विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्वाविंशोऽध्यायः २८१
'ब्रजमें कृष्ण नामसे विख्यात जो यह नन्द गोपका बेटा है, वह (मर्यादाको लाँघकर) बढ़नेवाले समुद्रकी भाँति बढ़कर हमारी जड़ काट रहा है ॥ २१ ॥
अनमात्यस्य शून्यस्य चारान्धस्य ममैव तु ।
कारणान्नन्दगोपस्य स सुतो गोपितो गृहे ॥ २२ ॥
'मेरे पास कोई सुयोग्य मन्त्री नहीं है, मैं हृदय एवं विचारसे शून्य हूँ तथा गुप्तचररूपी नेत्रसे हीन होनेके कारण अंधा हो गया हूँ। मेरे इसी दोषके कारण नन्द-गोपका वह पुत्र अपने घरमें सुरक्षित रह सका है ॥ २२ ॥
उपेक्षित इव व्याधिः पूर्यमाण इवाम्बुदः ।
नदन्मेघ इवोष्णान्ते स दुरात्मा विवर्धते ॥ २३ ॥
'वह दुरात्मा उपेक्षित रोग तथा वर्षा ऋतुमें निरन्तर जलसे भरनेवाले गरजते हुए मेघकी भाँति बढ़ता जा रहा है॥
तस्य नाहं गतिं जाने न योगं न पराक्रमम् ।
नन्दगोपस्य भवने जातस्याद्भुतकर्मणः ॥ २४ ॥
'नन्दके घरमें उत्पन्न हुए उस अद्भुतकर्मा बालकका आश्रय क्या है? यह मैं नहीं जानता। उसे वशमें करनेका उपाय क्या है, इसका भी मुझे पता नहीं तथा उसमें कितना पराक्रम है, यह भी अच्छी तरह ज्ञात नहीं हो सका ॥ २४ ॥
किं तद्भूतं समुद्भूतं देवापत्यं न विद्महे ।
अतिदेवैर्मानुष्यैः कर्मभिः सोऽनुमीयते ॥ २५ ॥
'पता नहीं कौन-सा भूत उसके रूपमें उत्पन्न हुआ है। वह किसी देवताकी संतान है, यह बात भी मेरी समझमें नहीं आती। उसके जो कर्म हैं, वे देवताओं और मनुष्योंके लिये असाध्य हैं। उन कर्मोंसे ही यह अनुमान होता है कि वह देवताओंसे भी अधिक शक्तिशाली है ॥ २५ ॥
पूतना शकुनी बाल्ये शिशुनेोत्तानशायिना ।
स्तनपानेप्सुना पीता प्राणैः सह दुरासदा ॥ २६ ॥
'पूतना नामवाली पक्षिणी एक दुर्जय राक्षसी थी। वह जब इसे बाल्यावस्थामे दूध पिलाने गयी, उस समय यह खाटपर उत्तान सोनेवाला शिशुमात्र था, परंतु उसका स्तन-पान करनेकी इच्छासे जब इसने मुँह लगाया, तब उसके प्राणोंके साथ यह उसे ही पी गया ॥ २६ ॥
यमुनाया ह्रदे नागः कालियो दमितस्तथा ।
रसातलचरो नीतः क्षणेनादर्शनं ह्रदात् ॥ २७ ॥
'यमुनाके कुण्डमें जो कालिय नाग रहता था, उसका भी इसने दमन कर दिया और क्षणभरमें उस कुण्डसे उसको अदृश्य करके रसातलचारी बना दिया ॥ २७ ॥
नन्दगोपसुतो योगं कृत्वा स पुनरुत्थितः ।
धेनुकस्तालशिखरात् पातितो जीवितं विना ॥ २८ ॥
'उस नागके हट जानेका उचित उपाय करके नन्द-गोप-का यह पुत्र पुनः जलसे बाहर निकल आया। धेनुकासुरको ताड़के शिखरसे गिराकर प्राणशून्य कर दिया ॥ २८ ॥
प्रलम्बं यं मृधे देवा न शेकुरतिवर्तितुम् ।
बालेन मुष्टिनैकेन स हतः प्राकृतो यथा ॥ २९ ॥
'युद्धमें देवता भी जिस प्रलम्बासुरका सामना करने या उसे हरा देनेकी शक्ति नहीं रखते थे, उसे इस बालकने केवल एक मुक्केसे मारकर साधारण मनुष्यकी भाँति कालके गालमें भेज दिया ॥ २९ ॥
वासवस्योत्सवं भङ्क्त्वा वर्षं वासवरोपजम् ।
निर्जित्य गोगृहार्थाय धृतो गोवर्धनो गिरिः ॥ ३० ॥
'इन्द्रके उत्सवको भङ्ग करके उनके रोषसे होनेवाली वर्षापर भी काबू पा लिया और गौओंके लिये सुरक्षित घर प्रस्तुत करनेके लिये गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया ॥
हतस्त्वरिष्टो बलवान् निःशृङ्गश्च कृतो व्रजे ।
अबालो बाल्यमास्थाय रमते शिशुलीलया ॥ ३१ ॥
'व्रजमें बलवान् अरिष्टासुरको मार डाला और उसका सींग उखाड़ लिया। यह वास्तवमें बालक नहीं है, केवल बाल्यावस्थाका आश्रय लेकर बालकों-जैसा खेल कर रहा है ॥ ३१ ॥
प्रबन्धः कर्मणामेवं तस्य गोव्रजवासिनः ।
संनिकृष्टं भयं चैव केशिनो मम च ध्रुवम् ॥ ३२ ॥
'गौओंके व्रजमें निवास करनेवाले इस बालकके कर्मोंकी जो इस प्रकार परम्परा चल रही है, उसे देखते हुए मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मुझपर और केशीपर भी निश्चय ही भय आनेवाला है और वह भय दूर नहीं अत्यन्त निकट है ॥ ३२ ॥
भूतपूर्वश्च मे मृत्युः सततं पूर्वदैहिकः ।
युद्धकाङ्क्षी च स यथा तिष्ठतीह ममाग्रतः ॥ ३३ ॥
'पूर्वजन्ममें इस शरीरके लिये जो भूतपूर्व मृत्यु था, वही इस समय भी युद्धकी अभिलाषा रखकर सदा मेरे सामने खड़ा रहता है ॥ ३३ ॥
क्व च गोपत्वमशुभं मानुष्यं मृत्युदुर्बलम् ।
क्व च देवप्रभावेन क्रीडितव्यं व्रजे मम ॥ ३४ ॥
'कहाँ तो अशुभ गोपत्व और मौतकी दुर्बलता धारण करनेवाला मानव-शरीर तथा कहाँ उसका मेरे व्रजमें रहकर देवतुल्य प्रभावसे अद्भुत क्रीडा करना ॥ ३४ ॥
अहो नीचेन वपुषाच्छादयित्वाऽऽत्मनो वपुः ।
कोऽप्येष रमते देवः श्मशानस्थ इवानलः ॥ ३५ ॥
'अहो ! कितने आश्चर्यकी बात है कि यह कोई देवता अपने स्वरूपको नीच गोपवेशमें छिपाकर श्मशानमें स्थित हुई अग्निके समान यहाँ रम रहा है ॥ ३५ ॥
श्रूयते हि पुरा विष्णुः सुराणां कारणान्तरे ।
वामनेन तु रूपेण जहार पृथिवीमिमाम् ॥ ३६ ॥
'सुना जाता है कि पूर्वकालमें विष्णुने देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये वामनरूप धारण करके राजा बलिके हाथसे इस पृथ्वीको छीन लिया था ॥ ३६ ॥