भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 298

२७६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'तुम किसलिये गोपवेश धारण करके हमलोगोंमें रम रहे हो। यह कार्य तो तुम्हारे लिये गर्हित है। तुम लोकपालोंके समान शक्तिशाली होकर भी यहाँ क्यों गौओंकी चरवाही और रखवाली करते हो ॥ ७॥

देवो वा दानवो वा त्वं यक्षो गन्धर्व एव वा । अस्माकं बान्धवो जातो योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते ॥८॥

'तुम देवता हो या दानव ? यक्ष हो अथवा गन्धर्व ? जो हमारे बन्धु-बान्धवके रूपमें उत्पन्न हुए हो ? कृष्ण ! तुम जो हो सो हो, तुम्हे हमारा नमस्कार है ॥ ८ ॥

केनचिद् यदि कार्येण वससीह यदृच्छया । वयं तवानुगाः सर्वे भवन्तं शरणं गताः ॥ ९ ॥

'यदि किसी कार्यविशेषसे तुम स्वेच्छापूर्वक यहाँ रह रहे हो तो रहो। हम सब लोग तुम्हारे अनुगामी सेवक हैं और तुम्हारी शरणमें आये हैं' ॥ ९॥

वैशम्पायन उवाच

गोपानां वचनं श्रुत्वा कृष्णः पद्मदलेक्षणः । प्रत्युवाच स्मितं कृत्वा ज्ञातीन् सर्वान् समागतान् ॥१०॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! गोपोंकी यह बात सुनकर विकसित कमलदलके समान नेत्रवाले श्रीकृष्णने मुसकराकर उन समस्त समागत बन्धुओंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १० ॥

मन्यन्ते मां यथा सर्वे भवन्तो भीमविक्रमम् । तथाहं नावमन्तव्यः सजातीयोऽस्मि बान्धवः ॥ ११ ॥

'आप सब लोग मुझे जैसा भयानक पराक्रमी समझ रहे हैं, वैसा मानकर मेरा अनादर न करें। मैं तो आपलोगोंका सजातीय भाई-बन्धु ही हूँ ॥ ११ ॥

यदि त्ववश्यं श्रोतव्यं कालः सम्प्रतिपाल्यताम् । ततो भवन्तः श्रोष्यन्ति मां च द्रक्ष्यन्ति तत्त्वतः ॥ १२ ॥

'यदि मेरे विषयमें आपलोगोंको यथार्थ बात अवश्य ही सुननी है तो इसके लिये उपयुक्त समयकी प्रतीक्षा करें, फिर आप मेरे विषयमें सुनेंगे और मैं वास्तवमें कैसा हूँ, यह देख और समझ सकेंगे ॥ १२ ॥

यद्ययं भवतां श्लाघ्यो बान्धवो देवसप्रभः । परिज्ञानेन किं कार्यं यद्येषोऽनुग्रहो मम ॥ १३ ॥

'यदि देवोपम कान्तिसे युक्त यह बालक आपलोगोंका स्पृहणीय भाई-बन्धु है तो इसके विषयमें विशेष छानबीन करनेकी क्या आवश्यकता है। यदि आप मौन ही रहें तो यह मेरे ऊपर आपका महान् अनुग्रह होगा' ॥ १३ ॥

एवमुक्तास्तु ते गोपा वसुदेवसुतेन वै। बद्धमौना दिशः सर्वे भेजिरे पिहिताननाः ॥ १४ ॥

वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर उन गोपोंने अपना मुँह बंद कर लिया और मौन होकर वे सब-के-सब विभिन्न दिशाओंमें चले गये ॥ १४ ॥

कृष्णस्तु यौवनं दृष्ट्वा निशि चन्द्रमसो वनम् । शारदीं च निशां रम्यां मनश्चक्रे रतिं प्रति ॥ १५॥

इधर श्रीकृष्णने पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमाका यौवन (अधिक कान्तिमान् रूप), रमणीय वन तथा शरत्-कालकी सुरम्य रजनीको देखकर मनमें रमण करनेकी इच्छा की ॥१५॥

स करीषाङ्गरागासु व्रजरथ्यासु वीर्यवान् । वृषाणां जातदर्पाणां युद्धानि समयोजयत् ॥ १६ ॥

पराक्रमी श्रीकृष्णने सूखे गोबरके चूर्णका अङ्गराग-सा धारण करनेवाली व्रजकी गलियोंमें बलोन्मत्त साँड़ोंके युद्धका आयोजन किया ॥ १६ ॥

गोपालांश्च बलोदग्रान् योधयामास वीर्यवान् । वने स वीरो गाश्चैव जग्राह ग्राहवद् विभुः ॥ १७ ॥

उन बलशाली वीर भगवान् गोविन्दने बलमें बढ़े-चढ़े गोपोंमें परस्पर मल्लयुद्ध भी करवाया और वनमें घूमती हुई गौओंको ग्राहकी भाँति पकड़नेकी भी लीला की ॥ १७ ॥

युवतीर्गोपकन्याश्च रात्रौ संकालय कालवित् । कैशोरकं मानयन् वै सह ताभिर्मुमोद ह ॥ १८ ॥

समयको पहचाननेवाले वे श्रीहरि अपनी किशोरावस्थाका आदर करते हुए युवती गोपकन्याओंको रातके समय वनमें ले गये और उन सबके साथ आमोद-प्रमोद करने लगे ॥ १८॥

तास्तस्य वदनं कान्तं कान्ता गोपस्त्रियो निशि । पिबन्ति नयनाक्षेपैर्गो गतं शशिनं यथा ॥ १९ ॥

निशाकालमें वे कान्तिमती गोपाङ्गनाएँ प्रियतम श्रीकृष्णके कमनीय मुखका, जो भूतलपर उतरे हुए द्वितीय चन्द्रमाके समान प्रतीत होता था, अपने नेत्रोंद्वारा कटाक्षपातपूर्वक पान करने लगीं ॥ १९ ॥

हरितालार्द्रपीतेन स कौशेयेन वाससा । वसानो भद्रवसनं कृष्णः कान्ततरोऽभवत् ॥ २० ॥

उस समय हरितालके पङ्ककी भाँति पीले रेशमी पीताम्बरसे अपने अङ्गोंको आच्छादित करनेवाले माङ्गल्य वस्त्रधारी श्रीकृष्ण और भी अधिक मनोहर प्रतीत हो रहे थे। २०

स बद्धाङ्गदनिव्यूहश्चित्रया वनमालया । शोभमानो हि गोविन्दः शोभयामास तद् व्रजम् ॥२१॥

बाहोंमें भुजबंद बाँधे और मस्तकपर मुकुट धारण किये विचित्र वनमालासे सुशोभित गोविन्द उस व्रजकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २१ ॥

नाम दामोदरेत्येवं गोपकन्यास्तदाब्रुवन् । विचित्रं चरितं घोषे दृष्ट्वा तत् तस्य भास्वतः ॥ २२ ॥

गोष्ठमें उन तेजस्वी श्रीकृष्णके विचित्र चरित्रोंको देखकर गोपकिशोरीयाँ उस समय उन्हें 'दामोदर' कहकर पुकारती थीं ॥ २२ ॥

तास्तं पयोधरोत्तुङ्गैरुरोभिः समपीडयन् । भ्रामिताक्षैश्च वदनैर्निरीक्षन्ते वराङ्गनाः ॥ २३ ॥