विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६७
स्वप्रायमानो जलदैर्निमीलितगुहामुखः ।
बाहूपधाने कृष्णस्य प्रसुप्त इव खे गिरिः ॥ ४७ ॥
सोनेकी इच्छा-सी रखनेवाला वह पर्वत आकाशमें श्रीकृष्णकी बाँहका तकिया लगाकर सोया हुआ-सा जान पड़ता था। उस समय उसका गुफारूपी मुख बादलोंकी चादरसे ढका हुआ था ॥ ४७ ॥
निर्विहङ्गरुतैर्वृक्षैर्निर्मयूरुतैर्वनैः ।
निरालम्ब इवाभाति गिरिः शिखिरवैर्वृतः ॥ ४८ ॥
उस पर्वतपर जो वृक्ष थे, उनपर पक्षियोंकी बोली नहीं सुनायी देती थी। वहाँके वन मयूरोंकी केका-ध्वनिसे शून्य हो गये थे। ऐसे वृक्षों और वनोंसे घिरा हुआ वह पर्वत अपने शिखरोंके साथ निरालम्ब-सा प्रतीत होता था ॥ ४८ ॥
पर्यस्तैर्घूर्णमानैश्च प्रचलद्भिश्च सानुभिः ।
सज्वराणीव शैलस्य वनानि शिखराणि च ॥ ४९ ॥
उसके श्रृंग अस्त-व्यस्त होकर चक्कर काटते और जोर-जोरसे हिलते थे। उनके कारण उस पर्वतके वन और शिखर ज्वरसे पीड़ित हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ४९ ॥
उत्तमाङ्गगतास्तस्य मेघाः पवनवाहनाः ।
त्वर्यमाणा महेन्द्रेण तोयं मुमुचुरक्षयम् ॥ ५० ॥
उस पर्वतके मस्तक (शिखर) पर पहुँचे हुए वायुरूपी वाहनवाले मेघ देवराज इन्द्रके द्वारा शीघ्रता करनेके लिये प्रेरित होनेपर अक्षय जलकी वर्षा करने लगे ॥ ५० ॥
स लम्बमानः कृष्णस्य भुजाग्रे सघनो गिरिः ।
चक्रारूढ इवाभाति देशो नृपतिपीडितः ॥ ५१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णकी भुजाके अग्रभागमें लटकता हुआ मेघोंसहित वह पर्वत किसी शत्रु राजाके द्वारा पीड़ित हुए देशकी भाँति चक्रपर चढ़ा हुआ-सा प्रतीत होता था* ॥ ५१ ॥
स मेघनिचयस्तस्थौ गिरिं तं परिवार्य ह ।
पुरं पुरस्कृत्य यथा स्फीतो जनपदो महान् ॥ ५२ ॥
वह मेघोंका समुदाय उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर उसी तरह खड़ा था, जैसे समृद्धिशाली महान् जनपद नगर या राजधानीको अपने सामने रखकर चारों ओर निवास करता है ॥ ५२ ॥
निवेश्य तं करे शैलं तोलयित्वा च सस्मितम् ।
प्रोवाच गोप्ता गोपानां प्रजापतिरिव स्थितः ॥ ५३ ॥
उस पर्वतको अपने हाथपर रखकर उसे संतुलित रखते हुए प्रजापतिके समान खड़े हुए गोपरक्षक भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराते हुए कहा— ॥ ५३ ॥
एतद् देवैरसम्भाव्यं दिव्येन विधिना मया ।
कृतं गिरिगृहं गोपा निर्वातं शरणं गवाम् ॥ ५४ ॥
'गोपगण ! मैंने दिव्य विधिसे यह पर्वतका घर बना दिया है, जिसे बनाना देवताओंके लिये भी असम्भव था। इसमें वर्षा और वायुका प्रवेश नहीं है। यह गौओंके लिये उत्तम आश्रय है ॥ ५४ ॥
क्षिप्रं विशन्तु यूथानि गवामिह हि शान्तये ।
निर्वातेषु च देशेषु निवसन्तु यथासुखम् ॥ ५५ ॥
'यहाँ शान्ति पानेके लिये गौओंके यूथ शीघ्र प्रवेश करें और इन वायुरहित स्थानोंमें सुखपूर्वक निवास करें ॥ ५५॥
यथाश्रेष्ठं यथायूथं यथासारं यथासुखम् ।
विभज्यन्तामयं देशः कृतं वर्षनिवारणम् ॥ ५६ ॥
'जो जैसे बड़े-छोटे हों, जिनके जैसे यूथ हों, जिनके पास जैसी साधन-सामग्री हो, उसके अनुसार तुम सब लोग सुखपूर्वक इस स्थानका बटवारा कर लो। मैंने वर्षाका भली-भाँति निवारण कर दिया है ॥ ५६ ॥
शैलोत्पाटनभूरेषा महती निर्मिता मया ।
पञ्चक्रोशप्रमाणेण क्रोशैकविस्तरो महान् ।
त्रैलोक्यमप्युत्सहते रक्षितुं किं पुनर्व्रजम् ॥ ५७ ॥
'मैंने पर्वतको उखाड़कर यहाँ रहने योग्य विशाल भूमि-का निर्माण कर दिया है। इसकी लंबाई पाँच कोस और चौड़ाई एक कोसकी है। यह महान् भूभाग तीनों लोकोंकी आँधी-पानीसे रक्षा कर सकता है, फिर व्रजकी तो बात ही क्या है ?' ॥ ५७ ॥
ततः किलकिलाशब्दो गवां हम्भारवैः सह ।
गोपानां तुमुलो जज्ञे मेघनादश्च वाह्यतः ॥ ५८ ॥
यह सुनकर भीतरकी ओर गौओंके रँभानेके साथ ही गोपोंकी किलकारियोंका तुमुल नाद गूँज उठा और बाहरकी ओर मेघोंकी गम्भीर गर्जना होने लगी ॥ ५८ ॥
प्राविशन्त ततो गावो गोपैर्यूथप्रकल्पिताः ।
तस्य शैलस्य विपुलं प्रदरं गह्वरोदरम् ॥ ५९ ॥
तदनन्तर गोपोंद्वारा एक-एक यूथके रूपमें विभक्त की हुई गौएँ उस पर्वतकी विशाल गुफामें, जिसका भीतरी भाग बहुत बड़ा था, प्रवेश करने लगीं ॥ ५९ ॥
कृष्णोऽपि मूले शैलस्य शैलस्तम्भ इवोच्छ्रितः ।
दधारैकेन हस्तेन शैलं प्रियमिवातिथिम् ॥ ६० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण भी उस पर्वतके मूलभागमे प्रस्तरनिर्मित ऊँचे खम्भके समान खड़े हो गये। उन्होंने उस पहाड़को
* शत्रु राजाद्वारा आक्रान्त देशके लोग रथ, शकट आदि वाहनोंपर आरूढ होकर जब पलायन करने लगते हैं, उस समय उन्हें चक्रारूढ कहा जाता है; उसी प्रकार इन्द्रसे पीडित पर्वत भगवान् श्रीकृष्णके हाथरूपी चक्रपर आरूढ हुआ दिखायी देता था ।