विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६३
स उवाच ततो गोपान् गिरिप्रभवया गिरा ।
अद्यप्रभृति चेज्योऽहं गोषु यद्यस्तु वो दया ॥ २७ ॥
तब उन्होंने पर्वतसे प्रकट हुई वाणीद्वारा उन गोपोंसे कहा—‘यदि तुमलोगोंमें दयाभाव विद्यमान हो, तो आजसे तुम्हें गौओंके भीतर मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ २७ ॥
अहं वः प्रथमो देवः सर्वकामरः शुभः ।
मम प्रभावाच्च गवामयुतान्येव भोक्ष्यथ ॥ २८ ॥
‘मैं तुमलोगोंका प्रथम देवता हूँ, तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और शुभचिन्तक हूँ। तुम मेरे प्रभावसे दस हजार गौओंके स्वामी एवं (उनके दूध-दही आदि-के) उपभोक्ता बने रहोगे ॥ २८ ॥
शिवश्च वो भविष्यामि मद्भक्तानां वने वने ।
रंस्ये च सह युष्माभिर्यथा दिविगतस्तथा ॥ २९ ॥
‘मुझमें भक्ति रखनेवाले तुम गोपोंके लिये मैं प्रत्येक वनमें कल्याणकारी होऊँगा और तुमलोगोंके साथ मैं उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहूँगा, जैसे दिव्य धाममे रहा करता हूँ॥
ये चेमे प्रथिता गोपा नन्दगोपपुरोगमाः ।
एषां प्रीतः प्रयच्छामि गोपानां विपुलं धनम् ॥ ३० ॥
‘ये जो नन्द आदि विख्यात गोप हैं, मैं प्रसन्न होकर इन सबको प्रचुर धन-सम्पत्ति प्रदान करूँगा ॥ ३० ॥
पर्याप्नुवन्तु क्षिप्रं मां गावो वत्ससमाकुलाः ।
एवं मम परा प्रीतिर्भविष्यति न संशयः ॥ ३१ ॥
‘अब बछड़ोंसहित गौएँ शीघ्र मेरी परिक्रमा करें। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३१ ॥
ततो नीराजनार्थं हि वृन्दशो गोकुलानि तम् ।
परिवव्रुर्गिरिवरं सवृषाणि समन्ततः ॥ ३२ ॥
फिर तो झुंड-की-झुंड गौएँ साँड़ोंके साथ आकर परिक्रमाके लिये गिरिराजको सब ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं ॥
ता गावः प्रद्रुता हृष्टाः सापीड़स्तवकाङ्गदाः ।
सस्रजापीड़शृङ्गाग्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३३ ॥
उनके मस्तकपर फूलोंके आभूषण बँधे हुए थे, चारो पैरोंमें पुष्पगुच्छोंके ही बने हुए बाजूबंद पहनाये गये थे, सींगोंके अग्रभागमें फूलोंके गजरे और शिरोभूषण शोभा पा रहे थे, ऐसी सैकड़ों और हजारों गौएँ हर्षमें भरकर एक साथ परिक्रमाके पथपर दौड़ीं ॥ ३३ ॥
अनुजग्मुश्च गोपालाः कालयन्तो धनानि च ।
भक्तिच्छेदानुलिप्ताङ्गा रक्तपीतसिताम्बराः ॥ ३४ ॥
गोपगण अपने उन गोधनोको हाँकते हुए उनके पीछे-पीछे चले। उन गोपोके विभिन्न अङ्गोंमें विभागपूर्वक नाना रंगोंके अनुलेप लगे थे। वे लाल, पीले और सफेद कपड़ोंसे सुशोभित थे ॥ ३४ ॥
मयूरचित्राङ्गदिनो भुजैः प्रहरणावृतैः ।
'मयूरपत्रवृन्तानां केशबन्धैः सुयोजितैः ॥ ३५ ॥
वभ्राजुरधिकं गोपाः समवाये तदाद्भुते ।
उनकी भुजाओमे मोरपत्रके विचित्र बाजूवंद बँधे हुए थे और उन्हीं हाथोमे डंडे भी शोभा पा रहे थे। उनके सुन्दर ढंगसे बँधे हुए केशोंमे मोरपंखके वृन्त खोसे गये थे। इन सबके कारण उस अद्भुत समुदाय या मेलेमें उन गोपोंकी अधिक शोभा हो रही थी ॥ ३५ १/२ ॥
अन्ये वृषानाबुरुहुर्नृत्यन्ति स्म परे मुदा ॥ ३६ ॥
गोपालास्त्वपरे गांश्च जगृहुर्वेगगामिनः ।
कुछ अन्य गोप बैलोपर चढ़े थे। दूसरे ग्वाले हर्षमे भरकर नाच रहे थे तथा अन्य बहुत-से गोपाल वेगपूर्वक भागी जाती हुई गौओको पकड़ते थे ॥ ३६ १/२ ॥
तस्मिन् पर्यायनिवृत्ते गवां नीराजनोत्सवे ॥ ३७ ॥
अन्तर्धानं जगामाशु तेन देहेन सोऽचलः ।
गौओंद्वारा नीराजना (परिक्रमा) का वह उत्सव बारी-बारीसे सम्पन्न हो जानेपर वे पर्वतदेवता अपने उस दिव्य शरीरसे शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये ॥ ३७ १/२ ॥
कृष्णोऽपि गोपसहितो विवेश व्रजमेव ह ॥ ३८ ॥
गिरियज्ञप्रवृत्तेन तेनाश्चर्येण विस्मिताः ।
गोपाः सबालवृद्धा वै तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३९ ॥
इधर श्रीकृष्ण भी गोपोंके साथ व्रजमे ही चले गये। गिरियज्ञके अनुष्ठानसे प्राप्त हुए उस महान् आश्चर्यसे चकित हो बालकों और वृद्धोंसहित सम्पूर्ण गोप मधुसूदन श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे ॥ ३८-३९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गिरियज्ञप्रवर्तने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गिरियज्ञका अनुष्ठानविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अष्टादशोऽध्यायः
इन्द्रका संवर्तक मेघोंद्वारा वर्षा कराकर गौओं और गोपोंको कष्टमें डालना, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धनधारण तथा उसके नीचे गौओं और गोपोंसहित व्रजवासियोंका जाना
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— |
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| महे प्रतिहते शक्रः सक्रोधस्त्रिदशेश्वरः ।<br>संवर्तकं नाम गणं तोयदानामथाब्रवीत् ॥ १ ॥ | जनमेजय ! अपना उत्सव रोक दिये जानेके कारण देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने मेघोंके संवर्तक नामक गणको बुलाकर इस प्रकार कहा—॥ १ ॥ |