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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
२५६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तं तु कृष्णश्च गोपाश्च दिविस्थाश्च दिवौकसः ।
तुष्टुवुर्निहते दैत्ये जयाशीर्भिर्महाबलम् ॥ ५६ ॥
उस समय उस दैत्यके मारे जानेपर श्रीकृष्ण, गोपगण तथा आकाशमें खड़े हुए देवता विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाबली बलरामजीकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥

बलेनायं हतो दैत्यो बालेनाक्लिष्टकर्मणा ।
विवदन्त्यशरीरिण्यो वाचः सुरसमीरिताः ॥ ५७ ॥
'अनायास ही महान् कर्म करनेवाले इस बालकने ऐसे महान् दैत्यको बलपूर्वक मार गिराया' इस प्रकार देवताओंकी कही हुई आकाशवाणी बारंबार प्रकट होने लगी ॥ ५७ ॥

बलदेवेति नामास्य देवैरुक्तं दिवि स्थितैः ।
बलं तु बलदेवस्य तदा भुवि जना विदुः ॥ ५८ ॥
उस समय आकाशमें खड़े हुए देवताओंने उनका नाम बलदेव रख दिया। तभीसे भूतलके मनुष्य बलदेवजीके बलको जानने लगे ॥ ५८ ॥

कर्मजं निहते दैत्ये देवैरपि दुरासदे ॥ ५९ ॥
जो देवताओंके लिये भी दुर्जय था, उस प्रलम्ब नामक दैत्यके मारे जानेपर बलरामजीको उनके पराक्रमके अनुसार वह (बलदेव) नाम प्राप्त हुआ था ॥ ५९ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां प्रलम्बवधे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसङ्गमें प्रलम्भासुरका वधविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥


पञ्चदशोऽध्यायः

इन्द्रोत्सवके विषयमें श्रीकृष्णकी जिज्ञासा तथा एक वृद्ध गोपके द्वारा उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच
तयोः प्रवृत्तयोरेवं कृष्णस्य च बलस्य च ।
वने विचरतोर्मासौ व्यतियातौ स्म वार्षिकौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! श्रीकृष्ण और बलराम दोनोंके इस प्रकार बाललीलामें प्रवृत्त होकर वनमें विचरते हुए वर्षाके दो मास व्यतीत हो गये ॥ १ ॥

व्रजमाजग्मतुस्तौ तु व्रजे शुश्रुवतुस्तदा ।
प्राप्तं शक्रमहं वीरौ गोपांश्चोत्सवलालसान् ॥ २ ॥
एक दिन जब वे दोनों वीर ब्रजमें आये, तब उन्होंने सुना कि इन्द्रयागके उत्सवका समय आ गया है और समस्त गोप उस उत्सवको देखनेके लिये लालायित हैं ॥ २ ॥

कौतूहलादिदं वाक्यं कृष्णः प्रोवाच तत्र तान् ।
कोऽयं शक्रमहो नाम येन वो हर्ष आगतः ॥ ३ ॥
तब श्रीकृष्णने कौतूहलवश उनसे यह बात पूछी—'यह इन्द्रयागका उत्सव क्या है ? जिससे तुमलोगोंको इतना हर्ष हो रहा है, ॥ ३ ॥

तत्र वृद्धतमस्त्वेको गोपो वाक्यमुवाच ह ।
श्रूयतां तात शक्रस्य यदर्थं ध्वज इज्यते ॥ ४ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर उन गोपोंमें सबसे बड़े-बूढ़े एक गोपने इस प्रकार कहा—'तात ! सुनो ! हमारे यहाँ इन्द्रके ध्वजकी पूजा किसलिये की जाती है, यह बताता हूँ ॥ ४ ॥

देवानामीश्वरः शक्रो मेघानां चारिसूदन ।
तस्य चायं महः कृष्ण लोकनाथस्य शाश्वतः ॥ ५ ॥
'शत्रुसूदन कृष्ण ! देवताओं और मेघोंके स्वामी देवराज इन्द्र हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्के सनातन रक्षक हैं। उन्हींका यह उत्सव मनाया जाता है ॥ ५ ॥

तेन संचोदिता मेघास्तस्य चायुधभूषिताः ।
तस्यैवाज्ञाकराः सस्यं जनयन्ति नवाम्बुभिः ॥ ६ ॥
'उन्हींसे प्रेरित हो उन्हींके आयुध (इन्द्रधनुष) से विभूषित हुए मेघ उनकी ही आज्ञाका पालन करते हुए नूतन जलकी वर्षा करके खेतीको उपजाते हैं ॥ ६ ॥

मेघस्य पयसो दाता पुरुहूतः पुरंदरः ।
सम्प्रहृष्टः स भगवान् प्रीणयत्यखिलं जगत् ॥ ७ ॥
'अनेक नामोंसे विभूषित भगवान् पुरन्दर (इन्द्र) मेघ और जलके दाता हैं। वे प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण जगत्को तृप्त करते हैं ॥ ७ ॥

तेन सम्पादितं सस्यं वयमन्ये च मानवाः ।
वर्तयामोपयुञ्जानास्तर्पयामश्च देवताः ॥ ८ ॥
'उनके द्वारा सम्पन्न की हुई खेतीसे जो अन्न पैदा होता है, उसीको हम तथा दूसरे मनुष्य खाते हैं, उसीका धर्मके कार्यमें भी उपयोग करते हुए देवताओंको यज्ञ आदिके द्वारा तृप्त करते हैं ॥ ८ ॥

देवे वर्षति लोकेऽस्मिंस्ततः सस्यं प्रवर्धते ।
पृथिव्यां तर्पितायां तु सामृतं लक्ष्यते जगत् ॥ ९ ॥
'इस संसारमें जब इन्द्रदेव वर्षा करते हैं, तब उसीसे खेतीकी उपज बढ़ती है। वर्षासे ही पृथ्वीके तृप्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् सजल दिखायी देता है ॥ ९ ॥

विष्णुपर्व ]षोडशोऽध्यायः२५७

क्षीरवत्यस्विमा गावो वत्सवत्यश्च निर्वृताः ।
तेन संवर्धितास्तात तृणैः पुष्टाः सपुङ्गवाः ॥ १० ॥

'तात ! उस वर्षासे बढ़ी हुई घासोंद्वारा ही साँड़ोंसहित ये गौएँ हृष्ट-पुष्ट होकर बछड़े देतीं और दूध देनेवाली होती हैं ॥ १० ॥

नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुक्षाऽर्दितो जनः ।
दृश्यते यत्र दृश्यन्ते तृप्तिमन्तो वलाहकाः ॥ ११ ॥

'जहाँ वर्षा करनेवाले मेघ दिखायी देते हैं, उस भूमिपर कभी अनाज और तृणका अभाव नहीं होता तथा वहाँके लोग कभी भूखसे पीड़ित नहीं देखे जाते हैं ॥ ११ ॥

दुदोह सवितुर्गा वै शक्रो दिव्याः पयस्विनीः ।
ताः क्षरन्ति नवं क्षीरं मेध्यं मेघौघधारितम् ॥ १२ ॥

'सूर्यदेवकी दिव्य किरणें पृथ्वीका जल सोखकर पयस्विनी (गौ अथवा जलवती) हो जाती हैं, तब इन्द्रदेव उनका दोहन करते हैं। उनके दोहन करनेपर वे किरणमयी गौएँ नूतन एवं पवित्र जलरूपी दूध प्रकट करती हैं, जिसे मेघोंकी घटारूप दुग्धपात्रमें संचित किया जाता है ॥ १२ ॥

वाय्वीरितं तु मेघेषु करोति निनदं महत् ।
जवेनावर्तितं चैव गर्जतीति जना विदुः ॥ १३ ॥

'वही वायुसे प्रेरित होकर वेगसे आवर्तित होनेपर मेघोंके भीतर अत्यन्त गम्भीर शब्द उत्पन्न करता है, जिसे लोग समझते हैं कि मेघ गर्जना कर रहा है ॥ १३ ॥

तस्य चैवोह्यमानस्य वायुयुक्तैर्वलाहकैः ।
वज्राशनिसमाः शब्दाः श्रूयन्ते नगभेदिनः ॥ १४ ॥

'वायुयुक्त मेघोंद्वारा ढोयी जाती हुई उस जलराशिका पर्वतभेदी शब्द ही वज्र एवं बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देता है ॥ १४ ॥

तज्जलं वज्रनिष्पेषैर्विमुञ्चति नभोगतैः ।
बहुभिः कामगैर्मेघैः शक्रो भृत्यैरिवेश्वरः ॥ १५ ॥

'जैसे राजा अपने सेवकोंसे काम लेता है, उसी प्रकार देवराज इन्द्र आकाशमें फैले हुए तथा इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाले बहुसंख्यक मेघोंद्वारा वज्रकी गड़गड़ाहटकी आवाजके साथ उस जलको इस भूतलपर बरसाते हैं ॥ १५ ॥

कचिद् दुर्दिनसंकाशैः क्वचिच्छिन्नाभ्रसंनिभैः ।
क्वचिद् भिन्नाञ्जनाकारैः क्वचिच्छीकरवर्षिभिः ॥ १६ ॥
मण्डयतीव देवेन्द्रो विश्वमेवं नभो घनैः ।
क्वचिच्छीकरमुक्ताभं कुरुते गगनं घनः ॥ १७ ॥

'कहीं वे मेघ दुर्दिन-से होकर सारे आकाशमें छा जाते हैं। कहीं फटे हुए बादलोंके रूपमें दिखायी देते हैं। कहीं खानसे काटकर निकाले गये कोयलेके समान काले होते हैं और कहीं जलकी छोटी-छोटी बूँदें बरसाते रहते हैं। इस तरह विभिन्न प्रकारके बादलोंद्वारा देवराज इन्द्र आकाश एवं विश्वको अलंकृत-सा करते रहते हैं। कहीं-कहीं तो बादल पानी बरसाकर आकाशको जलबिन्दुरूपी मोतियोंसे प्रकाशित कर देता है ॥ १६-१७ ॥

एवमेतत् पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः ।
पर्जन्यः सर्वभूतानां भवाय भुवि वर्षति ॥ १८ ॥

'इस प्रकार पर्जन्यदेव (इन्द्र) इस पृथ्वीके जलको सूर्यकी किरणोंद्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धिके लिये उसे मेघोंद्वारा भूतलपर बरसा देते हैं ॥ १८ ॥

यस्मात् प्रावृडियं कृष्ण शक्रस्य भुवि भाविनी ।
तस्मात् प्रावृषि राजानः सर्वे शक्रं मुदा युताः ।
महैः सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवाः ॥ १९ ॥

'श्रीकृष्ण! इसीलिये यह वर्षा ऋतु भूतलपर इन्द्रदेवकी पूजाका समय है; अतएव समस्त राजा वर्षा ऋतुमें बड़ी प्रसन्नताके साथ नाना प्रकारके उत्सवोंद्वारा देवराजकी पूजा करते हैं। हम तथा दूसरे मनुष्य भी ऐसा ही करते हैं' ॥१९॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां गोपवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णकी बाललीलाके प्रसंगमें गोपका वाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥


षोडशोऽध्यायः

श्रीकृष्णके द्वारा गिरियज्ञ एवं गोपूजनका प्रस्ताव करते हुए शरद् ऋतुका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
गोपवृद्धस्य वचनं श्रुत्वा शक्रपरिग्रहे ।
प्रभावज्ञोऽपि शक्रस्य वाक्यं दामोदरोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इन्द्र-महोत्सवको स्वीकार करनेके सम्बन्धमे उस बड़े-बूढ़े गोपका वचन सुनकर इन्द्रके प्रभावको जानते हुए भी श्रीकृष्णने यह बात कही—॥ १ ॥

वयं वनचरा गोपाः सदा गोधनजीविनः ।
गावोऽस्मद्दैवतं विद्धि गिरयश्च वनानि च ॥ २ ॥

'आर्य ! हमलोग वनमे रहनेवाले गोप हैं और सदा

२५८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गोधनसे अपनी जीविका चलाते हैं; अतः आपको मालूम होना चाहिये कि गौएँ, पर्वत और वन-ये ही हमारे देवता हैं ॥२॥
कर्षुकाणां कृषिवृत्तिः पण्यं विपणिजीविनाम् ।
गावोऽस्माकं परा वृत्तिरेतत् त्रैविद्यमुच्यते ॥ ३ ॥
'किसानोंकी जीविका है खेती, व्यापारसे जीवननिर्वाह करनेवाले वैश्योंकी जीविका-वृत्ति है खरीद-बिक्री और हमलोगोंकी सर्वोत्तम वृत्ति है गौओंका पालन । ये वार्तारूप विद्याके तीन भेद कहलाते हैं ॥ ३ ॥
विद्या यो यया युक्तस्तस्य सा दैवतं परम् ।
सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिणी ॥ ४ ॥
'जो जिस विद्यासे युक्त है, उसके लिये वही सर्वोत्तम देवता है, वही पूजा-अर्चाके योग्य है और वही उसके लिये उपकारिणी है ॥ ४ ॥
योऽन्यस्य फलमश्नानः करोत्यन्यस्य सत्क्रियाम् ।
द्वावनर्थौ स लभते प्रेत्य चेह च मानवः ॥५॥
'जो मनुष्य एक व्यक्तिसे फल पाकर उसे भोगता है और दूसरेकी पूजा (आदर-सत्कार) करता है, वह इस लोक और परलोकमें दो अनर्थोंका भागी होता है ॥ ५ ॥
कृष्यन्ता प्रथिता सीमा सीमान्तं श्रूयते वनम् ।
वनान्ता गिरयः सर्वे ते चास्माकं गतिर्ध्रुवा ॥ ६ ॥
'जहाँतक खेती होती है, वहाँतक ब्रजकी सीमा विख्यात है । सीमाके अन्तमें वन सुना जाता है और वनके अन्तमें समस्त पर्वत हैं । वे पर्वत ही हमारे अविचल आश्रय हैं ॥६॥
श्रूयन्ते गिरयश्चापि वनेऽस्मिन् कामरूपिणः ।
प्रविश्य तास्तास्तनवो रमन्ते स्वेषु सानुषु ॥ ७ ॥
'सुना जाता है कि इस वनमें रहनेवाले पर्वत भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं । वे भिन्न-भिन्न शरीरोंमें प्रवेश करके अपने शिखरोंपर मौजसे घूमते-फिरते हैं ॥ ७ ॥
भूत्वा केसरिणः सिंहा व्याघ्राश्च नखिनां वराः ।
वनानि खानि रक्षन्ति त्रासयन्तो वनच्छिदः ॥ ८ ॥
'वे ही अयालोंसे विभूषित सिंह और नखधारी जन्तुओंमें श्रेष्ठ व्याघ्र बनकर वनको काटने या हानि पहुँचानेवाले लोगोंको त्रास देते हुए अपने-अपने वनोंकी रक्षा करते हैं ॥ ८ ॥
यदा चैपां विकुर्वन्ति ते वनालयजीविनः ।
घ्नन्ति तानेव दुर्घृत्तान् पौरुषादेन कर्मणा ॥ ९ ॥
'जब वनके आश्रयमें रहकर जीवननिर्वाह करनेवाले लोग इन वनों या वनदेवताओंको हानि पहुँचाते हैं, तब वे कामरूपी देवता राक्षसोचित हिंसाकर्मके द्वारा उन दुराचारी मनुष्योंको निश्चय ही मार डालते हैं ॥ ९ ॥
मन्त्रयज्ञपरा विप्राः सीतायज्ञाश्च कर्षुकाः ।
गिरियज्ञास्तथा गोपा इज्योऽस्माभिर्गिरिर्वने ॥ १० ॥
'ब्राह्मणलोग मन्त्रयज्ञमें तत्पर रहते हैं, किसान सीता-यज्ञ करते हैं अर्थात् खेतोंको अच्छी तरह जोतते और हल जोतनेसे जो रेखा बन जाती है, उसकी तथा हलकी पूजा करते हैं तथा गोपगण गिरियज्ञ करते हैं; अतः हमलोगोंको इस वनमें गिरियज्ञ करना चाहिये ॥ १० ॥
तन्मह्यं रोचते गोपा गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् ।
कर्म कृत्वा सुखस्थाने पादपेष्वथवा गिरौ ॥११॥
तत्र हत्वा पशून् मेध्यान् वृत्तत्यायतने शुभे ।
सर्वघोषस्य संदोहः क्रियतां किं विचार्यते ॥ १२॥
'गोपगण ! मुझे तो वही अच्छा लगता है कि गिरियज्ञका आरम्भ हो । स्वस्तिवाचन आदि कर्म करके वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतके समीप किसी सुखद स्थानपर पवित्र पशुओंको एकत्र करके उनके पास जाकर उनका विस्तारपूर्वक पूजन किया जाय और एक शुभ मन्दिरमें सारे ब्रजके दूधका संग्रह कर लिया जाय । इस विषयमें आपलोग क्या विचार कर रहे हैं ॥ ११-१२ ॥
तं शरत्कुसुमापीडाः परिवार्थ प्रदक्षिणम् ।
गावो गिरिवरं सर्वास्ततो यान्तु पुनर्व्रजम् ॥ १३ ॥
'फिर शरद् ऋतुके फूलोंसे जिनके मस्तकका शृङ्गार किया गया हो, ऐसी समस्त गौएँ गिरिवर गोवर्धनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करके पुनः ब्रजमें जायें ॥ १३ ॥
प्राप्ता किलेयं हि गवां स्वादुतोयतृणा गुणैः ।
शरत् प्रमुदिता रम्या गतमेघजलाशया ॥ १४ ॥
'इस समय प्रमोदनूर्ण रमणीय शरद्-ऋतु आ गयी है, जब कि जल और घास गौओंके लिये स्वादुताके गुणोंसे सम्पन्न हो जाते हैं । अब जलाशयोंमें पानी बरसानेवाले बादल छँट गये ॥ १४ ॥
प्रियकैः पुष्पितैर्गौरं श्यामं वाणासनैः क्वचित् ।
कठोरतृणमभाति निर्मयूररुतं वनम् ॥ १५ ॥
'खिले हुए कदम्ब-पुष्पोंके कारण वन गौरवर्णका प्रतीत होता है । कहीं कहीं वाणासनों—झाड़-झंखाड़ोंके कारण वह श्याम रंगका दिखायी देता है । अब घासें कोमल नहीं रहीं—कुछ कठोर हो गयी हैं । वनमे मोरोंकी मधुर वाणी नहीं सुनायी देती है ॥ १५ ॥
विजला विमला व्योम्नि विबलाका विविद्युतः ।
विवर्धन्ते जलधरा विदन्ता इव कुञ्जराः ॥ १६ ॥
'आकाशमे जल, मल, बलाका और विद्युत्‌से रहित बादल दन्तहीन हाथियोंके समान बढ़ रहे हैं ॥ १६ ॥
पदुना मेघवातेन नवतोयानुकारिणा ।
पर्णोत्करधनाः सर्वे प्रसादं यान्ति पादपाः ॥ १७ ॥
'( वर्षा ऋतुमे ) नूतन जलको खींच लानेवाले शक्ति-

विष्णुपर्व ] षोडशोऽध्यायः २५९ शाली मेघयुक्त वायुसे अभिषिक्त होनेके कारण जो पत्तोंके के-सब अनुपम शोभा-सम्पत्तिसे प्रकाशित हो उठे हैं ॥ २३ ॥ बाहुल्यसे घने दिखायी देते थे, वे सभी वृक्ष अब पत्तोंके पङ्कजानि च ताम्राणि तथान्यानि सितान्यपि । विरल हो जानेसे प्रसादको प्राप्त हो रहे हैं (पहले वहाँ उत्पलानि च नीलानि भेजिरे वारिजां श्रियम् ॥ २४ ॥ अन्धकार छाया रहता था अब प्रकाश हो गया है) ॥ १७ ॥ 'लाल कमल, अन्यान्य श्वेत-पीत आदि कमल तथा नील सितवर्णाम्बुदोष्णीषं हंसचामरवीजितम् । उत्पल भी जलजनित शोभाके भागी हुए हैं ॥ २४ ॥ पूर्णचन्द्रामलच्छत्रं साभिषेकमिवाम्बरम् ॥ १८ ॥ मदं जहुः सितापाङ्गा मन्दं ववुरिरेऽनिलाः । अभवद् व्यभ्रमाकाशमभूच्च निभृतोऽर्णवः ॥ २५ ॥ 'इस समय आकाश मूर्धाभिषिक्त राजाके समान जान पड़ता है। सफेद बादल ही उसकी श्वेत पगड़ी या उज्ज्वल

२६० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे 'शरद् ऋतुमें गौएँ पहलेसे दूना दूध देने लगी हैं। साँड़ दुगुने मतवाले हो उठे हैं। वनोंकी शोभा-सम्पत्ति दुगुनी बढ़ गयी है और पकी हुई खेतीके कारण यह पृथ्वी अनन्त गुणोंसे सम्पन्न हो गयी है ॥ ३१ ॥ ज्योतींषि घनमुक्तानि प्रसन्नवन्ति जलानि च। मनांसि च मनुष्याणां प्रसादमुपयान्ति वै ॥ ३२ ॥ 'बादलोंके आवरणसे मुक्त हुए ग्रह-नक्षत्र, कमल- मण्डित जल तथा मनुष्योंके मन प्रसाद ( स्वच्छता एवं प्रसन्नता ) को प्राप्त हो रहे हैं ॥ ३२ ॥ असृजत् सविता व्योम्नि निर्मुक्तो जलदैर्भृशम् । शरत्प्रज्वलितं तेजस्तीक्ष्णरश्मिर्विशोषयन् ॥ ३३ ॥ 'आकाशमें मेघमुक्त हुआ सूर्य शरद् ऋतुके प्रभावसे अधिक प्रज्वलित तेज ( धूप ) की सृष्टि करता है तथा अपनी किरणोंको और भी तीखी करके वसुधाके रसका शोषण कर रहा है ॥ ३३ ॥ नीराजयित्वा सैन्यानि प्रयान्ति विजिगीषवः । अन्योन्यराष्ट्राभिमुखाः पार्थिवाः पृथिवीक्षितः ॥ ३४ ॥ 'भूतलके नरेश अपने सैनिकोंसे उनके अस्त्रोंका मार्जन करवाकर ( उन्हें साथ ले ) विजयकी इच्छासे एक दूसरेके राष्ट्रकी ओर जा रहे हैं ॥ ३४ ॥ बन्धुजीवाभिताम्रासु बद्धपङ्कवतीषु च। मनस्तिष्ठति कान्तासु चित्रासु वनराजिषु ॥ ३५ ॥ 'बन्धुजीव ( बन्धूक ) के लाल फूलोंसे सुशोभित हो जो सब ओरसे लाल-लाल दिखायी देती हैं तथा जिनकी कीचड़ सूख गयी है, ऐसी विचित्र एवं कमनीय वनश्रेणियोंमें ( उनकी शोभा निहारनेके लिये ) मन आसक्त हो रहा है ॥ ३५ ॥ वनेषु च विराजन्ते पादपा वनशोभिनः । असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः ॥ ३६ ॥ इषुसाह्वा निकुम्भाश्च प्रियकाः स्वर्णकास्तथा । भूमराः पेचकाश्चैव केतक्यश्च समन्ततः ॥ ३७ ॥ 'वनकी शोभा बढ़ानेवाले असन, छितवन, कोविदार, बाणासन, निकुम्भ, प्रियक और स्वर्णक नामवाले वृक्ष वनोंमें फूलोंसे लदकर अधिक शोभा पा रहे हैं। केतकी ( केवड़े ) के वृक्ष भी सब ओर खिले हुए हैं। भूमर ( एक प्रकारके मृग ) और उल्लू भी सर्वत्र सानन्द विचरते हैं ॥ ३६-३७ ॥ व्रजेषु च विशेषेण गर्गरोद्गारहासिषु । शरत्प्रकाशयोपेव गोष्ठेष्वटति रूपिणी ॥ ३८ ॥ 'दूध-दहीके मटों या घड़ोंसे जो माखन आदि ढाले जाते हैं, वे ही जिनकी हंसी हैं, उन व्रजों एवं गोष्ठोंमें तो यह शरद् ऋतु मूर्तिमती सुन्दरी युवतीकी भाँति घूम -रही है ॥ ३८ ॥ नूनं त्रिदशभूयिष्ठं मेघकालसुखोषितम् । पतत्त्रिकेतनं देवं बोधयन्ति दिवौकसः ॥ ३९ ॥ 'निश्चय ही देवतालोग इस समय देवश्रेष्ठ भगवान् गरुडध्वजको, जो वर्षाकालमे सुखपूर्वक शयन कर चुके हैं, जगा रहे हैं ॥ ३९ ॥ शरद्येवं सुसस्यायां प्राप्तायां प्रावृषः क्षये । नीलचन्द्रार्कवर्णैश्च रचितं बहुभिर्द्विजैः ॥ ४० ॥ फलैः प्रवालैश्च घनमिन्द्रचापघनोपमम् । भवनाकारविटपं लतापरममण्डितम् ॥ ४१ ॥ विशालमूलावन्तं पवनाभोगमण्डितम् । अर्चयामो गिरिं देवं गाश्चैव च विशेषतः ॥ ४२ ॥ 'वर्षा बीत जानेपर ऐसी सुन्दर खेतीसे सुशोभित शरद् ऋतुका शुभागमन हुआ है। इस समय ( मेर्यके समान ) नीले, चन्द्रमाके समान श्वेत तथा सूर्यके सदृश सुनहरे रंगवाले बहुत-से पक्षियोंने जिसे बहुरंगा बना दिया है, जो विविध प्रकारके फलों और नूतन पल्लवोंसे घना हो रहा है और इसलिये जो इन्द्रधनुषसे युक्त श्याम मेघकी-सी शोभा धारण करता है, जिसके वृक्षोंकी एक-एक शाखा घरके समान जान पड़ती है, जो लता और वल्लारियोंसे भलीभाँति अलंकृत है, जिसका विशाल मूलभाग बहुत दूरतक फैला हुआ है तथा जो वायुके विस्तारसे सुशोभित होता है, वह गोवर्धन पर्वत ही हमारा देवता है। हम उसकी तथा इन गौओंकी विशेष रूपसे पूजा करें ॥ ४०-४२ ॥ सावतंसैर्विषाणैश्च वर्हापीडैश्च दंशितैः । घण्टाभिश्च प्रलम्बाभिः पुष्पैः शारदिकैस्तथा ॥ ४३ ॥ शिवाय गावः पूज्यन्तां गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् । पूज्यतां त्रिदशैः शक्रो गिरिरस्माभिरिज्यताम् ॥ ४४ ॥ 'गायोंके सींगोंमें मुकुट और मोरपंखके समान बने हुए आभूषण बाँधे जायँ । उनके गलेमें बड़ी घंटियाँ लटका दी जायँ और व्रजके कल्याणके लिये शरद्में सुलभ होनेवाले पुष्पोंद्वारा गौओंकी पूजा की जाय। साथ ही 'गिरियज्ञ' आरम्भ कर दिया जाय । देवतालोग इन्द्रकी पूजा करें और हमलोग गिरिराज गोवर्धनकी ॥ ४३-४४ ॥ कारयिष्यामि गोयज्ञं बलादपि न संशयः । यद्यस्ति मयि वः प्रीतिर्यदि वा सुहृदो वयम् । गावो हि पूज्याः सततं सर्वेषां नात्र संशयः ॥ ४५ ॥ 'यदि आपलोगोंका मुझपर प्रेम है और यदि हमलोग एक दूसरेके हितैषी सुहृद् हैं तो मैं आपके द्वारा हठ एवं बलपूर्वक गोयज्ञ कराऊँगा । गौएँ सदा ही सबके लिये पूजनीय हैं-इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥

विष्णुपर्व ]सप्तदशोऽध्यायः२६१

यदि साम्ना भवेत् प्रीतिर्भवतां वैभवाय च।
एतन्मम वचस्तथ्यं क्रियतामविचारितम् ॥ ४६ ॥

'यदि मेरे समझानेसे आपको प्रसन्नता होती हो तो आपलोग अपने ही वैभव (अभ्युदय) के लिये मेरी इस सच्ची बातको बिना विचारे मान लें और इसके अनुसार कार्य करें' ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शरद्वर्णने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शरद्वर्णनविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥


सप्तदशोऽध्यायः

गोपोंद्वारा श्रीकृष्णकी बातको स्वीकार करके गिरियज्ञका अनुष्ठान तथा भगवान्‌का दिव्य रूप धारण करके उनकी पूजा ग्रहण करनेके पश्चात् उन्हें वर देना

वैशम्पायन उवाच
दामोदरवचः श्रुत्वा हृष्टास्ते गोपजीविनः।
तद्वागमृतमासाद्य प्रत्युचुर्विशङ्कया ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दामोदर (श्रीकृष्ण) की बात सुनकर गौओंपर ही अपनी जीविका निर्भर करनेवाले वे गोपगण प्रसन्नतापूर्वक उनके वचनामृतका आस्वादन करके निःशङ्क होकर बोले—॥ १ ॥

तवैषा बाल महती गोपानां हितवर्द्धिनी।
प्रीणयत्येव नः सर्वान् बुद्धिवृद्धिकरी गवाम् ॥ २ ॥

'हमारे बाल-गोपाल ! तुम्हारी यह बुद्धि—यह विचार-धारा महत्त्वपूर्ण होनेके साथ ही गोपोंके लिये हितकर तथा गौओंकी वृद्धि करनेवाली है। यह हम सब लोगोंको तृप्ति ही प्रदान करती है ॥ २ ॥

त्वं गतिस्त्वं रतिश्चैव त्वं वेत्ता त्वं परायणम्।
भयेष्वभयदस्त्वं नस्त्वमेव सुहृदां सुहृत् ॥ ३ ॥

'तुम्हीं हमारी गति हो, तुम्हीं रति (आनन्द) हो, तुम्हीं सर्वज्ञ और तुम्हीं हमारे सबसे बड़े आश्रय हो। भयके अवसरोंपर तुम्हीं हमें अभय देनेवाले हो तथा तुम्हीं हमारे लिये सुहृदोंके भी सुहृद् हो ॥ ३ ॥

त्वत्कृते कृष्ण घोषोऽयं क्षेमी मुदितगोकुलः।
कृत्स्नो वसति शान्तारिर्यथा स्वर्गे गतस्तथा ॥ ४ ॥

'श्रीकृष्ण ! तुम्हारे कारण ही यह गोष्ठ सकुशल है। यहाँकी गौओंका समुदाय प्रसन्न है। सारे शत्रु शान्त हो गये हैं तथा समस्त व्रज, जैसे स्वर्गमें रह रहा हो, इस तरह यहाँ सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ४ ॥

जन्मप्रभृति कर्मैतद् देवैरसुकरं भुवि।
बोद्धव्याद्याभिमानाच्च विस्मितानि मनांसि नः ॥ ५ ॥

'जन्मकालसे ही तुमने जो यह शकट-भंग और पूतना-वध आदि कार्य किया है, यह इस भूतलपर देवताओंके लिये भी सुकर नहीं है। यह सब देखकर तथा समझमें आने योग्य तुम्हारा जो अभिमानपूर्ण वचन है (कि मैं बलपूर्वक गो-यज्ञ आदि कराऊँगा) उसपर ध्यान देकर हमारे चित्त चकित हो उठे हैं ॥ ५ ॥

बलेन च परार्ध्येन यशसा विक्रमेण च।
उत्तमस्त्वं मनुष्येषु देवेष्विव पुरंदरः ॥ ६ ॥

'तुम अपने परम उत्कृष्ट बल, सुयश और पराक्रमद्वारा मनुष्योंमें सबसे उत्तम हो। ठीक उसी तरह जैसे देवताओंमें इन्द्र सबसे श्रेष्ठ हैं ॥ ६ ॥

प्रतापेन च तीक्ष्णेन दीप्त्या पूर्णतयापि च।
उत्तमस्त्वं च मर्त्येषु देवेष्विव दिवाकरः ॥ ७ ॥

'तुम अपने तीक्ष्ण प्रताप, अनुपम दीप्ति तथा पूर्णता-की दृष्टिसे भी मनुष्योंमें उसी प्रकार सर्वश्रेष्ठ हो, जैसे देवताओं-में दिवाकर (सूर्य) ॥ ७ ॥

कान्त्या लक्ष्म्या प्रसादेन वदनेन स्मितेन च।
उत्तमस्त्वं च मर्त्येषु देवेष्विव निशाकरः ॥ ८ ॥

'मनोरम कान्ति, शोभा-सम्पत्ति, प्रसाद, सुन्दर मुख और मुसकराहटके कारण भी तुम देवताओंमें चन्द्रमाकी भाँति मनुष्योंमें सबसे उत्तम हो ॥ ८ ॥

बलेन वपुषा चैव बाल्येन चरितेन च।
स्यात् ते शक्तिधरस्तुल्यो न तु कश्चन मानुषः ॥ ९ ॥
यत् त्वयाभिहितं वाक्यं गिरियज्ञं प्रति प्रभो।
कस्तल्लङ्घयितुं शक्तो वेलामिव महोदधिः ॥ १० ॥

'बल, शरीर, बचपन और मनोहर चरित्रकी दृष्टिसे भी तुम्हारे समान शक्तिशाली मनुष्य दूसरा कोई नहीं है। प्रभो ! तुमने गिरियज्ञके विषयमें जो बात कही है, उसका उल्लङ्घन कौन कर सकता है? क्या महासागर कभी तटभूमिको लाँघ सका है ॥ ९-१० ॥

स्थितः शक्रमहस्तात श्रीमान् गिरिमहस्त्वयम्।
त्वत्प्रणीतोऽद्य गोपानां गवां हेतोः प्रवर्त्यताम् ॥ ११ ॥

'तात ! आजसे इन्द्र-यागका उत्सव स्थगित हो गया।

२६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


अब यह शोभासम्पन्न गिरियज्ञ, जिसे तुमने चालू किया है, गौओं और गोपोंके हितके लिये सम्पादित हो ॥ ११ ॥

भाजनान्युपकल्प्यन्तां पयसः पेशलानि च।
कुम्भाश्च विनिवेश्यन्तामुदपानेषु शोभनाः ॥ १२ ॥
पुर्यन्तां पयसा नद्यो द्रोण्यश्च विपुलायताः।
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च तत् सर्वमुपनीयताम् ॥ १३ ॥
भाजनानि च मांसस्य न्यस्यन्तामोदनस्य च।
त्रिरात्रं चैव संदोहः सर्वघोपस्य गृह्यताम् ॥ १४ ॥
विशस्यन्तां च पशवो भोज्या ये महिषादयः।
प्रवर्त्यतां च यज्ञोऽयं सर्वगोपसुसंकुलः ॥ १५ ॥

'दूधसे भरे हुए सुन्दर-सुन्दर पात्र एकत्र किये जायें। कुओंपर सुन्दर-सुन्दर घड़े स्थापित किये जायें। नयी बनायी हुई नहरों तथा बड़े-बड़े कुण्डोंको दूधसे भर दिया जाय। भक्ष्य-भोज्य और पेय सब कुछ तैयार कर लिया जाय। फलोंके गूदों तथा भातसे भरे हुए पात्र रखे जायें। सारे ब्रजका तीन दिनोंका सारा दूध संगृहीत कर लिया जाय। भोजन करानेयोग्य जो भैंस-गाय आदि ब्रजके पशु हैं, उन्हें बड़े आदरके साथ उत्तमोत्तम पदार्थ खिलाये जायें और इस प्रकार समस्त गोपोंके सहयोगसे सम्पन्न होनेवाले इस यज्ञका आरम्भ हो' ॥ १२-१५ ॥

आनन्दजननो घोषो महान् मुदितगोकुलः।
तूर्यप्रणादघोषैश्च वृषभाणां च गर्जितैः ॥ १६ ॥
हुम्भारवैश्च वत्सानां गोपानां हर्षवर्धनः।

फिर तो ब्रजमें आनन्दजनक महान् कोलाहल होने लगा। सारा गोकुल हर्षोल्लासमें मग्न हो गया। वाद्योंके गम्भीर घोष, साँड़ोंकी गर्जना और बछड़ोंके रँभानेसे जो सम्मिलित शब्द प्रकट हुआ, वह गोपोंका हर्ष बढ़ाने लगा ॥

दध्नो ह्रदो घृतावर्तः पयःकुल्यासमाकुलः ॥ १७ ॥
मांसराशिः प्रभूताढ्यः प्रकाशाौदनपर्वतः।
सम्प्रावर्तत यज्ञोऽस्य गिरेर्गोभिः समाकुलः।
तुष्टगोपजनाकीर्णो गोपनारीमनोहरः ॥ १८ ॥

दहीके कुण्डमें ऊपर-ऊपर घी छा रहा था। दूधकी अनेकों नहरें बहने लगीं। फलोंके गूदोंकी बड़ी भारी राशि जमा हो गयी। बहुत-से संस्कारक द्रव्य संचित हो गये और उज्ज्वल भातोंका पर्वताकार पुञ्ज प्रकाशित होने लगा। इस प्रकार गौओंसे भरा हुआ श्रीकृष्णका गिरियज्ञ चालू हो गया। संतुष्ट हुए समस्त गोपगण उसमें सम्मिलित होकर आवश्यक कार्य करते थे। गोपाङ्गनाओंने अपनी उपस्थितिसे उस महोत्सवको मनोहर बना दिया था ॥ १७-१८ ॥

भक्ष्याणां राशयस्तत्र शतशश्चोपकल्पिताः।
गन्धमाल्यैश्च विविधैर्धूपैरुच्चावचैस्तथा ॥ १९ ॥

वहाँ भक्ष्य पदार्थोंके सैकड़ों ढेर लगाये गये थे। नाना प्रकारके गन्ध, माल्य तथा भाँति-भाँतिके धूपोंसे वह यज्ञ सुशोभित होता था ॥ १९ ॥

अथाधिष्टत्तपर्यन्ते सम्प्राप्ते यज्ञसंधिधौ।
यज्ञं गिरेस्तिथौ सौम्ये चक्रुर्गोपा द्विजैः सह ॥ २० ॥

अग्निके समीप जो आज्यस्थाली और चरुस्थाली आदि रखी गयी थीं, वे उस यज्ञका विधान आरम्भ होते ही आगपर चढ़ा दी गयीं। ब्राह्मणोंसहित गोपोंने किसी शुभ तिथिको उस यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया था ॥ २० ॥

यजनान्ते तदन्नं तु तत् पयो दधि चोत्तमम्।
मांसं च मायया कृष्णो गिरिर्भूत्वा समश्नुते ॥ २१ ॥

यज्ञके अन्तमें श्रीकृष्ण स्वयं ही मायासे पर्वतके अधिष्ठाता देवता बनकर उस अन्न, दूध, दही और फलोंके गूदोंको भोग लगाने लगे ॥ २१ ॥

तर्पिताश्चापि विप्राग्र्यास्तुष्टाः सम्पूर्णमानसाः।
उत्तस्थुः प्रीतमनसः स्वस्ति वाच्यं यथासुखम् ॥ २२ ॥

उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अन्न-पानसे तृप्त और दक्षिणा से संतुष्ट किया गया था। उन सबके मनोरथ पूर्ण हो गये थे। वे सुखपूर्वक स्वस्तिवाचन करके प्रसन्नचित्त होकर उठे थे ॥ २२ ॥

भुक्त्वा चावभृथे कृष्णः पयः पीत्वा च कामतः।
संतुष्टोऽस्मीति दिव्येन रूपेण प्रजहास वै ॥ २३ ॥

यज्ञान्तस्नानके समय गिरिदेवके रूपमें प्रकट हुए श्रीकृष्ण अपनेको अर्पित किये गये भोज्य-पदार्थोंको खाकर और इच्छानुसार दूध पीकर बोले—'मैं पूर्णतः तृप्त हो गया।' ऐसा कहकर वे उस दिव्यरूपके द्वारा जोर-जोरसे हँसने लगे ॥

तं गोपाः पर्वताकारं दिव्यस्रगनुलेपनम्।
गिरिमूर्ध्नि स्थितं दृष्ट्वा कृष्णं जग्मुः प्रधानतः ॥ २४ ॥

दिव्य माला और अनुलेप धारण किये उन पर्वताकार देवताको पर्वतके शिखरपर खड़ा देख सब लोगोंने उन्हें प्रधानतः श्रीकृष्ण ही समझकर उनकी शरण ली ॥ २४ ॥

भगवानपि तेनैव रूपेणाच्छादितः प्रभुः।
सहितैः प्रणतो गोपैर्ववन्दात्मानमात्मना ॥ २५ ॥

प्रभावशाली भगवान् श्रीकृष्णने भी उसी रूपसे अपनेको छिपाये रखकर वहाँ एकत्र हुए गोपोंके साथ नतमस्तक हो स्वयं ही अपने-आपको प्रणाम किया ॥ २५ ॥

तमूचुर्विस्मिता गोपा देवं गिरिवरे स्थितम्।
भगवंस्त्वद्वशे युक्ता दासाः किं कुर्म किङ्कराः ॥ २६ ॥

गिरिराजके शिखरपर खड़े हुए उन पर्वत देवतासे समस्त गोपोंने विस्मित होकर कहा—'भगवन् ! हम आपके वशमें हैं; आपके दास एवं सेवक हैं, बताइये ! हम आपकी क्या सेवा करें' ॥ २६ ॥

[विष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६३


स उवाच ततो गोपान् गिरिप्रभवया गिरा ।
अद्यप्रभृति चेज्योऽहं गोषु यद्यस्तु वो दया ॥ २७ ॥
तब उन्होंने पर्वतसे प्रकट हुई वाणीद्वारा उन गोपोंसे कहा—‘यदि तुमलोगोंमें दयाभाव विद्यमान हो, तो आजसे तुम्हें गौओंके भीतर मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ २७ ॥

अहं वः प्रथमो देवः सर्वकामरः शुभः ।
मम प्रभावाच्च गवामयुतान्येव भोक्ष्यथ ॥ २८ ॥
‘मैं तुमलोगोंका प्रथम देवता हूँ, तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और शुभचिन्तक हूँ। तुम मेरे प्रभावसे दस हजार गौओंके स्वामी एवं (उनके दूध-दही आदि-के) उपभोक्ता बने रहोगे ॥ २८ ॥

शिवश्च वो भविष्यामि मद्‌भक्तानां वने वने ।
रंस्ये च सह युष्माभिर्यथा दिविगतस्तथा ॥ २९ ॥
‘मुझमें भक्ति रखनेवाले तुम गोपोंके लिये मैं प्रत्येक वनमें कल्याणकारी होऊँगा और तुमलोगोंके साथ मैं उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहूँगा, जैसे दिव्य धाममे रहा करता हूँ॥

ये चेमे प्रथिता गोपा नन्दगोपपुरोगमाः ।
एषां प्रीतः प्रयच्छामि गोपानां विपुलं धनम् ॥ ३० ॥
‘ये जो नन्द आदि विख्यात गोप हैं, मैं प्रसन्न होकर इन सबको प्रचुर धन-सम्पत्ति प्रदान करूँगा ॥ ३० ॥

पर्याप्नुवन्तु क्षिप्रं मां गावो वत्ससमाकुलाः ।
एवं मम परा प्रीतिर्भविष्यति न संशयः ॥ ३१ ॥
‘अब बछड़ोंसहित गौएँ शीघ्र मेरी परिक्रमा करें। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३१ ॥

ततो नीराजनार्थं हि वृन्दशो गोकुलानि तम् ।
परिवव्रुर्गिरिवरं सवृषाणि समन्ततः ॥ ३२ ॥
फिर तो झुंड-की-झुंड गौएँ साँड़ोंके साथ आकर परिक्रमाके लिये गिरिराजको सब ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं ॥

ता गावः प्रद्रुता हृष्टाः सापीड़स्तवकाङ्गदाः ।
सस्रजापीड़शृङ्गाग्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३३ ॥
उनके मस्तकपर फूलोंके आभूषण बँधे हुए थे, चारो पैरोंमें पुष्पगुच्छोंके ही बने हुए बाजूबंद पहनाये गये थे, सींगोंके अग्रभागमें फूलोंके गजरे और शिरोभूषण शोभा पा रहे थे, ऐसी सैकड़ों और हजारों गौएँ हर्षमें भरकर एक साथ परिक्रमाके पथपर दौड़ीं ॥ ३३ ॥

अनुजग्मुश्च गोपालाः कालयन्तो धनानि च ।
भक्तिच्छेदानुलिप्ताङ्गा रक्तपीतसिताम्बराः ॥ ३४ ॥
गोपगण अपने उन गोधनोको हाँकते हुए उनके पीछे-पीछे चले। उन गोपोके विभिन्न अङ्गोंमें विभागपूर्वक नाना रंगोंके अनुलेप लगे थे। वे लाल, पीले और सफेद कपड़ोंसे सुशोभित थे ॥ ३४ ॥

मयूरचित्राङ्गदिनो भुजैः प्रहरणावृतैः ।
'मयूरपत्रवृन्तानां केशबन्धैः सुयोजितैः ॥ ३५ ॥
वभ्राजुरधिकं गोपाः समवाये तदाद्भुते ।
उनकी भुजाओमे मोरपत्रके विचित्र बाजूवंद बँधे हुए थे और उन्हीं हाथोमे डंडे भी शोभा पा रहे थे। उनके सुन्दर ढंगसे बँधे हुए केशोंमे मोरपंखके वृन्त खोसे गये थे। इन सबके कारण उस अद्भुत समुदाय या मेलेमें उन गोपोंकी अधिक शोभा हो रही थी ॥ ३५ १/२ ॥

अन्ये वृषानाबुरुहुर्नृत्यन्ति स्म परे मुदा ॥ ३६ ॥
गोपालास्त्वपरे गांश्च जगृहुर्वेगगामिनः ।
कुछ अन्य गोप बैलोपर चढ़े थे। दूसरे ग्वाले हर्षमे भरकर नाच रहे थे तथा अन्य बहुत-से गोपाल वेगपूर्वक भागी जाती हुई गौओको पकड़ते थे ॥ ३६ १/२ ॥

तस्मिन् पर्यायनिवृत्ते गवां नीराजनोत्सवे ॥ ३७ ॥
अन्तर्धानं जगामाशु तेन देहेन सोऽचलः ।
गौओंद्वारा नीराजना (परिक्रमा) का वह उत्सव बारी-बारीसे सम्पन्न हो जानेपर वे पर्वतदेवता अपने उस दिव्य शरीरसे शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये ॥ ३७ १/२ ॥

कृष्णोऽपि गोपसहितो विवेश व्रजमेव ह ॥ ३८ ॥
गिरियज्ञप्रवृत्तेन तेनाश्चर्येण विस्मिताः ।
गोपाः सबालवृद्धा वै तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३९ ॥
इधर श्रीकृष्ण भी गोपोंके साथ व्रजमे ही चले गये। गिरियज्ञके अनुष्ठानसे प्राप्त हुए उस महान् आश्चर्यसे चकित हो बालकों और वृद्धोंसहित सम्पूर्ण गोप मधुसूदन श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे ॥ ३८-३९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गिरियज्ञप्रवर्तने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गिरियज्ञका अनुष्ठानविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥


अष्टादशोऽध्यायः

इन्द्रका संवर्तक मेघोंद्वारा वर्षा कराकर गौओं और गोपोंको कष्टमें डालना, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धनधारण तथा उसके नीचे गौओं और गोपोंसहित व्रजवासियोंका जाना

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
महे प्रतिहते शक्रः सक्रोधस्त्रिदशेश्वरः ।<br>संवर्तकं नाम गणं तोयदानामथाब्रवीत् ॥ १ ॥जनमेजय ! अपना उत्सव रोक दिये जानेके कारण देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने मेघोंके संवर्तक नामक गणको बुलाकर इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

२६४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे ]

भो वलाहकमातङ्गाः श्रूयतां मम भाषितम् ।
यदि वो मत्प्रियं कार्यं राजभक्तिपुरस्कृतम् ॥ २ ॥
'मतवाले हाथियोंके समान श्रेष्ठ मेघगण ! यदि तुम्हें राजभक्तिको सामने रखते हुए मेरा प्रिय कार्य करना उचित जान पड़े, तो मेरी यह बात सुनो ॥ २ ॥

एते वृन्दावनगता दामोदरपरायणाः ।
नन्दगोपादया गोपा विद्विषन्ति ममोत्सवम् ॥ ३ ॥
'ये वृन्दावनमें गये हुए जो नन्द आदि गोप हैं, वे दामोदर श्रीकृष्णको ही सबसे बड़ा सहारा मानकर मेरे उत्सव-से द्वेष रखने लगे हैं ॥ ३ ॥

आजीवो यः परस्तेषां गोपत्वं च यतः स्मृतम् ।
ता गावः सप्तरात्रेण पीड्यन्तां वर्षमारुतैः ॥ ४ ॥
'अतः मेरी आज्ञा है कि उन गोपोंकी जो सबसे बड़ी आजीविका है तथा जिनका पालन करनेके कारण उनका गोपत्व सार्थक माना गया है, नन्द आदिकी उन गौओंको तुम लगातार सात रातोंतक भारी वर्षा और वायुके द्वारा पीड़ित करो ॥ ४ ॥

ऐरावतगतश्चाहं स्वयमेवाम्बु दारुणम् ।
स्रक्ष्यामि वृष्टिं वातं च वज्राशनिसमप्रभम् ॥ ५ ॥
'मैं भी ऐरावतपर आरूढ़ हो चलता हूँ और स्वयं ही वज्र एवं बिजलीके साथ-साथ प्रकाशित होनेवाले भयानक जल-की वर्षा एवं वायुकी सृष्टि करूँगा ॥ ५ ॥

भवद्भिश्चण्डवर्षेण चरता मारुतेन च ।
हतास्ताः सब्रजा गावस्त्यक्ष्यन्ति भुवि जीवितम् ॥ ६ ॥
'तुमलोग प्रचण्ड वायुके साथ विचरते हुए जब घोर वर्षा करोगे, तब उससे आहत एवं पीड़ित हुई गौएँ भूतलपर ब्रजवासियोंसहित अपने प्राण त्याग देंगी' ॥ ६ ॥

एवमाज्ञापयामास सर्वान्जलधरान् प्रभुः ।
प्रत्याहते वै कृष्णेन शासने पाकशासनः ॥ ७ ॥
श्रीकृष्णद्वारा अपने उत्सव एवं शासनका विघात हो जानेपर प्रभावशाली पाकशासन इन्द्रने समस्त जलधरोंको इस प्रकार अपनी आज्ञा सुना दी ॥ ७ ॥

ततस्ते जलदाः कृष्णा घोरनादा भयावहाः ।
आकाशं छादयामासुः सर्वतः पर्वतोपमाः ॥ ८ ॥
तब वे घोर गर्जना करनेवाले पर्वताकार भयंकर काले मेघ आकाशमें सब ओर छा गये ॥ ८ ॥

विद्युत्सम्पातजननाः शक्रचापविभूषिताः ।
तिमिरावृतमाकाशं चक्रुस्ते जलदास्तदा ॥ ९ ॥
उस समय इन्द्रधनुषसे विभूषित हो बिजली गिराते हुए उन मेघोंने आकाशको अन्धकारपूर्ण कर दिया ॥ ९ ॥

गजा इवान्यसंयुक्ताः केचिन्मकरवर्चसः ।
नागा इवान्ये गगने चेरुर्जलदपुङ्गवाः ॥ १० ॥
कुछ मेघ दूसरे हाथियोंसे सटकर चलते हुए हाथियों-के समान प्रतीत होते थे। दूसरे मगरोंके समान प्रकाशित होते थे तथा अन्य बड़े-बड़े बादल आकाशमे नागोंके समान विचरने लगे ॥ १० ॥

तेऽन्योन्यं वपुषा बद्धा नागयूथायुतोपमाः ।
दुर्दिनं विपुलं चक्रुश्छादयन्तो नभस्तलम् ॥ ११ ॥
जैसे हजारों हाथियोंके झुंड एक दूसरेसे अपने शरीरको आवद्ध करके चल रहे हों, वैसे ही प्रतीत होनेवाले उन जलधरों ने आकाशको आच्छादित करके वहाँ बड़ा भारी दुर्दिन उपस्थित कर दिया ॥ ११ ॥

नृहस्तनागहस्ताभ्यां वेणूनां चैव संहतैः ।
धाराभिस्तुल्यरूपामिर्ववृषुस्ते वलाहकाः ॥ १२ ॥
मनुष्योंके हाथ, हाथियोंके शुण्डदण्ड तथा बाँसके तुल्य मोटी धाराएँ प्रकट करके वे मेघ वहाँ सब ओर वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥

समुद्रं मेनिरे तं हि खमारूढं नृचक्षुषः ।
दुर्विगाह्यमपर्यन्तमगाधं दुर्दिनं महत् ॥ १३ ॥
मनुष्योंकी आँखोंने आकाशमें छाये हुए उस दुरवगाह अनन्त अगाध एवं महान् दुर्दिनको समुद्रके समान ही माना ॥ १३ ॥

नैवापतन् वै खगमा दुद्रुवुर्मृगजातयः ।
पर्वताभेषु मेघेषु खे नदत्सु समन्ततः ॥ १४ ॥
आकाशमे चारों ओर पर्वताकार मेघ गर्जना कर रहे थे। उस समय पक्षियोंने उड़ना बंद कर दिया तथा विभिन्न जाति-के पशु इधर-उधर भागने लगे ॥ १४ ॥

नष्टसूर्येन्दुसदशैर्मेघैर्नभसि दारुणैः ।
अतिवृष्टेन लोकस्य विरूपमभवद् वपुः ॥ १५ ॥
चन्द्रमा और सूर्यको भी नष्ट कर देनेवाले प्रलयकालके समान आकाशमें छाये हुए उन भयंकर मेघोंने अपनी अति-वृष्टिके कारण समस्त पार्थिव जगत्के रूपको विकृत कर दिया ॥ १५ ॥

मेघौघैर्निष्प्रभाकारमदृश्यग्रहतारकम् ।
चन्द्रसूर्यांशुविरहितं खं बभूवातिनिष्प्रभम् ॥ १६ ॥
मेघोंकी घटाएँ घिर आनेसे व्योम-मण्डल प्रभाशून्य हो गया। ग्रह और तारे दृष्टिथसे ओझल हो गये। चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंका पता नहीं चलता था। अतः सारा आकाश अन्धकारसे आच्छन्न हो गया ॥ १६ ॥

वारिणा मेघमुक्तेन मुच्यमानेन चासकृत् ।
आबभौ सर्वतस्तत्र भूमिस्तोयमयी यथा ॥ १७ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६५

मेघोंके बरसाये हुए तथा बारंबार बरसाये जाते हुए जलसे आवृत हो वहाँ सब ओरकी भूमि जलमयी-सी प्रतीत होने लगी ॥ १७ ॥

विनेदुर्वर्हिणस्तत्र तोककन्दरुताः खगाः। विवृद्धिं निम्नगा याताः प्लवगाः सम्प्लवं गताः ॥ १८ ॥

उस समय वहाँ मोर जोर-जोरसे बोलने लगे। पक्षियोंकी आवाज बहुत कम हो गयी। नदियोंमें बाढ़ आ गयी और किनारेके वृक्ष प्रवाहमें बह गये ॥ १८ ॥

गर्जितेन च मेघानां पर्जन्यनिनदेन च। तर्जितानीव कम्पन्ते तृणानि तरुभिः सह ॥ १९ ॥

मेघोंकी गर्जना तथा पर्जन्यदेवके गम्भीर नादसे डाँटे गयेकी भाँति वृक्षोंसहित तृण काँपने लगे ॥ १९ ॥

प्राप्तोऽन्तकालो लोकानां व्यक्तमेकार्णवा मही । इति गोपगणा वाक्यं व्याहरन्ति भयार्दिताः ॥ २० ॥

उस समय भयसे पीड़ित हुए गोप आपसमें कहने लगे कि 'निश्चय ही समस्त लोकोंका अन्तकाल आ पहुँचा है और पृथ्वी एकार्णवमें मग्न हो रही है' ॥ २० ॥

तेनोत्पाताम्बुवर्षेण गावो विप्रहता भृशम् । हम्भारवैः क्रन्दमाना न चेलुः स्तम्भितोपमाः ॥ २१ ॥

उस उत्पातस्वरूप जलकी भारी वर्षासे अत्यन्त ताड़ित एवं पीड़ित हुई गौएँ रँभानेकी ध्वनिसे करुणक्रन्दन करती हुई हिल-डुल भी न सकीं। ऐसा जान पड़ता था, उनके सारे अङ्ग अकड़ गये हैं ॥ २१ ॥

निष्कम्पसक्थिचरणा निष्प्रयत्नखुराननाः । हृष्टरोमार्द्रतनवः क्षामकुक्षिपयोधराः ॥ २२ ॥

उनकी जाँघें और पैर हिल नहीं पाते थे, खुर और मुख निश्चेष्ट थे, भीगे हुए शरीरमें रोंगटे खड़े हो गये थे और पेट तथा थन अत्यन्त दुबले होकर सिकुड़ गये थे ॥२२॥

काश्चित् प्राणाञ्जहुः श्रान्ता निपेतुः काश्चिदातुराः । काश्चित्सवत्साः पतिता गावः शीकरवेजिताः ॥ २३ ॥

कुछ गौओंने पीड़ासे श्रान्त होकर अपने प्राण त्याग दिये। कुछ आतुर होकर गिर पड़ीं और कितनी ही गौएँ जलके छींटोंसे उद्विग्न होकर बछड़ोंसहित धराशायिनी हो गयीं ॥ २३ ॥

काश्चिदाक्रम्य क्रोडेन वत्सांस्तिष्ठन्ति मातरः । विमुखाः श्रान्तसक्थ्यश्च निराहाराः कृशोदराः। पेतुराता॑ वेपमाना गावो वर्षपराजिताः ॥ २४ ॥

कुछ गौमाताएँ बछड़ोंको अपने अङ्कमें छिपाकर खड़ी थीं, कितनी ही बछड़ोंकी ओरसे विमुख हो गयी थीं, उनकी जाँघें शिथिल हो रही थीं, कुछ दाना-घास न मिलनेके कारण उनके पेट भीतरको धँस गये थे। वर्षासे परास्त होकर पीड़ित हुई गौएँ थर-थर काँपती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ती थीं ॥ २४॥

वत्साश्चोन्मुखका बाला दामोदरमुखाः स्थिताः । त्राहीति वदनैर्दीनैः कृष्णमूचुरिवार्दिताः ॥ २५ ॥

छोटे-छोटे बछड़े मुँह ऊपर उठाकर दामोदरकी ओर देखते हुए खड़े थे, मानो वे पीड़ित बछड़े अपने दीन मुखों- से श्रीकृष्णको सम्बोधित करके कह रहे थे कि 'प्रभो ! हमारी रक्षा कीजिये' ॥ २५ ॥

गवां तत् कदनं दृष्ट्वा दुर्दिनागमजं महत् । गोपांश्चासन्ननिधनान् कृष्णः कोपं समादधे ॥ २६ ॥

इस दुर्दिनके आनेसे गौओंका वह महासंहार होता देख और गोपोंको भी मौतके निकट पहुँचा हुआ जान श्रीकृष्णने इन्द्रके प्रति महान् कोप धारण किया ॥ २६ ॥

स चिन्तयित्वा संरब्धो दृष्टो योगो मयेति च । आत्मानमात्मना वाक्यमिदमूचे प्रियंवदः ॥ २७ ॥

प्रिय वचन बोलनेवाले श्रीकृष्णने कुछ देर सोच- विचारकर रोषावेशसे युक्त हो स्वयं ही अपने-आपसे इस प्रकार कहा— 'इस वर्षासे बचनेका उपाय मैंने देख लिया ॥ २७ ॥

अद्याहमिममत्पाट्य सकाननवनं गिरिम् । कल्पयेयं गवां स्थानं वर्षत्राणाय दुर्धरम् ॥ २८ ॥

'आज मैं वन और काननोंसहित इस दुर्धर गोवर्धन पर्वतको उखाड़कर गौओंको वर्षासे बचानेके लिये सुरक्षित स्थानका निर्माण करूँगा ॥ २८ ॥

अयं धृतो मया शैलः पृथ्वीगृहनिभोपमः । त्रास्यते सव्रजा गा वै मद्ध्वयस्थ भविष्यति ॥ २९ ॥

'मेरे द्वारा धारण किया हुआ यह पर्वत पृथ्वीपर बने हुए घरके समान होकर व्रजसहित समूची गौओंका परित्राण करेगा और मेरे अधीन हो जायगा' ॥ २९ ॥

एवं स चिन्तयित्वा तु कृष्णः सत्यपराक्रमः । वाह्रोर्बलं दर्शयिष्यन् समीपं तं महीधरम् । दोर्भ्यामुत्पाटयामास कृष्णो गिरिरिवापरः ॥ ३० ॥

इस प्रकार सोच-विचारकर सत्यपराक्रमी श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंका बल दिखाते हुए उस निकटवर्ती पर्वतको दोनों हाथोंसे पकड़कर उखाड़ लिया। उस समय श्रीकृष्ण दूसरे पर्वतके समान ही जान पड़ते थे ॥ ३० ॥

स धृतः संगतो मेघैर्गिरिः सव्येन पाणिना। गृहभावं गतस्तत्र गृहाकारेण वर्चसा ॥ ३१ ॥

भगवान्‌के बाये हाथसे धारण किया गया और मेघोंसे सटा हुआ वह पर्वत उनके गृहाकारक तेज या संकल्पसे वहाँ गृहभावको प्राप्त हो गया ॥ ३१ ॥

२६६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


भूमेरुत्पाट्यमानस्य तस्य शैलस्य सानुषु।
शिलाः प्रशिथिलाश्चेलुर्वनिपेतुश्च पादपाः॥ ३२ ॥

जिस समय वह पर्वत पृथ्वीसे उखाड़ा जाने लगा, उस समय उसके शिखरोंपर जो टूटी-फूटी शिलाएँ थीं, वे खिसककर गिरने लगीं और बहुत-से वृक्ष भी धराशायी हो गये॥ ३२ ॥

शिखरैर्घूर्ण्यमानैश्च सीदमानैश्च पादपैः।
विधूतैश्चोच्छ्रितैः शृङ्गैर्नगमः खगमोऽभवत् ॥ ३३॥

उस समय चक्कर काटते हुए शिखरों, खण्डित होते हुए वृक्षों तथा काँपती हुई ऊँची चोटियोंके कारण वह अविचल पर्वत आकाशचारी पक्षीके समान प्रतीत होने लगा॥ ३३ ॥

चलत्प्रस्रवणैः पार्श्वैर्मेघौघैरकतां गतैः।
भिद्यमानाश्मनिचयश्चचाल धरणीधरः ॥ ३४ ॥

पार्श्ववर्ती चञ्चल झरने मेघोंके समूहोंसे मिलकर एकताको प्राप्त हो गये। वह पर्वत हिलने लगा और उसकी प्रस्तरराशि विदीर्ण होकर बिखरने लगी ॥ ३४ ॥

न मेघानां प्रवृत्तानां न शैलस्याश्मवर्षिणः।
विविदुस्ते जना रूपं वायोस्तस्य च गर्जतः ॥ ३५ ॥

उस पर्वतके नीचे गर्भगृहमें बैठे हुए वे सब लोग न तो बरसते हुए मेघोंका, न पत्थर बरसानेवाले पर्वतका और न गरजती हुई वायुका ही स्वरूप जान सके ॥ ३५ ॥

मेघैः सशैलसंस्थानैर्नीलैः प्रस्रवणार्पितैः।
मिश्रीकृत इवाभाति गिरिरुद्धमवर्हवान् ॥३६॥

झरनोंसे मिले हुए पर्वताकार नील मेघोंसे मिश्रित हुआ वह पर्वत पंख उठाये हुए मोरके समान प्रतीत होता था ॥ ३६ ॥

आप्लुतोऽयं गिरिः पक्षैरिति विद्याधरोरगाः।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव वाचो मुञ्चन्ति सर्वशः ॥ ३७॥

विद्याधर, नाग गन्धर्व और अप्सराएं सब ओर ऐसी चर्चा करते थे कि यह पर्वत अपने मेघरूपी पंखोंमें ऊपरको उड़नेके लिये उद्यत-सा प्रतीत होता है ॥ ३७ ॥

सहस्ततलविन्यस्तो मुक्तमूलः क्षितेस्तलात्।
रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥३८॥

वह पर्वत श्रीकृष्णकी हथेलीपर टिका हुआ था। भूतलसे उसके मूल-भागका सम्बन्ध टूट चुका था। उस दशामे वह सोने, कोयले, चाँदी तथा गेरू आदि धातुओंको प्रकट करने लगा ॥ ३८ ॥

कानिचिच्छिथिलानीव संच्छिन्नाद्धानि कानिचित्।
गिरेर्मेघप्रविष्टानि तस्य शृङ्गाणि चाभवन् ॥ ३९ ॥

उस पर्वतके कुछ शिखर शिथिल-से हो गये थे, कुछ आधे भागसे टूट गये थे और कितने ही शिखर बादलोंके भीतर घुस गये थे ॥ ३९ ॥

गिरिणा कम्पमानेन कम्पितानां तु शाखिनाम्।
पुष्पमुच्चयचं भूमौ व्यशीर्यत समन्ततः ॥ ४०॥

पर्वतके हिलनेके साथ ही उसके ऊपरके वृक्ष कम्पित हो उठे और उनके नाना प्रकारके फूल पृथ्वीपर सब ओर बिखर गये ॥ ४० ॥

निःसृताः पृथुसूर्धानः स्वस्तिकार्धविभूषिताः।
द्विजिह्वपततः क्रुद्धाः खेचराः खे समन्ततः ॥ ४१ ॥

उस समय मोटे-मोटे मस्तकवाले सर्पराज, जो आकाशमें उड़नेकी शक्ति रखते थे, कुपित होकर आकाशमें सब ओर निकल पड़े। उनके शरीर आधे स्वस्तिकसे विभूषित थे ॥ ४१ ॥

आर्तिं जग्मुः खगगणा वर्षेण च भयेन च।
उत्पत्योत्पत्य गगनात् पुनः पेनुरवाङ्मुखाः ॥४२॥

पक्षियोंके समुदाय वर्षा और भयसे बड़े कष्टमें पड़ गये। वे उड़-उड़कर आकाशमें जाते और वहाँसे पुनः नीचे मुख किये गिर पड़ते थे ॥ ४२ ॥

रेसूरारोषिताः सिंहाः सजला इव तोयदाः।
गर्गरा इव मथ्यन्तो नेदुः शार्दूलपुङ्गवाः ॥ ४३ ॥

बहुत-से सिंह रोषमें भरकर सजल जलधरोंके समान दहाड़ रहे थे। बड़े-बड़े बाघ मथे जानेवाले मटोंके समान गम्भीर घोष करते थे ॥ ४३ ॥

विषमैश्च समीभूतैः समैश्चात्यन्तदुर्गमैः।
व्यावृत्तदेहः स गिरिरन्य एवोपलक्ष्यते ॥ ४४ ॥

उस पर्वतकी विषम भूमि सम हो गयी और समभूमि विषम होकर अत्यन्त दुर्गम हो गयी, इससे उसके स्वरूपमें इतना उलट-फेर हो गया कि वह किसी और ही पर्वत-सा दिखायी देता था ॥ ४४ ॥

अतिवृष्टस्य तैर्मेघैस्तस्य रूपं बभूव ह।
स्तम्भितस्येव रुद्रेण त्रिपुरस्य विहायसि ॥ ४५ ॥

उन मेघोंके द्वारा अतिवृष्टि होनेसे उस पर्वतका रूप वैसा ही हो गया, जैसा कि आकाशमें भगवान् रुद्रके द्वारा स्तम्भित किये गये त्रिपुरका रूप दिखायी देता था ॥४५॥

बाहुदण्डेन कृष्णस्य विधृतं सुमहत् तद्।
नीलाभ्रपटलच्छन्नं तद्गिरिच्छत्रमावभौ ॥ ४६ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके बाहुदण्डसे धारण किया गया तथा काले मेघ-समूहोंसे आच्छादित हुआ वह पर्वतरूपी छत्र बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ४६ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६७


स्वप्रायमानो जलदैर्निमीलितगुहामुखः ।
बाहूपधाने कृष्णस्य प्रसुप्त इव खे गिरिः ॥ ४७ ॥
सोनेकी इच्छा-सी रखनेवाला वह पर्वत आकाशमें श्रीकृष्णकी बाँहका तकिया लगाकर सोया हुआ-सा जान पड़ता था। उस समय उसका गुफारूपी मुख बादलोंकी चादरसे ढका हुआ था ॥ ४७ ॥

निर्विहङ्गरुतैर्वृक्षैर्निर्मयूरुतैर्वनैः ।
निरालम्ब इवाभाति गिरिः शिखिरवैर्वृतः ॥ ४८ ॥
उस पर्वतपर जो वृक्ष थे, उनपर पक्षियोंकी बोली नहीं सुनायी देती थी। वहाँके वन मयूरोंकी केका-ध्वनिसे शून्य हो गये थे। ऐसे वृक्षों और वनोंसे घिरा हुआ वह पर्वत अपने शिखरोंके साथ निरालम्ब-सा प्रतीत होता था ॥ ४८ ॥

पर्यस्तैर्घूर्णमानैश्च प्रचलद्भिश्च सानुभिः ।
सज्वराणीव शैलस्य वनानि शिखराणि च ॥ ४९ ॥
उसके श्रृंग अस्त-व्यस्त होकर चक्कर काटते और जोर-जोरसे हिलते थे। उनके कारण उस पर्वतके वन और शिखर ज्वरसे पीड़ित हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ४९ ॥

उत्तमाङ्गगतास्तस्य मेघाः पवनवाहनाः ।
त्वर्यमाणा महेन्द्रेण तोयं मुमुचुरक्षयम् ॥ ५० ॥
उस पर्वतके मस्तक (शिखर) पर पहुँचे हुए वायुरूपी वाहनवाले मेघ देवराज इन्द्रके द्वारा शीघ्रता करनेके लिये प्रेरित होनेपर अक्षय जलकी वर्षा करने लगे ॥ ५० ॥

स लम्बमानः कृष्णस्य भुजाग्रे सघनो गिरिः ।
चक्रारूढ इवाभाति देशो नृपतिपीडितः ॥ ५१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णकी भुजाके अग्रभागमें लटकता हुआ मेघोंसहित वह पर्वत किसी शत्रु राजाके द्वारा पीड़ित हुए देशकी भाँति चक्रपर चढ़ा हुआ-सा प्रतीत होता था* ॥ ५१ ॥

स मेघनिचयस्तस्थौ गिरिं तं परिवार्य ह ।
पुरं पुरस्कृत्य यथा स्फीतो जनपदो महान् ॥ ५२ ॥
वह मेघोंका समुदाय उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर उसी तरह खड़ा था, जैसे समृद्धिशाली महान् जनपद नगर या राजधानीको अपने सामने रखकर चारों ओर निवास करता है ॥ ५२ ॥

निवेश्य तं करे शैलं तोलयित्वा च सस्मितम् ।
प्रोवाच गोप्ता गोपानां प्रजापतिरिव स्थितः ॥ ५३ ॥
उस पर्वतको अपने हाथपर रखकर उसे संतुलित रखते हुए प्रजापतिके समान खड़े हुए गोपरक्षक भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराते हुए कहा— ॥ ५३ ॥

एतद् देवैरसम्भाव्यं दिव्येन विधिना मया ।
कृतं गिरिगृहं गोपा निर्वातं शरणं गवाम् ॥ ५४ ॥
'गोपगण ! मैंने दिव्य विधिसे यह पर्वतका घर बना दिया है, जिसे बनाना देवताओंके लिये भी असम्भव था। इसमें वर्षा और वायुका प्रवेश नहीं है। यह गौओंके लिये उत्तम आश्रय है ॥ ५४ ॥

क्षिप्रं विशन्तु यूथानि गवामिह हि शान्तये ।
निर्वातेषु च देशेषु निवसन्तु यथासुखम् ॥ ५५ ॥
'यहाँ शान्ति पानेके लिये गौओंके यूथ शीघ्र प्रवेश करें और इन वायुरहित स्थानोंमें सुखपूर्वक निवास करें ॥ ५५॥

यथाश्रेष्ठं यथायूथं यथासारं यथासुखम् ।
विभज्यन्तामयं देशः कृतं वर्षनिवारणम् ॥ ५६ ॥
'जो जैसे बड़े-छोटे हों, जिनके जैसे यूथ हों, जिनके पास जैसी साधन-सामग्री हो, उसके अनुसार तुम सब लोग सुखपूर्वक इस स्थानका बटवारा कर लो। मैंने वर्षाका भली-भाँति निवारण कर दिया है ॥ ५६ ॥

शैलोत्पाटनभूरेषा महती निर्मिता मया ।
पञ्चक्रोशप्रमाणेण क्रोशैकविस्तरो महान् ।
त्रैलोक्यमप्युत्सहते रक्षितुं किं पुनर्व्रजम् ॥ ५७ ॥
'मैंने पर्वतको उखाड़कर यहाँ रहने योग्य विशाल भूमि-का निर्माण कर दिया है। इसकी लंबाई पाँच कोस और चौड़ाई एक कोसकी है। यह महान् भूभाग तीनों लोकोंकी आँधी-पानीसे रक्षा कर सकता है, फिर व्रजकी तो बात ही क्या है ?' ॥ ५७ ॥

ततः किलकिलाशब्दो गवां हम्भारवैः सह ।
गोपानां तुमुलो जज्ञे मेघनादश्च वाह्यतः ॥ ५८ ॥
यह सुनकर भीतरकी ओर गौओंके रँभानेके साथ ही गोपोंकी किलकारियोंका तुमुल नाद गूँज उठा और बाहरकी ओर मेघोंकी गम्भीर गर्जना होने लगी ॥ ५८ ॥

प्राविशन्त ततो गावो गोपैर्यूथप्रकल्पिताः ।
तस्य शैलस्य विपुलं प्रदरं गह्वरोदरम् ॥ ५९ ॥
तदनन्तर गोपोंद्वारा एक-एक यूथके रूपमें विभक्त की हुई गौएँ उस पर्वतकी विशाल गुफामें, जिसका भीतरी भाग बहुत बड़ा था, प्रवेश करने लगीं ॥ ५९ ॥

कृष्णोऽपि मूले शैलस्य शैलस्तम्भ इवोच्छ्रितः ।
दधारैकेन हस्तेन शैलं प्रियमिवातिथिम् ॥ ६० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण भी उस पर्वतके मूलभागमे प्रस्तरनिर्मित ऊँचे खम्भके समान खड़े हो गये। उन्होंने उस पहाड़को


* शत्रु राजाद्वारा आक्रान्त देशके लोग रथ, शकट आदि वाहनोंपर आरूढ होकर जब पलायन करने लगते हैं, उस समय उन्हें चक्रारूढ कहा जाता है; उसी प्रकार इन्द्रसे पीडित पर्वत भगवान् श्रीकृष्णके हाथरूपी चक्रपर आरूढ हुआ दिखायी देता था ।

२६८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

अपने प्रिय अतिथिकी भाँति एक हाथमे पकड़ रखा था॥ ६०॥

ततो व्रजस्य भाण्डानि युक्तानि शकटानि च।
विविशुर्वर्षभीतास्ते तद् गृहं गिरिनिर्मितम्॥ ६१॥

तत्पश्चात् वर्षासे डरे हुए व्रजके गोप अपने बर्तन-भाँड़े और जुते हुए छकड़े लेकर उस पर्वतनिर्मित गृहमें प्रविष्ट हो गये॥ ६१॥

अतिदैवं तु कृष्णस्य दृष्ट्वा तत् कर्म वज्रभृत्।
मिथ्याप्रतिज्ञो जलदान् वारयामास वै विभुः॥ ६२॥

श्रीकृष्णके उस कर्मको, जो देवताओके लिये भी असम्भव है, देखकर वज्रधारी भगवान् इन्द्रने उन मेघोंको रोक दिया। व्रजको नष्ट कर देनेकी उनकी प्रतिज्ञा झूठी हो गयी॥ ६२॥

सप्तरात्रे तु निर्वृत्ते धरण्यां विगतोत्सवः।
जगाम संवृत्तो मेघैर्वृत्रहा स्वर्गमुत्तमम्॥ ६३॥

सात राततक पृथ्वीपर वर्षा करनेके पश्चात् मेघोंसे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्र उत्सवहीन (आनन्दशून्य) हो (अथवा व्रजमें मनाये जानेवाले अपने उत्सवसे वञ्चित हो) उत्तम स्वर्गलोकको लौट गये॥ ६३॥

निवृत्ते सप्तरात्रे तु निष्प्रयत्ने शतक्रतौ।
गताभ्रे विमले व्योम्नि दिवसे दीप्तभास्करे॥ ६४॥
गावस्तैनैव मार्गेण परिजग्मुर्यथागतम्।
स्वं च स्थानं ततो गोपः प्रत्ययात् पुनरेव सः॥ ६५॥

सात रात बीत जानेपर जब इन्द्रका सारा प्रयत्न निष्फल हो गया, बादल नष्ट हो गये, आकाश निर्मल हो गया और दिनमे सूर्यदेव देदीप्यमान हो उठे, उस समय सारी गौएँ फिर उसी मार्गसे जैसे आयी थीं, उसी तरह लौट गयीं। सारा व्रज पुनः अपने निवासस्थानको चला गया॥ ६४-६५॥

कृष्णोऽपि तं गिरिश्रेष्ठं स्वस्थाने स्थावरात्मवान्।
प्रीतो निवेशयामास शिवाय वरदो विभुः॥ ६६॥

स्थिर भावसे खड़े हुए वरदायक भगवान् श्रीकृष्णने भी प्रसन्न होकर फिर जगत्के कल्याणके लिये उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने स्थानपर स्थापित कर दिया॥ ६६॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोवर्धनधारणेऽष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका गोवर्धनधारणविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥


एकोनविंशोऽध्यायः

देवराज इन्द्रका आगमन, श्रीकृष्णका गोविन्द-पदपर अभिषेक तथा इन्द्रका श्रीकृष्णको भावी कार्य बताकर अर्जुनकी देख-भालके लिये कहना और श्रीकृष्णका उसे स्वीकार करना

वैशम्पायन उवाच

धृतं गोवर्धनं दृष्ट्वा परित्रातं च गोकुलम्।
कृष्णस्य दर्शनं शक्रो रोचयामास विस्मितः॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब इन्द्रने देखा कि श्रीकृष्णने गोवर्धन धारण करके गोकुलकी रक्षा कर ली, तब वे बड़े विस्मयमें पड़े। अब उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन करनेकी इच्छा हुई॥ १॥

स निर्जलाम्बुदाकारं मत्तं मदजलोक्षितम्।
आरुह्यैरावतं नागमाजगाम महीतलम्॥ २॥

वे जलहीन बादलके समान श्वेत वर्णवाले और मदके जलसे भीगे हुए ऐरावत नामक मदमत्त हाथीपर चढ़कर भूतलपर आये॥ २॥

स ददर्शापविष्टं वै गोवर्द्धनशिलातले।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणं पुरुहूतः पुरंदरः॥ ३॥

अनेक नामोंसे पुकारे जानेवाले पुरंदर इन्द्रने वहाँ आकर देखा, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वतकी एक शिलापर बैठे हुए हैं॥ ३॥

तं वीक्ष्य बालं महता तेजसा दीप्तमव्ययम्।
गोपवेषधरं विष्णुं प्रीतिं लेभे पुरंदरः॥ ४॥

महान् तेजसे उद्दीप्त होनेवाले गोपवेषधारी विष्णु-स्वरूप उन अविनाशी बालकृष्णको देखकर देवराज इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ४॥

तं सोऽम्बुजदलश्यामं कृष्णं श्रीवत्सलक्षणम्।
पर्याप्तनयनः शक्रः सर्वैर्नेत्रैरुपैक्षत॥ ५॥

नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर एवं श्रीवत्स-चिह्न-विभूषित उन श्रीकृष्णको देखकर इन्द्रको अपने नेत्रोंका फल प्राप्त हो गया। उन्होंने अपने सम्पूर्ण नेत्रोंसे जी भरकर उन्हें देखा॥ ५॥

दृष्ट्वा चैनं श्रिया जुष्टं मर्त्यलोकेऽमरोपमम्।
सूपविष्टं शिलापृष्ठे शक्रः स व्रीडितोऽभवत्॥ ६॥

मर्त्यलोकमे रहकर भी देवोपम शोभासे सम्पन्न श्रीकृष्णको शिलापृष्ठपर सुखपूर्वक बैठा देख इन्द्रको बड़ी लज्जा हुई॥ ६॥

तस्योपविष्टस्य मुखं पक्षाभ्यां पक्षिपुङ्गवः।
अन्तर्द्धानं गतच्छायां चकारोरगभोजनः॥ ७॥

विष्णुपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः २६९

वहाँ बैठे हुए श्रीहरिके मुखपर सर्पभोजी पक्षिराज गरुड़ अदृश्य रहकर अपने दोनों पंखोंसे छाया किये हुए थे ॥ ७ ॥

तं विविक्ते वनगतं लोकवृत्तान्ततत्परम् । उपस्थे गजं हित्वा कृष्णं वलनिषूदनः ॥ ८ ॥

बलसूदन इन्द्र हाथी छोड़कर उतर पड़े और एकान्तमे वनके भीतर रहकर लोक-व्यवहारमें तत्पर हुए श्रीकृष्णकी सेवामे उपस्थित हुए ॥ ८ ॥

स समीपगतस्तस्य दिव्यस्रगनुलेपनः । रराज देवराजो वै वज्रपूर्णकरः प्रभुः ॥ ९ ॥

श्रीकृष्णके समीप जाकर दिव्य पुष्पोंके हार और अनुलेपन धारण करनेवाले प्रभावशाली देवराज इन्द्र बड़ी शोभा पा रहे थे । उनका हाथ वज्रसे परिपूर्ण था ॥ ९ ॥

किरीटेनार्कतुल्येन विद्युद्योतकारिणा । कुण्डलाभ्यां स दिव्याभ्यां सततं शोभिताननः ॥ १० ॥

विद्युत्के समान प्रकाश फैलानेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी किरीट तथा दो दिव्य कुण्डलोंसे उनके श्रीमुखकी सदा ही बड़ी शोभा होती थी ॥ १० ॥

पञ्चस्तबकलम्बेन हारेणोरसि भूषितः । सहस्रपत्रकान्तेन देहभूषणकारिणा । ईक्षमाणः सहस्रेण नेत्राणां कामरूपिणाम् ॥ ११ ॥

वे अपने वक्षःस्थलपर एक ऐसे हारसे विभूषित थे, जिसमें फूलोंके पाँच गुच्छे लटक रहे थे । खिले हुए कमलदलके समान कान्तिमान्, सम्पूर्ण शरीरको विभूषित करनेवाले तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले एक सहस्र नेत्रोंसे वे भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देख रहे थे ॥ ११ ॥

त्रिदशाज्ञापनार्थेन मेघनिर्घोषकारिणा । अथ दिव्येन मधुरं व्याजहार स्वरेण तम् ॥ १२ ॥

उन्होंने देवताओंको आज्ञा देनेके लिये अभ्यस्त और मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले दिव्य स्वरसे मधुर वाणीमे भगवान्‌से इस प्रकार कहा ॥ १२ ॥

इन्द्र उवाच

कृष्ण कृष्ण महाबाहो ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन । अतिदिव्यं कृतं कर्म त्वया प्रीतिमती गवाम् ॥ १३ ॥

इन्द्र बोले—कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! आप सजातीय बन्धुओंके आनन्दकी वृद्धि करनेवाले हैं । गौओके प्रति प्रीति रखकर आपने जो कर्म किया है, वह अति दिव्य है ॥ १३ ॥

मयोत्सृष्टेषु मेघेषु युगान्तावर्तकारिषु । यत्त्वया रक्षिता गावस्तेनास्मि परितोषितः ॥ १४ ॥

मेरेद्वारा छोड़े गये प्रलयकी पुनरावृत्ति करनेवाले मेघोंके वर्षा करनेपर भी आपने जो गौओकी रक्षा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ॥ १४ ॥

स्वायम्भुवेन योगेन यश्चायं पर्वतोत्तमः । धृतो वेश्मवदाकाशे को ह्येतेन न विस्मयेत् ॥ १५ ॥

यह जो उत्तम पर्वत है, इसे आपने स्वायम्भुव योगसे आकाशमे घरकी भाँति धारण कर लिया था । आपके इस अलौकिक कर्मसे किसको आश्चर्य नहीं होगा ॥ १५ ॥

प्रतिषिद्धे मम मखे मयेयं रुषितेन वै । अतिवृष्टिः कृता कृष्ण गवां वै साप्तरात्रिकी ॥ १६ ॥

श्रीकृष्ण ! जब मेरा प्रचलित उत्सव रोक दिया गया, तब मैने रोषमे भरकर गौओंपर अपना क्रोध उतारनेके लिये सात राततक अतिवृष्टि की ॥ १६ ॥

सा त्वया प्रतिषिद्धेयं मेघवृष्टिर्दुरासदा । देवैः सदानवगणैर्दुर्निवाया मयि स्थिते ॥ १७ ॥

उस दुर्जय मेघवृष्टिका आपने निवारण कर दिया । मेरे रहते दानवोसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी उस वर्षाको रोकना बहुत ही कठिन था ॥ १७ ॥

अहो मे सुप्रियं कृष्ण यत् त्वं मानुषदेहवान् । समग्रं वैष्णवं तेजो विनिगृह्णसि रोषितः ॥ १८ ॥

श्रीकृष्ण ! यह एक आश्चर्यमयी घटना हुई है । मेरे लिये यह बहुत ही प्रिय है कि आप मनुष्यशरीर धारण करके भी अपने भीतर सम्पूर्ण वैष्णव तेजको छिपाये रखते हैं और रोष दिलाये जानेपर उसे प्रकट कर सकते हैं ॥ १८ ॥

साधितं देवतानां हि मन्येऽहं कार्यमव्ययम् । त्वयि मानुष्यमापन्ने युक्ते चैव स्वतेजसा ॥ १९ ॥

आप मानव-शरीरको प्राप्त होकर भी अपने वैष्णव तेजसे सम्पन्न हैं, इसलिये मैं देवताओंके कार्यको सिद्ध हुआ ही मानता हूँ । अब हमारा कोई कार्य बिगड़ नहीं सकता ॥ १९ ॥

सेत्स्यते सर्वकार्यार्थो न किंचित् परिहास्यते । देवानां यद् भवान् नेता सर्वकार्यपुरोगमः ॥ २० ॥

जब आप देवताओके नेता हैं और सभी कार्योंमे अग्र-


१. स्वयम्भूव योग कहते हैं हैरण्यगर्भी ( ब्रह्म-सम्बन्धिनी ) धारणाको, उसके करनेसे भारी-से-भारी वस्तु भी हल्की हो जाती है। जैसे श्रीकृष्णके उठाते समय गोवर्धन पर्वत हलका हो गया था, इसी तरह उस योग या धारणाका आश्रय लेनेमे बड़ी-से-बड़ी वस्तु भी बहुत छोटी या अल्प हो जाती है। जैसे अगस्त्यके समुद्रपान करते समय उनके लिये सारा समुद्र तीन ही आचमनमें सीमित होकर आ गया था।

द्वितीयं नाद्य पश्यामि यस्तेषां च धुरं वहेत् ॥ २१ ॥

२७०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गामी रहते हैं, तब हमारा सब कार्य, समस्त प्रयोजन सिद्ध हो जायगा, कुछ भी बिगड़ने नहीं पायेगा ॥ २० ॥

एकस्त्वमसि देवानां लोकानां च सनातनः ।
द्वितीयं नाद्य पश्यामि यस्तेषां च धुरं वहेत् ॥ २१ ॥

प्रभो ! एकमात्र आप ही सम्पूर्ण देवता तथा लोकोंके सनातन रक्षक हैं। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको यहाँ ऐसा नहीं देखता, जो उन लोकों और देवताओंकी रक्षाका भार वहन कर सके ॥ २१ ॥

यथा हि पुङ्गवः श्रेष्ठो ह्यग्रे धुरि नियोज्यते ।
एवं त्वमसि देवानां मग्नानां द्विजवाहनः ॥ २२ ॥

जैसे श्रेष्ठ बैल भार ढोनेके लिये सबसे आगे जोता जाता है, उसी प्रकार आप संकटमें डूबे हुए देवताओंका उद्धार करनेके लिये सबसे आगे रहते हैं। पक्षिराज गरुड़ आपके वाहन हैं ॥ २२ ॥

त्वच्छरीरगतं कृष्ण जगत्प्रकरणं त्विदम् ।
ब्रह्मणा साधु निर्दिष्टं धातुभ्य इव काञ्चनम् ॥ २३ ॥

श्रीकृष्ण ! यह जो संसारकी सृष्टि है, वह सब आपके शरीरके भीतर ही है। ब्रह्माजीने तो उसका भलीभाँति निर्देश-मात्र किया है। जैसे सब धातुओंमें सुवर्ण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त देवताओंमें आप हैं ॥ २३ ॥

स्वयं स्वयम्भूर्भगवान् बुद्ध्याथ वयसापि वा ।
न त्वानुगन्तुं शक्नोति पङ्गुर्द्रुतगतिं यथा ॥ २४ ॥

साक्षात् स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा भी अपनी बुद्धि अथवा अवस्थाके द्वारा आपका अनुसरण नहीं कर सकते—आपके साथ-साथ नहीं चल सकते। ठीक उसी तरह, जैसे पङ्गु मनुष्य शीघ्रगामी पुरुषका पीछा नहीं कर सकता—उसके साथ नहीं जा सकता ॥ २४ ॥

स्थाणुभ्यो हिमवाञ्श्रेष्ठो ह्रदानां वरुणालयः ।
गरुत्मान् पक्षिणां श्रेष्ठो देवानां च भवान् वरः ॥ २५ ॥

समस्त पर्वतोंमें हिमवान् श्रेष्ठ है। सरोवरोंमें समुद्र उत्तम है। पक्षियोंमें गरुड़ तथा देवताओंमें आप श्रेष्ठ हैं ॥ २५ ॥

अपामधस्ताल्लोको वै तस्योपरि महीधराः ।
नागानामुपरिष्टाद् भूः पृथिव्युपरि मानुषाः ॥ २६ ॥

सबसे नीचे जललोक है, उसके ऊपर पर्वत हैं। यह पृथ्वी नागोंके ऊपर स्थित है और पृथ्वीपर मनुष्य निवास करते हैं ॥ २६ ॥

मनुष्यलोकादूर्ध्वं तु खगानां गतिरुच्यते ।
आकाशस्योपरि रविर्द्वारं स्वर्गस्य भानुमान् ॥ २७ ॥

मनुष्यलोकसे ऊपर आकाशमें पक्षियोंकी गति बतायी जाती है। आकाशसे ऊपर अंशुमाली सूर्य हैं, जो स्वर्गलोकके द्वार कहे गये हैं ॥ २७ ॥

देवलोकः परस्तस्माद् विमानगमनो महान् ।
यत्राहं कृष्ण देवानामैन्द्रे विनिहितः पदे ॥ २८ ॥

सूर्यलोकसे ऊपर देवताओंका महान् लोक है, जहाँ विमानसे यात्रा की जाती है। श्रीकृष्ण ! वहीं मुझे देवेन्द्र-पदपर स्थापित किया गया है ॥ २८ ॥

स्वर्गादूर्ध्वं ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगणसेवितः ।
तत्र सोमगतिश्चैव ज्योतिषां च महात्मनाम् ॥ २९ ॥

स्वर्गसे ऊपर ब्रह्मलोक है, जो ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित है। यहाँतक चन्द्रमाकी तथा महात्मा ग्रह-नक्षत्रोंकी गति है ॥ २९ ॥

तस्योपरि गवां लोकः साध्यास्तं पालयन्ति हि ।
स हि सर्वगतः कृष्ण महाकाशगतो महान् ॥ ३० ॥

ब्रह्मलोकसे ऊपर गोलोक है, जिसका साध्यगण पालन करते हैं। श्रीकृष्ण ! वह महान् लोक सर्वव्यापी है। महाकाशमें व्यापकरूपसे स्थित है ॥ ३० ॥

उपर्युपरि तत्रापि गतिस्तव तपोमयी ।
यां न विद्मो वयं सर्वे पृच्छन्तोऽपि पितामहम् ॥ ३१ ॥

उसमें भी आपकी तपोमयी गति सर्वोपरि है। हम पितामहसे पूछते रहनेपर भी अबतक आपकी उस गतिको नहीं जान सके हैं ॥ ३१ ॥

लोकस्त्वधो दुष्कृतिनां नागलोकस्तु दारुणः ।
पृथिवी कर्मशीलानां क्षेत्रं सर्वस्य कर्मणः ॥ ३२ ॥

भयंकर नागलोक सबसे नीचे है। वह पापाचारियोंको प्राप्त होनेवाला लोक या स्थान है। जो स्वभावसे ही कर्मठ हैं, उनके लिये यह भूलोक है। यह समस्त कर्मका क्षेत्र है ॥ ३२ ॥

खमस्थिराणां विषयो वायुना तुल्यवृत्तिनाम् ।
गतिः शमदमाढ्यानां स्वर्गः सुकृतकर्मणाम् ॥ ३३ ॥

जो अस्थिर हैं, जिनकी वृत्ति वायुके समान है, उनका आश्रय आकाश या अन्तरिक्षलोक है। जो शम-दमसे सम्पन्न हो पुण्य-कर्ममें लगे रहते हैं, उन मनुष्योंकी गति स्वर्गलोक है ॥ ३३ ॥

ब्राह्मे तपसि युक्तानां ब्रह्मलोकः परा गतिः ।
गवामेव तु गोलोको दुरारोहा हि सा गतिः ॥ ३४ ॥

जो ब्राह्म-तपमें संलग्न रहनेवाले लोग हैं, उनकी परम गति ब्रह्मलोक है। गोलोक तो गौओंको ही सुलभ होनेवाला लोक है। वह गति दूसरोंके लिये दुरारोह (दुर्लभ) है ॥ ३४ ॥

स तु लोकस्त्वया कृष्ण सीदमानः कृतात्मना ।
धृतो धृतिमन् वीर निघ्नतोपद्रवान् गवाम् ॥ ३५ ॥

वीर श्रीकृष्ण ! इस समय (मेरे द्वारा वर्षाके कारण) वही गौओंका लोक संकटमें पड़ गया था, जिसे आप-जैसे धैर्यशाली पुण्यात्मा पुरुषने उन गौओंपर आये हुए उपद्रवोंका नाश करके बचाया है ॥ ३५ ॥

विष्णुपर्व ] / एकोनविंशोऽध्यायः २७१


तदहं समुन्प्राप्तो गवां वाक्येन चोदितः।
ब्रह्मणश्च महाभाग गौरवात् तव चागतः॥ ३६॥
अतः महाभाग ! मैं (दिव्य कामधेनु आदि) गौओके तथा ब्रह्माजीके वचनोंसे प्रेरित होकर यहाँ आया हूँ। आपके प्रति मेरे मनमे जो गौरव है; उससे भी मुझे यहाँ आनेमे प्रेरणा मिली है॥ ३६॥

अहं भूतपतिः कृष्ण देवराजः पुरंदरः।
अदितेर्गर्भपर्याये पूर्वजस्ते पुराकृतः॥ ३७॥
श्रीकृष्ण ! मैं वही समस्त भूतोंका अधिपति देवराज इन्द्र हूँ, जिसे आपने पूर्वकालमें माता अदितिके गर्भमे आकर अपना बड़ा भाई बनाया था ॥ ३७॥

स्वतेजस्तेजसा चैव यत् ते दर्शितवानहम्।
देवरूपेण तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि मे विभो॥ ३८॥
प्रभो ! मैंने जो देवरूपसे उपस्थित होकर तेजसे अपना तेज प्रकट करके आपको दिखाया है, मेरे उस सारे अपराधको आप क्षमा कर दें ॥ ३८॥

एवं क्षान्तमनाः कृष्ण स्वेन सौम्येन तेजसा।
ब्रह्मणः शृणु मे वाक्यं गवां च गजविक्रम ॥ ३९॥
हाथीके समान पराक्रमी श्रीकृष्ण ! इस प्रकार आप अपने सौम्य तेजसे मनमें क्षमाभाव लाकर ब्रह्माजी तथा गौओ-के कहे हुए इस वचनको मेरे मुखसे सुनिये—॥ ३९॥

आह त्वां भगवान् ब्रह्मा गावश्चाकाशगा दिवि।
कर्मभिस्तोपिता दिव्यैस्तव संरक्षणादिभिः ॥ ४० ॥
भगवान् ब्रह्मा तथा द्युलोकमें स्थित हुई आकाशगामिनी गौओंने आपको यह संदेश दिया है कि 'हम आपके 'गोसंरक्षण' आदि दिव्य कर्मोंसे बहुत संतुष्ट हैं॥ ४०॥

भवता रक्षिता गावो गोलोकश्च महानयम्।
यद् वयं पुङ्गवैः सार्द्धं वर्द्धामः प्रसवैस्तथा ॥ ४१ ॥
'आपने जो गौओंकी रक्षा की है, उससे इस महान् गोलोकका संरक्षण हुआ है; क्योकि अब हम अपने साँड़ों और संतानोके साथ दिनोंदिन बढ़ रही हैं॥ ४१॥

कर्षकान् पुङ्गवैर्वाहीहैर्मेध्येन हविषा सुरान्।
श्रियं शकृत्प्रवृत्तेन तर्पयिष्याम कामदाः ॥ ४२ ॥
'हम गौएँ सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली हैं। अब हल या गाड़ीमे जोतने योग्य वलिष्ठ बैल देकर हम किसानोंको संतुष्ट करेंगी। दूध-घीके द्वारा पवित्र हविष्य प्रस्तुत करके देवताओंकी तृप्ति करेंगी और गोबर देकर साक्षात् श्रीदेवीको संतुष्ट करती रहेंगी ॥ ४२॥

तदस्माकं गुरुस्त्वं हि प्राणदश्च महाबलः।
अद्यप्रभृति नो राजा त्वमिन्द्रो वै भव प्रभो ॥ ४३ ॥
'प्रभो ! आप महान् बलशाली प्रभु हमारा परित्राण करनेके कारण हमारे गुरुरूप हैं; अतः आजसे आप हम गौओंके राजा इन्द्र हो जायें' ॥ ४३ ॥

तस्मात् त्वं काञ्चनैः पूर्णैर्दिव्यस्य पयसो घटैः।
एभिरद्याभिषिञ्चस्व मया हस्तोपनामितैः ॥ ४४॥
अतः (गौओंके इस अनुरोधके अनुसार) मेरे द्वारा हाथपर रखकर प्रस्तुत किये गये इन दिव्य जलसे भरे हुए सोनेके कलशोंद्वारा आप अपना अभिषेक करें ॥ ४४॥

अहं किलेन्द्रो देवानां त्वं गवामिन्द्रतां गतः।
गोविन्द इति लोकास्त्वां स्तोष्यन्ति भुवि शाश्वतम्॥४५।
मै देवताओंका इन्द्र हूँ और आप गौओंके इन्द्र हो गये ! आजसे इस भूतलपर सब लोग आप सनातन प्रभुको 'गोविन्द' कहकर आपका स्तवन करेगे ॥ ४५ ॥

ममोपरि यथेन्द्रस्त्वं स्थापितो गोभिरीश्वरः।
उपेन्द्र इति कृष्ण त्वां गास्यन्ति दिवि देवताः ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्ण ! गौओंने आप परमेश्वरको जो मेरे ऊपर इन्द्र बनाकर प्रतिष्ठित किया है, उसके अनुसार देवतालोग आपको 'उपेन्द्र' नाम देकर द्युलोकमें आपकी कीर्तिका गान करेंगे ॥ ४६ ॥

ये चेमे वार्षिका मासाश्चत्वारो विहिता मम।
एषामर्द्धं प्रयच्छामि शरत्कालं तु पश्चिमम् ॥ ४७ ॥
मेरी आराधनाके लिये जो ये वर्षाके चार महीने विहित हुए हैं, इनका पिछला आधा भाग, जिसे शरत्काल कहते हैं, मै आपको दे रहा हूँ ॥ ४७ ॥

अद्यप्रभृति मासौ द्वौ ज्ञास्यन्ति मम मानवाः।
वर्षार्द्धे च ध्वजो महां ततः पूजामवाप्स्यसि।
ममाम्बुप्रभवं दर्पं तदा त्यक्ष्यन्ति बर्हिणः ॥ ४८ ॥
सब मनुष्य आजसे 'श्रावण और भाद्रपद' इन दो ही महीनोंको मेरे लिये नियत मानेगे । इनके साथ वर्षाका आधा भाग व्यतीत हो जानेपर इन्द्रव्रतकी समासिके चिह्नभूत मेरे ध्वजकी स्थापना होगी। उसके बाद आपकी पूजा होने लगेगी। उस समय मोर मेरे द्वारा बरसाये गये जलसे उत्पन्न हुए मदको त्याग देंगे ॥ ४८ ॥

अल्पवाचो गतमदा ये चान्ये मेघनादिनः।
शान्तिं सर्वे गमिष्यन्ति मम कालविचारिणः ॥ ४९ ॥
उनकी बोली कम हो जायगी और उनका सारा मद उतर जायगा। मेघोंको देखकर गर्जना करनेवाले जो दूसरे प्राणी हैं, वे सब भी मेरे समयका विचार करके शान्ति (मौन) धारण कर लेंगे ॥ ४९ ॥

त्रिशङ्कुर्गस्त्यचरितामाशां च प्रचरिष्यति।
सहस्ररश्मिरादित्यस्तापयन् स्वेन तेजसा ॥ ५०॥

२७२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वर्षांमें ही सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेव अपने तेजसे जगत्को ताप देते हुए 'त्रिशङ्कु' और 'अगस्त्य मुनि' के द्वारा उपभोगमें लायी हुई दक्षिण दिशामें संचार करेंगे ॥५०॥

ततः शरदि युक्तायां मौनकामेषु बर्हिषु ।
याचमाने खगे तोयं विप्लुतेषु प्लवेषु च ॥ ५१ ॥
हंससारसपूर्णेषु नदीनां पुलिनेषु च ।
मत्तक्रौञ्चप्रणादेषु प्रमत्तवृषभेषु च ॥ ५२ ॥
गोषु चैव प्रहृष्टासु क्षरन्तीषु पयो बहु ।
निवृत्तेषु च मेघेषु निर्यात्य जगतो जलम् ॥ ५३ ॥
आकाशे शस्त्रसंकाशे हंसेषु च चरत्सु च ।
जातपद्मेषु तोयेषु वापीषु च सरस्सु च ॥ ५४ ॥
तडागेषु च कान्तेषु तोयेषु विमलेषु च ।
कलमावनताग्रासु कृष्णकेदारपङ्क्तिषु ॥ ५५ ॥
मध्यस्थं सलिलारम्भं कुर्वन्तीषु नदीषु च ।
सुसस्यायां च सीमायां मनोहार्यां मुनेरपि ॥ ५६ ॥
पृथिव्यां पृथुराष्ट्रायां रम्यायां वर्षसंक्षये ।
श्रीमत्सु पङ्क्तिमार्गेषु फलवत्सु तृणेषु च ।
इक्षुमत्सु च देशेषु प्रवृत्तेषु मखेषु च ॥ ५७ ॥
ततः प्रवर्त्स्यते पुण्या शरत् सुप्तोत्थिते त्वयि ।

तदनन्तर जब शरद्ऋतुका योग प्राप्त होगा, मोर मौन रहनेकी इच्छा करेंगे, पपीहे जलकी याचना करने लगेंगे, नदियोंमें नाव चलना बंद हो जायगा (अर्थात् नदियोंमें जलकी बाढ़ नहीं रह जायगी), सरिताओंके तट हंसों और सारसोंसे भरे रहेंगे, मदमत्त क्रौञ्च पक्षी वहाँ कलरव करते होंगे, साँड़ मतवाले होकर घूमेंगे, गौएँ हर्षमें भरकर बहुत दूध देंगी, संसारके लिये जलकी वर्षा करके बादल विलीन हो जायेंगे, आकाश शस्त्रोंकी भाँति चमक उठेगा—निर्मल हो जायगा, हंस सब ओर विचरने लगेंगे, बावड़ी और सरोवरोंके जलोंमें कमल उत्पन्न हो जायेंगे, (उनके खिलनेसे) तड़ागोंकी शोभा बढ़ जायगी—वे कमनीय हो उठेंगे, सभी जलाशयोंके जल निर्मल हो जायेंगे, खेतोंकी श्रेणीबद्ध काली-काली क्यारियोंमें धानोंकी पकी बालें अग्रभागकी ओरसे लटकती होंगी, नदियाँ अपने जलका बहाव बीचमें कर लेंगी, ब्रजों अथवा गाँवोंकी सीमाएँ (खेतोंकी भूमि) सुन्दर सस्यों (अन्नान्नों) से सम्पन्न हो मुनियोंके भी मनको मोह लेनेवाली हो जायँगी, वर्षा संत जानेपर जब बहुत संख्यक राष्ट्रोंसे युक्त पृथ्वी रमणीय दिखायी देने लगेगी, पंक्तिबद्ध मार्ग शोभायमान हो जायेंगे, तृण बेलों तथा ओषधियोंमें फल लग जायेंगे, स्थान-स्थानपर ईखकी खेती लहराती दिखायी देगी, (आग्रायण और वाजपेय आदि) यज्ञ आरम्भ होने लगेंगे तथा आप (भगवान् विष्णु) जब सोकर जाग उठेंगे, उस समय पुण्यमयी शरद् ऋतुकी प्रवृत्ति होगी ॥ ५१–५७½ ॥

लोकेऽस्मिन् कृष्ण निखिले यथैव त्रिदिवे तथा ॥ ५८ ॥
नरास्त्वां चैव मां चैव ध्वजाकारासु यष्टिषु ।
महेन्द्रं चाप्युपेन्द्रं च महयन्ति महीतले ॥ ५९ ॥

श्रीकृष्ण ! वह शरत्काल प्राप्त होनेपर स्वर्गलोककी ही भाँति इस समस्त जगत्में रहनेवाले मनुष्य भी भूतलपर ध्वजाकार डंडोंमें मुझ महेन्द्रकी तथा आप उपेन्द्रकी पूजा करेंगे ॥ ५८-५९ ॥

ये चावयोः स्थिरे वृत्ते महेन्द्रोपेन्द्रसंज्ञिते ।
मानवाः प्रणमिष्यन्ति तेषां नास्त्यनयागमः ॥ ६० ॥

जो मानव हम दोनोंसे सम्बन्ध रखनेवाले इस सनातन आचार (महेन्द्रोपेन्द्रमख नामक उत्सव) में हमें प्रणाम करेंगे, उन्हें कभी अनीतिको सामना नहीं करना पड़ेगा ॥ ६० ॥

ततः शक्रस्तु तान् गृह्य घटान् दिव्यपयोधरान्।
अभिषेकेण गोविन्दं योजयामास योगवित् ॥ ६१ ॥

तदनन्तर योगवेत्ता इन्द्रने दिव्य (मन्दाकिनीका) जल धारण करनेवाले उन कलशोंको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्णका 'गोविन्द (गौओंके इन्द्र)'-पदपर अभिषेक किया ॥ ६१ ॥

दृष्ट्वा तमभिषिक्तं तु गावस्ताः सह यूथपैः ।
स्तनैः प्रस्रवयुक्तैश्च सिषिचुः कृष्णमव्ययम् ॥ ६२ ॥

(इन्द्रद्वारा) उनका अभिषेक हुआ देख यूथपतियों (साँड़ों) सहित उन दिव्य गौओंने भी दूधकी धारा बहाते हुए अपने थनोंद्वारा अविनाशी श्रीकृष्णका अभिषेचन किया ॥ ६२ ॥

मेघाश्च दिवि युक्ताभिः सामृताभिः समन्ततः ।
सिषिचुस्तोयधाराभिरभिषिच्य तमव्ययम् ॥ ६३ ॥

इसके बाद मेघोंने भी आकाशमें छोड़ी हुई अमृतयुक्त जलधाराओं द्वारा श्रीकृष्णको सब ओरसे नहलाकर उन अविनाशी ईश्वरका अभिषेक-कर्म सम्पन्न किया ॥ ६३ ॥

वनस्पतीनां सर्वेषां सुस्रावेन्दुनिभं पयः ।
ववर्षुः पुष्पवर्षं च नेदुस्तूर्याणि चाम्बरे ॥ ६४ ॥

तदनन्तर सभी वनस्पतियोंकी डालियोंसे चन्द्रमाके समान श्वेत दुग्ध टपकने लगा (इस तरह उन वनस्पतियोंने भी भगवान्का अभिषेक किया)। देवताओंने फूलोंकी वर्षा की तथा आकाशमें दिव्य बाजे अपने-आप बज उठे ॥ ६४ ॥

अस्तुवन् मुनयः सर्वे वाग्भिर्मन्त्रपरायणाः ।
एकार्णवे विविक्तं च दधार वसुधा वपुः ॥ ६५ ॥

तत्पश्चात् सभी मन्त्रपरायण मुनियोंने भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन किया। पृथ्वीने अपने उस स्वरूपको धारण किया, जो एकार्णवसे पृथक् होनेपर उसे प्राप्त हुआ था ॥ ६५ ॥

विष्णुपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः २७३


प्रसादं सागरा जग्मुर्ववुर्वाता जगद्धिताः।
मार्गस्थोऽपि वभौ भानुश्चन्द्रो नक्षत्रसंयुतः ॥ ६६ ॥
समस्त समुद्रोंके जल प्रसन्न (स्वच्छ-निर्मल) हो गये। वायु जगत्के लिये हितकारक होकर बहने लगी। सूर्यदेव अपने समुचित मार्गपर स्थित रहकर प्रकाशित होने लगे। चन्द्रमा नक्षत्रोंसे संयुक्त होकर सुशोभित होने लगे ॥ ६६ ॥

ईतयः प्रशमं जग्मुर्निर्वैररचना नृपाः।
प्रवालपत्रशबलाः पुष्पवन्तश्च पादपाः ॥ ६७॥
अतिवृष्टि आदि ईतियाँ शान्त हो गयीं। राजाओंके सभी कार्य वैरभावसे रहित होने लगे। वृक्ष फूलोंसे भर गये और नूतन पल्लवों तथा हरे-हरे पत्तोंसे विचित्र शोभा धारण करने लगे ॥ ६७ ॥

मदं प्रस्रुस्रुवुर्नागा यातास्तोषं वने मृगाः।
अलंकृता गात्ररूहैर्धातुभिर्भान्ति पर्वताः ॥ ६८ ॥
हाथी मद बहाने लगे। वनमें मृग आदि पशु संतोष प्राप्त करने लगे। पर्वत अपने ऊपर उगे हुए वृक्षों तथा विभिन्न धातुओंसे शोभा पाने लगे ॥ ६८ ॥

देवलोकोपमो लोकस्तुष्टोऽमृतरसैरिव।
आसीत् कृष्णाभिषेको हि दिव्यस्वर्गरसोक्षितः ॥ ६९॥
सम्पूर्ण जगत् देवलोकके समान सुखी हो गया, मानो उसे अमृत-रससे तृप्त कर दिया गया हो। इस प्रकार दिव्य स्वर्गीय रस (जल) से सिक्त होकर श्रीकृष्णका वह अभिषेक-कर्म सम्पन्न हुआ ॥ ६९ ॥

अभिषिक्तं तु तं गोभिः शक्रो गोविन्दमव्ययम्।
दिव्यमाल्याम्बरधरं देवदेवोऽब्रवीदिदम् ॥ ७० ॥
गौओं द्वारा अभिषिक्त होकर दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले अविनाशी गोविन्दसे देवदेव इन्द्रने इस प्रकार कहा—॥ ७० ॥

एष ते प्रथमः कृष्ण नियोगो गोषु यः कृतः।
श्रूयतामपरं कृष्ण ममागमनकारणम् ॥ ७१ ॥
'श्रीकृष्ण ! यह मैंने आपको अपने आगमनका प्रथम हेतु बताया है, जिसके अनुसार गौओंकी आज्ञाका पालन किया गया है। अब मेरे आनेका जो दूसरा कारण है, उसे भी सुन लीजिये ॥ ७१ ॥

क्षिप्रं प्रसाध्यतां कंसः केशी च तुरगाधमः।
अरिष्टश्च मदाविष्टो राजराज्यं ततः कुरु ॥ ७२ ॥
'मुझे यह कहना है कि आप शीघ्र ही कंस तथा अश्वोंमें अधम केशीका भी वध कर डालिये। मदमत्त अरिष्टासुरको यमलोक भेज दीजिये। तदनन्तर राजाओंपर शासन कीजिये ॥ ७२ ॥

पितृष्वसरि जातस्ते ममांशोऽहमिव स्थितः।
स ते रक्ष्यश्च मान्यश्च सख्ये च विनियुज्यताम् ॥ ७३ ॥
'आपकी बुआ कुन्तीके गर्भसे मेरा अंश उत्पन्न हुआ है, जो मेरे ही समान है। आप उसकी रक्षा और आदर करें तथा उसे अपना सखा बना लें ॥ ७३ ॥

त्वया ह्यनुगृहीतः स तव वृत्तानुवर्तकः।
त्वद्दृशे वर्तमानश्च प्राप्स्यते विपुलं यशः ॥ ७४ ॥
'आपसे अनुगृहीत होकर वह आपके बताये हुए आचारका पालन करेगा और सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहकर भूमण्डलमें महान् यश प्राप्त कर लेगा ॥ ७४ ॥

भारतस्य च वंशस्य स वरिष्ठो धनुर्धरः।
भविष्यत्यनुरूपश्च त्वदृते न च रंस्यते ॥ ७५॥
'वह भरतवंशका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होगा। आपकी इच्छाके अनुरूप बनकर रहेगा और आपके बिना कभी कहीं भी उसका मन नहीं लगेगा ॥ ७५ ॥

भारतं त्वयि चायत्तं तस्मिंश्च पुरुषोत्तमे।
उभाभ्यामपि संयोगे यास्यन्ति निधनं नृपाः ॥ ७६ ॥
'आप और उस पुरुषप्रवर कुन्तीकुमारपर ही महाभारत युद्ध अवलम्बित होगा। आप दोनोंका संयोग प्राप्त होनेपर राजालोग युद्धमें मारे जायेंगे ॥ ७६ ॥

प्रतिज्ञातं मया कृष्ण ऋषिमध्ये सुरेषु च।
मया पुत्रोऽर्जुनो नाम सृष्टः कुन्त्यां कुलोद्वहः ॥ ७७ ॥
'श्रीकृष्ण ! मैंने ऋषियों तथा देवताओंके बीचमें इस बातका विज्ञापन कर दिया है कि कुन्तीके गर्भसे मेरे द्वारा जिस कुलदीपक पुत्रकी उत्पत्ति हुई है, उसका नाम अर्जुन है ॥

सोऽस्त्राणां पारतत्त्वज्ञः श्रेष्ठश्चापाविकर्षणे।
तं प्रवेक्ष्यन्ति वै सर्वे राजानः शस्त्रयोधिनः ॥ ७८ ॥
'वह अस्त्रोंकी विद्यामें पारंगत है। धनुषको खींचनेमें सबसे श्रेष्ठ है। शस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेवाले सब नरेश उसीमें विलीन हो जायेंगे ॥ ७८ ॥

अक्षौहिणीस्तु शूराणां राज्ञां संग्रामशालिनाम्।
स एकः क्षत्रधर्मेण योजयिष्यति मृत्युना ॥ ७९ ॥
'संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर राजाओंकी कई अक्षौहिणी सेनाओंको वह अकेला ही क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करके मौतके घाट उतार देगा ॥ ७९ ॥

तस्यास्त्रचरितं मार्गे धनुषो लाघवेन च।
नानुयास्यन्ति राजानो देवा वा त्वां विना प्रभो ॥ ८० ॥
'प्रभो ! आपको छोड़कर दूसरे कोई देवता अथवा भूतलके नरेश अर्जुनके अस्त्र-मार्गका अनुसरण नहीं कर सकेंगे। उसमें जो धनुष चलानेकी फुर्ती है, उसके द्वारा भी कोई उसकी समानता नहीं कर सकता ॥ ८० ॥

स ते बन्धुः सहायश्च संग्रामेषु भविष्यति।
तस्य योगो विधातव्यस्त्वया गोविन्द मत्कृते ॥ ८१ ॥

२७४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

‘गोविन्द! युद्धके अवसरोंपर अर्जुन आपका सच्चा बन्धु एवं सहायक होगा। मेरे लिये अथवा मेरे कहनेसे आपको उसे अध्यात्मविद्याका उपदेश अवश्य करना चाहिये ॥ ८१ ॥

द्रष्टव्यश्च यथाहं वै त्वया मान्यश्च नित्यशः।
ज्ञाता त्वमेव लोकानामर्जुनस्य च नित्यशः ॥ ८२ ॥

‘आप अर्जुनको उसी तरह अपनापनकी दृष्टिसे देखें, जैसा मुझे देखा करते हैं। प्रतिदिन उसका आदर करते रहें। आप ही सम्पूर्ण लोकोंके ज्ञाता हैं, अतः अर्जुनका भी सदा ध्यान रखें ॥ ८२ ॥

त्वया च नित्यं संरक्ष्य आहवेषु महत्सु सः।
रक्षितस्य त्वया तस्य न मृत्युः प्रभविष्यति ॥ ८३ ॥

‘बड़े-बड़े युद्धके अवसरोंपर भी आपको नित्यप्रति उसकी रक्षा करनी चाहिये। आपसे सुरक्षित हुए अर्जुनपर मृत्युका वश नहीं चल सकेगा ॥ ८३ ॥

अर्जुनं विद्धि मां कृष्ण मां चैवात्मानमात्मना।
आत्मा तेऽहं यथा शश्वत् तथैव तव सोऽर्जुनः ॥ ८४ ॥

‘श्रीकृष्ण! आप अर्जुनको मेरा ही स्वरूप समझें और मुझे भी हृदयसे अपना आत्मा स्वीकार करें। जैसे मैं सदा ही आपका आत्मा हूँ, उसी प्रकार वह अर्जुन भी आपका आत्मा ही है ॥ ८४ ॥

त्वया लोकानिमाञ्जित्वा बलेर्हस्तात् त्रिभिः क्रमैः।
देवतानां कृतो राजा पुरा ज्येष्ठक्रमादहम् ॥ ८५ ॥

‘पूर्वकालमें आपने तीन पगोंद्वारा इन तीनों लोकोंको नापकर बलिके हाथसे अपने अधिकारमें ले लिया और मुझे ही अपना बड़ा भाई मानकर देवताओंका राजा बना दिया ॥

त्वां च सत्यमयं ज्ञात्वा सत्येष्टं सत्यविक्रमम्।
सत्येनोपेत्य देवा वै योजयन्ति रिपुक्षये ॥ ८६ ॥

‘आप सत्यमय हैं, सत्यरूपी यज्ञद्वारा आपका यजन हुआ है तथा आप सत्यपराक्रमी हैं, ऐसा जानकर देवतालोग सत्य-भावसे ही आपकी शरणमें आते और आपको शत्रु-संहारके कार्यमें लगाते हैं ॥ ८६ ॥

सोऽर्जुनो नाम मे पुत्रः पितुस्ते भगिनीसुतः।
इह सौहार्दमायातु भूत्वा सहचरस्तव ॥ ८७ ॥

‘अर्जुन नामसे प्रसिद्ध मेरा पुत्र आपके पिताकी बहिन (बुआ) का बेटा है। वह इस जगत्‌में आपका सहचर होकर आपके साथ पूर्ण सौहार्द स्थापित करे ॥ ८७ ॥

तस्य ते युध्यतः कृष्ण स्वस्थानेऽपि गृहेऽपि वा।
वोढव्या पुङ्गवेनेव धूः सदा रणमूर्धनि ॥ ८८ ॥

‘श्रीकृष्ण ! वह युद्ध कर रहा हो, अपने स्थानपर हो अथवा घरमें बैठा हो, आपको बलिष्ठ वृषभकी भाँति सदा उसका भार संभालना चाहिये। युद्धके मुहानेपर तो सदा ही आपको उसकी रक्षाका बोझ उठाना है ॥ ८८ ॥

कंसे विनिहते कृष्ण त्वया भाव्यर्थदर्शिना।
अभितस्तन्महद् युद्धं भविष्यति महीक्षिताम् ॥ ८९ ॥

‘श्रीकृष्ण ! आप तो भविष्यमें होनेवाली घटनाओंको भी प्रत्यक्षकी भाँति देखनेवाले हैं (अतः आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है)। जब कंस आपके द्वारा मार डाला जायगा, तब सब ओरसे आये हुए राजाओंका वह महान् युद्ध (महाभारत) होगा ॥ ८९ ॥

तत्र तेषां नृवीराणामतिमानुषकर्मणाम्।
विजयस्यार्जुनो भोक्ता यशसा त्वं च योक्ष्यसे ॥ ९० ॥

‘उस युद्धमें अतिमानव (अलौकिक) कर्म करनेवाले उन नरवीर राजाओंको जीतकर अर्जुन विजय-सुखका उपभोग करेगा और आप महान् सुयशके भागी होंगे ॥ ९० ॥

एतन्मे कृष्ण कात्स्न्येन कर्तुमर्हसि भाषितम्।
यद्यहं ते सुराश्चैव सत्यं च प्रियमच्युत ॥ ९१ ॥

‘अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्ण! यदि मैं, सम्पूर्ण देवता तथा सत्य आपको प्रिय हैं तो मैंने जो कुछ यहाँ कहा है, वह सब कार्य आपको पूर्ण करना चाहिये’॥

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा कृष्णो गोविन्दतां गतः।
प्रीतेन मनसा युक्तः प्रतिवाक्यं जगाद ह ॥ ९२ ॥

इन्द्रका यह वचन सुनकर 'गोविन्द' भावको प्राप्त हुए श्रीकृष्णने प्रसन्न-मनसे युक्त होकर इस प्रकार उत्तर दिया-॥

प्रीतोऽस्मि दर्शनाद् देव तव शक्र शचीपते।
यत् त्वयाभिहितं चेदं न किंचित् परिहास्यते ॥ ९३ ॥

‘देव! शचीवल्लभ शक्र! मैं तो आपके दर्शनसे ही प्रसन्न हो गया हूँ। आपने यह जो कुछ कहा है, वह सब पूरा किया जायगा; कुछ भी छोड़ा नहीं जायगा ॥ ९३ ॥

जानामि भवतो भावं जानाम्यर्जुनसम्भवम्।
जाने पितृष्वसारं च पाण्डोर्दत्तां महात्मनः ॥ ९४ ॥

‘आपका मेरे प्रति जो भाव है, उसे मैं जानता हूँ। मुझे अर्जुनके जन्मका भी पता है। महात्मा पाण्डुके साथ जिनका विवाह हुआ, उन अपनी बुआ कुन्तीको भी मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ९४ ॥

युधिष्ठिरं च जानामि कुमारं धर्मनिर्मितम्।
भीमसेनं च जानामि वायोः संतानजं सुतम् ॥ ९५ ॥

‘धर्मके द्वारा उत्पन्न हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे भी मैं परिचित हूँ। वायुकी संतान होकर उत्पन्न हुए अपनी बुआके बेटे भीमसेनको भी मैं जानता हूँ ॥ ९५ ॥

अश्विभ्यां साधु जानामि सृष्टं पुत्रद्वयं शुभम्।
नकुलं सहदेवं च माद्रीकुक्षिगतावुभौ ॥ ९६ ॥

‘दोनों अश्विनीकुमारोंने जिन दो शुभलक्षण पुत्रोंकी सृष्टि की है तथा जो माद्रीके गर्भमें रह चुके हैं, उन दोनों भाई नकुल और सहदेवके विषयमें भी मैं भलीभाँति जानकारी रखता हूँ ॥ ९६ ॥

विष्णुपर्व ] विंशोऽध्यायः २७५ कानीनं चापि जानामि सवितुः प्रथमं सुतम् । पितृष्वसरि कर्णं वै प्रसूतं सूततां गतम् ॥ ९७ ॥ 'बुआ कुन्तीके गर्भसे सूर्यदेवका संयोग पाकर कन्या- वस्थामे जो प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ था तथा जन्म लेनेके बाद जो सूत-भावको प्राप्त हो गया है, उस कर्णसे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ ॥ ९७ ॥ धार्तराष्ट्रांश्च मे सर्वे विदिता युद्धकाङ्क्षिणः । पाण्डोरुपरमं चैव शापाशनिनिपातजम् ॥ ९८ ॥ 'युद्धकी इच्छा रखनेवाले समस्त धृतराष्ट्र-पुत्रोंको भी मैं जानता हूँ । शापरूपी वज्रपातके कारण राजा पाण्डुका जो निधन हुआ है, वह भी मुझसे छिपा नहीं है ॥ ९८ ॥ तद् गच्छ त्रिदिवं शक्र सुखाय त्रिदिवौकसाम् । नार्जुनस्य रिपुः कश्चिन्ममाग्रे प्रभविष्यति ॥ ९९ ॥ 'अतः देवराज इन्द्र ! आप देवताओंको सुख देनेके लिये स्वर्गलोकको पधारिये । मेरे सामने अर्जुनका कोई भी शत्रु उसे परास्त नहीं कर सकेगा ॥ ९९ ॥' अर्जुनार्थे च तान् सर्वान् पाण्डवानक्षतान् युधि । कुन्त्या निर्यातयिष्यामि निवृत्ते भारते मृधे ॥१००॥ 'अर्जुनके लिये ही मैं महाभारत-युद्ध समाप्त होनेपर उन समस्त पाण्डवोंको कुन्तीकी सेवामें सकुशल लौटा दूँगा ॥ यच्च वक्ष्यति मां शक्र तनूजस्तव सोऽर्जुनः । भृत्यवत्तत् करिष्यामि तव स्नेहेन यन्त्रितः ॥१०१॥ 'देवेन्द्र ! आपका पुत्र अर्जुन मुझसे जो कुछ कहेगा, उसे मैं आपके स्नेह-पाशसे बँधकर आज्ञाकारी सेवककी भाँति पूर्ण करूँगा' ॥ १०१ ॥ सत्यसंघस्य तच्छ्रुत्वा प्रियं प्रीतस्य भाषितम् । कृष्णस्य साक्षात् त्रिदिवं जगाम त्रिदशेश्वरः ॥१०२॥ सत्यप्रतिज्ञ श्रीकृष्णके प्रसन्नतापूर्वक कहे गये इस प्रिय वचनको सुनकर देवेश्वर इन्द्र साक्षात् स्वर्गलोकको चले गये ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोविन्दाभिषेके एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गोविन्दका अभिषेकविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥ विंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका अलौकिक चरित्र देखकर आशङ्कित हुए गोपोंका उनसे प्रश्न और श्रीकृष्णद्वारा उत्तर तथा उनकी रासलीलाका संक्षेपसे वर्णन वैशम्पायन उवाच गते शक्रे ततः कृष्णः पूज्यमानो व्रजालयैः । गोवर्धनधरः श्रीमान् विवेश व्रजमेव ह ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! देवराज इन्द्र- के चले जानेपर व्रजवासियोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित होते हुए गोवर्धनधारी श्रीमान् कृष्णने व्रजमें ही प्रवेश किया ॥१॥ तस्य वृद्धाभिनन्दन्ति ज्ञातयश्च सहोषिताः । धन्याः स्मोऽनुगृहीताः स्मस्त्वद्वृत्तेन नयेन च ॥ २ ॥ गावो वर्षभयात् तीर्णा वयं तीर्णा महाभयात् । तव प्रसादाद् गोविन्द देवतुल्यपराक्रम ॥ ३ ॥ वहाँ बड़े-बूढ़े गोप और साथ रहनेवाले जाति-भाई उनका अभिनन्दन करते हुए बोले- 'देवतुल्य पराक्रमी गोविन्द ! हम धन्य हैं। तुमने अपने व्यवहार और नीतिसे हमलोगोंपर महान् अनुग्रह किया है। तुम्हारे प्रसादसे गौओंका वर्षाके भयसे उद्धार हुआ और हमलोग भी महान् भयसे पार हो गये ॥ २-३ ॥ अमानुषाणि कर्माणि तव पश्याम गोपते । धारणेनास्य शैलस्य विश्वस्त्वां कृष्ण दैवतम् ॥ ४ ॥ 'गोपते ! हम तुम्हारे सभी कर्म अलौकिक देख रहे हैं। श्रीकृष्ण ! इस गोवर्धन पर्वतको हाथपर धारण करनेसे हम यह अच्छी तरह समझ गये हैं कि तुम मनुष्य नहीं देवता हो ॥ ४ ॥ कस्त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां च महाबलः । वसूनां वा किमर्थं च वसुदेवः पिता तव ॥ ५ ॥ 'तुम्हारा बल महान् है। बताओ, तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओंमेंसे कौन हो ? ये नन्दजी तुम्हारे पिता कैसे हो गये ? ॥ ५ ॥ बलं च बाल्ये क्रीडा च जन्म चास्मासु गर्हितम् । कृष्ण दिव्या च ते चेष्टा शङ्कितानि मनांसि नः ॥ ६ ॥ 'श्रीकृष्ण ! बचपनमें ही तुममें ऐसा अलौकिक बल है, तुम्हारे खेल भी अलौकिक हैं तथा तुम्हारी सारी चेष्टा दिव्य है। परंतु हमलोगोंमें जो तुम्हारा जन्म हुआ, यही निन्दित है । ( तुम्हें ऐसा निन्दित जन्म कैसे प्राप्त हुआ ?) इन बातोंको सोचकर हमारे हृदय शंकित हो उठे हैं ॥ ६ ॥ किमर्थं गोपवेषेण रमसेऽस्मासु गर्हितम् । लोकपालोपमश्चैव गास्त्वं किं परिरक्षसि ॥ ७ ॥ १. हरिवंशपर्वके ५५ वें अध्यायमें वसुदेव और नन्दको अभिन्न बताया गया है। एक ही कश्यपके दो रूप हैं वसुदेव और नन्द। अतः कहीं-कहीं नन्दके लिये भी वसुदेव नामका प्रयोग हुआ है; इसीलिये यहाँ 'वसुदेव' पदका नन्द अर्थ किया गया है।