विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 292, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २७० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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गामी रहते हैं, तब हमारा सब कार्य, समस्त प्रयोजन सिद्ध हो जायगा, कुछ भी बिगड़ने नहीं पायेगा ॥ २० ॥
एकस्त्वमसि देवानां लोकानां च सनातनः ।
द्वितीयं नाद्य पश्यामि यस्तेषां च धुरं वहेत् ॥ २१ ॥
प्रभो ! एकमात्र आप ही सम्पूर्ण देवता तथा लोकोंके सनातन रक्षक हैं। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको यहाँ ऐसा नहीं देखता, जो उन लोकों और देवताओंकी रक्षाका भार वहन कर सके ॥ २१ ॥
यथा हि पुङ्गवः श्रेष्ठो ह्यग्रे धुरि नियोज्यते ।
एवं त्वमसि देवानां मग्नानां द्विजवाहनः ॥ २२ ॥
जैसे श्रेष्ठ बैल भार ढोनेके लिये सबसे आगे जोता जाता है, उसी प्रकार आप संकटमें डूबे हुए देवताओंका उद्धार करनेके लिये सबसे आगे रहते हैं। पक्षिराज गरुड़ आपके वाहन हैं ॥ २२ ॥
त्वच्छरीरगतं कृष्ण जगत्प्रकरणं त्विदम् ।
ब्रह्मणा साधु निर्दिष्टं धातुभ्य इव काञ्चनम् ॥ २३ ॥
श्रीकृष्ण ! यह जो संसारकी सृष्टि है, वह सब आपके शरीरके भीतर ही है। ब्रह्माजीने तो उसका भलीभाँति निर्देश-मात्र किया है। जैसे सब धातुओंमें सुवर्ण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त देवताओंमें आप हैं ॥ २३ ॥
स्वयं स्वयम्भूर्भगवान् बुद्ध्याथ वयसापि वा ।
न त्वानुगन्तुं शक्नोति पङ्गुर्द्रुतगतिं यथा ॥ २४ ॥
साक्षात् स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा भी अपनी बुद्धि अथवा अवस्थाके द्वारा आपका अनुसरण नहीं कर सकते—आपके साथ-साथ नहीं चल सकते। ठीक उसी तरह, जैसे पङ्गु मनुष्य शीघ्रगामी पुरुषका पीछा नहीं कर सकता—उसके साथ नहीं जा सकता ॥ २४ ॥
स्थाणुभ्यो हिमवाञ्श्रेष्ठो ह्रदानां वरुणालयः ।
गरुत्मान् पक्षिणां श्रेष्ठो देवानां च भवान् वरः ॥ २५ ॥
समस्त पर्वतोंमें हिमवान् श्रेष्ठ है। सरोवरोंमें समुद्र उत्तम है। पक्षियोंमें गरुड़ तथा देवताओंमें आप श्रेष्ठ हैं ॥ २५ ॥
अपामधस्ताल्लोको वै तस्योपरि महीधराः ।
नागानामुपरिष्टाद् भूः पृथिव्युपरि मानुषाः ॥ २६ ॥
सबसे नीचे जललोक है, उसके ऊपर पर्वत हैं। यह पृथ्वी नागोंके ऊपर स्थित है और पृथ्वीपर मनुष्य निवास करते हैं ॥ २६ ॥
मनुष्यलोकादूर्ध्वं तु खगानां गतिरुच्यते ।
आकाशस्योपरि रविर्द्वारं स्वर्गस्य भानुमान् ॥ २७ ॥
मनुष्यलोकसे ऊपर आकाशमें पक्षियोंकी गति बतायी जाती है। आकाशसे ऊपर अंशुमाली सूर्य हैं, जो स्वर्गलोकके द्वार कहे गये हैं ॥ २७ ॥
देवलोकः परस्तस्माद् विमानगमनो महान् ।
यत्राहं कृष्ण देवानामैन्द्रे विनिहितः पदे ॥ २८ ॥
सूर्यलोकसे ऊपर देवताओंका महान् लोक है, जहाँ विमानसे यात्रा की जाती है। श्रीकृष्ण ! वहीं मुझे देवेन्द्र-पदपर स्थापित किया गया है ॥ २८ ॥
स्वर्गादूर्ध्वं ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगणसेवितः ।
तत्र सोमगतिश्चैव ज्योतिषां च महात्मनाम् ॥ २९ ॥
स्वर्गसे ऊपर ब्रह्मलोक है, जो ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित है। यहाँतक चन्द्रमाकी तथा महात्मा ग्रह-नक्षत्रोंकी गति है ॥ २९ ॥
तस्योपरि गवां लोकः साध्यास्तं पालयन्ति हि ।
स हि सर्वगतः कृष्ण महाकाशगतो महान् ॥ ३० ॥
ब्रह्मलोकसे ऊपर गोलोक है, जिसका साध्यगण पालन करते हैं। श्रीकृष्ण ! वह महान् लोक सर्वव्यापी है। महाकाशमें व्यापकरूपसे स्थित है ॥ ३० ॥
उपर्युपरि तत्रापि गतिस्तव तपोमयी ।
यां न विद्मो वयं सर्वे पृच्छन्तोऽपि पितामहम् ॥ ३१ ॥
उसमें भी आपकी तपोमयी गति सर्वोपरि है। हम पितामहसे पूछते रहनेपर भी अबतक आपकी उस गतिको नहीं जान सके हैं ॥ ३१ ॥
लोकस्त्वधो दुष्कृतिनां नागलोकस्तु दारुणः ।
पृथिवी कर्मशीलानां क्षेत्रं सर्वस्य कर्मणः ॥ ३२ ॥
भयंकर नागलोक सबसे नीचे है। वह पापाचारियोंको प्राप्त होनेवाला लोक या स्थान है। जो स्वभावसे ही कर्मठ हैं, उनके लिये यह भूलोक है। यह समस्त कर्मका क्षेत्र है ॥ ३२ ॥
खमस्थिराणां विषयो वायुना तुल्यवृत्तिनाम् ।
गतिः शमदमाढ्यानां स्वर्गः सुकृतकर्मणाम् ॥ ३३ ॥
जो अस्थिर हैं, जिनकी वृत्ति वायुके समान है, उनका आश्रय आकाश या अन्तरिक्षलोक है। जो शम-दमसे सम्पन्न हो पुण्य-कर्ममें लगे रहते हैं, उन मनुष्योंकी गति स्वर्गलोक है ॥ ३३ ॥
ब्राह्मे तपसि युक्तानां ब्रह्मलोकः परा गतिः ।
गवामेव तु गोलोको दुरारोहा हि सा गतिः ॥ ३४ ॥
जो ब्राह्म-तपमें संलग्न रहनेवाले लोग हैं, उनकी परम गति ब्रह्मलोक है। गोलोक तो गौओंको ही सुलभ होनेवाला लोक है। वह गति दूसरोंके लिये दुरारोह (दुर्लभ) है ॥ ३४ ॥
स तु लोकस्त्वया कृष्ण सीदमानः कृतात्मना ।
धृतो धृतिमन् वीर निघ्नतोपद्रवान् गवाम् ॥ ३५ ॥
वीर श्रीकृष्ण ! इस समय (मेरे द्वारा वर्षाके कारण) वही गौओंका लोक संकटमें पड़ गया था, जिसे आप-जैसे धैर्यशाली पुण्यात्मा पुरुषने उन गौओंपर आये हुए उपद्रवोंका नाश करके बचाया है ॥ ३५ ॥