विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे महाननो महाग्रीवः सुमहानान्तकोपमः । तत्र रोहिणीनन्दन बलरामके चरित्र और बलको भली- रौद्रः शकटचक्राक्षो नमयंश्चरणैर्महीम् ॥ २७ ॥ भाँति जाननेवाले श्रीकृष्णने मुसकराकर हर्षभरी सान्त्वना- उसका मुख बहुत बड़ा था, गरदन भी वैसी ही थी। युक्त वाणीमें उनसे कहा—॥ ३४ ॥ वह महाकाय दैत्य यमराजके समान भयंकर दिखायी देता अहोऽयं मानुषो भावो व्यक्तमेवानुपाल्यते । था। उसकी आँखें गाड़ीके पहिये-सी घूम रही थीं। वह अपने यस्त्वं जगन्मयं देवं गुह्याद् गुह्यतरं गतः ॥ ३५ ॥ पैरोंसे पृथ्वीको झुका देता था ॥ २७ ॥ स्मर नारायणात्मानं लोकानां त्वं विपर्यये । स्रग्दामलम्बाभरणः प्रलम्वाम्बरभूषणः । अवगच्छात्मानमऽऽत्मानं समुद्राणां समागमे ॥ ३६ ॥ वीरः प्रलम्बः प्रययौ लम्बतोय इवाम्बुदः ॥ २८ ॥ 'अहो ! आप तो स्पष्ट ही मानव-भावका अवलम्बन उसके गलेमें फूलोंकी लंबी माला शोभा दे रही थी। एवं पालन करते जा रहे हैं। आपका स्वरूप तो अखिल उसके वस्त्र और आभूषण भी बहुत बड़े-बड़े थे। वह वीर विश्वमय है। आप दिव्यस्वरूप तथा गुह्यसे भी गुह्यतर हैं। प्रलम्ब नीचेको गिरते हुए जलवाले मेघके समान तीव्र गतिसे आप ही समस्त लोकोंका संहार होनेपर नारायणरूपसे स्थित चला जा रहा था ॥ २८ ॥ होते हैं। आप अपने उस स्वरूपका स्मरण तो कीजिये। स जहाराथ वेगेन रौहिणेयं महासुरः । प्रलयकालमें जब सारे समुद्र मिलकर एक हो जाते हैं, उस सागरोपप्लवगतं कृत्स्नं लोकमिवान्तकः ॥ २९ ॥ समय आप जिस शेषशायी नारायणरूपसे विराजमान होते उस महान् असुरने रोहिणीनन्दन बलरामको बड़े वेगसे हैं, उसका स्वयं ही अनुभव कीजिये ॥ ३५-३६ ॥ हर लिया, ठीक उसी तरह जैसे प्रलयंकर काल एकार्णवमें पुरातनानां देवानां ब्रह्मणः सलिलस्य च । डूबे हुए समस्त लोकका अपहरण कर लेता है ॥ २९ ॥ आत्मवृत्तप्रभावाणां संस्मराद्यं च वै वपुः ॥ ३७ ॥ ह्रियमाणः प्रलम्बेन स तु संकर्षणो बभौ । 'पुरातन देवता, ब्रह्मा, जल तथा अपने चरित्र और उद्यमान इवाकाशे कालमेघेन चन्द्रमाः ॥ ३० ॥ प्रभाव—इन सबका आदि कारण तथा जो आपका शाश्वत प्रलम्बासुरके द्वारा हरकर ले जाये जाते हुए संकर्षण स्वरूप है, उसका स्मरण कीजिये ॥ ३७ ॥ आकाशमें ऐसे जान पड़ते थे; मानो कोई काला मेघ शिरः खं ते जलं मूर्त्तिः पादौ भूर्दहनो मुखम् । चन्द्रमाको अपने ऊपर बिठाकर लिये जा रहा हो ॥ ३० ॥ वायुर्लोकायुरुच्छ्वासो मनः सोमो ह्यभूत् तव ॥ ३८ ॥ स संदिग्धमिवात्मानं मेने संकर्षणस्तदा । 'आकाश आपका सिर है, जल मूर्ति है, पृथ्वी पैर है, दैत्यस्कन्धगतः श्रीमान् कृष्णं चेदमुवाच ह ॥ ३१ ॥ अग्नि मुख है, लोकोंको जीवन देनेवाली वायु आपका उस समय बलरामने अपने आपको प्राण-संशयकी उच्छ्वास है और चन्द्रमा आपका मन है ॥ ३८ ॥ स्थितिमें पड़ा हुआ समझा। तब दैत्यके कंधेपर बैठे हुए सहस्रास्यः सहस्राङ्गः सहस्रचरणेक्षणः । उन श्रीमान् संकर्षणने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ ३१ ॥ सहस्रपद्मनाभस्त्वं सहस्रांशुधरोऽरिहा ॥ ३९ ॥ हियेऽहं कृष्ण दैत्येन पर्वतोदग्रवर्मणा । 'आपके सहस्रों मुख, सहस्रों शरीर, सहस्रों हाथ-पैर प्रदर्शयित्वा महतीं मायां मानुषरूपिणीम् ॥ ३२ ॥ और सहस्रों नेत्र हैं। आपकी नाभिसे सहस्रों कमल प्रकट हो 'श्रीकृष्ण ! यह देखो ! मुझे कोई पर्वतके समान चुके हैं। आप सहस्र किरणोंवाले सूर्यको चक्ररूपसे धारण विशालकाय दैत्य हरकर लिये जाता है। इसने मनुष्यरूप- करके शत्रुओंका संहार करते हैं ॥ ३९ ॥' धारिणी महती मायाका प्रदर्शन करके मुझे भ्रममें डाल यत्त्वया दर्शितं लोके तत् पश्यन्ति दिवौकसः । दिया था ॥ ३२ ॥ यत् त्वया नोक्तपूर्वं हि कस्तदन्वेष्टुमर्हति ॥ ४० ॥ कथमस्य मया कार्यं शासनं दुष्टचेतसः । 'आपने पूर्वकालमें जो कुछ दिखाया है, संसारमे उसीको प्रलम्बस्य प्रवृद्धस्य दर्पाद् द्विगुणवर्चसः ॥ ३३ ॥ देवता लोग देखते हैं। आपने पहले जिसकी चर्चा नहीं की 'यह दुष्टात्मा दैत्य बढ़कर बहुत लंबा हो गया है। बलके है, उसका अनुसंधान कौन कर सकता है ? ॥ ४० ॥ मदसे इसकी कान्ति दुगुनी हो गयी है। मुझे किस तरह यद् वेदितव्यं लोकेऽस्मिंस्तत्त्वया समुदाहृतम् । इसका दमन करना चाहिये' ॥ ३३ ॥ विदितं यत् तवैकस्य देवा अपि न तद् विदुः ॥ ४१ ॥ तमाह सस्मितं कृष्णः साम्ना हर्षाकुलेन वै । 'जगत्में जो कुछ जानने योग्य है, उसका आपने अभिज्ञो रौहिणेयस्य वृत्तस्य च बलस्य च ॥ ३४ ॥ प्रतिपादन कर दिया है। एकमात्र आपको जो तत्त्व ज्ञात है, उसे देवता भी नहीं जानते ॥ ४१ ॥