ ३३ ॥ नीराजयित्वा सैन्यानि प्रयान्ति विजिगीषवः । अन्योन्यराष्ट्राभिमुखाः पार्थिवाः पृथिवीक्षितः ॥ ३४ ॥ 'भूतलके नरेश अपने सैनिकोंसे उनके अस्त्रोंका मार्जन करवाकर ( उन्हें साथ ले ) विजयकी इच्छासे एक दूसरेके राष्ट्रकी ओर जा रहे हैं ॥ ३४ ॥ बन्धुजीवाभिताम्रासु बद्धपङ्कवतीषु च। मनस्तिष्ठति कान्तासु चित्रासु वनराजिषु ॥ ३५ ॥ 'बन्धुजीव ( बन्धूक ) के लाल फूलोंसे सुशोभित हो जो सब ओरसे लाल-लाल दिखायी देती हैं तथा जिनकी कीचड़ सूख गयी है, ऐसी विचित्र एवं कमनीय वनश्रेणियोंमें ( उनकी शोभा निहारनेके लिये ) मन आसक्त हो रहा है ॥ ३५ ॥ वनेषु च विराजन्ते पादपा वनशोभिनः । असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः ॥ ३६ ॥ इषुसाह्वा निकुम्भाश्च प्रियकाः स्वर्णकास्तथा । भूमराः पेचकाश्चैव केतक्यश्च समन्ततः ॥ ३७ ॥ 'वनकी शोभा बढ़ानेवाले असन, छितवन, कोविदार, बाणासन, निकुम्भ, प्रियक और स्वर्णक नामवाले वृक्ष वनोंमें फूलोंसे लदकर अधिक शोभा पा रहे हैं। केतकी ( केवड़े ) के वृक्ष भी सब ओर खिले हुए हैं। भूमर ( एक प्रकारके मृग ) और उल्लू भी सर्वत्र सानन्द विचरते हैं ॥ ३६-३७ ॥ व्रजेषु च विशेषेण गर्गरोद्गारहासिषु । शरत्प्रकाशयोपेव गोष्ठेष्वटति रूपिणी ॥ ३८ ॥ 'दूध-दहीके मटों या घड़ोंसे जो माखन आदि ढाले जाते हैं, वे ही जिनकी हंसी हैं, उन व्रजों एवं गोष्ठोंमें तो यह शरद् ऋतु मूर्तिमती सुन्दरी युवतीकी भाँति घूम -रही है ॥ ३८ ॥ नूनं त्रिदशभूयिष्ठं मेघकालसुखोषितम् । पतत्त्रिकेतनं देवं बोधयन्ति दिवौकसः ॥ ३९ ॥ 'निश्चय ही देवतालोग इस समय देवश्रेष्ठ भगवान् गरुडध्वजको, जो वर्षाकालमे सुखपूर्वक शयन कर चुके हैं, जगा रहे हैं ॥ ३९ ॥ शरद्येवं सुसस्यायां प्राप्तायां प्रावृषः क्षये । नीलचन्द्रार्कवर्णैश्च रचितं बहुभिर्द्विजैः ॥ ४० ॥ फलैः प्रवालैश्च घनमिन्द्रचापघनोपमम् । भवनाकारविटपं लतापरममण्डितम् ॥ ४१ ॥ विशालमूलावन्तं पवनाभोगमण्डितम् । अर्चयामो गिरिं देवं गाश्चैव च विशेषतः ॥ ४२ ॥ 'वर्षा बीत जानेपर ऐसी सुन्दर खेतीसे सुशोभित शरद् ऋतुका शुभागमन हुआ है। इस समय ( मेर्यके समान ) नीले, चन्द्रमाके समान श्वेत तथा सूर्यके सदृश सुनहरे रंगवाले बहुत-से पक्षियोंने जिसे बहुरंगा बना दिया है, जो विविध प्रकारके फलों और नूतन पल्लवोंसे घना हो रहा है और इसलिये जो इन्द्रधनुषसे युक्त श्याम मेघकी-सी शोभा धारण करता है, जिसके वृक्षोंकी एक-एक शाखा घरके समान जान पड़ती है, जो लता और वल्लारियोंसे भलीभाँति अलंकृत है, जिसका विशाल मूलभाग बहुत दूरतक फैला हुआ है तथा जो वायुके विस्तारसे सुशोभित होता है, वह गोवर्धन पर्वत ही हमारा देवता है। हम उसकी तथा इन गौओंकी विशेष रूपसे पूजा करें ॥ ४०-४२ ॥ सावतंसैर्विषाणैश्च वर्हापीडैश्च दंशितैः । घण्टाभिश्च प्रलम्बाभिः पुष्पैः शारदिकैस्तथा ॥ ४३ ॥ शिवाय गावः पूज्यन्तां गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् । पूज्यतां त्रिदशैः शक्रो गिरिरस्माभिरिज्यताम् ॥ ४४ ॥ 'गायोंके सींगोंमें मुकुट और मोरपंखके समान बने हुए आभूषण बाँधे जायँ । उनके गलेमें बड़ी घंटियाँ लटका दी जायँ और व्रजके कल्याणके लिये शरद्में सुलभ होनेवाले पुष्पोंद्वारा गौओंकी पूजा की जाय। साथ ही 'गिरियज्ञ' आरम्भ कर दिया जाय । देवतालोग इन्द्रकी पूजा करें और हमलोग गिरिराज गोवर्धनकी ॥ ४३-४४ ॥ कारयिष्यामि गोयज्ञं बलादपि न संशयः । यद्यस्ति मयि वः प्रीतिर्यदि वा सुहृदो वयम् । गावो हि पूज्याः सततं सर्वेषां नात्र संशयः ॥ ४५ ॥ 'यदि आपलोगोंका मुझपर प्रेम है और यदि हमलोग एक दूसरेके हितैषी सुहृद् हैं तो मैं आपके द्वारा हठ एवं बलपूर्वक गोयज्ञ कराऊँगा । गौएँ सदा ही सबके लिये पूजनीय हैं-इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥