विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 293, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] / एकोनविंशोऽध्यायः २७१
तदहं समुन्प्राप्तो गवां वाक्येन चोदितः।
ब्रह्मणश्च महाभाग गौरवात् तव चागतः॥ ३६॥
अतः महाभाग ! मैं (दिव्य कामधेनु आदि) गौओके तथा ब्रह्माजीके वचनोंसे प्रेरित होकर यहाँ आया हूँ। आपके प्रति मेरे मनमे जो गौरव है; उससे भी मुझे यहाँ आनेमे प्रेरणा मिली है॥ ३६॥
अहं भूतपतिः कृष्ण देवराजः पुरंदरः।
अदितेर्गर्भपर्याये पूर्वजस्ते पुराकृतः॥ ३७॥
श्रीकृष्ण ! मैं वही समस्त भूतोंका अधिपति देवराज इन्द्र हूँ, जिसे आपने पूर्वकालमें माता अदितिके गर्भमे आकर अपना बड़ा भाई बनाया था ॥ ३७॥
स्वतेजस्तेजसा चैव यत् ते दर्शितवानहम्।
देवरूपेण तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि मे विभो॥ ३८॥
प्रभो ! मैंने जो देवरूपसे उपस्थित होकर तेजसे अपना तेज प्रकट करके आपको दिखाया है, मेरे उस सारे अपराधको आप क्षमा कर दें ॥ ३८॥
एवं क्षान्तमनाः कृष्ण स्वेन सौम्येन तेजसा।
ब्रह्मणः शृणु मे वाक्यं गवां च गजविक्रम ॥ ३९॥
हाथीके समान पराक्रमी श्रीकृष्ण ! इस प्रकार आप अपने सौम्य तेजसे मनमें क्षमाभाव लाकर ब्रह्माजी तथा गौओ-के कहे हुए इस वचनको मेरे मुखसे सुनिये—॥ ३९॥
आह त्वां भगवान् ब्रह्मा गावश्चाकाशगा दिवि।
कर्मभिस्तोपिता दिव्यैस्तव संरक्षणादिभिः ॥ ४० ॥
भगवान् ब्रह्मा तथा द्युलोकमें स्थित हुई आकाशगामिनी गौओंने आपको यह संदेश दिया है कि 'हम आपके 'गोसंरक्षण' आदि दिव्य कर्मोंसे बहुत संतुष्ट हैं॥ ४०॥
भवता रक्षिता गावो गोलोकश्च महानयम्।
यद् वयं पुङ्गवैः सार्द्धं वर्द्धामः प्रसवैस्तथा ॥ ४१ ॥
'आपने जो गौओंकी रक्षा की है, उससे इस महान् गोलोकका संरक्षण हुआ है; क्योकि अब हम अपने साँड़ों और संतानोके साथ दिनोंदिन बढ़ रही हैं॥ ४१॥
कर्षकान् पुङ्गवैर्वाहीहैर्मेध्येन हविषा सुरान्।
श्रियं शकृत्प्रवृत्तेन तर्पयिष्याम कामदाः ॥ ४२ ॥
'हम गौएँ सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली हैं। अब हल या गाड़ीमे जोतने योग्य वलिष्ठ बैल देकर हम किसानोंको संतुष्ट करेंगी। दूध-घीके द्वारा पवित्र हविष्य प्रस्तुत करके देवताओंकी तृप्ति करेंगी और गोबर देकर साक्षात् श्रीदेवीको संतुष्ट करती रहेंगी ॥ ४२॥
तदस्माकं गुरुस्त्वं हि प्राणदश्च महाबलः।
अद्यप्रभृति नो राजा त्वमिन्द्रो वै भव प्रभो ॥ ४३ ॥
'प्रभो ! आप महान् बलशाली प्रभु हमारा परित्राण करनेके कारण हमारे गुरुरूप हैं; अतः आजसे आप हम गौओंके राजा इन्द्र हो जायें' ॥ ४३ ॥
तस्मात् त्वं काञ्चनैः पूर्णैर्दिव्यस्य पयसो घटैः।
एभिरद्याभिषिञ्चस्व मया हस्तोपनामितैः ॥ ४४॥
अतः (गौओंके इस अनुरोधके अनुसार) मेरे द्वारा हाथपर रखकर प्रस्तुत किये गये इन दिव्य जलसे भरे हुए सोनेके कलशोंद्वारा आप अपना अभिषेक करें ॥ ४४॥
अहं किलेन्द्रो देवानां त्वं गवामिन्द्रतां गतः।
गोविन्द इति लोकास्त्वां स्तोष्यन्ति भुवि शाश्वतम्॥४५।
मै देवताओंका इन्द्र हूँ और आप गौओंके इन्द्र हो गये ! आजसे इस भूतलपर सब लोग आप सनातन प्रभुको 'गोविन्द' कहकर आपका स्तवन करेगे ॥ ४५ ॥
ममोपरि यथेन्द्रस्त्वं स्थापितो गोभिरीश्वरः।
उपेन्द्र इति कृष्ण त्वां गास्यन्ति दिवि देवताः ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्ण ! गौओंने आप परमेश्वरको जो मेरे ऊपर इन्द्र बनाकर प्रतिष्ठित किया है, उसके अनुसार देवतालोग आपको 'उपेन्द्र' नाम देकर द्युलोकमें आपकी कीर्तिका गान करेंगे ॥ ४६ ॥
ये चेमे वार्षिका मासाश्चत्वारो विहिता मम।
एषामर्द्धं प्रयच्छामि शरत्कालं तु पश्चिमम् ॥ ४७ ॥
मेरी आराधनाके लिये जो ये वर्षाके चार महीने विहित हुए हैं, इनका पिछला आधा भाग, जिसे शरत्काल कहते हैं, मै आपको दे रहा हूँ ॥ ४७ ॥
अद्यप्रभृति मासौ द्वौ ज्ञास्यन्ति मम मानवाः।
वर्षार्द्धे च ध्वजो महां ततः पूजामवाप्स्यसि।
ममाम्बुप्रभवं दर्पं तदा त्यक्ष्यन्ति बर्हिणः ॥ ४८ ॥
सब मनुष्य आजसे 'श्रावण और भाद्रपद' इन दो ही महीनोंको मेरे लिये नियत मानेगे । इनके साथ वर्षाका आधा भाग व्यतीत हो जानेपर इन्द्रव्रतकी समासिके चिह्नभूत मेरे ध्वजकी स्थापना होगी। उसके बाद आपकी पूजा होने लगेगी। उस समय मोर मेरे द्वारा बरसाये गये जलसे उत्पन्न हुए मदको त्याग देंगे ॥ ४८ ॥
अल्पवाचो गतमदा ये चान्ये मेघनादिनः।
शान्तिं सर्वे गमिष्यन्ति मम कालविचारिणः ॥ ४९ ॥
उनकी बोली कम हो जायगी और उनका सारा मद उतर जायगा। मेघोंको देखकर गर्जना करनेवाले जो दूसरे प्राणी हैं, वे सब भी मेरे समयका विचार करके शान्ति (मौन) धारण कर लेंगे ॥ ४९ ॥
त्रिशङ्कुर्गस्त्यचरितामाशां च प्रचरिष्यति।
सहस्ररश्मिरादित्यस्तापयन् स्वेन तेजसा ॥ ५०॥