विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २७२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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वर्षांमें ही सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेव अपने तेजसे जगत्को ताप देते हुए 'त्रिशङ्कु' और 'अगस्त्य मुनि' के द्वारा उपभोगमें लायी हुई दक्षिण दिशामें संचार करेंगे ॥५०॥
ततः शरदि युक्तायां मौनकामेषु बर्हिषु ।
याचमाने खगे तोयं विप्लुतेषु प्लवेषु च ॥ ५१ ॥
हंससारसपूर्णेषु नदीनां पुलिनेषु च ।
मत्तक्रौञ्चप्रणादेषु प्रमत्तवृषभेषु च ॥ ५२ ॥
गोषु चैव प्रहृष्टासु क्षरन्तीषु पयो बहु ।
निवृत्तेषु च मेघेषु निर्यात्य जगतो जलम् ॥ ५३ ॥
आकाशे शस्त्रसंकाशे हंसेषु च चरत्सु च ।
जातपद्मेषु तोयेषु वापीषु च सरस्सु च ॥ ५४ ॥
तडागेषु च कान्तेषु तोयेषु विमलेषु च ।
कलमावनताग्रासु कृष्णकेदारपङ्क्तिषु ॥ ५५ ॥
मध्यस्थं सलिलारम्भं कुर्वन्तीषु नदीषु च ।
सुसस्यायां च सीमायां मनोहार्यां मुनेरपि ॥ ५६ ॥
पृथिव्यां पृथुराष्ट्रायां रम्यायां वर्षसंक्षये ।
श्रीमत्सु पङ्क्तिमार्गेषु फलवत्सु तृणेषु च ।
इक्षुमत्सु च देशेषु प्रवृत्तेषु मखेषु च ॥ ५७ ॥
ततः प्रवर्त्स्यते पुण्या शरत् सुप्तोत्थिते त्वयि ।
तदनन्तर जब शरद्ऋतुका योग प्राप्त होगा, मोर मौन रहनेकी इच्छा करेंगे, पपीहे जलकी याचना करने लगेंगे, नदियोंमें नाव चलना बंद हो जायगा (अर्थात् नदियोंमें जलकी बाढ़ नहीं रह जायगी), सरिताओंके तट हंसों और सारसोंसे भरे रहेंगे, मदमत्त क्रौञ्च पक्षी वहाँ कलरव करते होंगे, साँड़ मतवाले होकर घूमेंगे, गौएँ हर्षमें भरकर बहुत दूध देंगी, संसारके लिये जलकी वर्षा करके बादल विलीन हो जायेंगे, आकाश शस्त्रोंकी भाँति चमक उठेगा—निर्मल हो जायगा, हंस सब ओर विचरने लगेंगे, बावड़ी और सरोवरोंके जलोंमें कमल उत्पन्न हो जायेंगे, (उनके खिलनेसे) तड़ागोंकी शोभा बढ़ जायगी—वे कमनीय हो उठेंगे, सभी जलाशयोंके जल निर्मल हो जायेंगे, खेतोंकी श्रेणीबद्ध काली-काली क्यारियोंमें धानोंकी पकी बालें अग्रभागकी ओरसे लटकती होंगी, नदियाँ अपने जलका बहाव बीचमें कर लेंगी, ब्रजों अथवा गाँवोंकी सीमाएँ (खेतोंकी भूमि) सुन्दर सस्यों (अन्नान्नों) से सम्पन्न हो मुनियोंके भी मनको मोह लेनेवाली हो जायँगी, वर्षा संत जानेपर जब बहुत संख्यक राष्ट्रोंसे युक्त पृथ्वी रमणीय दिखायी देने लगेगी, पंक्तिबद्ध मार्ग शोभायमान हो जायेंगे, तृण बेलों तथा ओषधियोंमें फल लग जायेंगे, स्थान-स्थानपर ईखकी खेती लहराती दिखायी देगी, (आग्रायण और वाजपेय आदि) यज्ञ आरम्भ होने लगेंगे तथा आप (भगवान् विष्णु) जब सोकर जाग उठेंगे, उस समय पुण्यमयी शरद् ऋतुकी प्रवृत्ति होगी ॥ ५१–५७½ ॥
लोकेऽस्मिन् कृष्ण निखिले यथैव त्रिदिवे तथा ॥ ५८ ॥
नरास्त्वां चैव मां चैव ध्वजाकारासु यष्टिषु ।
महेन्द्रं चाप्युपेन्द्रं च महयन्ति महीतले ॥ ५९ ॥
श्रीकृष्ण ! वह शरत्काल प्राप्त होनेपर स्वर्गलोककी ही भाँति इस समस्त जगत्में रहनेवाले मनुष्य भी भूतलपर ध्वजाकार डंडोंमें मुझ महेन्द्रकी तथा आप उपेन्द्रकी पूजा करेंगे ॥ ५८-५९ ॥
ये चावयोः स्थिरे वृत्ते महेन्द्रोपेन्द्रसंज्ञिते ।
मानवाः प्रणमिष्यन्ति तेषां नास्त्यनयागमः ॥ ६० ॥
जो मानव हम दोनोंसे सम्बन्ध रखनेवाले इस सनातन आचार (महेन्द्रोपेन्द्रमख नामक उत्सव) में हमें प्रणाम करेंगे, उन्हें कभी अनीतिको सामना नहीं करना पड़ेगा ॥ ६० ॥
ततः शक्रस्तु तान् गृह्य घटान् दिव्यपयोधरान्।
अभिषेकेण गोविन्दं योजयामास योगवित् ॥ ६१ ॥
तदनन्तर योगवेत्ता इन्द्रने दिव्य (मन्दाकिनीका) जल धारण करनेवाले उन कलशोंको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्णका 'गोविन्द (गौओंके इन्द्र)'-पदपर अभिषेक किया ॥ ६१ ॥
दृष्ट्वा तमभिषिक्तं तु गावस्ताः सह यूथपैः ।
स्तनैः प्रस्रवयुक्तैश्च सिषिचुः कृष्णमव्ययम् ॥ ६२ ॥
(इन्द्रद्वारा) उनका अभिषेक हुआ देख यूथपतियों (साँड़ों) सहित उन दिव्य गौओंने भी दूधकी धारा बहाते हुए अपने थनोंद्वारा अविनाशी श्रीकृष्णका अभिषेचन किया ॥ ६२ ॥
मेघाश्च दिवि युक्ताभिः सामृताभिः समन्ततः ।
सिषिचुस्तोयधाराभिरभिषिच्य तमव्ययम् ॥ ६३ ॥
इसके बाद मेघोंने भी आकाशमें छोड़ी हुई अमृतयुक्त जलधाराओं द्वारा श्रीकृष्णको सब ओरसे नहलाकर उन अविनाशी ईश्वरका अभिषेक-कर्म सम्पन्न किया ॥ ६३ ॥
वनस्पतीनां सर्वेषां सुस्रावेन्दुनिभं पयः ।
ववर्षुः पुष्पवर्षं च नेदुस्तूर्याणि चाम्बरे ॥ ६४ ॥
तदनन्तर सभी वनस्पतियोंकी डालियोंसे चन्द्रमाके समान श्वेत दुग्ध टपकने लगा (इस तरह उन वनस्पतियोंने भी भगवान्का अभिषेक किया)। देवताओंने फूलोंकी वर्षा की तथा आकाशमें दिव्य बाजे अपने-आप बज उठे ॥ ६४ ॥
अस्तुवन् मुनयः सर्वे वाग्भिर्मन्त्रपरायणाः ।
एकार्णवे विविक्तं च दधार वसुधा वपुः ॥ ६५ ॥
तत्पश्चात् सभी मन्त्रपरायण मुनियोंने भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन किया। पृथ्वीने अपने उस स्वरूपको धारण किया, जो एकार्णवसे पृथक् होनेपर उसे प्राप्त हुआ था ॥ ६५ ॥