विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
२७६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'तुम किसलिये गोपवेश धारण करके हमलोगोंमें रम रहे हो। यह कार्य तो तुम्हारे लिये गर्हित है। तुम लोकपालोंके समान शक्तिशाली होकर भी यहाँ क्यों गौओंकी चरवाही और रखवाली करते हो ॥ ७॥
देवो वा दानवो वा त्वं यक्षो गन्धर्व एव वा । अस्माकं बान्धवो जातो योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते ॥८॥
'तुम देवता हो या दानव ? यक्ष हो अथवा गन्धर्व ? जो हमारे बन्धु-बान्धवके रूपमें उत्पन्न हुए हो ? कृष्ण ! तुम जो हो सो हो, तुम्हे हमारा नमस्कार है ॥ ८ ॥
केनचिद् यदि कार्येण वससीह यदृच्छया । वयं तवानुगाः सर्वे भवन्तं शरणं गताः ॥ ९ ॥
'यदि किसी कार्यविशेषसे तुम स्वेच्छापूर्वक यहाँ रह रहे हो तो रहो। हम सब लोग तुम्हारे अनुगामी सेवक हैं और तुम्हारी शरणमें आये हैं' ॥ ९॥
वैशम्पायन उवाच
गोपानां वचनं श्रुत्वा कृष्णः पद्मदलेक्षणः । प्रत्युवाच स्मितं कृत्वा ज्ञातीन् सर्वान् समागतान् ॥१०॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! गोपोंकी यह बात सुनकर विकसित कमलदलके समान नेत्रवाले श्रीकृष्णने मुसकराकर उन समस्त समागत बन्धुओंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १० ॥
मन्यन्ते मां यथा सर्वे भवन्तो भीमविक्रमम् । तथाहं नावमन्तव्यः सजातीयोऽस्मि बान्धवः ॥ ११ ॥
'आप सब लोग मुझे जैसा भयानक पराक्रमी समझ रहे हैं, वैसा मानकर मेरा अनादर न करें। मैं तो आपलोगोंका सजातीय भाई-बन्धु ही हूँ ॥ ११ ॥
यदि त्ववश्यं श्रोतव्यं कालः सम्प्रतिपाल्यताम् । ततो भवन्तः श्रोष्यन्ति मां च द्रक्ष्यन्ति तत्त्वतः ॥ १२ ॥
'यदि मेरे विषयमें आपलोगोंको यथार्थ बात अवश्य ही सुननी है तो इसके लिये उपयुक्त समयकी प्रतीक्षा करें, फिर आप मेरे विषयमें सुनेंगे और मैं वास्तवमें कैसा हूँ, यह देख और समझ सकेंगे ॥ १२ ॥
यद्ययं भवतां श्लाघ्यो बान्धवो देवसप्रभः । परिज्ञानेन किं कार्यं यद्येषोऽनुग्रहो मम ॥ १३ ॥
'यदि देवोपम कान्तिसे युक्त यह बालक आपलोगोंका स्पृहणीय भाई-बन्धु है तो इसके विषयमें विशेष छानबीन करनेकी क्या आवश्यकता है। यदि आप मौन ही रहें तो यह मेरे ऊपर आपका महान् अनुग्रह होगा' ॥ १३ ॥
एवमुक्तास्तु ते गोपा वसुदेवसुतेन वै। बद्धमौना दिशः सर्वे भेजिरे पिहिताननाः ॥ १४ ॥
वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर उन गोपोंने अपना मुँह बंद कर लिया और मौन होकर वे सब-के-सब विभिन्न दिशाओंमें चले गये ॥ १४ ॥
कृष्णस्तु यौवनं दृष्ट्वा निशि चन्द्रमसो वनम् । शारदीं च निशां रम्यां मनश्चक्रे रतिं प्रति ॥ १५॥
इधर श्रीकृष्णने पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमाका यौवन (अधिक कान्तिमान् रूप), रमणीय वन तथा शरत्-कालकी सुरम्य रजनीको देखकर मनमें रमण करनेकी इच्छा की ॥१५॥
स करीषाङ्गरागासु व्रजरथ्यासु वीर्यवान् । वृषाणां जातदर्पाणां युद्धानि समयोजयत् ॥ १६ ॥
पराक्रमी श्रीकृष्णने सूखे गोबरके चूर्णका अङ्गराग-सा धारण करनेवाली व्रजकी गलियोंमें बलोन्मत्त साँड़ोंके युद्धका आयोजन किया ॥ १६ ॥
गोपालांश्च बलोदग्रान् योधयामास वीर्यवान् । वने स वीरो गाश्चैव जग्राह ग्राहवद् विभुः ॥ १७ ॥
उन बलशाली वीर भगवान् गोविन्दने बलमें बढ़े-चढ़े गोपोंमें परस्पर मल्लयुद्ध भी करवाया और वनमें घूमती हुई गौओंको ग्राहकी भाँति पकड़नेकी भी लीला की ॥ १७ ॥
युवतीर्गोपकन्याश्च रात्रौ संकालय कालवित् । कैशोरकं मानयन् वै सह ताभिर्मुमोद ह ॥ १८ ॥
समयको पहचाननेवाले वे श्रीहरि अपनी किशोरावस्थाका आदर करते हुए युवती गोपकन्याओंको रातके समय वनमें ले गये और उन सबके साथ आमोद-प्रमोद करने लगे ॥ १८॥
तास्तस्य वदनं कान्तं कान्ता गोपस्त्रियो निशि । पिबन्ति नयनाक्षेपैर्गो गतं शशिनं यथा ॥ १९ ॥
निशाकालमें वे कान्तिमती गोपाङ्गनाएँ प्रियतम श्रीकृष्णके कमनीय मुखका, जो भूतलपर उतरे हुए द्वितीय चन्द्रमाके समान प्रतीत होता था, अपने नेत्रोंद्वारा कटाक्षपातपूर्वक पान करने लगीं ॥ १९ ॥
हरितालार्द्रपीतेन स कौशेयेन वाससा । वसानो भद्रवसनं कृष्णः कान्ततरोऽभवत् ॥ २० ॥
उस समय हरितालके पङ्ककी भाँति पीले रेशमी पीताम्बरसे अपने अङ्गोंको आच्छादित करनेवाले माङ्गल्य वस्त्रधारी श्रीकृष्ण और भी अधिक मनोहर प्रतीत हो रहे थे। २०
स बद्धाङ्गदनिव्यूहश्चित्रया वनमालया । शोभमानो हि गोविन्दः शोभयामास तद् व्रजम् ॥२१॥
बाहोंमें भुजबंद बाँधे और मस्तकपर मुकुट धारण किये विचित्र वनमालासे सुशोभित गोविन्द उस व्रजकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २१ ॥
नाम दामोदरेत्येवं गोपकन्यास्तदाब्रुवन् । विचित्रं चरितं घोषे दृष्ट्वा तत् तस्य भास्वतः ॥ २२ ॥
गोष्ठमें उन तेजस्वी श्रीकृष्णके विचित्र चरित्रोंको देखकर गोपकिशोरीयाँ उस समय उन्हें 'दामोदर' कहकर पुकारती थीं ॥ २२ ॥
तास्तं पयोधरोत्तुङ्गैरुरोभिः समपीडयन् । भ्रामिताक्षैश्च वदनैर्निरीक्षन्ते वराङ्गनाः ॥ २३ ॥
विष्णुपर्व ] एकविंशोऽध्यायः [ २७७
वे सुन्दरी गोपियाँ उन्हें पीन पयोधरोंसे युक्त ऊँचे वक्षःस्थलसे लगाकर गाढ़ आलिङ्गन करतीं और बारंबार आँखें घुमाकर उन्हींकी ओर मुँह करके उनका रूप निहारती रहती थीं ॥ २३ ॥
ता वार्यमाणाः पतिभिर्मातृभिर्भ्रातृभिस्तथा ।
कृष्णं गोपाङ्गना रात्रौ मृगयन्ते रतिप्रियाः ॥ २४ ॥
पति, पिता-माता तथा भाइयोंके मना करनेपर भी वे गोपाङ्गनाएँ रात्रिके समय श्रीकृष्णको ढूँढ़ती फिरती थीं; क्योंकि श्रीकृष्णविषयक रति उन्हें बहुत प्रिय थी ॥ २४ ॥
तास्तु पङ्क्तीकृताः सर्वा रमयन्ति मनोरमम् ।
गायन्त्यः कृष्णचरितं द्वन्द्वशो गोपकन्यकाः ॥ २५ ॥
वे सारी गोप-किशोरियाँ मण्डलाकार पंक्ति बनाकर खड़ी हो जातीं और उनमेंसे प्रत्येक गोपीके दोनों ओर श्रीकृष्ण विराजमान होते थे। इस प्रकार गोपी-कृष्णकी युगल-जोड़ी बनाकर वे सुन्दरियाँ श्रीकृष्णके चरित्रका गान करती हुई उन्हें आनन्द प्रदान करती थीं ॥ २५ ॥
कृष्णलीलानुकारिण्यः कृष्णप्रणिहितेक्षणाः ।
कृष्णस्य गतिगामिन्यस्तरुण्योऽस्ता वराङ्गनाः ॥ २६ ॥
उनकी आँखें श्रीकृष्णकी ओर ही लगी रहती थीं। वे तरुण-अवस्थावाली सुन्दरियाँ श्रीकृष्णकी लीलाका अनुकरण करतीं तथा उन्हींके समान चलती थीं ॥ २६ ॥
वनेषु तालहस्ताग्रैः कूजयन्त्यस्तथापराः ।
चेरुर्वै चरितं तस्य कृष्णस्य व्रजयोषितः ॥ २७ ॥
व्रजकी दूसरी गोपियाँ हाथोंके अग्रभागसे ताल दे-देकर श्रीकृष्णकी लीलाओंका गान करती हुई वनोंमें विचरती थीं। २७।
तास्तस्य नृत्यं गीतं च विलासस्मितवीक्षितम् ।
मुदिताश्चानुकुर्वन्त्यः क्रीडन्ति व्रजयोषितः ॥ २८ ॥
वे व्रजाङ्गनाएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीकृष्णके नृत्य, गीत, विलास, मुसकराहट तथा चञ्चल चितवनकी नकल करती हुई भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करती रहती थीं ॥ २८ ॥
भावनिस्पन्दमधुरं गायन्त्यस्ता वराङ्गनाः ।
व्रजं गताः सुखं चेरुर्दामोदरपरायणाः ॥ २९ ॥
वे गोपसुन्दरियाँ व्रजमण्डल (वन आदि) में जाकर ऐसे गीत गाती थीं, जिनसे उनका श्रीकृष्णविषयक प्रगाढ अनुराग स्पष्टतः प्रकट होने लगता था और इसीसे उन गीतोंका माधुर्य बढ़ जाता था। इस प्रकार दामोदरके ही चिन्तनमें तत्पर रहकर वे वहाँ सुखपूर्वक विचरती थीं ॥२९॥
करीषपांसुदिग्धाङ्गयस्ताः कृष्णमनुव्रविरे ।
रमयन्यो यथा नागं सम्प्रमत्तं करेणवः ॥ ३० ॥
उनके अङ्गोंमें अङ्गरागकी जगह गोबरके चूर्ण लगे होते थे। वे श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करती हुई उन्हें उसी तरह घेरे रहती थीं, जैसे हथिनियाँ मदमत्त गजराजको ॥ ३०॥
तमन्वया भावविकचैर्नेत्रैः प्रहसिताननाः ।
पिवन्त्यस्तृप्तवनिवाः कृष्णं कृष्णमृगेक्षणाः ॥ ३१ ॥
कृष्णसार मृगके सदृश नेत्रोंवाली कितनी ही अन्य गोपवनिताएँ अनुरागसे उत्फुल्ल नेत्रोंद्वारा प्यारे श्यामसुन्दरकी रूपसुधाका पान किया करती थीं, किंतु उससे तृप्त नहीं होती थीं। उनके मुखपर सदा ही हँसी खेलती रहती थी ॥ ३१॥
मुखमस्याब्जसंकाशं तृषिता गोपकन्यकाः ।
रत्यन्तरगता रात्रौ पिवन्ति रसलालसाः ॥ ३२ ॥
वे गोपकन्याएँ श्रीकृष्ण-रसके लिये प्यासी रहती थीं। उनके मनमें उस रसके आस्वादनके लिये निरन्तर लालसा बनी रहती थी; अतः वे रात्रिके समय रासलीलामें सम्मिलित हो उनके मुखारविन्दकी मकरन्द-सुधाका पान करती थीं ॥ ३२ ॥
हा हेति कुर्वतस्तस्य प्रहृष्टास्ता वराङ्गनाः ।
जगुर्हनिःसृतां वाणीं नाम्ना दामोदरेरिताम् ॥ ३३ ॥
जब वे 'हा राधे ! हा व्रजगोपियो !' इत्यादि कहकर उन्हें पुकारते, उस समय उनका आह्वान सुनकर वे गोप-सुन्दरियाँ हर्षसे खिल उठती थीं। दामोदरके मुखसे निकली हुई उस मधुर वाणीको वे सादर ग्रहण करती थीं ॥ ३३ ॥
तासां ग्रथितसीमन्ता रति नीत्वाऽऽकुलीकृताः ।
चारु विस्रंसिरे केशाः कुचाग्रे गोपयोषिताम् ॥ ३४ ॥
उनके गुँथे हुए सोमन्तवाले केश रासलीलामें पहुँचकर आकुलताकी अवस्था मे खुल जाते और गोपियोंके कुचाग्रभागपर बिखर जाते थे। उस समय भी वे मनोहर ही लगते थे ॥ ३४ ॥
एवं स कृष्णो गोपीनां चक्रवालैरलं कृतः ।
शारदीषु सचन्द्रासु निशासु मुमुदे सुखी ॥ ३५ ॥
इस प्रकार शरत्कालकी चाँदनी रातोंमें गोपीमण्डलसे अलंकृत हुए श्रीकृष्ण सुखपूर्वक रासक्रीडा करके आनन्द-मग्न हो जाते थे ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलेभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रासक्रीडायां विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रासक्रीडाविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
एकविंशोऽध्यायः
अरिष्टासुरका वध
वैशम्पायन उवाच
प्रदोषार्द्धे कदाचित् तु कृष्णे रतिपरायणे ।
त्रासयन् समदो गोष्ठमरिष्टः प्रत्यदृश्यत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! एक दिन
| २७८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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आधा प्रदोष (अर्थात् डेढ़ घंटा रात) बीतनेपर जब भगवान् श्रीकृष्ण रासक्रीडामें संलग्न थे, उसी समय सारे व्रजको त्रास देता हुआ मतवाला अरिष्टासुर वहाँ दिखायी दिया ॥ १॥
निर्वाणाङ्गारमेघाभास्तीक्ष्णशृङ्गोऽर्कलोचनः ।
खुरतीक्ष्णाग्रचरणः कालः काल इवापरः ॥ २ ॥
वह बुझे हुए अङ्गार (कोयले) तथा मेघोंके समान काला था, उसके सींग तीखे थे और आँखें सूर्यके समान तेजस्विनी दिखायी देती थीं। उसके चरणोंके अग्रभाग अथवा खुर छुरेके समान तेज थे। वह काला दैत्य दूसरे कालके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥
लेलिहानः सनिष्वेषं जिह्वयोष्ठौ पुनः पुनः ।
गर्विताविद्धलाङ्गूलः कठिनस्कन्धबन्धनः ॥ ३ ॥
वह दाँतसे ओठोंको चबाता और जिह्वासे उन्हें बारंबार चाटता था। उसने बलके घमंडमें आकर पूँछ उठा रखी थी तथा उसके कंधेका कुब्बड़ बहुत ही कठोर था ॥ ३ ॥
ककुदोद्ग्रनिर्माणः प्रमाणाद् दुरतिक्रमः ।
शकृन्मूत्रोपलिप्ताङ्गो गवामुद्वेजनो भृशम् ॥ ४ ॥
वह अपने कंधेके कुब्बड़से चोट करके बने-बनाये महल आदिको धराशायी कर देता था। उसकी ऊँचाई इतनी थी कि उसे लाँघकर जाना किसीके लिये भी बहुत कठिन था। उसके पिछले अङ्ग गोबर और मूतसे लिप्त हो रहे थे तथा वह गौओंको अत्यन्त उद्वेगमें डाल देता था ॥ ४ ॥
महाकटिः स्थूलमुखो दृढजानुर्महोदरः ।
विषाणावलिगतगतिर्लम्बता कण्ठचर्मणा ॥ ५ ॥
उसका कटिभाग विशाल था और मुख स्थूल था, दोनों घुटने सुदृढ़ थे और पेट बहुत बड़ा था। उसके गलेका कंबल लटक रहा था और वह सींग नीचे किये उछलता-कूदता आगे बढ़ रहा था ॥ ५ ॥
गवारोहेषु चपलस्तरुघाताङ्किताननः ।
युद्धसज्जविषाणाग्रो द्विपद्वृषभसूदनः ॥ ६ ॥
वह गौओंके पिछले भागपर चढ़नेके लिये चञ्चल हो रहा था। वृक्षोंसे टक्कर लेनेके कारण उसके मस्तकमें कई जगह गड्ढे पड़ गये थे। वह अपने सींगोंके अग्रभागको सदा जूझनेके लिये उद्यत रखता था तथा विपक्षी बैलोंको मार डालता था ॥ ६ ॥
अरिष्टो नाम हि गवामरिष्टो दारुणाकृतिः ।
दैत्यो वृषभरूपेण गोष्ठान् विपरिधावति ॥ ७ ॥
भयानक आकारवाला वह अरिष्टासुर गौओंके लिये अरिष्ट-कारक ग्रह बन गया था। वह दैत्य बैलके रूपमें आकर सभी गोठोंमें दौड़ लगाया करता था ॥ ७ ॥
पातयानो गवां गर्भान् दृप्तो गच्छत्यनार्तवम् ।
भजमानश्च चपलो गृष्टीः सम्प्रचचार ह ॥ ८ ॥
वह गौओंके गर्भ गिरा देता था। मदमत्त होकर बिना ऋतुके ही उनसे समागम करता तथा वह चञ्चल दैत्य तुरंत-की ब्यायी हुई गौओंका भी उपभोग करनेके लिये उनके पीछे पड़ा रहता था ॥ ८ ॥
शृङ्गप्रहरणो रौद्रः प्रहरन् गोषु दुर्मदः ।
गोष्ठेषु न रतिं लेभे विना युद्धेन गोवृषः ॥ ९ ॥
सींग ही उसके आयुध थे। वह बड़ा भयंकर एवं दुर्मद प्रतीत होता था। गौओंपर प्रहार करना उसका नित्यका काम था। वह वृषभरूपधारी दैत्य गोठोंमें पहुँचकर युद्ध किये बिना संतुष्ट नहीं होता था ॥ ९ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य स वृषः केशवायतः ।
आजगाम बलोदग्रो वैवस्वतवशे स्थितः ॥ १० ॥
किसी समय यमराजके वशमें पड़ा हुआ वह उत्कट बलशाली वृषभरूपधारी असुर भगवान् श्रीकृष्णके सामने आया ॥ १० ॥
स तत्र गास्तु प्रसभं बाधमानो मदोत्कटः ।
चकार निर्वृषं गोष्ठं निर्वत्सशिशुपुङ्गवम् ॥ ११ ॥
मदमत्त अरिष्टासुर वहाँ आते ही बलपूर्वक गौओंको सताने लगा। उसने उस गोष्ठको बैल, बछड़ों तथा बालकोंसे सूना कर दिया ॥ ११ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु गावः कृष्णसमीपगाः ।
त्रासयामास दुष्टात्मा वैवस्वतवशे स्थितः ॥ १२ ॥
इसी समय कालके वशमें पड़ा हुआ वह दुष्टात्मा दैत्य श्रीकृष्णके पास खड़ी हुई गौओंको त्रास देने लगा ॥ १२ ॥
सेन्द्राशनिरिवाम्भोदो नर्दमानो महासुरः ।
तालशब्देन तं कृष्णः सिंहनादैश्च मोहयन् ॥ १३ ॥
उस समय गर्जना करता हुआ वह महान् असुर इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ आकाशमें छाये हुए मेघके समान जान पड़ता था। उसे मोहमें डालनेके लिये श्रीकृष्णने ताल ठोंका और सिंहनाद किया ॥ १३ ॥
अभ्यधावत गोविन्दो दैत्यं वृषभरूपिणम् ।
स कृष्णं गोवृषो दृष्ट्वा हृष्टलाङ्गूललोचनः ॥ १४ ॥
फिर वे भगवान् गोविन्द उस वृषभरूपधारी दैत्यकी ओर दौड़े । श्रीकृष्णको देखते ही उस बैलने हर्षमें भरकर अपनी पूँछ उठायी और उसके नेत्र भी खिल उठे ॥ १४ ॥
रोषितस्तालशब्देन युद्धाकाङ्क्षी ननर्द ह ।
तमापतन्तं दुर्वृत्तं दृष्ट्वा वृषभरूपिणम् ।
तस्मात् स्थानान्न व्यचलत् कृष्णो गिरिरिवाचलः ॥ १५ ॥
उनके ताल ठोंकनेके शब्दसे वह रोषमें भरा हुआ था, अतः युद्धकी इच्छासे गर्जना करने लगा। बैलका रूप धारण करके अपनी ओर आते हुए उस दुराचारी दैत्यको देखकर भी श्रीकृष्ण उस स्थानसे तनिक भी इधर-उधर नहीं हुए, पर्वतके समान अविचल-भावसे खड़े रह गये ॥ १५ ॥
विष्णुपर्व ] द्वाविंशोऽध्यायः [ २७९
स कुक्षौ वृषभो दृष्टिं प्रणिधाय धृताननः।
कृष्णस्य निधनाकाङ्क्षी तूर्णमभ्युत्पपात ह ॥ १६॥
उस वृषभने श्रीकृष्णके पेटमें दृष्टि जमाकर उधर ही मस्तक भिड़ाया और उनके वधकी इच्छा रखकर तुरंत ही उछला ॥ १६॥
तमापतन्तं वेगेन प्रतिजग्राह दुर्द्धरम्।
कृष्णः कृष्णाञ्जननिभो वृषं प्रति वृषोपमः ॥ १७॥
काले अञ्जनके समान श्याम-शरीरवाले श्रीकृष्ण उस बैलका सामना करनेके लिये विपक्षी साँड़के समान प्रतीत होते थे। उन्होंने वेगसे अपनी ओर आते हुए उस दुर्धर दैत्यको पकड़ लिया ॥ १७ ॥
स संसक्तस्तु कृष्णे वै वृषेणेव महावृषः।
सुमोच वक्त्रजं फेनं नस्तश्चाथ सशश्वद्वत् ॥ १८॥
फिर तो श्रीकृष्ण उसके साथ इस तरह उलझ गये, जैसे एक साँड़के साथ दूसरा महासाँड़ भिड़ गया हो। अरिष्टासुर हाँफता हुआ अपनी नाक और मुखसे फेन छोड़ने लगा ॥ १८ ॥
तावन्योन्यावरुद्धाङ्गौ युद्धे कृष्णवृषासुरौ।
रेजतुर्मेघसमये संसक्ताविव तोयदौ ॥ १९॥
श्रीकृष्ण और अरिष्टासुर दोनोंने उस युद्धमें एक दूसरेके शरीरको अवरुद्ध कर लिया था। उस समय वे दोनों वर्षा-कालमें परस्पर सटे हुए दो मेघोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ १९ ॥
तस्य दर्पबलं हत्वा कृत्वा शृङ्गान्तरे पदम्।
आपीडयदरिष्टस्य कण्ठं क्लिन्नमिवाम्बरम् ॥ २०॥
इस प्रकार उसके बलको क्षीण करके घमंड चूर कर देनेके बाद श्रीकृष्णने उसके दोनों सींगोंके बीचमें एक पैर रखा और जैसे भीगे हुए कपड़ेको निचोड़ा जाता है, उसी प्रकार अरिष्टासुरके गलेको दबाकर मरोड़ दिया ॥ २०॥
शृङ्गं चास्य पुनः सव्यमुत्पाट्य यमदण्डवत्।
तेनैव प्राहरद् चक्रे स ममार भृशं हतः ॥ २१॥
तत्पश्चात् उसके बायें सींगको जो यमदण्डके समान जान पड़ता था, उखाड़ लिया और उसीके द्वारा उसके मुखपर प्रहार किया। उसकी गहरी चोट खाकर अरिष्टासुर मर गया ॥ २१ ॥
स भिन्नशृङ्गो भग्नास्यो भग्नस्कन्धश्च दानवः।
पपात रुधिरोद्गारी साम्बुधार इवाम्बुदः ॥ २२॥
उसका सींग उखड़ गया, मुख कुचल दिया गया और गर्दन टूट गयी, उस दशामें वह दानव जलकी धारा बरसाने-वाले मेघके समान अपने मुखसे रक्तवमन करता हुआ गिर पड़ा ॥ २२ ॥
गोविन्देन हतं दृष्ट्वा दृप्तं वृषभदानवम्।
साधु साध्विति भूतानि तत्कर्त्तारमभितुष्टुवुः ॥ २३ ॥
मदसे उन्मत्त रहनेवाले उस वृषभरूपी दानवको भगवान् गोविन्दके हाथसे मारा गया देख सब प्राणी साधु-साधु कहकर उनके उस कर्मकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ २३ ॥
स चोपेन्द्रो वृषं हत्वा कान्तचन्द्रे निशामुखे।
अरविन्दामलनयनः पुनरेव ररास ह ॥ २४॥
उस प्रदोषकालमें जब कि चन्द्रमाकी कमनीय कान्ति बढ़ी हुई थी, कमलनयन भगवान् उपेन्द्र वृषभासुरको मार-कर पुनः रासक्रीड़ामे संलग्न हो गये ॥ २४ ॥
तेऽपि गोवृत्तयः सर्वे कृष्णं कमललोचनम्।
उपासांचक्रिरे हृष्टाः सर्वे शक्रमिवामराः ॥ २५॥
गौएँ ही जिनकी आजीविका हैं, वे समस्त गोप भी हर्षमें भरकर कमलनयन श्रीकृष्णकी उसी तरह उपासना करने लगे, जैसे सम्पूर्ण देवता इन्द्रकी आराधना करते हैं ॥ २५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वृषभासुरवधे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वृषभासुरका वधविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
द्वाविंशोऽध्यायः
कंसकी आशङ्का, उसका रात्रिके समय यदुवंशियोंको बुलाकर भरी सभामें श्रीकृष्ण और विष्णुके प्रभावको बताना, वसुदेवपर कठोर आक्षेप करना तथा अक्रूरको श्रीकृष्ण आदिको बुला लानेके लिये व्रजमें जानेकी आज्ञा देना
वैशम्पायन उवाच
कृष्णं व्रजगतं श्रुत्वा वर्धमानमिवानलम्।
उद्वेगमगमत् कंसः शङ्कमानस्ततो भयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्ण व्रजमें जाकर अग्निकी भाँति बढ़ते, उत्तरोत्तर प्रज्वलित होते जा रहे हैं, यह सुनकर कंसको बड़ा उद्वेग हुआ। उसके मनमें श्रीकृष्णसे भय प्राप्त होनेकी शङ्का दृढ़ होने लगी ॥ १ ॥
पूतनायां हतायां च कालिये च पराजिते।
धेनुके प्रलयं नीते प्रलम्बे च निपातिते ॥ २॥
धृते गोवर्धने शैले विफले शक्रशासने।
गोषु त्रातासु च तथा स्पृहणीयेन कर्मणा ॥ ३ ॥
ककुद्मिनि हतेऽरिष्टे गोषेषु मुदितेषु च।
दृश्यमाने विनाशे च संनिकृष्टे महाभये ॥ ४ ॥
कर्षणे वृक्षयोश्चैव शकटस्य तथैव च।
अचिन्त्यं कर्म तच्छ्रुत्वा वर्धमानेषु शत्रुपु ॥ ५ ॥
| २८० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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प्राप्तारिष्टमिवात्मानं मेने स मथुरेश्वरः।
विसंज्ञेन्द्रियभूतात्मा गतासुप्रतिमो बभौ ॥ ६ ॥
पूत्ना मारी गयी, कालिय नाग परास्त हुआ, धेनुकासुर कालके गालमें भेज दिया गया, प्रलम्बासुरको मार गिराया गया, गोवर्धन पहाड़को श्रीकृष्णने हाथपर उठा लिया, इन्द्रका शासन निष्फल हो गया, वैसे स्पृहणीय कर्मके द्वारा सम्पूर्ण गाँवोंकी रक्षा कर ली गयी, ऊँचे ककुदवाले अरिष्टासुरको मार डाला गया, गोपगण आनन्दमें मग्न रहते हैं और अपना (कंसका) महाभयंकर विनाशकाल संनिकट दिखायी देने लगा है, यमलार्जुन वृक्षोंका ओखली खींचते समय टूट जाना, शकटका भङ्ग हो जाना आदि असम्भव कार्य सम्भव हो गये, शत्रु निरन्तर बढ़ रहे हैं और उनके द्वारा अचिन्त्य कर्म सम्पादित होने लगा है, यह सब सुनकर मथुरापति कंसने यह मान लिया कि अब मेरे ऊपर अरिष्ट आया ही चाहता है। इससे उसकी इन्द्रियाँ, शरीर और मन-बुद्धि सब-के-सब अचेत हो गये तथा वह प्राणहीन-सा प्रतीत होने लगा ॥
ततो ज्ञातीन् समानाय्य पितरं चोग्रशासनः।
निशि स्तिमितमूकायां मथुरायां जनाधिपः ॥ ७ ॥
तदनन्तर भयंकर शासनवाले राजा कंसने रात्रिके नीरव एवं निस्तब्ध-कालमें मथुरापुरीके भीतर रहनेवाले समस्त बन्धु-बान्धवों तथा अपने पिता उग्रसेनको भी बुलाया ॥ ७ ॥
वसुदेवं च देवाभं कङ्कं चाहूय यादवम्।
सत्यकं दारुकं चैव कङ्कावरजमेव च ॥ ८ ॥
भोजं वैतरणं चैव विकुद्रं च महाबलम्।
भयशङ्खं च धर्मज्ञं विपृथुं च पृथुश्रियम् ॥ ९ ॥
बभ्रुं दानपतिं चैव कृतवर्माणमेव च।
भूरितेजसमक्षोभ्यं भूरिश्रवसमेव च ॥ १० ॥
एतान् स यादवान् सर्वानभाष्य शृणुतेति च।
उग्रसेनसुतो राजा प्रोवाच मथुरेश्वरः ॥ ११ ॥
देवताके समान तेजस्वी वसुदेव, यदुकुलनन्दन कङ्क, सत्यक, दारुक, कङ्कके छोटे भाई, भोज, वैतरण, महाबली विकुद्र, धर्मज्ञ भयशङ्ख, पृथुल राजलक्ष्मीसे सम्पन्न विपृथु, दानपति बभ्रु (अक्रूर), कृतवर्मा, अक्षोभ्य भूरितेजा और भूरिश्रवा—इन सब यादवोंको बुलाकर सबको सम्बोधित करके मथुराके स्वामी उग्रसेनकुमार राजा कंसने कहा—'बन्धुओ ! आपलोग सुनें ॥ ८–११ ॥
भवन्तः सर्वकार्यज्ञा वेदेषु परिनिष्ठिताः।
न्यायवृत्तान्तकुशलास्त्रिवर्गस्य प्रवर्त्तकाः ॥ १२ ॥
कर्तव्यानां च कर्तारो लोकस्य विबुधोपमाः।
तस्थिवांसो महावृत्ते निष्कम्पा इव पर्वताः ॥ १३ ॥
'आप समस्त कर्तव्य-कर्मोंके ज्ञाता, वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान्, न्यायोचित बर्तावमें कुशल, धर्म, अर्थ और कामके प्रवर्त्तक, कर्तव्य-पालक, जगत्के लिये देवताओंके समान माननीय, महान् आचार-विचारमें दृढ़तापूर्वक स्थिर रहनेवाले और पर्वतके समान अविचल हैं ॥ १२-१३ ॥
अदम्भवृत्तयः सर्वे सर्वे गुरुकुलोषिताः।
राजमन्त्रधराः सर्वे सर्वे धनुषि पारगाः ॥ १४ ॥
'आप सब लोग पाखण्डपूर्ण वृत्तिसे दूर रहते हैं। सबने गुरुकुलमें रहकर शिक्षा पायी है। आप सब लोग राजाकी गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित रखनेवाले तथा धनुर्वेदमें पारङ्गत हैं ॥
यशःप्रदीपा लोकानां वेदार्थानां विवक्षवः।
आश्रमाणां निसर्गज्ञा वर्णानां क्रमपारगाः ॥ १५ ॥
'आपके यशरूपी प्रदीप सम्पूर्ण जगत्में अपना प्रकाश फैला रहे हैं। आपलोग वेदोंके तात्पर्यका प्रतिपादन करनेमें समर्थ हैं। आश्रमोंके जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णोंके जो क्रमिक धर्म हैं, उनके आपलोग पारङ्गत विद्वान् हैं ॥ १५ ॥
प्रवक्तारः सुनियतां नेतारो नयदर्शिनाम्।
भेत्तारः परराष्ट्राणां त्रातारः शरणार्थिनाम् ॥ १६ ॥
'आपलोग उत्तम विधियोंके वक्ता, नीतिदर्शी पुरुषोंके भी नेता, शत्रुराष्ट्रोंके गुप्त रहस्योंका भेदन करनेवाले तथा शरणार्थियोंके संरक्षक हैं ॥ १६ ॥
एवमक्षतचारित्रैः श्रीमद्भिरुदितोदितैः।
द्यौरप्यनुगृहीता स्याद् भवद्भिः किं पुनर्मही ॥ १७ ॥
'आपके सदाचारमे कभी आँच नहीं आने पायी है ! आपलोग श्रीसम्पन्न हैं तथा श्रेष्ठ पुरुषोंकी चर्चा होते समय आपलोगोंके नाम बारंबार लिये जाते हैं। आपलोग चाहें तो स्वर्गलोकपर भी अनुग्रह कर सकते हैं, फिर इस भूतलकी तो बात ही क्या है ? ॥ १७ ॥
ऋषीणामिव वो वृत्तं प्रभावो मरुतामिव।
रुद्राणामिव वः क्रोधो दीप्तिरङ्गिरसामिव ॥ १८ ॥
'आपका आचार ऋषियोंके, प्रभाव मरुद्गणोंके, क्रोध रुद्रोंके और तेज या दीप्ति अग्नियोंके समान है ॥ १८ ॥
व्यावर्त्तमानं सुमहद् भवद्भिः ख्यातकीर्तिभिः।
धृतं यदुकुलं वीरैर्भूतलं पर्वतैरिव ॥ १९ ॥
'यह महान् यदुकुल जब अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो रहा था, उस समय विख्यात कीर्तिवाले आप-जैसे वीरोंने ही इसे मर्यादामें स्थापित किया, ठीक उसी तरह जैसे पर्वतोंने इस भूतलको दृढ़तापूर्वक धारण कर रखा है ॥ १९ ॥
एवं भवत्सु युक्तेषु मम चित्तानुवर्तिषु।
वर्धमानो ममानर्थो भवद्भिः किमुपेक्षितः ॥ २० ॥
'आपलोग ऐसे सुयोग्य हैं और सदा मेरे अनुकूल चलते हैं, परंतु इस समय आपलोगोंके होते हुए भी मेरे अनर्थ (संकट) की वृद्धि हो रही है, पता नहीं आपने उसकी उपेक्षा कैसे कर दी है ॥ २० ॥
एष कृष्ण इति ख्यातो नन्दगोपसुतो व्रजे।
वर्धमान इवाम्भोधिर्मूलं नः परिकृन्तति ॥ २१ ॥
विष्णुपर्व ] द्वाविंशोऽध्यायः २८१
'ब्रजमें कृष्ण नामसे विख्यात जो यह नन्द गोपका बेटा है, वह (मर्यादाको लाँघकर) बढ़नेवाले समुद्रकी भाँति बढ़कर हमारी जड़ काट रहा है ॥ २१ ॥
अनमात्यस्य शून्यस्य चारान्धस्य ममैव तु ।
कारणान्नन्दगोपस्य स सुतो गोपितो गृहे ॥ २२ ॥
'मेरे पास कोई सुयोग्य मन्त्री नहीं है, मैं हृदय एवं विचारसे शून्य हूँ तथा गुप्तचररूपी नेत्रसे हीन होनेके कारण अंधा हो गया हूँ। मेरे इसी दोषके कारण नन्द-गोपका वह पुत्र अपने घरमें सुरक्षित रह सका है ॥ २२ ॥
उपेक्षित इव व्याधिः पूर्यमाण इवाम्बुदः ।
नदन्मेघ इवोष्णान्ते स दुरात्मा विवर्धते ॥ २३ ॥
'वह दुरात्मा उपेक्षित रोग तथा वर्षा ऋतुमें निरन्तर जलसे भरनेवाले गरजते हुए मेघकी भाँति बढ़ता जा रहा है॥
तस्य नाहं गतिं जाने न योगं न पराक्रमम् ।
नन्दगोपस्य भवने जातस्याद्भुतकर्मणः ॥ २४ ॥
'नन्दके घरमें उत्पन्न हुए उस अद्भुतकर्मा बालकका आश्रय क्या है? यह मैं नहीं जानता। उसे वशमें करनेका उपाय क्या है, इसका भी मुझे पता नहीं तथा उसमें कितना पराक्रम है, यह भी अच्छी तरह ज्ञात नहीं हो सका ॥ २४ ॥
किं तद्भूतं समुद्भूतं देवापत्यं न विद्महे ।
अतिदेवैर्मानुष्यैः कर्मभिः सोऽनुमीयते ॥ २५ ॥
'पता नहीं कौन-सा भूत उसके रूपमें उत्पन्न हुआ है। वह किसी देवताकी संतान है, यह बात भी मेरी समझमें नहीं आती। उसके जो कर्म हैं, वे देवताओं और मनुष्योंके लिये असाध्य हैं। उन कर्मोंसे ही यह अनुमान होता है कि वह देवताओंसे भी अधिक शक्तिशाली है ॥ २५ ॥
पूतना शकुनी बाल्ये शिशुनेोत्तानशायिना ।
स्तनपानेप्सुना पीता प्राणैः सह दुरासदा ॥ २६ ॥
'पूतना नामवाली पक्षिणी एक दुर्जय राक्षसी थी। वह जब इसे बाल्यावस्थामे दूध पिलाने गयी, उस समय यह खाटपर उत्तान सोनेवाला शिशुमात्र था, परंतु उसका स्तन-पान करनेकी इच्छासे जब इसने मुँह लगाया, तब उसके प्राणोंके साथ यह उसे ही पी गया ॥ २६ ॥
यमुनाया ह्रदे नागः कालियो दमितस्तथा ।
रसातलचरो नीतः क्षणेनादर्शनं ह्रदात् ॥ २७ ॥
'यमुनाके कुण्डमें जो कालिय नाग रहता था, उसका भी इसने दमन कर दिया और क्षणभरमें उस कुण्डसे उसको अदृश्य करके रसातलचारी बना दिया ॥ २७ ॥
नन्दगोपसुतो योगं कृत्वा स पुनरुत्थितः ।
धेनुकस्तालशिखरात् पातितो जीवितं विना ॥ २८ ॥
'उस नागके हट जानेका उचित उपाय करके नन्द-गोप-का यह पुत्र पुनः जलसे बाहर निकल आया। धेनुकासुरको ताड़के शिखरसे गिराकर प्राणशून्य कर दिया ॥ २८ ॥
प्रलम्बं यं मृधे देवा न शेकुरतिवर्तितुम् ।
बालेन मुष्टिनैकेन स हतः प्राकृतो यथा ॥ २९ ॥
'युद्धमें देवता भी जिस प्रलम्बासुरका सामना करने या उसे हरा देनेकी शक्ति नहीं रखते थे, उसे इस बालकने केवल एक मुक्केसे मारकर साधारण मनुष्यकी भाँति कालके गालमें भेज दिया ॥ २९ ॥
वासवस्योत्सवं भङ्क्त्वा वर्षं वासवरोपजम् ।
निर्जित्य गोगृहार्थाय धृतो गोवर्धनो गिरिः ॥ ३० ॥
'इन्द्रके उत्सवको भङ्ग करके उनके रोषसे होनेवाली वर्षापर भी काबू पा लिया और गौओंके लिये सुरक्षित घर प्रस्तुत करनेके लिये गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया ॥
हतस्त्वरिष्टो बलवान् निःशृङ्गश्च कृतो व्रजे ।
अबालो बाल्यमास्थाय रमते शिशुलीलया ॥ ३१ ॥
'व्रजमें बलवान् अरिष्टासुरको मार डाला और उसका सींग उखाड़ लिया। यह वास्तवमें बालक नहीं है, केवल बाल्यावस्थाका आश्रय लेकर बालकों-जैसा खेल कर रहा है ॥ ३१ ॥
प्रबन्धः कर्मणामेवं तस्य गोव्रजवासिनः ।
संनिकृष्टं भयं चैव केशिनो मम च ध्रुवम् ॥ ३२ ॥
'गौओंके व्रजमें निवास करनेवाले इस बालकके कर्मोंकी जो इस प्रकार परम्परा चल रही है, उसे देखते हुए मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मुझपर और केशीपर भी निश्चय ही भय आनेवाला है और वह भय दूर नहीं अत्यन्त निकट है ॥ ३२ ॥
भूतपूर्वश्च मे मृत्युः सततं पूर्वदैहिकः ।
युद्धकाङ्क्षी च स यथा तिष्ठतीह ममाग्रतः ॥ ३३ ॥
'पूर्वजन्ममें इस शरीरके लिये जो भूतपूर्व मृत्यु था, वही इस समय भी युद्धकी अभिलाषा रखकर सदा मेरे सामने खड़ा रहता है ॥ ३३ ॥
क्व च गोपत्वमशुभं मानुष्यं मृत्युदुर्बलम् ।
क्व च देवप्रभावेन क्रीडितव्यं व्रजे मम ॥ ३४ ॥
'कहाँ तो अशुभ गोपत्व और मौतकी दुर्बलता धारण करनेवाला मानव-शरीर तथा कहाँ उसका मेरे व्रजमें रहकर देवतुल्य प्रभावसे अद्भुत क्रीडा करना ॥ ३४ ॥
अहो नीचेन वपुषाच्छादयित्वाऽऽत्मनो वपुः ।
कोऽप्येष रमते देवः श्मशानस्थ इवानलः ॥ ३५ ॥
'अहो ! कितने आश्चर्यकी बात है कि यह कोई देवता अपने स्वरूपको नीच गोपवेशमें छिपाकर श्मशानमें स्थित हुई अग्निके समान यहाँ रम रहा है ॥ ३५ ॥
श्रूयते हि पुरा विष्णुः सुराणां कारणान्तरे ।
वामनेन तु रूपेण जहार पृथिवीमिमाम् ॥ ३६ ॥
'सुना जाता है कि पूर्वकालमें विष्णुने देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये वामनरूप धारण करके राजा बलिके हाथसे इस पृथ्वीको छीन लिया था ॥ ३६ ॥
| २८२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे |
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कृत्वा केसरिणो रूपं विष्णुना प्रभविष्णुना ।
हतो हिरण्यकशिपुर्दानवानां पितामहः ॥ ३७ ॥
'उन्हीं प्रभावशाली विष्णुने सिंहका-सा रूप बनाकर दानवोंके पितामह हिरण्यकशिपुका वध कर डाला था ॥ ३७ ॥
अचिन्त्यरूपमास्थाय श्वेतशैलस्य मूर्धनि ।
भवेन च्याविता दैत्याः पुरा तत्त्रिपुरं गता ॥ ३८ ॥
'इसी तरह पूर्वकालमें रुद्र (रूपधारी विष्णु) ने अचिन्त्य रूपका आश्रय लेकर श्वेताचलके शिखरपर स्थित हो त्रिपुरका नाश करके दैत्योंको वहाँसे नीचे गिरा दिया था ॥ ३८ ॥
चालितो गुरुपुत्रेण भार्गवोऽङ्गिरसेन वै।
प्रविश्य दार्दुरीं मायामनावृष्टिं चकार ह ॥ ३९ ॥
'बृहस्पतिके पुत्र कचने दार्दुरी मायामें प्रविष्ट होकर शुक्राचार्यको अपनी प्रतिज्ञासे विचलित कर दिया था। उन्होंने ही दैत्योंके जगत्में 'अनावृष्टि' उत्पन्न कर दी थी। (जिससे दैत्योंकी बड़ी भारी हानि हुई*। ये कच भी विष्णुकी ही विभूति थे) ॥ ३९ ॥
अनन्तः शाश्वतो देवः सहस्रशिरसोऽव्ययः ।
वाराहं रूपमास्थाय प्रोज्जहाराणर्वान्महीम् ॥ ४० ॥
'वे विष्णु अनन्त, सनातन देव, सहस्रों मस्तकोंसे विभूषित और अविनाशी हैं। उन्होंने वाराहरूप धारण करके समुद्रसे इस पृथ्वीका उद्धार किया ॥ ४० ॥
अमृते निर्मिते पूर्वं विष्णुः स्त्रीरूपमास्थितः ।
सुराणामसुराणां च युद्धं चक्रे सुदारुणम् ॥ ४१ ॥
'पूर्वकालमें जब अमृत प्रकट हुआ था, तब विष्णुने ही मोहिनी स्त्रीका रूप धारण करके देवताओं और असुरोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध करवाया था ॥ ४१ ॥
अमृतार्थे पुरा चापि देवदैत्यसमागमे ।
दधार मन्दरं विष्णूरूपार इति श्रुतिः ॥ ४२ ॥
'अमृत निकालनेके लिये सम्मिलितरूपसे प्रयत्न करनेके उद्देश्यसे जब देवता और दैत्य परस्पर मिले थे, उस समय श्रीविष्णुने ही कच्छपरूप धारण करके समुद्रके भीतर मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया था—ऐसा सुना जाता है ॥ ४२ ॥
वपुर्वामनमास्थाय नन्दनीयं पुरा बलेः ।
त्रिभिः क्रमैस्तु त्रैलोक्याज्जहार त्रिदिवालयम् ॥ ४३ ॥
'उन्होंने ही पहले अभिनन्दनीय वामनरूप धारण करके तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नापकर बलिके हाथसे स्वर्गलोकका राज्य ले लिया था ॥ ४३ ॥
चतुर्धा तेजसो भागं कृत्वा दाशरथे गृहे ।
स एव रामसंज्ञो वै रावणं व्यनशत् तदा ॥ ४४ ॥
'वे ही राजा दशरथके घरमे अपने तेजको चार भागोंमे विभक्त करके अवतीर्ण हुए और 'राम' नामसे प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने उस समय रावणका वध किया था ॥ ४४ ॥
एवमेष निकृत्या वै तत्तद्रूपमुपागतः ।
साधयत्यात्मनः कार्यं सुराणामर्थसिद्धये ॥ ४५ ॥
'इस प्रकार ये विष्णु छलसे भिन्न-भिन्न रूप धारण करके देवताओंका मनोरथ सिद्ध करनेके लिये अपना काम बना लेते हैं ॥ ४५ ॥
तदेष नूनं विष्णुर्वा शक्रो वा मरुतां पतिः ।
मत्साधनेच्छया प्राप्तो नारदो मां यदुक्तवान् ॥ ४६ ॥
'अतः यह श्रीकृष्ण निश्चय ही विष्णु है अथवा देवराज इन्द्र । यह मेरा वध करनेकी इच्छासे ही व्रजभूमिमें आया है; जैसा कि देवर्षि नारदने मुझे बताया था ॥ ४६ ॥
अत्र मे शङ्कते बुद्धिर्र्वसुदेवं प्रति ध्रुवा ।
अस्य बुद्धिविशेषेण वयं कातरतां गताः ॥ ४७ ॥
'इस विषयमें मेरी बुद्धि निश्चय ही वसुदेवके प्रति संदेह करने लगी है। इस वसुदेवकी विशिष्ट बुद्धिसे हम अवश्य कातर हो उठे हैं ॥ ४७ ॥
अहं हि खट्वाङ्गवने नारदेन समागतः ।
द्वितीयं स हि मां विप्रः पुनरेवाब्रवीद् वचः ॥ ४८ ॥
'मैं खट्वाङ्गवनमें जब दूसरी बार नारदसे मिला था, तब उस ब्राह्मणने मुझसे पुनः इस प्रकार कहा—॥ ४८ ॥
यस्त्वया हि कृतो यत्नः कंस गर्भकृते महान् ।
वसुदेवेन ते रात्रौ तत्कर्म विफलीकृतम् ॥ ४९॥
'कंस ! तुमने जो देवकीका गर्भ नष्ट कर देनेके लिये महान् प्रयत्न आरम्भ किया था, तुम्हारे उस कर्मको रातके समय वसुदेवने निष्फल कर दिया ॥ ४९ ॥
दारिका या त्वया रात्रौ शिलायां कंस पातिता ।
तां यशोदासुतां विद्धि कृष्णं च वसुदेवजम् ॥ ५० ॥
'कंस ! तुमने रातके समय जिस कन्याको शिलापर दे मारा था, उसे यशोदाकी पुत्री समझो और वहाँ जो श्रीकृष्ण है, वही वसुदेव (तथा देवकी) का पुत्र है ॥ ५० ॥
रात्रौ व्यावर्तितोवैतौ गर्भो तव वधाय वै ।
वसुदेवेन संधाय मित्ररूपेण शत्रुना ॥ ५१ ॥
'तुम्हारे मित्र-रूपधारी शत्रु वसुदेवने रातके समय छलपूर्वक तुम्हारे वधके लिये इन दोनो बच्चोकी अदला बदली कर ली थी ॥ ५१ ॥
* जैसे मेंढक वारंवार मरकर उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार कच भी दैत्योंद्वारा वारंवार मारे जानेपर जीवित हुए। यही उनका दार्दुरी मायामें प्रवेश है। एक बार दानवोंने कचको मारकर युक्तिसे शुक्राचार्यके पेटमें पहुँचा दिया। उनकी जीवन-रक्षाके लिये विवश होकर शुक्राचार्यको 'संजीवनी विद्या किसीको भी नहीं सिखाऊँगा' अपनी यह प्रतिज्ञा छोड़नी पड़ी और उन्होंने कचको विद्या सिखा दी। उसके प्रभावसे कच गुरुजीका पेट फाड़कर निकल आये। फिर उन्होंने गुरुजीको भी जीवित कर दिया। दैत्योंने जो ब्रह्महत्या की, उसी पापसे उनके राज्यमें वर्षा बंद हो गयी।
विष्णुपर्व ] द्वाविंशोऽध्यायः [ २८३
सा तु कन्या यशोदाया विन्ध्ये पर्वतसत्तमे।
हत्वा शुम्भनिशुम्भौ द्वौ दानवौ नगचारिणौ ॥ ५२ ॥
'यशोदाकी वह कन्या पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यगिरिपर जाकर रहती है। वहाँ उस पर्वतपर विचरनेवाले जो शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव थे, उनका वध करके प्रतिष्ठित हुई है ॥ ५२ ॥
कृताभिषेका वरदा भूतसंघनिषेविता।
अर्च्यते दस्युभिर्घोरैर्महाबलिपशुप्रिया ॥ ५३ ॥
'प्राणियोंके समुदायद्वारा सेवित वह देवी उपासकोंको अभीष्ट वर देनेवाली है। उसे महती पूजन-सामग्री और वहाँ विचरनेवाले पशु प्रिय हैं। वहाँ भयानक दस्यु उस देवीका अभिषेक करके पूजन करते हैं ॥ ५३ ॥
सुरापिशितपूर्णाभ्यां कुम्भाभ्यामुपशोभिता।
मयूरपक्वदण्डैश्च बर्हभारैर्विभूषिता ॥ ५४ ॥
'वह मधु तथा फलके गूदेसे भरे हुए दो कलशोंसे सुशोभित होती है। मोरपंखके बने हुए विचित्र भुजदण्ड तथा मोरोंकी पाँखसे ही बनाये गये दूसरे-दूसरे आभूषण उस देवीके अलंकार हैं ॥ ५४ ॥
हृष्टकुक्कुटसंनादं वनं वायसनादितम्।
मृगसंघैश्च सम्पूर्णमविरुद्धैश्च पक्षिभिः ॥ ५५ ॥
सिंहव्याघ्रवराहाणां नादेन प्रतिनादितम्।
वृक्षगम्भीरनिविडं कान्तारैः सर्वतो वृतम् ॥ ५६ ॥
दिव्यभृङ्गारुचमरैरादर्शैरुपशोभितम् ।
देवतूर्यनिनादैश्च शतशः प्रतिनादितम् ॥ ५७ ॥
स्थानं तस्या नगे विन्ध्ये निर्मितं स्वेन तेजसा।
रिपूणां त्रासजननी नित्यं तत्र मनोरमे ॥ ५८ ॥
वसते परमप्रीता देवतैरपि पूजिता।
'उस विन्ध्यपर्वतपर उसके अपने ही तेजसे निर्मित हुआ स्थान एक सुन्दर वन है, जहाँ हर्षमें भरे हुए मुर्गोंका कलनाद सुनायी देता है। कौओंके काँव-काँवकी आवाज भी गूँजती रहती है। मृग आदि पशुओंके समुदाय भी वहाँ भरे रहते हैं तथा मनके अनुकूल पक्षियोंसे भी वह स्थान सुशोभित रहता है। वहाँ सिंहों, व्याघ्रों और वराहोंकी गर्जनाका गम्भीर शब्द प्रतिध्वनित होता रहता है। वृक्षोंके बाहुल्यसे वह गम्भीर एवं गहन प्रतीत होता है। सब ओरसे दुर्गम स्थानोंद्वारा वह घिरा हुआ है। दिव्य गडूआ, चवँर और दर्पण देवीके उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं। सैकड़ों देववाद्योंकी ध्वनियोंसे वह वन गूँजता रहता है। शत्रुओंको त्रास देनेवाली वह देवी सदा उसी मनोरम वनमें प्रसन्नतापूर्वक निवास करती है। वहाँ देवता भी उसकी पूजा करते हैं ॥ ५५—५८ १/२ ॥
यस्त्वयं नन्दगोपस्य कृष्ण इत्युच्यते सुतः ॥ ५९ ॥
अत्र मे नारदः प्राह सुमहत्कर्मकारणम्।
द्वितीयो वसुदेवाद् वै वासुदेवो भविष्यति ॥ ६० ॥
स हि ते सहजो मृत्युर्बान्धवश्च भविष्यति ।
'यह कृष्ण नामसे प्रसिद्ध जो नन्दगोपका पुत्र बताया जाता है, उसके विषयमें नारदजीने मुझसे कहा है कि 'व्रजमें जो पूतनावध आदि बड़े-बड़े कर्म हो रहे हैं, उनका प्रधान कारण वही है। वह वसुदेवसे उत्पन्न होनेवाला दूसरा पुत्र है, इसलिये वासुदेव नामसे विख्यात होगा। वह तुम्हारी सहज मृत्यु तथा बान्धव भी होगा ॥ ५९-६० १/२ ॥
स एव वासुदेवो वै वसुदेवसुतो बली।
बान्धवो धर्मतो मह्यं हृदयेनान्तको रिपुः ॥ ६१ ॥
'वसुदेवका वह बलवान् पुत्र वासुदेव ही धर्मतः मेरा बान्धव है; किंतु हृदयसे विनाशकारी शत्रु बना है ॥ ६१ ॥
यथा हि वायसो मूर्ध्नि पद्भ्यां यस्यावतिष्ठति ।
नेत्रे तुदति तस्यैव वक्रेणामिषगृद्धिनः ॥ ६२ ॥
वसुदेवस्तथैवायं सपुत्रज्ञातिबान्धवः ।
छिनत्ति मम मूलानि भुङ्क्ते च मम पार्श्वतः ॥ ६३ ॥
'जैसे कौवा जिसके सिरपर दोनों पंजे रखकर बैठता है, अपनी मांसलोलुप चोंचसे उसीके दोनों नेत्रोंपर प्रहार करता है; उसी प्रकार ये वसुदेव भी अपने पुत्र और भाई-बन्धुओंसहित मेरे ही पास खाते हैं और मेरी ही जड़ काटते हैं ॥ ६२-६३ ॥
भ्रूणहत्यापि संतार्या गोवधः स्त्रीवधोऽपि वा ।
न कृतघ्नस्य लोकोऽस्ति बान्धवस्य विशेषतः ॥ ६४ ॥
'भ्रूणहत्याके पापसे मनुष्य तर सकता है, गोवध अथवा स्त्रीवधके पापको भी प्रायश्चित्त आदिके द्वारा लाँघा जा सकता है; परंतु जो कृतघ्न है, विशेषतः अपने भाई-बन्धुपर कृतघ्नता करता है, उसके लिये कोई लोक नहीं है—उसका कहीं भी ठिकाना नहीं लगता ॥ ६४ ॥
पतितानुगतं मार्गं निषेवत्यचिरेण सः।
यः कृतघ्नोऽनुबन्धेन प्रीतिं वहति दारुणाम् ॥ ६५ ॥
'जो भीतरसे कृतघ्न रहकर अपना काम बनानेके लिये ऊपरसे भयानक प्रीतिका बोझ ढोता है, वह शीघ्र ही पतितोंके पथका आश्रय लेता है ॥ ६५ ॥
नरकाध्युषितः पन्था गन्तव्यस्तेन दारुणः ।
अपापे पापहृदयो यः पापमनुतिष्ठति ॥ ६६ ॥
'जो पापहीनके प्रति अपने हृदयमें पापपूर्ण भाव लेकर पापका ही बर्ताव करता है, उसे नरकके भयंकर मार्गपर जाना पड़ता है ॥ ६६ ॥
अहं वा स्वजनः श्लाघ्यः स वा श्लाघ्यतरः सुतः।
नियमैर्गुणवृत्तेन त्वया बान्धवकाम्यया ॥ ६७ ॥
'नियम, गुण और आचार—इनको सामने रखकर तुम्हें किसीको मित्र बनानेकी इच्छा करनी चाहिये। बतलाओ, तुम मुझ स्वजनको स्पृहणीय मानते हो अथवा अपने उस पुत्रको मुझसे भी अधिक श्लाघ्य समझते हो ? ॥ ६७ ॥
२८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
हस्तिनां कलहे घोरे वधमृच्छन्ति वीरुधः ।
युद्धव्युपरमे ते तु सहाश्नन्ति महावने ॥ ६८ ॥
बान्धवानामपि तथा भेदकाले समुत्थिते ।
वध्यते योऽन्तरप्रेप्सुः स्वजनो यदि वेतरः ॥ ६९ ॥
'हाथियोंमें भयंकर युद्ध छिड़ जानेपर घास-पात और लता-बेलें नष्ट होती हैं; फिर युद्धका विराम होनेपर वे हाथी उस महान् वनमें साथ-साथ खाते-पीते हैं; उसी प्रकार भाई-बन्धुओंमें भेद उपस्थित होनेपर जो छिद्र ढूँढ़नेवाला होता है, वही मारा जाता है; भले ही वह स्वजन हो या और कोई ॥ ६८-६९ ॥
कालस्त्वं हि विनाशाय मया पुष्टो विजानता ।
वसुदेव कुलस्यास्य यद् विरोध्यसे भृशम् ॥ ७० ॥
'वसुदेव ! तुम इस कुलके काल हो। मैंने अपने विनाशके लिये ही तुम्हें जान-बूझकर पाला-पोसा है। तभी तो तुम मुझसे अत्यन्त विरोध बढ़ा रहे हो ॥ ७० ॥
अमर्षी वैरशीलश्च सदा पापमतिः शठः ।
स्थाने यदुकुलं मूढ शोचनीयं त्वया कृतम् ॥ ७१ ॥
'ओ मूढ़ ! तुम अमर्षशील (असहिष्णु) और स्वभावतः वैर रखनेवाले हो। तुम्हारी बुद्धि सदा पापमें ही लगी रहती है। तुम शठ हो। तुमने जो इस यदुकुलकी शोचनीय अवस्था कर दी है, वह उचित ही है ॥ ७१ ॥
वसुदेव वृथा वृद्ध यन्मया त्वं पुरस्कृतः ।
श्वेतेन शिरसा वृद्धो नैव वर्षशतैर्भवेत् ॥ ७२ ॥
यस्य बुद्धिः परिणता स वै वृद्धतरो नृणाम् ॥ ७३ ॥
'बूढ़े वसुदेव ! मैंने जो तुम्हें पुरस्कृत किया—सदा अगुआ बनाकर रक्खा, वह सब व्यर्थ हो गया। सिरके बाल सफेद हो जायें और सौ वर्षोंकी आयु हो जाय—इतनेसे ही कोई वृद्ध (श्रेष्ठ) नहीं हो सकता, जिसकी बुद्धि परिपक्व हो, वही मनुष्योंमें वृद्धतर (श्रेष्ठतम या बड़ा-बूढ़ा) माना गया है ॥ ७२-७३ ॥
त्वं च कर्कशशीलश्च बुद्ध्या च न बहुश्रुतः ।
केवलं वयसा वृद्धो यथा शरदि तोयदः ॥ ७४ ॥
'तुम्हारा स्वभाव तो कर्कश (क्रूर) है। तुम बुद्धिसे भी बहुश्रुत (अधिक बातोंके जानकार) नहीं हो। शरद् ऋतुके बादलकी भाँति केवल अवस्थामे ही बूढ़े हो (अनुभवमें नहीं) ॥७४॥
किं च त्वं साधु जानीषे वसुदेव वृथामते ।
मृते कंसे मम सुतो मथुरां पालयिष्यति ॥ ७५ ॥
'इतना ही नहीं, व्यर्थ बुद्धि रखनेवाले वसुदेव ! तुम यह अच्छी तरह समझने लगे हो कि कंसके मर जानेपर मेरा बेटा मथुराका पालन करेगा—वही यहाँका राजा होगा ॥ ७५ ॥
छिन्नाशास्त्वं वृथावृद्धो मिथ्या त्वेवं विचारितम् ।
जिजीविषुर्न सोऽप्यस्ति योऽवतिष्ठेन्ममाग्रतः ॥ ७६ ॥
'परंतु तुम्हारी यह आशा छिन्न-भिन्न हो जायगी। तुम व्यर्थ ही बूढ़े हुए। तुमने झूठे ही ऐसा विचार किया है। अरे ! जो मेरे सामने प्रतिद्वन्द्वी बनकर खडा हो, उसके विषयमे यह समझना चाहिये कि वह जीवित रहना नहीं चाहता ॥ ७६ ॥
प्रहर्तुकामो विश्वस्ते यस्त्वं दुष्टेन चेतसा ।
तत् ते प्रतिकरिष्येऽहं पुत्रयोस्तव पश्यतः ॥ ७७ ॥
'मैंने सदा तुम्हारा विश्वास किया और तुमने दुष्टतापूर्ण चित्तसे मुझपर प्रहार करनेकी अभिलाषा की। इसका बदला मैं तुम्हारे दोनों पुत्रोंसे लूँगा और तुम उसे अपनी आँखों देखोगे ॥ ७७ ॥
न मे वृद्धवधः कश्चिद् द्विजस्त्रीवध एव च ।
कृतपूर्वः करिष्ये वा विशेषेण तु बान्धवे ॥ ७८ ॥
'मैंने पहले कभी भी किसी बूढ़ेका, ब्राह्मणका अथवा स्त्रीका वध नहीं किया है तथा न आगे ही ऐसा करूँगा; विशेषतः अपने बन्धु-बान्धवपर तो मैं हाथ उठाऊँगा ही नहीं ॥ ७८ ॥
इह त्वं जातसंवृद्धो मम पित्रा विवर्धितः ।
पितृष्वसुश्च मे भर्ता यदूनां प्रथमो गुरुः ॥ ७९ ॥
'वसुदेव ! तुम यहीं पैदा हुए, यहीं बढ़े और मेरे पिताने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया। तुम मेरी चचेरी बहिनके पति हो और यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ गुरुरूप माने जाते हो ॥ ७९ ॥
कुले महति विख्यातः प्रथिते चक्रवर्तिनाम् ।
गुर्वर्थे पूजितः सद्भिर्महद्भिर्धर्मबुद्धिभिः ॥ ८० ॥
'चक्रवर्तियोंके सुविख्यात एवं महान् कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ, तुम स्वयं भी प्रसिद्ध हो तथा धर्मविषयक बुद्धि रखनेवाले श्रेष्ठ महापुरुषोंने उसी गौरवके कारण तुम्हारा पूजन, आदर-सत्कार किया है ॥ ८० ॥
किं करिष्यामहे सर्वे सत्सु वक्तव्यतां गताः ।
यदूनां यूथमुख्यस्य यस्य ते वृत्तमflags... ईदृशम् ॥ ८१ ॥
'तुम यदुवंशियोंके समुदायमें मुख्य हो। जब तुम्हारा आचार-व्यवहार ऐसा है (तो औरोंका क्या कहा जाय ?)। क्या करें, हम सब लोग केवल तुम्हारे कारण सत्पुरुषोंके समाजमे निन्दाके पात्र बन गये ॥ ८१ ॥
मद्वधो वा जयो वापि वसुदेवस्य दुर्नयैः ।
सत्सु यास्यन्ति पुरुषा यदूनामवगुण्ठिताः ॥ ८२ ॥
'वसुदेवकी दुर्नीतिसे मेरा वध हो अथवा विजय, आजसे यदुकुलके पुरुष सज्जनोंके समाजमें अपना मुँह ढँककर जायेंगे ॥ ८२ ॥
त्वया हि मद्वधोपायं तर्कमाणेण वै मृधे ।
अविश्वास्यं कृतं कर्म वाच्याश्च यादवाः कृताः ॥ ८३ ॥
'वसुदेव ! तुमने युद्धमें मेरे वधका उपाय सोचते-सोचते अविश्वासयोग्य कर्म किया और यादवोंको निन्दनीय बना दिया ॥ ८३ ॥
१. यद्यपि ययातिके शापसे यदुकुलका कोई भी पुरुष चक्रवर्ती राजा नहीं हुआ तथापि यहाँ चक्रवर्तीके लक्षण-विशेषसे सम्पन्न पुरुषोंको ही चक्रवर्ती कहा गया है। वह लक्षण इस प्रकार है—
यस्य मूर्धनि दृश्येत विना छत्रेण भूपतेः । पद्मानुकारिणी छाया तमाहुश्चक्रवर्तिनम् ॥ अर्थात् जिस राजाके मस्तकपर बिना छत्र लगाये ही कमल-जैसी छाया दिखायी दे, उसे चक्रवर्ती कहते हैं।
विष्णुपर्व ] द्वांविशोऽध्यायः २८५
ऐसा कर्म कर डाला, जिसके कारण यादवोंके ऊपरसे सबका विश्वास उठ गया। तुमने यदुवंशियोंको कलङ्कित करके निन्दाके योग्य बना दिया ॥ ८३ ॥
अशाम्यं वैरमुत्पन्नं मम कृष्णस्य चोभयोः।
शान्तिमेकतरे शान्ते गते यास्यन्ति यादवाः ॥ ८४ ॥
'अब तो हम दोनोंमें—मुझ कंस और कृष्णमेकभी शान्त न होनेवाला वैर उत्पन्न हो गया है। हममेसे किसी एक व्यक्तिके शान्त होने—मर जानेपर ही यादवोंको शान्ति मिलेगी ॥ ८४ ॥
गच्छ दानपते क्षिप्रं ताविहानयितुं व्रजात्।
नन्दगोपं च गोपांश्च करदान् मम शासनात् ॥ ८५ ॥
'दानपते अक्रूर ! तुम मेरे आदेशसे वसुदेवके उन दोनों पुत्रोंको, नन्दगोपको तथा मुझे कर देनेवाले अन्य गोपोंको भी ब्रजसे यहाँ बुला लानेके लिये शीघ्र जाओ ॥ ८५ ॥
वाच्यश्च नन्दगोपो वै करमादाय वार्षिकम्।
शीघ्रमागच्छ नगरं गोपैः सह समन्वितः ॥ ८६ ॥
'नन्दगोपसे कह देना कि तुम हमारा वार्षिक कर लेकर गोपोंके साथ शीघ्र ही मथुरापुरीको चलो ॥ ८६ ॥
कृष्णसंकर्षणौ चैव वसुदेवसुतावुभौ।
द्रष्टुमिच्छति वै कंसः सभृत्यः सपुरोहितः ॥ ८७ ॥
'वसुदेवके ये दोनों पुत्र जो श्रीकृष्ण और संकर्षण हैं, इन्हें सेवकों और पुरोहितोंसहित महाराज कंस देखना चाहते हैं ॥ ८७ ॥
एतौ युद्धविदौ रङ्गे कालनिर्माणयोधिनौ।
दृढौ च कृतिनौ चैव शृणोमि व्यायतोद्यमौ ॥ ८८ ॥
'सुनता हूँ कि ये दोनों अखाड़ेमे लड़ना जानते हैं और सामयिक युद्धकी कलामे कुशल हैं। इन्होंने दीर्घकालसे इसके लिये विशेष यत्न और परिश्रम किया है तथा ये दोनों भाई सुदृढ़ और चतुर हैं ॥ ८८ ॥
अस्माकमपि मल्लौ द्वौ सज्जौ युद्धकृतोत्सवौ।
ताभ्यां सह नियोत्स्येते तौ युद्धकुशलावुभौ ॥ ८९ ॥
'हमारे यहाँ भी दो पहलवान लड़ाईके लिये तैयार हैं। इन्हें लड़ने-भिड़नेमें बड़ा आनन्द आता है। वे दोनों ही युद्धमे कुशल हैं, जो उन दोनों श्रीकृष्ण और संकर्षणके साथ युद्ध करेंगे ॥ ८९ ॥
द्रष्टव्यौ च मयावश्यं बालौ तावमरोपमौ।
पितृष्वसुः सुतौ मुख्यौ व्रजवासौ वनेचरौ ॥ ९० ॥
'वे दोनों देवोपम बालक मेरी चचेरी बहिनके प्रधान पुत्र हैं, जो इस समय ब्रजमे रहते और वनमे विचरते हैं। मुझे अवश्य उन दोनोंको देखना चाहिये ॥ ९० ॥
वक्तव्यं च व्रजे तस्मिन् समीपे व्रजवासिनाम्।
राजा धनुर्मखं नाम कारयिष्यति वै सुखी ॥ ९१ ॥
'उस ब्रजमे जाकर व्रजवासियोंके समीप तुम्हे यह कहना चाहिये कि सुखी राजा कंस धनुर्यज्ञका उत्सव करायेंगे ॥९१॥
संनिकृष्टे वने ते तु निवसन्त्व यथासुखम्।
जनस्यामन्त्रितस्यार्थे यथा स्यात् सर्वमव्ययम् ॥९२ ॥
'इस उत्सवमें आमन्त्रित हुए लोगोंको जिस प्रकार हर तरहसे आराम मिले, उसके लिये तुम सब ब्रजवासी मथुराके समीपवर्ती वनमे आकर सुखपूर्वक रहो ॥ ९२ ॥
पयसः सर्पिषश्चैव दध्नो दध्युत्तरस्य च।
यथाकामप्रदानाय भोज्याधिश्रयनाय च ॥ ९३ ॥
'दूध, घी, दही और तक्र आदिको अतिथियोंकी इच्छाके अनुसार जुटाकर देना और खीर आदि बनानेके लिये जब जितने दूधको आगपर रखना आवश्यक हो, तब-तब उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये पर्याप्त दूध प्रस्तुत करना—इसी उद्देश्यसे तुम्हें नगरके निकट निवास करना है ॥ ९३ ॥
अक्रूर गच्छ शीघ्रं त्वं तावानय ममाज्ञया।
संकर्षणं च कृष्णं च द्रष्टुं कौतूहलं हि मे ॥ ९४ ॥
'अक्रूर ! शीघ्र जाओ। मेरी आज्ञासे उन दोनों संकर्षण और कृष्णको यहाँ ले आओ। मुझे उन्हे देखनेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ९४ ॥
तयोरागमने प्रीतिः परमा मत्कृता भवेत्।
दृष्ट्वा तु तौ महावीर्यौ तद् विधास्यामि यद्धितम् ॥ ९५ ॥
'उनके आ जानेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी, (जिसका श्रेय तुम्हे मिलेगा । ) उन दोनों महापराक्रमी बालकोंको देखकर मैं वही करूँगा, जिसमें मेरा हित होगा ॥ ९५ ॥
शासनं यदि वा श्रुत्वा मम तौ परिभाषितम्।
नागच्छेतां यथाकालं निग्राह्यावपि तौ मम ॥ ९६ ॥
'मेरी यह आज्ञा तथा बातें सुनकर यदि वे दोनों यहाँ ठीक समयपर आनेको तैयार न हों तो मेरी रायमें वे बंदी बना लेनेके भी योग्य हैं ( अर्थात् तुम उन्हें कैद करके भी ला सकते हो ) ॥ ९६ ॥
सान्त्वमेव तु वालेषु प्रधानं प्रथमो नयः।
मधुरेणैव तौ मन्दौ स्वयमेवानायाशु वै ॥ ९७ ॥
'समझा-बुझाकर काम लेना ही बालकोंके प्रति प्रधान एवं प्रमुख नीति है; इसलिये तुम उन दोनों मूर्खोंको मीठी बातोसे स्वयं ही राजी करके यहाँ शीघ्र ले आओ ॥ ९७ ॥
अक्रूर कुरु मे प्रीतिमेतां परमदुर्लभाम्।
यदि वा नोपजप्तोऽसि वसुदेवेन सुव्रत ।
तथा कर्तव्यमेतद्धि यथा तावागमिष्यतः ॥ ९८ ॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले अक्रूर ! यदि वसुदेवने तुम्हारे भी कान न भर दिये हों तो तुम मेरी इस परम दुर्लभ प्रीतिका सम्पादन करो। तुम्हे वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये, जिससे वे दोनों स्वतः यहाँ आ जायँ' ॥ ९८ ॥
एवमाक्षिप्यमाणोऽपि वसुदेवो वस्तूपमः।
सागराकारमात्मानं निष्प्रकम्पमधारयत् ॥ ९९ ॥
कंसके इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी वसुओंके समान शक्तिशाली वसुदेवने अपने समुद्र-जैसे हृदयको क्षुब्ध या कम्पित नहीं होने दिया। उसे धैर्यपूर्वक काबूमें रखा ॥९९॥
वाक्छल्यैस्ताड्यमानस्तु कंसेनादीर्घदर्शिना।
क्षमां मनसि संधाय नोत्तरं प्रत्यभाषत ॥१००॥
| २८६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
अदूरदर्शी कंसने उन्हें वाग्बाणोंसे वार-वार घायल किया। फिर भी उन्होंने मनमे क्षमाभाव रखकर उसे उसकी बातोंका कोई उत्तर नहीं दिया ॥ १०० ॥
ये तु तं ददृशुस्तत्र क्षिप्यमाणमनेकधा।
धिग्धिगित्यासकृत् ते वै शनैरुचुरवाङ्मुखाः ॥ १०१॥
जिन लोगोंने वहाँ वसुदेवजीपर बारंबार आक्षेप होता देखा, वे अपना मुँह नीचे किये धीरे-धीरे अनेक बार बोल उठे कि धिक्कार है, धिक्कार है ॥ १०१ ॥
अक्रूरस्तु महातेजा जानन् दिव्येन चक्षुषा।
जलं दृष्ट्वेव तृषितः प्रेषितः प्रीतिमानभूत् ॥ १०२॥
महातेजस्वी अक्रूर अपनी दिव्य दृष्टिसे सब कुछ जानते थे (कि भगवान् श्रीकृष्ण कौन हैं और किसलिये अवतीर्ण हुए हैं); अतः जैसे प्यासा मनुष्य पानीको देखते ही प्रसन्न हो उठता है, उसी प्रकार उन्हें कंसके भेजनेपर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव हुआ ॥ १०२ ॥
तस्मिन्नेव मुहूर्ते तु मथुरायाः स निर्ययौ।
प्रीतिमान् पुण्डरीकाक्षं द्रष्टुं दानपतिः स्वयम् ॥१०३॥
दानपति अक्रूर मन-ही-मन प्रसन्न हो स्वयं जाकर कमल-नयन श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उसी मुहूर्तमें मथुरासे निकल पड़े ॥ १०३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अक्रूरप्रस्थाने द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अक्रूरका प्रस्थानविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
त्रयोविंशोऽध्यायः
अन्धकका कंसको मुँहतोड़ उत्तर
वैशम्पायन उवाच
क्षिप्तं यदुवृषं दृष्ट्वा सर्वे ते यदुपुङ्गवाः।
निपीड्य श्रवणान् हस्तैर्मनिरे तं गतायुषम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! यदुकुलके उन सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने यदुकुलतिलक वसुदेवपर आक्षेप होता देख शीघ्र ही हाथोंसे अपने-अपने कान बंद कर लिये। उन सबको यह निश्चय हो गया कि कंसकी आयु समाप्त हो चली है ॥ १ ॥
अन्धकोऽनुद्विग्नमना धैर्यादविकृतं वचः।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठः समाजे कंसमोजसा ॥ २ ॥
उसी समाजमे वक्ताओंमें श्रेष्ठ अन्धक भी थे, जिनके मनमें कंससे तनिक भी भय नहीं था। उन्होंने धैर्यसे अपनी वाणीको विकाररहित रखते हुए कंससे ओजस्वी स्वरमें कहा—॥
अश्लाघ्यो मे मतः पुत्र तवायं वाक्परिश्रमः।
अयुक्तो गर्हितः सद्भिर्बान्धवेषु विशेषतः ॥ ३ ॥
'बेटा ! तुमने जो इतनी देरतक भाषण देनेका कष्ट उठाया है, तुम्हारा यह परिश्रम मेरे मतमें आदर या प्रशंसा-के योग्य नहीं है। यह सर्वथा अनुचित है। श्रेष्ठ पुरुषोंने इसकी सदा निन्दा की है। विशेषतः अपने बन्धु-बान्धवोंके प्रति ऐसा आक्षेप सर्वथा निन्दित है ॥ ३ ॥
अयादवो यदि भवाञ्छृणु तावद् यदुच्यते।
न हि त्वां यादवं वीर बलात् कुर्वन्ति यादवाः ॥ ४ ॥
'वीर ! अब इस समय मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। यदि तुम यादव नहीं हो या अपनेको यादव नहीं मानते हो तो ये यदुवंशी तुम्हें जबरदस्ती यादव नहीं बना रहे हैं (और न बनाना चाहते हैं) ॥ ४ ॥
अश्लाघ्या वृष्णयः पुत्र येषां त्वमनुशासिता।
इक्ष्वाकुवंशजो राजा विनिवृत्तः स्वयं सकृत् ॥ ५ ॥
'वत्स ! जिनके शासक तुम हो, ये वृष्णिवंशी आदर और प्रशंसाके योग्य हो ही नहीं सकते हैं। इक्ष्वाकुवंशमें एक प्रजापीड़क राजा उत्पन्न हुआ था, जो स्वयं ही किसी समय राज्य छोड़कर भाग गया अथवा मिट गया (इस यदुकुलमें तुम भी वैसे ही जान पड़ते हो, अतः तुम्हारी भी वैसी ही दशा होनेवाली है) ॥ ५ ॥
भोजो वा यादवो वासि कंसो वासि यथा तथा।
सहजं ते शिरस्तात जटी मुण्डोऽपि वा भव ॥ ६ ॥
'तात ! तुम भोज हो, यादव हो अथवा कंस हो या जैसा-तैसा कोई भी हो, तुम्हारा मस्तक तुम्हारे साथ ही उत्पन्न हुआ है (और वह अभीतक मौजूद है)। तुम उसपर बड़ी-बड़ी जटाएँ रखा लो अथवा मूँड मुड़ा लो (यदि तुम यादव रहना नहीं चाहते तो जो चाहो, वही बन जाओ) ॥ ६ ॥
उग्रसेनस्त्वयं शोच्यो योऽस्माकं कुलपांसनः।
दुर्जातीयेन येन त्वमीदृशो जनितः सुतः ॥ ७ ॥
'मेरी दृष्टिमे तो यह उग्रसेन शोचनीय है, जो हमलोगोंमें कुलाङ्गार पैदा हो गया और जिस दुर्जातिने तुम्हारे-जैसे बेटे-को जन्म दिया ॥ ७ ॥
न चात्मनो गुणांस्तात प्रवदन्ति मनीषिणः।
परेणोक्ता गुणा गौण्यं यान्ति वेदार्थसम्मताः ॥ ८ ॥
'तात ! मनीषी पुरुष अपने मुखसे अपने गुणोंका बखान नहीं करते हैं। दूसरेके द्वारा वर्णित या प्रशंसित हुए गुण ही सफल होते और वेदार्थके तुल्य प्रामाणिक माने जाते हैं ॥ ८ ॥
पृथिव्यां यदुवंशोऽयं निन्दनीयो महीक्षिताम्।
बालः कुलान्तकृन्मूढो येषां त्वमनुशासिता ॥ ९ ॥
'भूमण्डलमें यह यदुवंश समस्त भूपालोंके लिये निन्दनीय बन गया; क्योंकि तुम्हारे समान कुलनाशक, मूर्ख और अविवेकी बालक इन यादवोंका शासक है ॥ ९ ॥
विष्णुपर्र्व ] त्रयोविंशोऽध्यायः २८७
असाधुमद्भिर्वाक्यैश्च त्वया साध्विति भाषितैः ।
न चाप्यासादितं कार्यमात्मा च विवृतः कृतः ॥ १० ॥
'तुमने निन्दायुक्त वचनोंको उत्तम मानकर जो यहाँ कहा है, उनसे कोई कार्य तो सिद्ध हुआ नहीं; केवल तुम्हारे स्वरूपका स्पष्टीकरण हो गया है (इन बातोंसे सब लोग यह जान गये कि तुम कितने ओछे हो !) ॥ १० ॥
गुरोरनवलिप्तस्य मान्यस्य महतामपि ।
क्षेपणं कः शुभं मन्ये द्विजस्येव वधे कृते ॥ ११ ॥
'जो अहंकाररहित तथा महापुरुषोंके लिये भी माननीय गुरुजन हैं, उनपर आक्षेप करना ब्रह्महत्याके समान है। उसे करके कौन अपने लिये कल्याणकी आशा कर सकता है ॥
मान्याश्चैवाभिगम्याश्च वृद्धास्तात यथाग्नयः ।
क्रोधो हि तेषां प्रदहेल्लोकानन्तर्गतानपि ॥ १२ ॥
'तात ! वृद्ध पुरुष अग्नियोंके समान आदरणीय तथा सेव्य होते हैं; उनका क्रोध आन्तरिक साधनाओंसे प्राप्त हुए लोकोंको भी जलाकर भस्म कर सकता है ॥ १२ ॥
बुधेन तात दान्तेन नित्यमभ्युच्छितात्मना ।
धर्मस्य गतिरन्वेष्या मत्स्यस्य गतिरप्स्विव ॥ १३ ॥
'तात ! जिसका आत्मा उन्नतिके पथपर अग्रसर है तथा जो जितेन्द्रिय एवं विवेकशील विद्वान् है, उस पुरुषको धर्मकी गतिका सदा ही अन्वेषण करना चाहिये; जैसे जलमे मछलीकी गति अत्यन्त सूक्ष्म या अव्यक्त होती है, उसी प्रकार धर्मकी गति भी सूक्ष्म है ॥ १३ ॥
केवलं त्वं तु दर्पेण वृद्धानग्निसमानिह ।
वाचा तुदसि मर्मघ्न्या अमन्त्रोक्ता यथाऽऽहुतिः ॥ १४।
'तुम तो केवल अहंकारवश यहाँ बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी वृद्ध पुरुषोंको अपनी मर्मभेदिनी वाणीद्वारा पीड़ा दे रहे हो। जैसे मन्त्रका उच्चारण किये बिना दी हुई आहुति व्यर्थ होती है, उसी प्रकार तुम्हारी यह आक्षेपपूर्ण बातें निष्फल हैं ॥ १४ ॥
वसुदेवं च पुत्रार्थे यदिमं परिगर्हसि ।
तत्र मिथ्या प्रलापं ते निन्दामि कृपणं वचः ॥ १५ ॥
'वसुदेवने अपने पुत्रकी रक्षाके लिये जो कुछ किया है, उसके लिये जो तुम इनपर आक्षेप करते हो, वह सब तुम्हारा मिथ्या प्रलाप है। उस विषयमें कही गयी तुम्हारी इन कायरतापूर्ण बातोंकी मैं निन्दा करता हूँ ॥ १५ ॥
दारुणे च पिता पुत्रे नैव दारुणतां व्रजेत् ।
पुत्रार्थे ह्यापदः कष्टाः पितरः प्राप्नुवन्ति हि ॥ १६ ॥
'पुत्र क्रूर स्वभावका हो जाय तो भी पिता उसके प्रति निष्ठुर नहीं हो सकता; क्योंकि पुत्रोंके लिये पिताओंको कितनी ही कष्टदायिनी विपत्तियाँ झेलनी पड़ती हैं ॥ १६ ॥
छादितो वसुदेवेन यदि पुत्रः शिशुस्तदा ।
मन्यसे यद्यकर्तव्यं तत् पृच्छ पितरं स्वकम् ॥ १७ ॥
'यदि वसुदेवने उस समय अपने शिशु पुत्रको उसकी रक्षाके लिये छिपा दिया था तो यह कोई अनुचित कर्म नहीं किया। यदि तुम इसे न करनेयोग्य बुरा कर्म मानते हो तो इस विषयमें अपने पितासे ही पूछो ॥ १७ ॥
गर्हता वसुदेवं च यदुवंशं च निन्दता ।
त्वया यादवपुत्राणां वैरं विपमर्जितम् ॥ १८ ॥
'वसुदेवपर आक्षेप और यादवकुलकी निन्दा करके तुमने यहाँ यादवकुमारोंके वैरजनित विषका ही उपार्जन किया है ॥
अकर्तव्यं यदि कृतं वसुदेवेन पुत्रजम् ।
किमर्थमुग्रसेनेन शिशुस्त्वं न विनाशितः ॥ १९ ॥
'यदि वसुदेवने अपने पुत्रके प्राण बचाकर अनुचित कर्म किया है तो उग्रसेनने शैशवावस्थामें तुम्हें क्यों नहीं मार डाला ॥ १९ ॥
पुन्नाम्नो नरकात् पुत्रो यस्मात्त्राता पितुस्तदा ।
तस्माद् ब्रुवन्ति पुत्रेति पुत्रं धर्मविदो जनाः ॥ २० ॥
'पुत्र पुत् नामक नरकसे पितरोंकी रक्षा करता है, इसलिये धर्मज्ञ पुरुष पुत्रको पुत्र कहते हैं ॥ २० ॥
जात्यां हि यादवः कृष्णः स च संकर्षणो युवा ।
त्वं चापि विधुतस्ताभ्यां जातवैरेण चेतसा ॥ २१ ॥
'श्रीकृष्ण और नवयुवक संकर्षण भी यादव ही हैं, किंतु तुमने उनके उत्पन्न होते ही उनसे वैर बाँध लिया; फिर उन दोनोंने मनमें वैरभावको स्थान देकर तुमसे शत्रुता बाँध ली है (अतः इस वैर-भावमें प्रथम अपराध तुम्हारा ही है) ॥ २१॥
उद्धूतानीह सर्वेषां यदूनां हृदयानि वै ।
वसुदेवे त्वयाऽऽक्षिप्ते वासुदेवे च कोपिते ॥ २२ ॥
'तुमने वसुदेवपर आक्षेप किया और वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णके मनमें अपने प्रति क्रोध उत्पन्न कर दिया, इससे समस्त यादवोंके हृदय यहाँ कम्पित हो उठे हैं ॥ २२ ॥
कृष्णे च भवतो द्वेष्ये वसुदेवविगर्हणात् ।
शंसन्ति चेमानि भयं निमित्तान्यशुभानि ते ॥ २३ ॥
'एक तो श्रीकृष्णके प्रति तुम्हारा द्वेष था ही, दूसरे तुमने वसुदेवकी भरपूर निन्दा भी कर डाली, इससे ये अशुभसूचक अपशकुन प्रकट होकर तुम्हारे लिये भयकी प्राप्ति बता रहे हैं ॥ २३ ॥
सर्पाणां दर्शनं तीव्रं दुःखप्नानां निशाक्षये ।
पुर्यां वैधव्यशंसीनि कारणैरनुमीमहे ॥ २४ ॥
'जब रात समाप्त हो रही हो, उस समय सर्पों और बुरे स्वप्नोंका दर्शन अत्यन्त कष्टदायक होता है। ये जो शकुन दिखायी देते हैं, वे इस नगरीके भावी वैधव्यकी सूचना देनेवाले हैं। अबतक जो कारण प्राप्त हुए हैं, उनसे हमें ऐसा ही अनुमान होता है ॥ २४ ॥
एष घोरो ग्रहः स्वातीमुल्लिखन् खे गभस्तिभिः ।
वक्रमङ्गारकश्चक्रे चित्रायां घोरदर्शनः ॥ २५ ॥
'यह भयंकर ग्रह राहु आकाशमे अपनी किरणोंद्वारा स्वातिका वेध कर रहा है तथा भयानक दिखायी देनेवाला मंगल सर्वतोभद्रचक्रमे वक्रीभूत होकर चित्रा नक्षत्रपर स्थित है* ॥
* ज्योतिषके अनुसार सर्वतोभद्र नामक चक्रमें मृगशिरा कंसका जन्म-नक्षत्र है, उनसे दशम नक्षत्र चित्रा है, जो उसीका कर्मनक्षत्र -
| २८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
बुधेन पश्चिमा संध्या व्याप्ता घोरेण तेजसा ।
वैश्वानरपथे शुक्लो ह्यतिचारं चचार ह ॥ २६ ॥
'बुधने भयानक तेजसे पश्चिम संध्याको व्याप्त कर रखा है (अर्थात् वह पश्चिम दिशामें उदित हो रहे हैं, ऐसा होना राज्यभंगका सूचक है) तथा शुक्रने वैश्वानरपथ (सूर्यमार्ग) पर अतिचार गतिसे चलना आरम्भ किया है (सूर्यको लाँघ-कर जाना ही अतिचार है) ॥ २६ ॥
केतुना धूमकेतोस्तु नक्षत्राणि त्रयोदश ।
भरण्यादीनि भिन्नानि नानुयान्ति निशाकरम् ॥ २७ ॥
'धूमकेतु नामक उत्पात-ग्रहके पुच्छभागसे भरणी आदि तेरह नक्षत्र विद्ध हो गये हैं, इसलिये वे चन्द्रमाका अनुसरण नहीं करते हैं ॥ २७ ॥
प्राक्संध्या परिघग्रस्ता भाभिर्बाधति भास्करम् ।
प्रतिलोमं च यान्त्येव व्याहरन्तो मृगद्विजाः ॥ २८ ॥
'पूर्वकालकी संध्या परिघ^१से ग्रस्त है। वह अपनी प्रभाओं-द्वारा सूर्यदेवको बाधा पहुँचाती है तथा पशु और पक्षी अपनी बोली बोलते हुए प्रतिकूल दिशासे होकर जाते हैं ॥ २८ ॥
शिवा श्मशानान्निष्क्रम्य निःश्वासाङ्गारवर्षिणी ।
उभे संध्ये पुरीं घोरा पर्यति बहु वाशती ॥ २९ ॥
'दोनों संध्याओके समय एक भयानक गीदड़ी श्मशान-भूमिसे निकलकर अपने निःश्वाससे अङ्गारकी वर्षा करती और बहुत बोलती हुई मथुरापुरीके चारों ओर चक्कर लगाती है।२९।
उल्का निर्घातनादेन पपात धरणीतले ।
चलत्यपर्वणि मही गिरीणां शिखराणि च ॥ ३० ॥
'कुछ ही समय पहले वज्रपातकी-सी ध्वनिके साथ पृथ्वी-पर उल्कापात हुआ है । यह पृथ्वी तथा पर्वतोंके शिखर अकस्मात् काँपने लगते हैं ॥ ३० ॥
ग्रस्तः स्वर्भानुना सूर्यो दिवा नक्तमजायत ।
धूमोत्पातैर्दिशो व्याप्ताः शुष्काशानिसमाहताः ॥ ३१ ॥
'अभी पिछले दिनों राहुने सूर्यपर ग्रहण लगा दियाथा, जिससे दिनमें ही रात हो गयी थी। धूम और उत्पातोंसेसम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हैं। सूखेमें ही बिजलियाँ गिरती हैं ॥ ३१॥
प्रस्रवन्ति घना रक्तं साशनिस्तनयित्नवः ।
चलिता देवताः स्थानात् त्यजन्ति विहगा नगान् ॥३२॥
'मेघ बिजली और गड़गड़ाहट के साथ रक्तकी वर्षा करते हैं। देवताओंकी प्रतिमाएँ अपने स्थानसे हट जाती हैं और पक्षी वृक्षोंको त्याग देते हैं ॥ ३२ ॥
यानि राजविनाशाय दैवज्ञाः कथयन्ति ह ।
तानि सर्वाणि पश्यामो निमित्तान्यशुभानि वै ॥ ३३ ॥
'ज्योतिषी लोग राजाके विनाशकी सूचना देनेवाले जो-जो अशुभ निमित्त (अपशकुन) बताते हैं, उन सबको हम लोग देख रहे हैं ॥ ३३ ॥
त्वं चापि स्वजनद्वेषी राजधर्मपराङ्मुखः ।
अनिमित्तागतक्रोधः संनिकृष्टभयो ह्यसि ॥ ३४ ॥
'तुम भी स्वजनोंसे द्वेष रखते हो, राजधर्मसे विमुख हो चुके हो और अकारण ही तुम्हें क्रोध आ जाता है, इससे जान पड़ता है, निकट-भविष्यमें ही तुम्हारे ऊपर भय आनेवाला है ॥
यस्त्वं देवोपमं वृद्धं वसुदेवं वसूपमम् ।
मोहात् क्षिपसि दुर्बुद्धे कुतस्ते शान्तिरात्मनः ॥ ३५ ॥
'दुर्बुद्धे ! तुम जो देवताओं तथा वसुओंके समान तेजस्वी बूढ़े वसुदेवपर मोहवश आक्षेप कर रहे हो, इससे तुम्हारे आत्माको शान्ति कैसे मिल सकती है ॥ ३५ ॥
त्वद्गतो यो हि नः स्नेहस्तं त्यजामोऽद्य वै वयम् ।
अहितं स्वस्य वंशस्य न त्वां क्षणमुपास्महे ॥ ३६ ॥
'तुम्हारे प्रति जो हमारा स्नेह रहा है, उसे हमलोग आज त्याग देते हैं। तुम अपने वंशका अहित करनेवाले हो, अतः अब हम एक क्षण भी तुम्हारे पास नहीं बैठेंगे ॥
स हि दानपतिर्धन्यो यो द्रक्ष्यति वने गतम् ।
पुण्डरीकविशालाक्षं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥ ३७ ॥
'वे दानपति अक्रूर धन्य हैं, जो आज वनमें गये हुए अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कमलनयन श्रीकृष्णको अपनी आँखोंसे देखेंगे ॥ ३७ ॥
छिन्नमूलो ह्ययं वंशो यदूनां त्वत्कृते कृतः ।
कृष्णो ज्ञातीन् समानाय्य स संधानं करिष्यति ॥ ३८ ॥
'तुम्हारे कारण इस यदुवंशकी जड़ कट गयी है। अब श्रीकृष्ण ही आकर समस्त भाई-बन्धुओको जुटायेंगे और उनमें मेल करायेंगे ॥ ३८ ॥
क्षान्तमेव तवानेन वसुदेवेन धीमता ।
कालसम्यक्परिज्ञाने ब्रूहि त्वं यद्यदिच्छसि ॥ ३९ ॥
'इन बुद्धिमान् वसुदेवने तो तुम्हारे अपराधको क्षमा ही कर दिया है। कालने तुम्हारी विवेकशक्ति नष्ट कर दी, अतः तुम जो-जो चाहो, बकते रहो ॥ ३९ ॥
मह्यं तु रोचते कंस वसुदेवसहायवान् ।
गच्छ कृष्णस्य निलयं संधिस्तेन च रोचताम् ॥४०॥
'कंस ! मुझे तो यही अच्छा लगता है, कि 'तुम वसुदेव-को साथ लेकर श्रीकृष्णके स्थानपर जाओ और उनके साथ संधि करना स्वीकार करो' ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवचने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकका वचनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
है । वहीं भयंकर ग्रह राहु, जो क्रूर ग्रह माना गया है, स्थित है । मंगल भी वक्रगतिसे वहीं आ गया है । इन दोनोंने कर्मनक्षत्रको व्याप्त करके जन्मनक्षत्रको विद्ध कर दिया है। इसका फल बताते हुए अन्धक कहते हैं—'कंस तुम्हारा जीवित रहनेके लिये जो प्रयत्न है, वह निष्फल होगा और तुम्हारे देहका भी नाश हो जायगा।' ( नीलकण्ठी )
१. सूर्यमण्डलमें उगा हुआ तिरछा डंडा परिघ कहलाता है।
[विष्णुपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः २८९
चतुर्विंशोऽध्यायः
केशीके अत्याचार और श्रीकृष्णद्वारा उसका वध
वैशम्पायन उवाच
अन्धकस्य वचः श्रुत्वा कंसः संरक्तलोचनः ।
न किंचिदब्रवीत् क्रोधाद् विवेश स्वं निकेतनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अन्धककी बातें सुनकर कंसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह उनसे कुछ नहीं बोला और रोषपूर्वक उठकर अपने महलमें चला गया ॥ १ ॥
ते च सर्वे यथावेश्म यादवाः श्रुतविस्तराः ।
जग्मुर्विगतसंकल्पाः कंसवैकृतशंसिनः ॥ २ ॥
फिर वे सब यादव, जो वहाँकी सारी बातें विस्तारपूर्वक सुन चुके थे, निराश होकर अपने-अपने घरको लौट गये। वे मार्गमें यह चर्चा कर रहे थे कि कंसका मस्तिष्क खराब हो गया है ॥ २ ॥
अक्रूरोऽपि यथाऽऽज्ञप्तः कृष्णदर्शनलालसः ।
जगाम रथमुख्येन मनसा तुल्यगामिना ॥ ३ ॥
अक्रूरके मनमें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा जाग उठी थी, अतः वे भी कंसकी आज्ञाके अनुसार उठे और मनके समान शीघ्रगामी श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो वहाँसे चल दिये ॥ ३ ॥
कृष्णस्यापि निमित्तानि शुभान्यङ्गगतानि वै ।
पितृतुल्येन शंसन्ति बान्धवेन समागमम् ॥ ४ ॥
उधर श्रीकृष्णको भी अपने अङ्गोंमें ही कुछ ऐसे शुभ लक्षण दिखायी देते थे, जो पिता-जैसे बान्धवसे भेंट होनेकी सूचना दे रहे थे ॥ ४ ॥
प्रागेव च नरेन्द्रेण माथुरेणोग्रसेनिना ।
केशिनः प्रेषितो दूतो वधायोपेन्द्रकारणात् ॥ ५ ॥
(अक्रूरको भेजनेसे) पहले ही मथुराके राजा उग्रसेन-कुमार कंसने केशीके पास दूत भेजा और कहलाया कि तुम श्रीकृष्णका वध कर डालो ॥ ५ ॥
स च दूतवचः श्रुत्वा केशी क्लेशकरो नृणाम् ।
वृन्दावनगतो गोपान् बाधते स्म दुरासदः ॥ ६ ॥
दूतकी बात सुनकर मनुष्योंको क्लेश प्रदान करनेवाला दुर्जय दैत्य केशी वृन्दावनमें जाकर गोपोंको सताने लगा ॥ ६ ॥
मानुषं मांसमश्नन् क्रुद्धो दुष्टपराक्रमः ।
दुर्दान्तो वाजिदैत्योऽसावकरोत् कदनं महत् ॥ ७ ॥
केशी घोड़ेके रूपमें रहनेवाला दुर्दान्त दैत्य था और मनुष्यका मांस खाता था। उस दुष्ट पराक्रमी असुरने कुपित होकर वहाँ महान् संहार आरम्भ कर दिया ॥ ७ ॥
निघ्नन् गा वै सगोपालान् गवां पिशितभोजनः ।
दुर्मदः कामचारी च स केशी निरवग्रहः ॥ ८ ॥
वह ग्वालोंसहित गौओंको मार डालता और गौओंका मांस खाया करता था। मदमत्त केशी स्वच्छन्द विचरनेवाला और उच्छृङ्खल था ॥ ८ ॥
तदरण्यं श्मशानाभं नृणां मांसास्थिभिर्वृतम् ।
यत्रास्ते स हि दुष्टात्मा केशी तुरगदानवः ॥ ९ ॥
अश्वरूपधारी दुष्टात्मा दानव केशी जहाँ रहता था, वह वन मनुष्योंके मांस और हड्डियोंसे व्याप्त होकर श्मशान-भूमिके समान प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
खुरैर्दारयते भूमिं वेगेनाभ्रजते द्रुमान् ।
ह्रेषितैः स्पर्धते वायुं प्लुतैर्लङ्घयते नभः ॥ १० ॥
वह टापोंसे पृथ्वीको विदीर्ण कर देता और वेगसे वृक्षोंको भी तोड़ डालता था, हाँसते या हिनहिनाते समय प्रचण्ड वायुके कोलाहलसे होड़ लगाता था और उछलकर आकाशको भी लाँघ जाता था ॥ १० ॥
अतिप्रवृद्धो मत्तश्च दुष्टोऽश्वो वनगोचरः ।
आकम्पितसटो रौद्रः कंसस्य चरितानुगः ॥ ११ ॥
वह वनमें विचरनेवाला दुष्ट अश्व बहुत बड़ा और मतवाला था। उसके अयाल कुछ हिलते रहते थे। वह, भयंकर दैत्य कंसके चरित्रका अनुसरण करनेवाला था ॥ ११ ॥
ईरिणं तद् वनं सर्वं तेनासीत् पापकर्मणा ।
कृतं तुरगदैत्येन सर्वान् गोपाञ्जिघांसता ॥ १२ ॥
समस्त गोपोंको मार डालनेकी इच्छावाले उस पापाचारी अश्वरूपधारी दैत्यने वह सारा वन मनुष्योंसे सूना कर दिया था ॥ १२ ॥
तेन दुष्टप्रचारेण दूषितं तद् वनं महत् ।
न नृभिर्गोधनैर्वापि सेव्यते वनवृत्तिभिः ॥ १३ ॥
उस दुराचारीने वह विशाल वन दूषित कर डाला था। वनसे ही जीवन निर्वाह करनेवाले मनुष्य और गोधन भी कभी उस वनका सेवन नहीं करते थे ॥ १३ ॥
निःसम्पातः कृतः पन्थास्तेन तद्विषयाश्रयः ।
मदात्स्खलितवृत्तेन नृमांसान्यश्नता भृशम् ॥ १४ ॥
मदके कारण वह सदाचारसे भ्रष्ट हो चुका था और अधिकतर मनुष्योंके ही मांस खाता था। उसके निवास-स्थानमें होकर जो रास्ता जाता था, उसे उसने अगम्य बना दिया था। १४।
नृशब्दानुसरः क्रुद्धः स कदाचिद् वनागमे ।
जगाम घोषसंवासं चोदितः कालधर्मणा ॥ १५ ॥
म० ह० १०
| २९० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
एक समय मनुष्योंके शब्दका अनुसरण करता हुआ केशी क्रोधमें भरकर वृन्दावनके भीतर गोपोंकी बस्तीमे गया, उस समय उसपर काल सवार था ॥ १५ ॥
तं दृष्ट्वा दुद्रुवुर्गोपाः स्त्रियश्च शिशुभिः सह ।
क्रन्दमाना जगन्नाथं कृष्णं नाथमुपाश्रिताः ॥ १६ ॥
उसे देखते ही गोप और गोपाङ्गनाएँ शिशुओंको साथ लेकर भागीं तथा करुण क्रन्दन करती हुई जगत्के रक्षक, अपने स्वामी श्रीकृष्णकी शरणमें आ पहुँचीं ॥ १६ ॥
तासां रुदितशब्देन गोपानां क्रन्दितेन च ।
दत्त्वाभयं तु कृष्णो वै केशिनं सोऽभ्यदुद्रुवे ॥ १७ ॥
गोपाङ्गनाओंके रोदन और गोपोंके क्रन्दनसे द्रवित होकर श्रीकृष्णने उन्हें अभय कर दिया। फिर वे केशीपर टूट पड़े ॥१७॥
केशी चाप्युन्नतग्रीवः प्रकाशदशनेक्षणः ।
ह्रेषमाणो जवोदग्रो गोविन्दाभिमुखो ययौ ॥ १८ ॥
केशी भी अपनी गर्दन ऊपर उठाये हींसता हुआ बड़े वेगसे श्रीकृष्णकी ओर चला । उस समय वह दाँत दिखाता हुआ आँखें फाड़-फाड़कर उनकी ओर देख रहा था ॥१८॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य केशिनं हयदानवम् ।
प्रत्युज्जगाम गोविन्दस्तोयदः शशिनं यथा ॥ १९ ॥
उस अश्वरूपधारी दानव केशीको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्ण उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े, मानो श्याम मेघ चन्द्रमाकी ओर जा रहा हो ॥ १९ ॥
केशिनस्तु तमभ्याशे दृष्ट्वा कृष्णमवस्थितम् ।
मनुष्यबुद्धयो गोपाः कृष्णमूचुर्हितैषिणः ॥ २० ॥
श्रीकृष्णको केशीके निकट खड़ा हुआ देख उनके प्रति मनुष्य-बुद्धि रखनेवाले हितैषी गोप उनसे इस प्रकार बोले-।२०।
कृष्ण तात न खल्वेष सहसा ते हयाधमः ।
उपसर्प्यो भवान् बालः पापश्चैष दुरासदः ॥ २१ ॥
'तात श्रीकृष्ण ! तुम सहसा इस नीच अश्वके पास न चले जाना; क्योंकि तुम अभी बालक हो और यह पापात्मा एक दुर्धर्ष दैत्य है ॥ २१ ॥
एष कंसस्य सहजः प्राणस्तात बहिश्चरः ।
उत्तमश्च हयेन्द्राणां दानवोऽप्रतिमो युधि ॥ २२ ॥
'तात ! यह कंसका बाहर विचरनेवाला सहज प्राण है, बड़े-बड़े अश्वराजोंमें उत्तम है। युद्धमें इस दानवकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २२ ॥
त्रासनः सर्वभूतानां तुरगाणां महाबलः ।
अवध्यः सर्वभूतानां प्रथमः पापकर्मणाम् ॥ २३ ॥
'समस्त प्राणियोंको त्रास देनेवाला यह दैत्य घोड़ोंमें सबसे अधिक बलवान् है। सम्पूर्ण भूतोंमेंसे किसीके लिये भी यह वध्य नहीं है। पापाचारियोंमें यह सबसे अग्रगण्य है' ॥ २३ ॥
गोपानां तद् वचः श्रुत्वा वदतां मधुसूदनः ।
केशिना सह युद्धाय मतिं चक्रेऽरिसूदनः ॥ २४ ॥
उपर्युक्त बातें कहनेवाले गोपोंका वह कथन सुनकर शत्रुसूदन भगवान् मधुसूदनने केशीके साथ युद्धके लिये विचार किया ॥ २४॥
ततः सव्यं दक्षिणं च मण्डलं स परिभ्रमन् ।
पद्भ्यामुभाभ्यां स हयः क्रोधेनारुजते द्रुमान् ॥ २५ ॥
तदनन्तर वह अश्व दायें-बायें चक्कर काटता हुआ अपने दोनों पैरोंसे क्रोधपूर्वक वृक्षोंको तोड़ने लगा ॥ २५ ॥
मुखे लम्बसटे चास्य स्कन्धे केशघनावृते ।
वलयोऽभ्रतरङ्गाभाः सुस्रुवुः क्रोधजं जलम् ॥ २६ ॥
उसके लंबे अयालवाले मुख और घने केशोंसे ढके हुए कंधेपर जो मेघोंकी लहरोंके समान वलियाँ (चमड़ोंके सिकुड़नेसे बनी हुई रेखाएँ) थीं, वे क्रोधजनित जल (पसीना) टपकाने लगीं ॥ २६ ॥
स फेनं वक्त्रजं चैव ववर्ष रजसावृतम् ।
हिमकाले यथा व्योम्नि नीहारमिव चन्द्रमाः ॥ २७ ॥
वह अपने मुखसे पैदा हुए धूलिमिश्रित फेनकी वर्षा करने लगा। मानो हेमन्त ऋतुमें चन्द्रमा आकाशमें कुहासा गिरा रहा हो ॥ २७ ॥
गोविन्दमरविन्दाक्षं हेषितोद्गारशीकरैः ।
स फेनैर्वक्त्रनिगीर्णैः प्रोक्षयामास भारत ॥ २८ ॥
भरतनन्दन ! उसने अपने हींसनेके साथ निकले हुए जलकणों तथा मुखसे गिरते हुए फेनोद्गारों द्वारा कमलनयन श्रीकृष्णको नहला दिया ॥ २८ ॥
खुरोद्धूतावतंसिकेन मधुकक्षोदपाण्डुना ।
रजसा स हयः कृष्णं चकारारुणमूर्धजम् ॥ २९ ॥
अपनी टापोंसे उठकर फैली हुई धूलसे, जो मुलेठीके चूर्णकी भाँति कुछ-कुछ पीले रंगकी थी, उस घोड़ेने श्रीकृष्ण-के मस्तकके बालोंको कुछ लाल-सा कर दिया ॥ २९ ॥
प्लुतवल्गितपादस्तु तक्षमाणो धरां खुरैः ।
दन्तान् निर्दशमानस्तु केशी कृष्णमुपाद्रवत् ॥ ३० ॥
केशीके पैर वहाँ उछल-कूद मचा रहे थे। वह अपनी टापोंसे पृथिवीको खोदता और दाँतोंको पीसता हुआ श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा ॥ ३० ॥
स संसक्तस्तु कृष्णेन केशी तुरगसत्तमः ।
पूर्वाभ्यां चरणाभ्यां वै कृष्णं वक्षस्यताडयत् ॥ ३१ ॥
अश्वोंमें श्रेष्ठ केशी श्रीकृष्णके साथ उलझ गया। उसने
विष्णुपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः २९१
अपने दोनों आगेवाले पैरोंसे उनकी छातीमें प्रहार किया ॥ ३१ ॥
पुनः पुनः स च बली प्राहिणोत् पार्श्वतः खुरान् ।
कृष्णस्य दानवो घोरं प्रहारममितौजसः ॥ ३२ ॥
उस बलवान् दानवने अगल-बगलसे भी बारंबार अपनी टाप चलायी और अमित तेजस्वी श्रीकृष्णपर घोर प्रहार किया ॥ ३२ ॥
वक्त्रेण चास्य घोरेण तीक्ष्णदंष्ट्रायुधेन वै।
अदशद् बाहुशिखरं कृष्णस्य रुषितो हयः ॥ ३३ ॥
तीखी दाढ़ ही जिसका आयुध थी, उस भयानक मुखके द्वारा रोषमें भरे हुए उस घोड़ेने श्रीकृष्णकी भुजाके अग्रभागको दाँत गड़ाकर घायल कर दिया ॥ ३३ ॥
स लम्बकेसरसटः कृष्णेन सह सङ्गतः ।
रराज केशी मेघेने संसक्तः ख इवांशुमान् ॥ ३४ ॥
लंबे-लंबे अयालसे सुशोभित केशी श्रीकृष्णके साथ जूझता हुआ उसी तरह शोभा पाने लगा, जैसे आकाशमें अंशुमाली सूर्य मेघके साथ उलझ गये हों ॥ ३४ ॥
उरस्तस्योरसा हन्तुमियेप बलवान् हयः ।
वेगेन वासुदेवस्य क्रोधाद् द्विगुणविक्रमः ॥ ३५ ॥
उस बलवान् घोड़ेका पराक्रम उसके क्रोधके कारण दूना बढ़ गया था। उसने श्रीकृष्णकी छातीपर अपनी छातीसे वेगपूर्वक चोट पहुँचानेका विचार किया ॥ ३५ ॥
तस्योत्सिक्तस्य बलवान् कृष्णोऽप्यमितविक्रमः ।
बाहुमाभोगिनं कृत्वा मुखे क्रुद्धः समादधत् ॥ ३६ ॥
तब अमित पराक्रमी बलवान् श्रीकृष्णने भी कुपित होकर उस घमंडी दैत्यके मुखमें अपनी एक बाँहको बहुत बड़ी करके डाल दिया ॥ ३६ ॥
स तं बाहुमशको वै खादितुं भेत्तुमेव च ।
दशनैर्मूलनिर्मुक्तैः सफेनं रुधिरं वमन् ॥ ३७ ॥
वह उनकी उस बाँहको अपने दाँतोंसे चबाने या विदीर्ण करनेमें समर्थ न हो सका, उलटे उसके दाँत ही जड़से उखड़ गये; साथ ही वह मुखसे फेनसहित रक्त वमन करने लगा ॥
विपाटिताभ्यामोष्ठाभ्यां कटाभ्यां विदलीकृतः ।
अक्षिणी विवृते चक्रे विसृते मुक्तबन्धने ॥ ३८ ॥
उसके ओठ और गलफर फटकर दो दलोंमें विभक्त हो गये । स्नायुबन्धनके ढीले हो जानेसे केशीकी आँखें फटकर बाहर निकल आयीं ॥ ३८ ॥
निरस्तहनुराविष्टः शोणिताक्तविलोचनः ।
उत्कर्णो नष्टचेतास्तु स केशी बह्वचेष्टत ॥ ३९ ॥
उसके होठोंका निचला भाग फटकर निकल गया । उस बाँहसे आविष्ट होनेके कारण उसके फटे हुए दोनों नेत्रोंसे रक्त बहने लगा । उसके कान भी उखड़कर गिर पड़े तथा चेतना नष्ट हो गयी । उस अवस्थामें केशी बारंबार छटपटाने लगा ॥
उत्पतन्नसकृत्पादैः शकृन्मूत्रं समुत्सृजन् ।
खिन्नाङ्गरोमा श्रान्तस्तु निर्यलचरणोऽभवत् ॥ ४० ॥
वह बार-बार पैरोंको उछालने और मल-मूत्र छोड़ने लगा । उसका एक-एक अङ्ग और रोम-रोम खिन्न हो उठा था। अन्तमें वह थक गया और उसके पैर निश्चेष्ट हो गये ॥ ४० ॥
केशिवक्त्रविलग्नस्तु कृष्णबाहुरशोभत ।
व्याभुग्न इव घर्मान्ते चन्द्रार्धकिरणैर्धनः ॥ ४१ ॥
केशीके मुखमें लगी हुई श्रीकृष्णकी वह बाँह उसके मुखमण्डलसे आधी आवेष्टित-सी होकर वर्षाकालमें आधे चन्द्रमाकी किरणोंसे घिरे हुए बादलके समान शोभा पाती थी ॥ ४१ ॥
केशी च कृष्णसंसक्तः शान्तगात्रो व्यरोचत ।
प्रभातावनतश्चन्द्रः श्रान्तो मेरुमिवाश्रितः ॥ ४२ ॥
श्रीकृष्णसे सटे हुए केशीका शरीर शान्त हो गया था । उस समय वह उसी तरह शोभा पा रहा था, जैसे प्रभात-कालमें अस्ताचलके शिखरपर पहुँचा हुआ चन्द्रमा थककर मेरुका आश्रय लेनेपर सुशोभित होता है ॥ ४२ ॥
तस्य कृष्णभुजोद्धूताः केशिनो दशना मुखात् ।
पेतुः शरदि निस्तोयाः सिताभ्रावयवा इव ॥ ४३ ॥
श्रीकृष्णकी भुजासे टकराकर केशीके सारे दाँत मुखसे बाहर गिर पड़े । वे ऐसे प्रतीत होते थे, मानो शरद्ऋतुके जलशून्य श्वेत बादलोंके टुकड़े बिखरे हुए हों ॥ ४३ ॥
स तु केशी भृशं शान्तः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
स्वभुजं स्वायतं कृत्वा पाटितो वलवत् तदा ॥ ४४ ॥
जब केशी भलीभाँति शान्त हो गया, तब अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने अपनी बाँहको बहुत बड़ी करके उस दैत्यके शरीरको बलपूर्वक बीचसे चीर डाला ॥ ४४ ॥
स पाटितो भुजेनाजौ कृष्णेन विकृताननः ।
केशी नदन्महानादं दानवो व्यथितस्तदा ॥ ४५ ॥
उस युद्धस्थलमें श्रीकृष्णकी भुजाद्वारा फाड़े गये केशीका मुख विकराल हो उठा । वह दानव व्यथित होकर बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा ॥ ४५ ॥
विघूर्णमानस्त्रस्ताङ्गो मुखाद् रुधिरमुद्वमन् ।
भृशं व्यङ्गीकृतवपुर्निकृत्तार्ध इवाचलः ॥ ४६ ॥
उसके सारे अङ्ग शिथिल हो गये थे । वह चक्कर काटता हुआ मुँहसे खून उगल रहा था । उसका शरीर कई अङ्गोंसे हीन हो चुका था । वह ऐसा दिखायी देता था, मानो किसी पर्वतको बीचसे चीर डाला गया हो ॥ ४६ ॥
| २९२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
व्यादितास्यो महारौद्रः सोऽसुरः कृष्णबाहुना ।
निपपात यथा कृत्तो नागो हि द्विद्लीकृतः ॥ ४७ ॥
श्रीकृष्णकी भुजासे जिसका मुँह फट गया था, वह दो भागोंमें बँटा हुआ महाभयंकर असुर दो टुकड़ोंमें कटे हुए हाथीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४७ ॥
बाहुना कृत्तदेहस्य केशिनो रूपमाबभौ ।
पशोरिव महाघोरं निहतस्य पिनाकिना ॥ ४८ ॥
श्रीकृष्णकी भुजासे कटे हुए शरीरवाले केशीका रूप पिनाकपाणि भगवान् रुद्रद्वारा मारे गये पशु (महिषासुर) के समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था ॥ ४८ ॥
द्विपादपृष्ठपुच्छार्द्धं श्रवणैकाक्षिनासिके ।
केशिनस्तद्विधाभूते द्वे चार्धे रेजतुः क्षितौ ॥ ४९ ॥
केशीके शरीरके वे दोनों खण्ड दो पाँव, आधी पीठ, आधी पूँछ तथा एक-एक कान, आँख और नासिकारन्ध्रसे युक्त हो पृथ्वीपर पड़े-पड़े (अनुपम) शोभा पा रहे थे॥४९॥
केशिदन्तक्षतस्यापि कृष्णस्य शुशुभे भुजः ।
वृद्धः साल इवारण्ये गजेन्द्रदशनाङ्कितः ॥ ५० ॥
केशीके दाँतोंसे घायल हुई श्रीकृष्णकी वह बाँह ऐसी सुशोभित हो रही थी, मानो वनमें गजराजके दाँतोंके आघात-चिह्नसे अङ्कित कोई बहुत बड़ा शालका वृक्ष हो ॥ ५० ॥
तं हत्वा केशिनं युद्धे कल्पयित्वा च भागशः ।
कृष्णः पद्मपलाशाक्षो हसंस्तत्रैव तस्थिवान् ॥ ५१ ॥
इस प्रकार युद्धमें केशीको मारकर उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े करके कमलनयन श्रीकृष्ण वहीं हँसते हुए खड़े रहे॥
तं हतं केशिनं दृष्ट्वा गोपा गोपस्त्रियस्तथा ।
बभूवुर्मुदिताः सर्वे हतविघ्ना गतक्लमाः ॥ ५२ ॥
उस केशीको मारा गया देख गोप और गोपाङ्गनाएँ बहुत प्रसन्न हुईं। सबके विघ्न नष्ट हो गये, कष्ट दूर हो गये॥५२॥
दामोदरं तु श्रीमन्तं यथास्थानं यथावयः ।
अभ्यनन्दन् प्रियैर्वाक्यैः पूजयन्तः पुनः पुनः ॥ ५३ ॥
स्थान और अवस्थाके अनुसार सभी गोप बारंबार श्रीमान् दामोदरका पूजन करते हुए प्रिय वचनोंद्वारा उनका अभिनन्दन करने लगे ॥ ५३ ॥
गोपा ऊचुः
अहो तात कृतं कर्म हतोऽयं लोककण्टकः ।
दैत्यः क्षितिचरः कृष्ण हयरूपं समास्थितः ॥ ५४ ॥
गोप बोले—तात ! तुमने अद्भुत कर्म किया है। यह समस्त जगत्के लिये कंटकरूप दैत्य आज तुम्हारे हाथसे मारा गया । श्रीकृष्ण ! यह इस भूतलपर घोड़ेका रूप धारण करके बिचरता था ॥ ५४ ॥
कृतं वृन्दावनं क्षेमं सेव्यं नृमृगपक्षिणाम् ।
हता पापमिमं तात केशिनं हयदानवम् ॥ ५५ ॥
तात ! इस अश्वरूपधारी पापी दानव केशीका वध करके तुमने वृन्दावनको मनुष्यों तथा पशु-पक्षियोंके लिये सेव्य और क्षेमकारक बना दिया ॥ ५५ ॥
हता नो बहवो गोपा गावो वत्सेषु वत्सलाः ।
नैके चान्ये जनपदा हतानेन दुरात्मना ॥ ५६ ॥
इस दुरात्माने हमारे बहुत-से गोप मार डाले थे। बछड़ों-पर वात्सल्य रखनेवाली बहुत-सी गौओंका भी वध कर डाला था; इसके सिवा और भी कितने ही जनपद इसके हाथों नष्ट हो चुके थे ॥ ५६ ॥
एष संवर्तकं कर्तुमुद्यतः खलु पापकृत् ।
नृलोकं निर्नरं कृत्वा चर्तुकामो यथासुखम् ॥ ५७ ॥
यह पापाचारी दानव निश्चय ही संसारका प्रलय करनेके लिये उद्यत हुआ था। मनुष्य-लोकको मनुष्योंसे सूना करके यहाँ सुखपूर्वक विचरनेकी इच्छा रखता था ॥ ५७ ॥
नैतस्य प्रमुवे स्थातुं कश्चिच्छक्तो जिजीविषुः ।
अपि देवसमूहेषु किं पुनः पृथिवीतले ॥ ५८ ॥
जीवित रहनेकी इच्छावाला कोई भी पुरुष इसके सामने खड़ा नहीं हो सकता था। देवताओंके समूहमेंसे भी कोई इसका सामना नहीं कर सकता था, फिर भूतल-निवासियोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ५८ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथाहान्तर्हितो विप्रो नारदः खगमो मुनिः ।
प्रीतोऽस्मि विष्णो देवेश कृष्ण कृष्णेति चाब्रवीत् ५९
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर आकाशचारी मुनि विप्रवर नारदजी आकाशमें अदृश्य भावसे खड़े हो बोले--'देवेश्वर विष्णो ! कृष्ण ! कृष्ण !! मैं आप-पर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ५९ ॥
नारद उवाच
यदिदं दुष्करं कर्म कृतं केशिजिघांसया ।
त्वय्येव केवलं युक्तं त्रिदिवे त्र्यम्बकस्य वा ॥ ६० ॥
नारदजी फिर बोले—प्रभो ! आपने केशीको मार डालनेकी इच्छासे जो यह दुष्कर कर्म किया है, यह केवल आपके ही योग्य था अथवा देवलोकमें केवल त्रिनेत्रधारी रुद्र ही ऐसा पराक्रम कर सकते थे ॥ ६० ॥
अहं युद्धोत्सुकस्तात त्वद्गतेनान्तरात्मना ।
इदं नरहयं युद्धं द्रष्टुं स्वर्गादिहागतः ॥ ६१ ॥
तात ! मैं युद्ध देखनेको सदा ही उत्सुक रहता हूँ। अतः अपनी अन्तरात्मासे आपका ही चिन्तन करता हुआ यह
विष्णुपर्व ]
चतुर्विंशोऽध्यायः
२९३
मनुष्य और अश्वका संग्राम देखनेके लिये स्वर्गलोकसे यहाँ आया था॥ ६१ ॥
पूतनानिधनादीनि कर्माणि तव दृष्टवान्।
अहं त्वनेन गोविन्द कर्मणा परितोषितः ॥ ६२ ॥
गोविन्द ! आपके 'पूतनावध' आदि कर्मोंको भी मैं देख चुका हूँ। किंतु इस केशीके वधरूप कर्मसे मुझे विशेष संतोष हुआ है ॥ ६२ ॥
हयादस्मान्महेन्द्रोऽपि बिभेति बलसूदनः।
कुर्वाणाच्च वपुर्घोरं केशिनो दुष्टचेतसः ॥ ६३ ॥
भयानक रूप धारण करनेवाले इस दुरात्मा अश्व केशीसे बलसूदन देवराज इन्द्र भी डरते थे ॥ ६३ ॥
यत्त्वया पाटितो देहो भुजेनायतपर्वणा।
एषोऽस्य मृत्युरन्ताय विहितो विश्वयोनिना ॥ ६४ ॥
आपने अपनी बाँहके एक भागको बड़ा करके उसके द्वारा जो इसके शरीरको फाड़ डाला है, विश्वयोनि ब्रह्माजीने इसकी मृत्युके लिये ऐसा ही विधान बनाया था ॥ ६४ ॥
यस्मात् त्वया हतः केशी तस्मान्मच्छासनं शृणु।
केशवो नाम नाम्ना त्वं ख्यातो लोके भविष्यसि ॥ ६५ ॥
अब आप मेरा यह अनुशासन सुनें—आपने केशीका वध किया है, इसलिये संसारमें 'केशव' नामसे विख्यात होंगे।
स्वस्त्यस्तु भवतो लोके साधु याम्यहमाशुगः।
कृत्यशेषं च ते कार्यं शक्तस्त्वमसि मा चिरम् ॥ ६६ ॥
जगत्में आपका (या आपसे जगत्का) कल्याण हो। आपको साधुवाद देकर मैं शीघ्र चला जाता हूँ। अब जो (कंस-वध आदि) कृत्य शेष रह गये हैं, उन्हें आपको पूर्ण करना है। आप इसमें समर्थ हैं, अतः शीघ्र कर डालें; विलम्ब न होने दें ॥ ६६ ॥
त्वयि कार्यान्तरगते नरा इव दिवौकसः।
विडम्बयन्तः क्रीडन्ति लीलां त्वद्बलमाश्रिताः ॥ ६७ ॥
जब आप भूभार-हरण आदि अन्य कार्योंके लिये यहाँ (अवतार लेनेके लिये) चले आते हैं, तब आपके ही बलका आश्रय लेनेवाले देवता भी मनुष्योंकी भाँति आपकी लीलाका अनुकरण (अभिनय) करते हुए (नाटक आदि) खेलते हैं।६७।
अभ्याशे वर्तते कालो भारतस्याहवोदधेः।
हस्तप्राप्तानि युद्धानि राज्ञां त्रिदिवगामिनाम् ॥ ६८ ॥
समुद्रतुल्य महाभारतयुद्धका समय अब बहुत निकट है। मरकर स्वर्गमें जानेवाले राजाओंके लिये युद्धके अवसर हाथमें आ गये हैं ॥ ६८ ॥
पन्थानः शोधिता व्योम्नि विमानाना रोहोर्ध्वगाः।
अवकाशा विभज्यन्ते शक्रलोके महीक्षिताम् ॥ ६९ ॥
विमानोंके आरोहणके लिये आकाशमें जो ऊर्ध्वगामी मार्ग हैं, उनका शोधन कर दिया गया है (रुकावटें दूर कर दी गयी हैं)। इन्द्रलोकमें आनेवाले राजाओंके लिये पृथक्-पृथक् अवकाश (निवास-स्थान) बनाये जाते हैं ॥ ६९ ॥
उग्रसेनसुते शान्ते पदस्थे त्वयि केशव।
अभितस्तन्महद् युद्धं भविष्यति महीक्षिताम् ॥ ७० ॥
केशव ! उग्रसेनकुमार कंसके मारे जानेपर जब आप यादवोंके संरक्षणके रूपमें मुख्य पदपर प्रतिष्ठित होंगे; तब सब ओर राजाओंका वह महान् युद्ध आरम्भ हो जायगा ॥७०।
त्वां चाप्रतिमकर्माणं संश्रयिष्यन्ति पाण्डवाः।
भेदकाले नरेन्द्राणां पक्षग्राहो भविष्यसि ॥ ७१ ॥
आपके कर्म (या पराक्रम) की कहीं तुलना नहीं है, अतः पाण्डवलोग आपकी ही शरण लेंगे। राजाओंमें भेदके अवसरपर जब युद्ध उपस्थित होगा, उस समय आप पाण्डवोंका ही पक्ष लेंगे ॥ ७१ ॥
त्वयि राजासनस्थे हि राजश्रियमनुत्तमाम्।
शुभां त्यक्ष्यन्ति राजानस्त्वत्प्रभावात्र संशयः ॥ ७२ ॥
जब आप राजासनपर बैठेंगे, तब आपके प्रभावसे राजा लोग अपनी उत्तम एवं शुभ राज्यलक्ष्मीको त्याग देंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ७२ ॥
एष मे कृष्ण संदेशः श्रुतिभिः ख्यातिमेष्यति।
देवतानां दिविस्थानां जगतश्च जगत्पते ॥ ७३ ॥
जगदीश्वर श्रीकृष्ण ! यह मेरा तथा स्वर्गवासी देवताओंका संदेश है, जो श्रुतियोंद्वारा गूढ़ रूपसे प्रतिपादित है।* अब यह जगत्में भी विख्यात हो जायगा ॥ ७३ ॥
दृष्टं मे भवतः कर्म दृष्टश्वासि मया प्रभो।
कंसं भूयः समेष्यामि साधिते साधु याम्यहम् ॥ ७४ ॥
* उन संदेशप्रतिपादक श्रुतियोंमेंसे एक श्रुति, जो महाभारतयुद्धपर प्रकाश डालती है, इस प्रकार है—"अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च विवर्तेते रजसी वेद्याभिः। वैश्वानरो जायमानो न राजावातिरज्ज्योतिषाग्निस्तमांसि" अर्थात् एक युद्धयज्ञका सम्बन्ध श्रीकृष्णसे है और दूसरे युद्धयज्ञका अर्जुनसे। उन दोनोंने एक साथ होकर जब कार्य किया, तब उनके द्वारा दो युद्ध-यज्ञ सम्पादित हुए। वे दोनों युद्धयज्ञ रजोगुणी थे; क्योंकि प्राप्य पैतृक सम्पत्तिको निमित्त बनाकर किये गये थे। वैश्वानर अर्थात् धर्म संसारमें जन्म ग्रहण करके (श्रीकृष्ण और अर्जुनकी सहायतासे) निश्चय ही राजा हुआ। उसने प्रकाशमान अग्निकी सहायतासे असुरोंका अन्धकार तिरोहित कर दिया था (अर्थात् धर्मराजने खाण्डव-दाहके समय अग्निके दिये हुए चक्र और गाण्डीवकी सहायतासे श्रीकृष्ण और अर्जुनके पराक्रमद्वारा असुरोंका विध्वंस कराया। (नीलकण्ठीसे)
| २९४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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प्रभो ! मैंने आपका पराक्रम देखा, आपका भी दर्शन किया। साधुवाद ! अब मैं जाता हूँ, कंसके मारे जानेपर मैं फिर आपसे मिलूँगा ॥ ७४ ॥
एवमुक्त्वा तु स तदा नारदः खं जगाम ह ।
नारदस्य वचः श्रुत्वा देवसंगीतयोनिनः ॥ ७५ ॥
तथेति स समाभाष्य पुनर्गोपान् समासद्त् ।
गोपाः कृष्णं समासाद्य विविशुर्व्रजमेव ह ॥ ७६ ॥
ऐसा कहकर नारदजी तत्काल आकाशमें चले गये। देवसङ्गीतके उत्पत्तिके स्थान नारदजीका पूर्वोक्त वचन सुनकर श्रीकृष्णने 'तथास्तु' कहकर उनकी बात मान ली, फिर वे गोपोंसे मिले। गोपगण श्रीकृष्णसे मिलकर उनके साथ ही पुनः ब्रजमें प्रविष्ट हुए ॥ ७५-७६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि केशिवधे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें केशीका वधविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
पञ्चविंशोऽध्यायः
अक्रूरका ब्रजमें आकर भगवान् श्रीकृष्णको देखना और उनके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचना
वैशम्पायन उवाच
अथास्तं गच्छति तदा मन्दरश्मौ दिवाकरे ।
संध्यारक्ततले व्योम्नि शशाङ्के पाण्डुमण्डले ॥ १ ॥
नीडस्थेषु विहङ्गेषु सत्सु प्रादुष्कृताग्निषु ।
ईषत्तमःसंवृतासु दिक्षु सर्वासु सर्वशः ॥ २ ॥
घोषवासिषु सुप्तेषु वाशन्तीषु शिवासु च ।
नक्तंचरेषु हृष्टेषु पिशिताशनकाङ्क्षिषु ॥ ३ ॥
शक्रगोपाह्वयामोदे प्रदोषेऽभ्यासत्तस्करे ।
संध्यामयीमिव गुहां सम्प्रतिष्ठे दिवाकरे ॥ ४ ॥
अधिश्रयणवेलायां प्राप्तायां गृहमेधिनाम् ।
वन्यैर्वैखानसैर्मन्त्रैर्हूयमाने हुताशने ॥ ५ ॥
उपावृत्तासु वै गोषु दुह्यमानासु च व्रजे ।
असकृद्व्याहरन्तीषु बद्धवत्सासु धेनुषु ॥ ६ ॥
प्रकीर्णदामनीकेषु गास्तथैवाह्वयत्सु च ।
सनिनादेषु गोषेषु काल्यमाने च गोधने ॥ ७ ॥
करीषेषु प्रक्लप्तेषु दीप्यमानेषु सर्वशः ।
काष्ठभारानतस्कन्धैर्गोपैरभ्यागतैस्तथा ॥ ८ ॥
किंचिदभ्युद्गते सोमे मन्दरश्मौ विराजति ।
ईषद्विगाहमानायां रजन्यां दिवसे गते ॥ ९ ॥
प्राप्ते दिनव्युपरमे प्रवृत्ते क्षणदामुखे ।
भास्करे तेजसि गते सौम्ये तेजस्युपस्थिते ॥ १० ॥
अग्निहोत्राकुले काले सौम्येन्दौ समुपस्थिते ।
अग्नीषोमात्मके संधौ वर्तमाने जगन्मये ॥ ११ ॥
पश्चिमेनाग्निदीप्तेन पूर्वेणोत्पलवर्चसा ।
दग्धाद्रिसदृशे व्योम्नि किंचित्तारागणाकुले ॥ १२ ॥
वयोभिर्वासमुपगतैर्बन्धुभिश्च समागमम् ।
शंसद्भिः स्यन्दनेनाशु प्राप्तो दानपतिर्व्रजम् ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस दिन जब सूर्यदेव अस्ताचलको जाने लगे, उनकी किरणें मन्द हो गयीं, पश्चिमके आकाशमें संध्याकी लाली छा गयी, चन्द्रमाका श्वेत-पीत मण्डल उदित होने लगा, पक्षी अपने नीडों (घोसलों) में विश्राम करने लगे, श्रेष्ठ याज्ञिकोंने जब अग्नि प्रज्वलित कर दी, सम्पूर्ण दिशाएँ सब ओरसे जब कुछ-कुछ अन्धकारसे आवृत हो गयीं, व्रजवासी सोनेकी तैयारी करने लगे, गीदड़ियाँ बोलने लगीं, मांसाहारकी अभिलाषा रखनेवाले निशाचर हर्षमें भर गये, धूपसे तपे हुए इन्द्रगोप नामक कीड़ोंको आनन्द देनेवाला और वेदोंके स्वाध्यायको बंद करनेवाला प्रदोषकाल जब आ पहुँचा, जब सूर्यदेव संधारूपिणी गुफामें प्रविष्ट हो गये, जब गृहस्थोंके लिये हवनीय घृत या दुग्धको आगपर रखनेकी वेला आ पहुँची, वनवासी वैखानस (वानप्रस्थ) जब मन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुति देने लगे, जब गौएँ वनसे लौटकर ब्रजमें आ गयीं और उनका दूध दुह लिया गया, जिनके बछड़े बँधे थे और जो स्वयं भी लंबी रस्सियोंमें आबद्ध थीं, वे धेनुएँ जब बार-बार रँभाने लगीं, गौओंको बुलाते हुए गोपगण जब सब ओर कोलाहल करने लगे, जब बाँधनेके लिये गौओंको हाँककर ले जाया जाने लगा; काष्ठके भारसे झुके हुए कंधोंवाले गोप जब घर आकर सब ओर फैले हुए सूखे गोबरके चूरोंको सुलगाने या प्रज्वलित करने लगे, किंचित् उदित हुए चन्द्रदेव जब अपनी मन्द किरणोंसे ही प्रकाशित हो रहे थे, दिन चले जानेपर थोड़ी-सी ही रातका आगमन हुआ था, दिनकी पूर्ण समाप्ति होकर रात्रिके प्रथम प्रहरका अभी आरम्भ ही हुआ था, सूर्यका उष्ण प्रकाश अस्त होकर चन्द्रमाका शीतल प्रकाश उपस्थित हुआ था, जिस समय अग्निहोत्रकी सुगन्धि सब ओर व्याप्त हो रही थी, स्वभावतः सौम्य चन्द्रदेव उदित हुए, जब सम्पूर्ण जगत्में अग्नीषोमात्मक संधिका समय वर्तमान था, जब पश्चिममें अग्निके समान संध्याकालका अरुण प्रकाश फैला था तथा पूर्वमें भी लाल कमलके समान कान्तिवाले चन्द्रमाकी कुङ्कुम-
[विष्णुपर्व.] पञ्चविंशोऽध्यायः २९५
जैसी प्रभा फैली हुई थी और उन दोनों दिशाओंके अरुण प्रकाशसे जब आकाश उभयपार्श्वसे दग्ध हुए पर्वतके समान प्रतीत हो रहा था और उसमें कुछ-कुछ तारे प्रकट हो गये थे, ऐसे समयमें घर लौटनेकी इच्छावाले पथिकोंको बन्धुओंसे समागम होनेकी सूचना-सी देनेवाले पक्षियोंके साथ-साथ दानपति अक्रूर अपने रथके द्वारा शीघ्र ही ब्रजमें आ पहुँचे ॥ १-१३ ॥
प्रविशन्नेव पप्रच्छ सांनिध्यं केशवस्य सः।
रौहिणेयस्य चाक्रूरो नन्दगोपस्य चासकृत् ॥ १४ ॥
ब्रजमें प्रवेश करते ही अक्रूर वहाँके लोगोंसे बारंवार श्रीकृष्ण, रोहिणीनन्दन बलराम तथा नन्दगोपका निवास-स्थान पूछने लगे ॥ १४ ॥
स नन्दगोपस्य गृहं वासाय विबुधोपमः।
अवतीर्य ततो यानात् प्रविवेश महाबलः ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् देवोपम कान्तिसे युक्त महाबली अक्रूर उस रथसे उतरकर निवासके लिये नन्दगोपके घरमें प्रविष्ट हुए ॥ १५ ॥
हर्षपूर्णेन वक्त्रेण साश्रुनेत्रेण चैव हि।
प्रविशन्नेव च द्वारि ददर्शादोहने गवाम् ॥ १६ ॥
वत्समध्ये स्थितं कृष्णं सवत्समिव गोवृषम्।
उस समय उनके मुखपर पूर्ण हर्ष छा रहा था, नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बह रहे थे, नन्दके द्वारपर पदार्पण करते ही उन्होंने देखा, गौओंके दुहनेके स्थानमें श्रीकृष्ण बहुत-से बछड़ोंके बीचमें खड़े हैं। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो बछड़ों-सहित साँड़ खड़ा हो ॥ १६३ ॥
स तं हर्षपरीतेन वचसा गद्गदेन वै ॥ १७ ॥
एहि केशव तातेति प्रव्याहरत धर्मवित्।
उन्हें देखते ही धर्मज्ञ अक्रूर हर्षभरी गद्गद वाणीद्वारा बोले—‘तात केशव ! यहाँ आओ !’ ॥ १७३ ॥
उत्तानशायिनं दृष्ट्वा पुनर्हृष्ट्वा श्रिया वृतम् ॥ १८ ॥
अव्यक्तयौवनं कृष्णमक्रूरः प्रशशंस ह।
(कुछ ही वर्ष पहले) जिन्हें शैशवावस्थामें उत्तान सोते देखा-सुना था, उन्हीं श्रीकृष्णको पुनः अनुपम शोभासे सम्पन्न अव्यक्त यौवन-अवस्थामें देखकर अक्रूर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ १८३ ॥
अयं स पुण्डरीकाक्षः सिंहशार्दूलविक्रमः।
सम्पूर्णजलमेघाभः पर्वतप्रवराकृतिः ॥ १९ ॥
ये ही वे सिंह और व्याघ्रके समान पराक्रमी कमलनयन श्रीकृष्ण दिखायी देते हैं, जिनकी अङ्गकान्ति जलसे भरे हुए जलधरकी भाँति श्याम है और शरीरकी ऊँचाई श्रेष्ठ पर्वतके समान प्रतीत होती है ॥ १९ ॥
मृधेष््वप्यधर्षणीयेन सश्रीवत्सेन वक्षसा।
द्विपन्निधनदक्षाभ्यां भुजाभ्यां साधु भूषितः ॥ २० ॥
इनका श्रीवत्सविभूषित वक्षःस्थल युद्धमें अजेय है और भुजाएँ शत्रुओंका संहार करनेमें कुशल हैं। इन भुजाओं तथा वक्षःस्थलसे इनके श्रीविग्रहकी बड़ी शोभा हो रही है ॥
मूर्तिमान् स रहस्यात्मा जगतोऽग्र्यस्य भाजनम्।
गोपवेषधरो विष्णुरुद्द्योतयन्नूरुहः ॥ २१ ॥
ये ही वे मूर्तिमान् रहस्यात्मा (उपनिषदोंमें प्रतिपादित पुरुषोत्तम) हैं, जो इस संसारकी अग्रपूजा पानेके प्रथम अधिकारी हैं। वे भगवान् विष्णु ही यहाँ गोप-वेश धारण करके प्रकट हुए हैं। इनकी रोमावलि ऊपरकी ओर उठी हुई और परम पवित्र है (अर्थात् यह प्रेमी भक्तोंको देखते ही रोमाञ्चित हो उठते हैं) ॥ २१ ॥
किरीटलाञ्छनेनापि शिरसा छत्रवर्चसा।
कुण्डलोत्तमयोग्याभ्यां श्रवणाभ्यां विभूषितः ॥ २२ ॥
जिसपर किरीट धारण करनेका चिह्न है तथा जहाँ छत्राकार कान्ति प्रकाशित हो रही है, उस मस्तकसे और उत्तम कुण्डल पहनने योग्य दोनों कानोंसे ये विभूषित हो रहे हैं ॥
हारार्हेण च पीनेन सुविस्तीर्णेन वक्षसा।
द्वाभ्यां भुजाभ्यां वृत्ताभ्यां दीर्घाभ्यामुपशोभितः ॥ २३ ॥
हार पहनने योग्य ऊँची और चौड़ी छातीसे तथा गोलाकार दो विशाल भुजाओंसे इनकी बड़ी शोभा हो रही है ॥
स्त्रीसहस्रोपचर्येण वपुषा मन्मथाधिना।
पीते वसानो वसने सोऽयं विष्णुः सनातनः ॥ २४ ॥
इनका श्रीविग्रह उस यौवन और पौगण्ड अवस्थाकी संधिमे पहुँचा हुआ है, जहाँ कामदेवको आश्रय मिलता है। यह विग्रह सहस्रों स्त्रियोंद्वारा परिचर्या प्राप्त करने योग्य है, ऐसे दिव्य शरीरपर दो पीत-वस्त्र धारण किये ये वे ही सनातन विष्णु यहाँ विराजमान हैं ॥ २४ ॥
धरण्याश्रयभूताभ्यां चरणाभ्यामरिंदमः।
त्रैलोक्याक्रान्तिभूताभ्यां भुवि पद्भ्यां व्यवस्थितः ॥ २५ ॥
जो पृथ्वीके आश्रयभूत हैं तथा तीनों लोकोंको आक्रान्त करनेमें समर्थ हैं, ऐसे संचरणशील युगल चरणोंसे यह शत्रुदमन श्रीकृष्ण इस भूमिपर खड़े हैं ॥ २५ ॥
रुचिराग्रकरश्चास्य चक्राङ्कित इवेक्ष्यते।
द्वितीय उद्यतश्चापि गदासंयोगमिच्छति ॥ २६ ॥
इनका एक हाथ, जिसका अग्रभाग बहुत ही सुन्दर है, चक्रसे चिह्नित-सा दिखायी देता है। दूसरा उठा हुआ हाथ गदासे संयुक्त होना चाहता है ॥ २६ ॥
अवतीर्णो भवायेह प्रथमं पदमात्मनः।
शोभतेऽद्य भुवि श्रेष्ठस्त्रिदशानां धुरंधरः ॥ २७ ॥