भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 288

२६६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


भूमेरुत्पाट्यमानस्य तस्य शैलस्य सानुषु।
शिलाः प्रशिथिलाश्चेलुर्वनिपेतुश्च पादपाः॥ ३२ ॥

जिस समय वह पर्वत पृथ्वीसे उखाड़ा जाने लगा, उस समय उसके शिखरोंपर जो टूटी-फूटी शिलाएँ थीं, वे खिसककर गिरने लगीं और बहुत-से वृक्ष भी धराशायी हो गये॥ ३२ ॥

शिखरैर्घूर्ण्यमानैश्च सीदमानैश्च पादपैः।
विधूतैश्चोच्छ्रितैः शृङ्गैर्नगमः खगमोऽभवत् ॥ ३३॥

उस समय चक्कर काटते हुए शिखरों, खण्डित होते हुए वृक्षों तथा काँपती हुई ऊँची चोटियोंके कारण वह अविचल पर्वत आकाशचारी पक्षीके समान प्रतीत होने लगा॥ ३३ ॥

चलत्प्रस्रवणैः पार्श्वैर्मेघौघैरकतां गतैः।
भिद्यमानाश्मनिचयश्चचाल धरणीधरः ॥ ३४ ॥

पार्श्ववर्ती चञ्चल झरने मेघोंके समूहोंसे मिलकर एकताको प्राप्त हो गये। वह पर्वत हिलने लगा और उसकी प्रस्तरराशि विदीर्ण होकर बिखरने लगी ॥ ३४ ॥

न मेघानां प्रवृत्तानां न शैलस्याश्मवर्षिणः।
विविदुस्ते जना रूपं वायोस्तस्य च गर्जतः ॥ ३५ ॥

उस पर्वतके नीचे गर्भगृहमें बैठे हुए वे सब लोग न तो बरसते हुए मेघोंका, न पत्थर बरसानेवाले पर्वतका और न गरजती हुई वायुका ही स्वरूप जान सके ॥ ३५ ॥

मेघैः सशैलसंस्थानैर्नीलैः प्रस्रवणार्पितैः।
मिश्रीकृत इवाभाति गिरिरुद्धमवर्हवान् ॥३६॥

झरनोंसे मिले हुए पर्वताकार नील मेघोंसे मिश्रित हुआ वह पर्वत पंख उठाये हुए मोरके समान प्रतीत होता था ॥ ३६ ॥

आप्लुतोऽयं गिरिः पक्षैरिति विद्याधरोरगाः।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव वाचो मुञ्चन्ति सर्वशः ॥ ३७॥

विद्याधर, नाग गन्धर्व और अप्सराएं सब ओर ऐसी चर्चा करते थे कि यह पर्वत अपने मेघरूपी पंखोंमें ऊपरको उड़नेके लिये उद्यत-सा प्रतीत होता है ॥ ३७ ॥

सहस्ततलविन्यस्तो मुक्तमूलः क्षितेस्तलात्।
रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥३८॥

वह पर्वत श्रीकृष्णकी हथेलीपर टिका हुआ था। भूतलसे उसके मूल-भागका सम्बन्ध टूट चुका था। उस दशामे वह सोने, कोयले, चाँदी तथा गेरू आदि धातुओंको प्रकट करने लगा ॥ ३८ ॥

कानिचिच्छिथिलानीव संच्छिन्नाद्धानि कानिचित्।
गिरेर्मेघप्रविष्टानि तस्य शृङ्गाणि चाभवन् ॥ ३९ ॥

उस पर्वतके कुछ शिखर शिथिल-से हो गये थे, कुछ आधे भागसे टूट गये थे और कितने ही शिखर बादलोंके भीतर घुस गये थे ॥ ३९ ॥

गिरिणा कम्पमानेन कम्पितानां तु शाखिनाम्।
पुष्पमुच्चयचं भूमौ व्यशीर्यत समन्ततः ॥ ४०॥

पर्वतके हिलनेके साथ ही उसके ऊपरके वृक्ष कम्पित हो उठे और उनके नाना प्रकारके फूल पृथ्वीपर सब ओर बिखर गये ॥ ४० ॥

निःसृताः पृथुसूर्धानः स्वस्तिकार्धविभूषिताः।
द्विजिह्वपततः क्रुद्धाः खेचराः खे समन्ततः ॥ ४१ ॥

उस समय मोटे-मोटे मस्तकवाले सर्पराज, जो आकाशमें उड़नेकी शक्ति रखते थे, कुपित होकर आकाशमें सब ओर निकल पड़े। उनके शरीर आधे स्वस्तिकसे विभूषित थे ॥ ४१ ॥

आर्तिं जग्मुः खगगणा वर्षेण च भयेन च।
उत्पत्योत्पत्य गगनात् पुनः पेनुरवाङ्मुखाः ॥४२॥

पक्षियोंके समुदाय वर्षा और भयसे बड़े कष्टमें पड़ गये। वे उड़-उड़कर आकाशमें जाते और वहाँसे पुनः नीचे मुख किये गिर पड़ते थे ॥ ४२ ॥

रेसूरारोषिताः सिंहाः सजला इव तोयदाः।
गर्गरा इव मथ्यन्तो नेदुः शार्दूलपुङ्गवाः ॥ ४३ ॥

बहुत-से सिंह रोषमें भरकर सजल जलधरोंके समान दहाड़ रहे थे। बड़े-बड़े बाघ मथे जानेवाले मटोंके समान गम्भीर घोष करते थे ॥ ४३ ॥

विषमैश्च समीभूतैः समैश्चात्यन्तदुर्गमैः।
व्यावृत्तदेहः स गिरिरन्य एवोपलक्ष्यते ॥ ४४ ॥

उस पर्वतकी विषम भूमि सम हो गयी और समभूमि विषम होकर अत्यन्त दुर्गम हो गयी, इससे उसके स्वरूपमें इतना उलट-फेर हो गया कि वह किसी और ही पर्वत-सा दिखायी देता था ॥ ४४ ॥

अतिवृष्टस्य तैर्मेघैस्तस्य रूपं बभूव ह।
स्तम्भितस्येव रुद्रेण त्रिपुरस्य विहायसि ॥ ४५ ॥

उन मेघोंके द्वारा अतिवृष्टि होनेसे उस पर्वतका रूप वैसा ही हो गया, जैसा कि आकाशमें भगवान् रुद्रके द्वारा स्तम्भित किये गये त्रिपुरका रूप दिखायी देता था ॥४५॥

बाहुदण्डेन कृष्णस्य विधृतं सुमहत् तद्।
नीलाभ्रपटलच्छन्नं तद्गिरिच्छत्रमावभौ ॥ ४६ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके बाहुदण्डसे धारण किया गया तथा काले मेघ-समूहोंसे आच्छादित हुआ वह पर्वतरूपी छत्र बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ४६ ॥