विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २८० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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प्राप्तारिष्टमिवात्मानं मेने स मथुरेश्वरः।
विसंज्ञेन्द्रियभूतात्मा गतासुप्रतिमो बभौ ॥ ६ ॥
पूत्ना मारी गयी, कालिय नाग परास्त हुआ, धेनुकासुर कालके गालमें भेज दिया गया, प्रलम्बासुरको मार गिराया गया, गोवर्धन पहाड़को श्रीकृष्णने हाथपर उठा लिया, इन्द्रका शासन निष्फल हो गया, वैसे स्पृहणीय कर्मके द्वारा सम्पूर्ण गाँवोंकी रक्षा कर ली गयी, ऊँचे ककुदवाले अरिष्टासुरको मार डाला गया, गोपगण आनन्दमें मग्न रहते हैं और अपना (कंसका) महाभयंकर विनाशकाल संनिकट दिखायी देने लगा है, यमलार्जुन वृक्षोंका ओखली खींचते समय टूट जाना, शकटका भङ्ग हो जाना आदि असम्भव कार्य सम्भव हो गये, शत्रु निरन्तर बढ़ रहे हैं और उनके द्वारा अचिन्त्य कर्म सम्पादित होने लगा है, यह सब सुनकर मथुरापति कंसने यह मान लिया कि अब मेरे ऊपर अरिष्ट आया ही चाहता है। इससे उसकी इन्द्रियाँ, शरीर और मन-बुद्धि सब-के-सब अचेत हो गये तथा वह प्राणहीन-सा प्रतीत होने लगा ॥
ततो ज्ञातीन् समानाय्य पितरं चोग्रशासनः।
निशि स्तिमितमूकायां मथुरायां जनाधिपः ॥ ७ ॥
तदनन्तर भयंकर शासनवाले राजा कंसने रात्रिके नीरव एवं निस्तब्ध-कालमें मथुरापुरीके भीतर रहनेवाले समस्त बन्धु-बान्धवों तथा अपने पिता उग्रसेनको भी बुलाया ॥ ७ ॥
वसुदेवं च देवाभं कङ्कं चाहूय यादवम्।
सत्यकं दारुकं चैव कङ्कावरजमेव च ॥ ८ ॥
भोजं वैतरणं चैव विकुद्रं च महाबलम्।
भयशङ्खं च धर्मज्ञं विपृथुं च पृथुश्रियम् ॥ ९ ॥
बभ्रुं दानपतिं चैव कृतवर्माणमेव च।
भूरितेजसमक्षोभ्यं भूरिश्रवसमेव च ॥ १० ॥
एतान् स यादवान् सर्वानभाष्य शृणुतेति च।
उग्रसेनसुतो राजा प्रोवाच मथुरेश्वरः ॥ ११ ॥
देवताके समान तेजस्वी वसुदेव, यदुकुलनन्दन कङ्क, सत्यक, दारुक, कङ्कके छोटे भाई, भोज, वैतरण, महाबली विकुद्र, धर्मज्ञ भयशङ्ख, पृथुल राजलक्ष्मीसे सम्पन्न विपृथु, दानपति बभ्रु (अक्रूर), कृतवर्मा, अक्षोभ्य भूरितेजा और भूरिश्रवा—इन सब यादवोंको बुलाकर सबको सम्बोधित करके मथुराके स्वामी उग्रसेनकुमार राजा कंसने कहा—'बन्धुओ ! आपलोग सुनें ॥ ८–११ ॥
भवन्तः सर्वकार्यज्ञा वेदेषु परिनिष्ठिताः।
न्यायवृत्तान्तकुशलास्त्रिवर्गस्य प्रवर्त्तकाः ॥ १२ ॥
कर्तव्यानां च कर्तारो लोकस्य विबुधोपमाः।
तस्थिवांसो महावृत्ते निष्कम्पा इव पर्वताः ॥ १३ ॥
'आप समस्त कर्तव्य-कर्मोंके ज्ञाता, वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान्, न्यायोचित बर्तावमें कुशल, धर्म, अर्थ और कामके प्रवर्त्तक, कर्तव्य-पालक, जगत्के लिये देवताओंके समान माननीय, महान् आचार-विचारमें दृढ़तापूर्वक स्थिर रहनेवाले और पर्वतके समान अविचल हैं ॥ १२-१३ ॥
अदम्भवृत्तयः सर्वे सर्वे गुरुकुलोषिताः।
राजमन्त्रधराः सर्वे सर्वे धनुषि पारगाः ॥ १४ ॥
'आप सब लोग पाखण्डपूर्ण वृत्तिसे दूर रहते हैं। सबने गुरुकुलमें रहकर शिक्षा पायी है। आप सब लोग राजाकी गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित रखनेवाले तथा धनुर्वेदमें पारङ्गत हैं ॥
यशःप्रदीपा लोकानां वेदार्थानां विवक्षवः।
आश्रमाणां निसर्गज्ञा वर्णानां क्रमपारगाः ॥ १५ ॥
'आपके यशरूपी प्रदीप सम्पूर्ण जगत्में अपना प्रकाश फैला रहे हैं। आपलोग वेदोंके तात्पर्यका प्रतिपादन करनेमें समर्थ हैं। आश्रमोंके जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णोंके जो क्रमिक धर्म हैं, उनके आपलोग पारङ्गत विद्वान् हैं ॥ १५ ॥
प्रवक्तारः सुनियतां नेतारो नयदर्शिनाम्।
भेत्तारः परराष्ट्राणां त्रातारः शरणार्थिनाम् ॥ १६ ॥
'आपलोग उत्तम विधियोंके वक्ता, नीतिदर्शी पुरुषोंके भी नेता, शत्रुराष्ट्रोंके गुप्त रहस्योंका भेदन करनेवाले तथा शरणार्थियोंके संरक्षक हैं ॥ १६ ॥
एवमक्षतचारित्रैः श्रीमद्भिरुदितोदितैः।
द्यौरप्यनुगृहीता स्याद् भवद्भिः किं पुनर्मही ॥ १७ ॥
'आपके सदाचारमे कभी आँच नहीं आने पायी है ! आपलोग श्रीसम्पन्न हैं तथा श्रेष्ठ पुरुषोंकी चर्चा होते समय आपलोगोंके नाम बारंबार लिये जाते हैं। आपलोग चाहें तो स्वर्गलोकपर भी अनुग्रह कर सकते हैं, फिर इस भूतलकी तो बात ही क्या है ? ॥ १७ ॥
ऋषीणामिव वो वृत्तं प्रभावो मरुतामिव।
रुद्राणामिव वः क्रोधो दीप्तिरङ्गिरसामिव ॥ १८ ॥
'आपका आचार ऋषियोंके, प्रभाव मरुद्गणोंके, क्रोध रुद्रोंके और तेज या दीप्ति अग्नियोंके समान है ॥ १८ ॥
व्यावर्त्तमानं सुमहद् भवद्भिः ख्यातकीर्तिभिः।
धृतं यदुकुलं वीरैर्भूतलं पर्वतैरिव ॥ १९ ॥
'यह महान् यदुकुल जब अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो रहा था, उस समय विख्यात कीर्तिवाले आप-जैसे वीरोंने ही इसे मर्यादामें स्थापित किया, ठीक उसी तरह जैसे पर्वतोंने इस भूतलको दृढ़तापूर्वक धारण कर रखा है ॥ १९ ॥
एवं भवत्सु युक्तेषु मम चित्तानुवर्तिषु।
वर्धमानो ममानर्थो भवद्भिः किमुपेक्षितः ॥ २० ॥
'आपलोग ऐसे सुयोग्य हैं और सदा मेरे अनुकूल चलते हैं, परंतु इस समय आपलोगोंके होते हुए भी मेरे अनर्थ (संकट) की वृद्धि हो रही है, पता नहीं आपने उसकी उपेक्षा कैसे कर दी है ॥ २० ॥
एष कृष्ण इति ख्यातो नन्दगोपसुतो व्रजे।
वर्धमान इवाम्भोधिर्मूलं नः परिकृन्तति ॥ २१ ॥