भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

विष्णुपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः २७३


प्रसादं सागरा जग्मुर्ववुर्वाता जगद्धिताः।
मार्गस्थोऽपि वभौ भानुश्चन्द्रो नक्षत्रसंयुतः ॥ ६६ ॥
समस्त समुद्रोंके जल प्रसन्न (स्वच्छ-निर्मल) हो गये। वायु जगत्के लिये हितकारक होकर बहने लगी। सूर्यदेव अपने समुचित मार्गपर स्थित रहकर प्रकाशित होने लगे। चन्द्रमा नक्षत्रोंसे संयुक्त होकर सुशोभित होने लगे ॥ ६६ ॥

ईतयः प्रशमं जग्मुर्निर्वैररचना नृपाः।
प्रवालपत्रशबलाः पुष्पवन्तश्च पादपाः ॥ ६७॥
अतिवृष्टि आदि ईतियाँ शान्त हो गयीं। राजाओंके सभी कार्य वैरभावसे रहित होने लगे। वृक्ष फूलोंसे भर गये और नूतन पल्लवों तथा हरे-हरे पत्तोंसे विचित्र शोभा धारण करने लगे ॥ ६७ ॥

मदं प्रस्रुस्रुवुर्नागा यातास्तोषं वने मृगाः।
अलंकृता गात्ररूहैर्धातुभिर्भान्ति पर्वताः ॥ ६८ ॥
हाथी मद बहाने लगे। वनमें मृग आदि पशु संतोष प्राप्त करने लगे। पर्वत अपने ऊपर उगे हुए वृक्षों तथा विभिन्न धातुओंसे शोभा पाने लगे ॥ ६८ ॥

देवलोकोपमो लोकस्तुष्टोऽमृतरसैरिव।
आसीत् कृष्णाभिषेको हि दिव्यस्वर्गरसोक्षितः ॥ ६९॥
सम्पूर्ण जगत् देवलोकके समान सुखी हो गया, मानो उसे अमृत-रससे तृप्त कर दिया गया हो। इस प्रकार दिव्य स्वर्गीय रस (जल) से सिक्त होकर श्रीकृष्णका वह अभिषेक-कर्म सम्पन्न हुआ ॥ ६९ ॥

अभिषिक्तं तु तं गोभिः शक्रो गोविन्दमव्ययम्।
दिव्यमाल्याम्बरधरं देवदेवोऽब्रवीदिदम् ॥ ७० ॥
गौओं द्वारा अभिषिक्त होकर दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले अविनाशी गोविन्दसे देवदेव इन्द्रने इस प्रकार कहा—॥ ७० ॥

एष ते प्रथमः कृष्ण नियोगो गोषु यः कृतः।
श्रूयतामपरं कृष्ण ममागमनकारणम् ॥ ७१ ॥
'श्रीकृष्ण ! यह मैंने आपको अपने आगमनका प्रथम हेतु बताया है, जिसके अनुसार गौओंकी आज्ञाका पालन किया गया है। अब मेरे आनेका जो दूसरा कारण है, उसे भी सुन लीजिये ॥ ७१ ॥

क्षिप्रं प्रसाध्यतां कंसः केशी च तुरगाधमः।
अरिष्टश्च मदाविष्टो राजराज्यं ततः कुरु ॥ ७२ ॥
'मुझे यह कहना है कि आप शीघ्र ही कंस तथा अश्वोंमें अधम केशीका भी वध कर डालिये। मदमत्त अरिष्टासुरको यमलोक भेज दीजिये। तदनन्तर राजाओंपर शासन कीजिये ॥ ७२ ॥

पितृष्वसरि जातस्ते ममांशोऽहमिव स्थितः।
स ते रक्ष्यश्च मान्यश्च सख्ये च विनियुज्यताम् ॥ ७३ ॥
'आपकी बुआ कुन्तीके गर्भसे मेरा अंश उत्पन्न हुआ है, जो मेरे ही समान है। आप उसकी रक्षा और आदर करें तथा उसे अपना सखा बना लें ॥ ७३ ॥

त्वया ह्यनुगृहीतः स तव वृत्तानुवर्तकः।
त्वद्दृशे वर्तमानश्च प्राप्स्यते विपुलं यशः ॥ ७४ ॥
'आपसे अनुगृहीत होकर वह आपके बताये हुए आचारका पालन करेगा और सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहकर भूमण्डलमें महान् यश प्राप्त कर लेगा ॥ ७४ ॥

भारतस्य च वंशस्य स वरिष्ठो धनुर्धरः।
भविष्यत्यनुरूपश्च त्वदृते न च रंस्यते ॥ ७५॥
'वह भरतवंशका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होगा। आपकी इच्छाके अनुरूप बनकर रहेगा और आपके बिना कभी कहीं भी उसका मन नहीं लगेगा ॥ ७५ ॥

भारतं त्वयि चायत्तं तस्मिंश्च पुरुषोत्तमे।
उभाभ्यामपि संयोगे यास्यन्ति निधनं नृपाः ॥ ७६ ॥
'आप और उस पुरुषप्रवर कुन्तीकुमारपर ही महाभारत युद्ध अवलम्बित होगा। आप दोनोंका संयोग प्राप्त होनेपर राजालोग युद्धमें मारे जायेंगे ॥ ७६ ॥

प्रतिज्ञातं मया कृष्ण ऋषिमध्ये सुरेषु च।
मया पुत्रोऽर्जुनो नाम सृष्टः कुन्त्यां कुलोद्वहः ॥ ७७ ॥
'श्रीकृष्ण ! मैंने ऋषियों तथा देवताओंके बीचमें इस बातका विज्ञापन कर दिया है कि कुन्तीके गर्भसे मेरे द्वारा जिस कुलदीपक पुत्रकी उत्पत्ति हुई है, उसका नाम अर्जुन है ॥

सोऽस्त्राणां पारतत्त्वज्ञः श्रेष्ठश्चापाविकर्षणे।
तं प्रवेक्ष्यन्ति वै सर्वे राजानः शस्त्रयोधिनः ॥ ७८ ॥
'वह अस्त्रोंकी विद्यामें पारंगत है। धनुषको खींचनेमें सबसे श्रेष्ठ है। शस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेवाले सब नरेश उसीमें विलीन हो जायेंगे ॥ ७८ ॥

अक्षौहिणीस्तु शूराणां राज्ञां संग्रामशालिनाम्।
स एकः क्षत्रधर्मेण योजयिष्यति मृत्युना ॥ ७९ ॥
'संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर राजाओंकी कई अक्षौहिणी सेनाओंको वह अकेला ही क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करके मौतके घाट उतार देगा ॥ ७९ ॥

तस्यास्त्रचरितं मार्गे धनुषो लाघवेन च।
नानुयास्यन्ति राजानो देवा वा त्वां विना प्रभो ॥ ८० ॥
'प्रभो ! आपको छोड़कर दूसरे कोई देवता अथवा भूतलके नरेश अर्जुनके अस्त्र-मार्गका अनुसरण नहीं कर सकेंगे। उसमें जो धनुष चलानेकी फुर्ती है, उसके द्वारा भी कोई उसकी समानता नहीं कर सकता ॥ ८० ॥

स ते बन्धुः सहायश्च संग्रामेषु भविष्यति।
तस्य योगो विधातव्यस्त्वया गोविन्द मत्कृते ॥ ८१ ॥