भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 296
२७४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

‘गोविन्द! युद्धके अवसरोंपर अर्जुन आपका सच्चा बन्धु एवं सहायक होगा। मेरे लिये अथवा मेरे कहनेसे आपको उसे अध्यात्मविद्याका उपदेश अवश्य करना चाहिये ॥ ८१ ॥

द्रष्टव्यश्च यथाहं वै त्वया मान्यश्च नित्यशः।
ज्ञाता त्वमेव लोकानामर्जुनस्य च नित्यशः ॥ ८२ ॥

‘आप अर्जुनको उसी तरह अपनापनकी दृष्टिसे देखें, जैसा मुझे देखा करते हैं। प्रतिदिन उसका आदर करते रहें। आप ही सम्पूर्ण लोकोंके ज्ञाता हैं, अतः अर्जुनका भी सदा ध्यान रखें ॥ ८२ ॥

त्वया च नित्यं संरक्ष्य आहवेषु महत्सु सः।
रक्षितस्य त्वया तस्य न मृत्युः प्रभविष्यति ॥ ८३ ॥

‘बड़े-बड़े युद्धके अवसरोंपर भी आपको नित्यप्रति उसकी रक्षा करनी चाहिये। आपसे सुरक्षित हुए अर्जुनपर मृत्युका वश नहीं चल सकेगा ॥ ८३ ॥

अर्जुनं विद्धि मां कृष्ण मां चैवात्मानमात्मना।
आत्मा तेऽहं यथा शश्वत् तथैव तव सोऽर्जुनः ॥ ८४ ॥

‘श्रीकृष्ण! आप अर्जुनको मेरा ही स्वरूप समझें और मुझे भी हृदयसे अपना आत्मा स्वीकार करें। जैसे मैं सदा ही आपका आत्मा हूँ, उसी प्रकार वह अर्जुन भी आपका आत्मा ही है ॥ ८४ ॥

त्वया लोकानिमाञ्जित्वा बलेर्हस्तात् त्रिभिः क्रमैः।
देवतानां कृतो राजा पुरा ज्येष्ठक्रमादहम् ॥ ८५ ॥

‘पूर्वकालमें आपने तीन पगोंद्वारा इन तीनों लोकोंको नापकर बलिके हाथसे अपने अधिकारमें ले लिया और मुझे ही अपना बड़ा भाई मानकर देवताओंका राजा बना दिया ॥

त्वां च सत्यमयं ज्ञात्वा सत्येष्टं सत्यविक्रमम्।
सत्येनोपेत्य देवा वै योजयन्ति रिपुक्षये ॥ ८६ ॥

‘आप सत्यमय हैं, सत्यरूपी यज्ञद्वारा आपका यजन हुआ है तथा आप सत्यपराक्रमी हैं, ऐसा जानकर देवतालोग सत्य-भावसे ही आपकी शरणमें आते और आपको शत्रु-संहारके कार्यमें लगाते हैं ॥ ८६ ॥

सोऽर्जुनो नाम मे पुत्रः पितुस्ते भगिनीसुतः।
इह सौहार्दमायातु भूत्वा सहचरस्तव ॥ ८७ ॥

‘अर्जुन नामसे प्रसिद्ध मेरा पुत्र आपके पिताकी बहिन (बुआ) का बेटा है। वह इस जगत्‌में आपका सहचर होकर आपके साथ पूर्ण सौहार्द स्थापित करे ॥ ८७ ॥

तस्य ते युध्यतः कृष्ण स्वस्थानेऽपि गृहेऽपि वा।
वोढव्या पुङ्गवेनेव धूः सदा रणमूर्धनि ॥ ८८ ॥

‘श्रीकृष्ण ! वह युद्ध कर रहा हो, अपने स्थानपर हो अथवा घरमें बैठा हो, आपको बलिष्ठ वृषभकी भाँति सदा उसका भार संभालना चाहिये। युद्धके मुहानेपर तो सदा ही आपको उसकी रक्षाका बोझ उठाना है ॥ ८८ ॥

कंसे विनिहते कृष्ण त्वया भाव्यर्थदर्शिना।
अभितस्तन्महद् युद्धं भविष्यति महीक्षिताम् ॥ ८९ ॥

‘श्रीकृष्ण ! आप तो भविष्यमें होनेवाली घटनाओंको भी प्रत्यक्षकी भाँति देखनेवाले हैं (अतः आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है)। जब कंस आपके द्वारा मार डाला जायगा, तब सब ओरसे आये हुए राजाओंका वह महान् युद्ध (महाभारत) होगा ॥ ८९ ॥

तत्र तेषां नृवीराणामतिमानुषकर्मणाम्।
विजयस्यार्जुनो भोक्ता यशसा त्वं च योक्ष्यसे ॥ ९० ॥

‘उस युद्धमें अतिमानव (अलौकिक) कर्म करनेवाले उन नरवीर राजाओंको जीतकर अर्जुन विजय-सुखका उपभोग करेगा और आप महान् सुयशके भागी होंगे ॥ ९० ॥

एतन्मे कृष्ण कात्स्न्येन कर्तुमर्हसि भाषितम्।
यद्यहं ते सुराश्चैव सत्यं च प्रियमच्युत ॥ ९१ ॥

‘अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्ण! यदि मैं, सम्पूर्ण देवता तथा सत्य आपको प्रिय हैं तो मैंने जो कुछ यहाँ कहा है, वह सब कार्य आपको पूर्ण करना चाहिये’॥

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा कृष्णो गोविन्दतां गतः।
प्रीतेन मनसा युक्तः प्रतिवाक्यं जगाद ह ॥ ९२ ॥

इन्द्रका यह वचन सुनकर 'गोविन्द' भावको प्राप्त हुए श्रीकृष्णने प्रसन्न-मनसे युक्त होकर इस प्रकार उत्तर दिया-॥

प्रीतोऽस्मि दर्शनाद् देव तव शक्र शचीपते।
यत् त्वयाभिहितं चेदं न किंचित् परिहास्यते ॥ ९३ ॥

‘देव! शचीवल्लभ शक्र! मैं तो आपके दर्शनसे ही प्रसन्न हो गया हूँ। आपने यह जो कुछ कहा है, वह सब पूरा किया जायगा; कुछ भी छोड़ा नहीं जायगा ॥ ९३ ॥

जानामि भवतो भावं जानाम्यर्जुनसम्भवम्।
जाने पितृष्वसारं च पाण्डोर्दत्तां महात्मनः ॥ ९४ ॥

‘आपका मेरे प्रति जो भाव है, उसे मैं जानता हूँ। मुझे अर्जुनके जन्मका भी पता है। महात्मा पाण्डुके साथ जिनका विवाह हुआ, उन अपनी बुआ कुन्तीको भी मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ९४ ॥

युधिष्ठिरं च जानामि कुमारं धर्मनिर्मितम्।
भीमसेनं च जानामि वायोः संतानजं सुतम् ॥ ९५ ॥

‘धर्मके द्वारा उत्पन्न हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे भी मैं परिचित हूँ। वायुकी संतान होकर उत्पन्न हुए अपनी बुआके बेटे भीमसेनको भी मैं जानता हूँ ॥ ९५ ॥

अश्विभ्यां साधु जानामि सृष्टं पुत्रद्वयं शुभम्।
नकुलं सहदेवं च माद्रीकुक्षिगतावुभौ ॥ ९६ ॥

‘दोनों अश्विनीकुमारोंने जिन दो शुभलक्षण पुत्रोंकी सृष्टि की है तथा जो माद्रीके गर्भमें रह चुके हैं, उन दोनों भाई नकुल और सहदेवके विषयमें भी मैं भलीभाँति जानकारी रखता हूँ ॥ ९६ ॥