विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे ]
भो वलाहकमातङ्गाः श्रूयतां मम भाषितम् ।
यदि वो मत्प्रियं कार्यं राजभक्तिपुरस्कृतम् ॥ २ ॥
'मतवाले हाथियोंके समान श्रेष्ठ मेघगण ! यदि तुम्हें राजभक्तिको सामने रखते हुए मेरा प्रिय कार्य करना उचित जान पड़े, तो मेरी यह बात सुनो ॥ २ ॥
एते वृन्दावनगता दामोदरपरायणाः ।
नन्दगोपादया गोपा विद्विषन्ति ममोत्सवम् ॥ ३ ॥
'ये वृन्दावनमें गये हुए जो नन्द आदि गोप हैं, वे दामोदर श्रीकृष्णको ही सबसे बड़ा सहारा मानकर मेरे उत्सव-से द्वेष रखने लगे हैं ॥ ३ ॥
आजीवो यः परस्तेषां गोपत्वं च यतः स्मृतम् ।
ता गावः सप्तरात्रेण पीड्यन्तां वर्षमारुतैः ॥ ४ ॥
'अतः मेरी आज्ञा है कि उन गोपोंकी जो सबसे बड़ी आजीविका है तथा जिनका पालन करनेके कारण उनका गोपत्व सार्थक माना गया है, नन्द आदिकी उन गौओंको तुम लगातार सात रातोंतक भारी वर्षा और वायुके द्वारा पीड़ित करो ॥ ४ ॥
ऐरावतगतश्चाहं स्वयमेवाम्बु दारुणम् ।
स्रक्ष्यामि वृष्टिं वातं च वज्राशनिसमप्रभम् ॥ ५ ॥
'मैं भी ऐरावतपर आरूढ़ हो चलता हूँ और स्वयं ही वज्र एवं बिजलीके साथ-साथ प्रकाशित होनेवाले भयानक जल-की वर्षा एवं वायुकी सृष्टि करूँगा ॥ ५ ॥
भवद्भिश्चण्डवर्षेण चरता मारुतेन च ।
हतास्ताः सब्रजा गावस्त्यक्ष्यन्ति भुवि जीवितम् ॥ ६ ॥
'तुमलोग प्रचण्ड वायुके साथ विचरते हुए जब घोर वर्षा करोगे, तब उससे आहत एवं पीड़ित हुई गौएँ भूतलपर ब्रजवासियोंसहित अपने प्राण त्याग देंगी' ॥ ६ ॥
एवमाज्ञापयामास सर्वान्जलधरान् प्रभुः ।
प्रत्याहते वै कृष्णेन शासने पाकशासनः ॥ ७ ॥
श्रीकृष्णद्वारा अपने उत्सव एवं शासनका विघात हो जानेपर प्रभावशाली पाकशासन इन्द्रने समस्त जलधरोंको इस प्रकार अपनी आज्ञा सुना दी ॥ ७ ॥
ततस्ते जलदाः कृष्णा घोरनादा भयावहाः ।
आकाशं छादयामासुः सर्वतः पर्वतोपमाः ॥ ८ ॥
तब वे घोर गर्जना करनेवाले पर्वताकार भयंकर काले मेघ आकाशमें सब ओर छा गये ॥ ८ ॥
विद्युत्सम्पातजननाः शक्रचापविभूषिताः ।
तिमिरावृतमाकाशं चक्रुस्ते जलदास्तदा ॥ ९ ॥
उस समय इन्द्रधनुषसे विभूषित हो बिजली गिराते हुए उन मेघोंने आकाशको अन्धकारपूर्ण कर दिया ॥ ९ ॥
गजा इवान्यसंयुक्ताः केचिन्मकरवर्चसः ।
नागा इवान्ये गगने चेरुर्जलदपुङ्गवाः ॥ १० ॥
कुछ मेघ दूसरे हाथियोंसे सटकर चलते हुए हाथियों-के समान प्रतीत होते थे। दूसरे मगरोंके समान प्रकाशित होते थे तथा अन्य बड़े-बड़े बादल आकाशमे नागोंके समान विचरने लगे ॥ १० ॥
तेऽन्योन्यं वपुषा बद्धा नागयूथायुतोपमाः ।
दुर्दिनं विपुलं चक्रुश्छादयन्तो नभस्तलम् ॥ ११ ॥
जैसे हजारों हाथियोंके झुंड एक दूसरेसे अपने शरीरको आवद्ध करके चल रहे हों, वैसे ही प्रतीत होनेवाले उन जलधरों ने आकाशको आच्छादित करके वहाँ बड़ा भारी दुर्दिन उपस्थित कर दिया ॥ ११ ॥
नृहस्तनागहस्ताभ्यां वेणूनां चैव संहतैः ।
धाराभिस्तुल्यरूपामिर्ववृषुस्ते वलाहकाः ॥ १२ ॥
मनुष्योंके हाथ, हाथियोंके शुण्डदण्ड तथा बाँसके तुल्य मोटी धाराएँ प्रकट करके वे मेघ वहाँ सब ओर वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥
समुद्रं मेनिरे तं हि खमारूढं नृचक्षुषः ।
दुर्विगाह्यमपर्यन्तमगाधं दुर्दिनं महत् ॥ १३ ॥
मनुष्योंकी आँखोंने आकाशमें छाये हुए उस दुरवगाह अनन्त अगाध एवं महान् दुर्दिनको समुद्रके समान ही माना ॥ १३ ॥
नैवापतन् वै खगमा दुद्रुवुर्मृगजातयः ।
पर्वताभेषु मेघेषु खे नदत्सु समन्ततः ॥ १४ ॥
आकाशमे चारों ओर पर्वताकार मेघ गर्जना कर रहे थे। उस समय पक्षियोंने उड़ना बंद कर दिया तथा विभिन्न जाति-के पशु इधर-उधर भागने लगे ॥ १४ ॥
नष्टसूर्येन्दुसदशैर्मेघैर्नभसि दारुणैः ।
अतिवृष्टेन लोकस्य विरूपमभवद् वपुः ॥ १५ ॥
चन्द्रमा और सूर्यको भी नष्ट कर देनेवाले प्रलयकालके समान आकाशमें छाये हुए उन भयंकर मेघोंने अपनी अति-वृष्टिके कारण समस्त पार्थिव जगत्के रूपको विकृत कर दिया ॥ १५ ॥
मेघौघैर्निष्प्रभाकारमदृश्यग्रहतारकम् ।
चन्द्रसूर्यांशुविरहितं खं बभूवातिनिष्प्रभम् ॥ १६ ॥
मेघोंकी घटाएँ घिर आनेसे व्योम-मण्डल प्रभाशून्य हो गया। ग्रह और तारे दृष्टिथसे ओझल हो गये। चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंका पता नहीं चलता था। अतः सारा आकाश अन्धकारसे आच्छन्न हो गया ॥ १६ ॥
वारिणा मेघमुक्तेन मुच्यमानेन चासकृत् ।
आबभौ सर्वतस्तत्र भूमिस्तोयमयी यथा ॥ १७ ॥