विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 297, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] विंशोऽध्यायः २७५ कानीनं चापि जानामि सवितुः प्रथमं सुतम् । पितृष्वसरि कर्णं वै प्रसूतं सूततां गतम् ॥ ९७ ॥ 'बुआ कुन्तीके गर्भसे सूर्यदेवका संयोग पाकर कन्या- वस्थामे जो प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ था तथा जन्म लेनेके बाद जो सूत-भावको प्राप्त हो गया है, उस कर्णसे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ ॥ ९७ ॥ धार्तराष्ट्रांश्च मे सर्वे विदिता युद्धकाङ्क्षिणः । पाण्डोरुपरमं चैव शापाशनिनिपातजम् ॥ ९८ ॥ 'युद्धकी इच्छा रखनेवाले समस्त धृतराष्ट्र-पुत्रोंको भी मैं जानता हूँ । शापरूपी वज्रपातके कारण राजा पाण्डुका जो निधन हुआ है, वह भी मुझसे छिपा नहीं है ॥ ९८ ॥ तद् गच्छ त्रिदिवं शक्र सुखाय त्रिदिवौकसाम् । नार्जुनस्य रिपुः कश्चिन्ममाग्रे प्रभविष्यति ॥ ९९ ॥ 'अतः देवराज इन्द्र ! आप देवताओंको सुख देनेके लिये स्वर्गलोकको पधारिये । मेरे सामने अर्जुनका कोई भी शत्रु उसे परास्त नहीं कर सकेगा ॥ ९९ ॥' अर्जुनार्थे च तान् सर्वान् पाण्डवानक्षतान् युधि । कुन्त्या निर्यातयिष्यामि निवृत्ते भारते मृधे ॥१००॥ 'अर्जुनके लिये ही मैं महाभारत-युद्ध समाप्त होनेपर उन समस्त पाण्डवोंको कुन्तीकी सेवामें सकुशल लौटा दूँगा ॥ यच्च वक्ष्यति मां शक्र तनूजस्तव सोऽर्जुनः । भृत्यवत्तत् करिष्यामि तव स्नेहेन यन्त्रितः ॥१०१॥ 'देवेन्द्र ! आपका पुत्र अर्जुन मुझसे जो कुछ कहेगा, उसे मैं आपके स्नेह-पाशसे बँधकर आज्ञाकारी सेवककी भाँति पूर्ण करूँगा' ॥ १०१ ॥ सत्यसंघस्य तच्छ्रुत्वा प्रियं प्रीतस्य भाषितम् । कृष्णस्य साक्षात् त्रिदिवं जगाम त्रिदशेश्वरः ॥१०२॥ सत्यप्रतिज्ञ श्रीकृष्णके प्रसन्नतापूर्वक कहे गये इस प्रिय वचनको सुनकर देवेश्वर इन्द्र साक्षात् स्वर्गलोकको चले गये ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोविन्दाभिषेके एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गोविन्दका अभिषेकविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥ विंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका अलौकिक चरित्र देखकर आशङ्कित हुए गोपोंका उनसे प्रश्न और श्रीकृष्णद्वारा उत्तर तथा उनकी रासलीलाका संक्षेपसे वर्णन वैशम्पायन उवाच गते शक्रे ततः कृष्णः पूज्यमानो व्रजालयैः । गोवर्धनधरः श्रीमान् विवेश व्रजमेव ह ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! देवराज इन्द्र- के चले जानेपर व्रजवासियोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित होते हुए गोवर्धनधारी श्रीमान् कृष्णने व्रजमें ही प्रवेश किया ॥१॥ तस्य वृद्धाभिनन्दन्ति ज्ञातयश्च सहोषिताः । धन्याः स्मोऽनुगृहीताः स्मस्त्वद्वृत्तेन नयेन च ॥ २ ॥ गावो वर्षभयात् तीर्णा वयं तीर्णा महाभयात् । तव प्रसादाद् गोविन्द देवतुल्यपराक्रम ॥ ३ ॥ वहाँ बड़े-बूढ़े गोप और साथ रहनेवाले जाति-भाई उनका अभिनन्दन करते हुए बोले- 'देवतुल्य पराक्रमी गोविन्द ! हम धन्य हैं। तुमने अपने व्यवहार और नीतिसे हमलोगोंपर महान् अनुग्रह किया है। तुम्हारे प्रसादसे गौओंका वर्षाके भयसे उद्धार हुआ और हमलोग भी महान् भयसे पार हो गये ॥ २-३ ॥ अमानुषाणि कर्माणि तव पश्याम गोपते । धारणेनास्य शैलस्य विश्वस्त्वां कृष्ण दैवतम् ॥ ४ ॥ 'गोपते ! हम तुम्हारे सभी कर्म अलौकिक देख रहे हैं। श्रीकृष्ण ! इस गोवर्धन पर्वतको हाथपर धारण करनेसे हम यह अच्छी तरह समझ गये हैं कि तुम मनुष्य नहीं देवता हो ॥ ४ ॥ कस्त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां च महाबलः । वसूनां वा किमर्थं च वसुदेवः पिता तव ॥ ५ ॥ 'तुम्हारा बल महान् है। बताओ, तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओंमेंसे कौन हो ? ये नन्दजी तुम्हारे पिता कैसे हो गये ? ॥ ५ ॥ बलं च बाल्ये क्रीडा च जन्म चास्मासु गर्हितम् । कृष्ण दिव्या च ते चेष्टा शङ्कितानि मनांसि नः ॥ ६ ॥ 'श्रीकृष्ण ! बचपनमें ही तुममें ऐसा अलौकिक बल है, तुम्हारे खेल भी अलौकिक हैं तथा तुम्हारी सारी चेष्टा दिव्य है। परंतु हमलोगोंमें जो तुम्हारा जन्म हुआ, यही निन्दित है । ( तुम्हें ऐसा निन्दित जन्म कैसे प्राप्त हुआ ?) इन बातोंको सोचकर हमारे हृदय शंकित हो उठे हैं ॥ ६ ॥ किमर्थं गोपवेषेण रमसेऽस्मासु गर्हितम् । लोकपालोपमश्चैव गास्त्वं किं परिरक्षसि ॥ ७ ॥ १. हरिवंशपर्वके ५५ वें अध्यायमें वसुदेव और नन्दको अभिन्न बताया गया है। एक ही कश्यपके दो रूप हैं वसुदेव और नन्द। अतः कहीं-कहीं नन्दके लिये भी वसुदेव नामका प्रयोग हुआ है; इसीलिये यहाँ 'वसुदेव' पदका नन्द अर्थ किया गया है।