विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः २६९
वहाँ बैठे हुए श्रीहरिके मुखपर सर्पभोजी पक्षिराज गरुड़ अदृश्य रहकर अपने दोनों पंखोंसे छाया किये हुए थे ॥ ७ ॥
तं विविक्ते वनगतं लोकवृत्तान्ततत्परम् । उपस्थे गजं हित्वा कृष्णं वलनिषूदनः ॥ ८ ॥
बलसूदन इन्द्र हाथी छोड़कर उतर पड़े और एकान्तमे वनके भीतर रहकर लोक-व्यवहारमें तत्पर हुए श्रीकृष्णकी सेवामे उपस्थित हुए ॥ ८ ॥
स समीपगतस्तस्य दिव्यस्रगनुलेपनः । रराज देवराजो वै वज्रपूर्णकरः प्रभुः ॥ ९ ॥
श्रीकृष्णके समीप जाकर दिव्य पुष्पोंके हार और अनुलेपन धारण करनेवाले प्रभावशाली देवराज इन्द्र बड़ी शोभा पा रहे थे । उनका हाथ वज्रसे परिपूर्ण था ॥ ९ ॥
किरीटेनार्कतुल्येन विद्युद्योतकारिणा । कुण्डलाभ्यां स दिव्याभ्यां सततं शोभिताननः ॥ १० ॥
विद्युत्के समान प्रकाश फैलानेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी किरीट तथा दो दिव्य कुण्डलोंसे उनके श्रीमुखकी सदा ही बड़ी शोभा होती थी ॥ १० ॥
पञ्चस्तबकलम्बेन हारेणोरसि भूषितः । सहस्रपत्रकान्तेन देहभूषणकारिणा । ईक्षमाणः सहस्रेण नेत्राणां कामरूपिणाम् ॥ ११ ॥
वे अपने वक्षःस्थलपर एक ऐसे हारसे विभूषित थे, जिसमें फूलोंके पाँच गुच्छे लटक रहे थे । खिले हुए कमलदलके समान कान्तिमान्, सम्पूर्ण शरीरको विभूषित करनेवाले तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले एक सहस्र नेत्रोंसे वे भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देख रहे थे ॥ ११ ॥
त्रिदशाज्ञापनार्थेन मेघनिर्घोषकारिणा । अथ दिव्येन मधुरं व्याजहार स्वरेण तम् ॥ १२ ॥
उन्होंने देवताओंको आज्ञा देनेके लिये अभ्यस्त और मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले दिव्य स्वरसे मधुर वाणीमे भगवान्से इस प्रकार कहा ॥ १२ ॥
इन्द्र उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन । अतिदिव्यं कृतं कर्म त्वया प्रीतिमती गवाम् ॥ १३ ॥
इन्द्र बोले—कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! आप सजातीय बन्धुओंके आनन्दकी वृद्धि करनेवाले हैं । गौओके प्रति प्रीति रखकर आपने जो कर्म किया है, वह अति दिव्य है ॥ १३ ॥
मयोत्सृष्टेषु मेघेषु युगान्तावर्तकारिषु । यत्त्वया रक्षिता गावस्तेनास्मि परितोषितः ॥ १४ ॥
मेरेद्वारा छोड़े गये प्रलयकी पुनरावृत्ति करनेवाले मेघोंके वर्षा करनेपर भी आपने जो गौओकी रक्षा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ॥ १४ ॥
स्वायम्भुवेन योगेन यश्चायं पर्वतोत्तमः । धृतो वेश्मवदाकाशे को ह्येतेन न विस्मयेत् ॥ १५ ॥
यह जो उत्तम पर्वत है, इसे आपने स्वायम्भुव योगसे आकाशमे घरकी भाँति धारण कर लिया था । आपके इस अलौकिक कर्मसे किसको आश्चर्य नहीं होगा ॥ १५ ॥
प्रतिषिद्धे मम मखे मयेयं रुषितेन वै । अतिवृष्टिः कृता कृष्ण गवां वै साप्तरात्रिकी ॥ १६ ॥
श्रीकृष्ण ! जब मेरा प्रचलित उत्सव रोक दिया गया, तब मैने रोषमे भरकर गौओंपर अपना क्रोध उतारनेके लिये सात राततक अतिवृष्टि की ॥ १६ ॥
सा त्वया प्रतिषिद्धेयं मेघवृष्टिर्दुरासदा । देवैः सदानवगणैर्दुर्निवाया मयि स्थिते ॥ १७ ॥
उस दुर्जय मेघवृष्टिका आपने निवारण कर दिया । मेरे रहते दानवोसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी उस वर्षाको रोकना बहुत ही कठिन था ॥ १७ ॥
अहो मे सुप्रियं कृष्ण यत् त्वं मानुषदेहवान् । समग्रं वैष्णवं तेजो विनिगृह्णसि रोषितः ॥ १८ ॥
श्रीकृष्ण ! यह एक आश्चर्यमयी घटना हुई है । मेरे लिये यह बहुत ही प्रिय है कि आप मनुष्यशरीर धारण करके भी अपने भीतर सम्पूर्ण वैष्णव तेजको छिपाये रखते हैं और रोष दिलाये जानेपर उसे प्रकट कर सकते हैं ॥ १८ ॥
साधितं देवतानां हि मन्येऽहं कार्यमव्ययम् । त्वयि मानुष्यमापन्ने युक्ते चैव स्वतेजसा ॥ १९ ॥
आप मानव-शरीरको प्राप्त होकर भी अपने वैष्णव तेजसे सम्पन्न हैं, इसलिये मैं देवताओंके कार्यको सिद्ध हुआ ही मानता हूँ । अब हमारा कोई कार्य बिगड़ नहीं सकता ॥ १९ ॥
सेत्स्यते सर्वकार्यार्थो न किंचित् परिहास्यते । देवानां यद् भवान् नेता सर्वकार्यपुरोगमः ॥ २० ॥
जब आप देवताओके नेता हैं और सभी कार्योंमे अग्र-
१. स्वयम्भूव योग कहते हैं हैरण्यगर्भी ( ब्रह्म-सम्बन्धिनी ) धारणाको, उसके करनेसे भारी-से-भारी वस्तु भी हल्की हो जाती है। जैसे श्रीकृष्णके उठाते समय गोवर्धन पर्वत हलका हो गया था, इसी तरह उस योग या धारणाका आश्रय लेनेमे बड़ी-से-बड़ी वस्तु भी बहुत छोटी या अल्प हो जाती है। जैसे अगस्त्यके समुद्रपान करते समय उनके लिये सारा समुद्र तीन ही आचमनमें सीमित होकर आ गया था।