विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
अपने प्रिय अतिथिकी भाँति एक हाथमे पकड़ रखा था॥ ६०॥
ततो व्रजस्य भाण्डानि युक्तानि शकटानि च।
विविशुर्वर्षभीतास्ते तद् गृहं गिरिनिर्मितम्॥ ६१॥
तत्पश्चात् वर्षासे डरे हुए व्रजके गोप अपने बर्तन-भाँड़े और जुते हुए छकड़े लेकर उस पर्वतनिर्मित गृहमें प्रविष्ट हो गये॥ ६१॥
अतिदैवं तु कृष्णस्य दृष्ट्वा तत् कर्म वज्रभृत्।
मिथ्याप्रतिज्ञो जलदान् वारयामास वै विभुः॥ ६२॥
श्रीकृष्णके उस कर्मको, जो देवताओके लिये भी असम्भव है, देखकर वज्रधारी भगवान् इन्द्रने उन मेघोंको रोक दिया। व्रजको नष्ट कर देनेकी उनकी प्रतिज्ञा झूठी हो गयी॥ ६२॥
सप्तरात्रे तु निर्वृत्ते धरण्यां विगतोत्सवः।
जगाम संवृत्तो मेघैर्वृत्रहा स्वर्गमुत्तमम्॥ ६३॥
सात राततक पृथ्वीपर वर्षा करनेके पश्चात् मेघोंसे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्र उत्सवहीन (आनन्दशून्य) हो (अथवा व्रजमें मनाये जानेवाले अपने उत्सवसे वञ्चित हो) उत्तम स्वर्गलोकको लौट गये॥ ६३॥
निवृत्ते सप्तरात्रे तु निष्प्रयत्ने शतक्रतौ।
गताभ्रे विमले व्योम्नि दिवसे दीप्तभास्करे॥ ६४॥
गावस्तैनैव मार्गेण परिजग्मुर्यथागतम्।
स्वं च स्थानं ततो गोपः प्रत्ययात् पुनरेव सः॥ ६५॥
सात रात बीत जानेपर जब इन्द्रका सारा प्रयत्न निष्फल हो गया, बादल नष्ट हो गये, आकाश निर्मल हो गया और दिनमे सूर्यदेव देदीप्यमान हो उठे, उस समय सारी गौएँ फिर उसी मार्गसे जैसे आयी थीं, उसी तरह लौट गयीं। सारा व्रज पुनः अपने निवासस्थानको चला गया॥ ६४-६५॥
कृष्णोऽपि तं गिरिश्रेष्ठं स्वस्थाने स्थावरात्मवान्।
प्रीतो निवेशयामास शिवाय वरदो विभुः॥ ६६॥
स्थिर भावसे खड़े हुए वरदायक भगवान् श्रीकृष्णने भी प्रसन्न होकर फिर जगत्के कल्याणके लिये उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने स्थानपर स्थापित कर दिया॥ ६६॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोवर्धनधारणेऽष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका गोवर्धनधारणविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥
एकोनविंशोऽध्यायः
देवराज इन्द्रका आगमन, श्रीकृष्णका गोविन्द-पदपर अभिषेक तथा इन्द्रका श्रीकृष्णको भावी कार्य बताकर अर्जुनकी देख-भालके लिये कहना और श्रीकृष्णका उसे स्वीकार करना
वैशम्पायन उवाच
धृतं गोवर्धनं दृष्ट्वा परित्रातं च गोकुलम्।
कृष्णस्य दर्शनं शक्रो रोचयामास विस्मितः॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब इन्द्रने देखा कि श्रीकृष्णने गोवर्धन धारण करके गोकुलकी रक्षा कर ली, तब वे बड़े विस्मयमें पड़े। अब उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन करनेकी इच्छा हुई॥ १॥
स निर्जलाम्बुदाकारं मत्तं मदजलोक्षितम्।
आरुह्यैरावतं नागमाजगाम महीतलम्॥ २॥
वे जलहीन बादलके समान श्वेत वर्णवाले और मदके जलसे भीगे हुए ऐरावत नामक मदमत्त हाथीपर चढ़कर भूतलपर आये॥ २॥
स ददर्शापविष्टं वै गोवर्द्धनशिलातले।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणं पुरुहूतः पुरंदरः॥ ३॥
अनेक नामोंसे पुकारे जानेवाले पुरंदर इन्द्रने वहाँ आकर देखा, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वतकी एक शिलापर बैठे हुए हैं॥ ३॥
तं वीक्ष्य बालं महता तेजसा दीप्तमव्ययम्।
गोपवेषधरं विष्णुं प्रीतिं लेभे पुरंदरः॥ ४॥
महान् तेजसे उद्दीप्त होनेवाले गोपवेषधारी विष्णु-स्वरूप उन अविनाशी बालकृष्णको देखकर देवराज इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ४॥
तं सोऽम्बुजदलश्यामं कृष्णं श्रीवत्सलक्षणम्।
पर्याप्तनयनः शक्रः सर्वैर्नेत्रैरुपैक्षत॥ ५॥
नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर एवं श्रीवत्स-चिह्न-विभूषित उन श्रीकृष्णको देखकर इन्द्रको अपने नेत्रोंका फल प्राप्त हो गया। उन्होंने अपने सम्पूर्ण नेत्रोंसे जी भरकर उन्हें देखा॥ ५॥
दृष्ट्वा चैनं श्रिया जुष्टं मर्त्यलोकेऽमरोपमम्।
सूपविष्टं शिलापृष्ठे शक्रः स व्रीडितोऽभवत्॥ ६॥
मर्त्यलोकमे रहकर भी देवोपम शोभासे सम्पन्न श्रीकृष्णको शिलापृष्ठपर सुखपूर्वक बैठा देख इन्द्रको बड़ी लज्जा हुई॥ ६॥
तस्योपविष्टस्य मुखं पक्षाभ्यां पक्षिपुङ्गवः।
अन्तर्द्धानं गतच्छायां चकारोरगभोजनः॥ ७॥