भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

विष्णुपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः - २५५

आत्मजं ते वपुर्व्योम्नि न पश्यन्त्यात्मसम्भवम् । यत् तु ते कृत्रिमं रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः ॥ ४२ ॥ 'आपका जो सहज, आकाशमे भी व्यापक एवं स्वयम्भू रूप है, उस (विशुद्ध सनातन एवं निर्गुण-निराकार रूप) को देवता भी देख या समझ नहीं पाते हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये आप जो सगुण-साकार रूपसे अवतार ग्रहण करते हैं, उसीकी देवता लोग पूजा एवं आराधना करते हैं॥४२॥

देवैर्न दृष्टश्रान्तस्ते तेनानन्त इति स्मृतः । त्वं हि सूक्ष्मो महानेकः सूक्ष्मैरपि दुरासदः ॥ ४३ ॥ 'देवताओंने भी आपका अन्त नहीं देखा है, इसलिये आप अनन्त माने गये हैं। आप ही सूक्ष्म, महान् और एक हैं। सूक्ष्म बुद्धि-इन्द्रियादिके द्वारा भी आपको जानना या पाना अत्यन्त कठिन है ॥ ४३ ॥

त्वय्येव जगतः स्तम्भे शाश्वती जगती स्थिता । अचला प्राणिनां योनिर्धारयत्यखिलं जगत् ॥ ४४ ॥ 'आप ही इस जगत्‌के आधारस्तम्भ हैं। आपपर प्रतिष्ठित होकर ही यह सनातन पृथ्वी अविचल भावसे सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करती है और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका स्थान बनती है ॥ ४४ ॥

चतुःसागरभोगस्त्वं चातुर्वर्ण्यविभागवित् । चतुर्युगेषु लोकानां चातुर्होत्रफलाशनः ॥ ४५ ॥ 'चारों समुद्र आपके स्वरूप हैं। आप चारों वर्णोंके विभागको जाननेवाले हैं। चारों युगोंमे लोकोंके चातुर्होत्र यज्ञका जो फल है, उसका उपभोग करनेवाले भी आप ही हैं ॥ ४५ ॥

यथाहमपि लोकानां तथा त्वं तच्च मे मतम् । उभावेकशरीरौ स्वो जगदर्थे द्विधाकृतौ ॥ ४६ ॥ 'जैसे मैं समस्त लोकोंका अन्तर्यामी आत्मा हूँ, वैसे ही आप भी हैं, यह मेरा मत है। हम दोनों ही एक शरीरवाले हैं, केवल जगत्‌के हितके लिये दो रूपोंमे प्रकट हुए हैं ॥ ४६ ॥

अहं वा शाश्वतः कृष्णस्त्वं वा शेषः पुरातनः । लोकानां शाश्वतो देवस्त्वं हि शेषः सनातनः । आवयोर्देहमात्रेण द्विधेदं धार्यते जगत् ॥ ४७ ॥ 'मैं सनातन विष्णु हूँ और आप पुरातन शेष हैं; तीनों लोकोंके सनातन देवता तथा सनातन शेष आप ही हैं; हमारा चिन्मय शरीरमात्र ही (विष्णु या अनन्तरूपसे) इस जड चेतनमय द्विविध जगत्‌को धारण करता है ॥ ४७॥

अहं यः स भवानेव यस्त्वं सोऽहं सनातनः । द्वावेव विहितौ ह्यावामेकदेहौ महाबलौ ॥ ४८ ॥ 'जो मैं हूँ, वह आप ही है। जो आप हैं, वह सनातन पुरुष मैं ही हूँ। हम दोनों ही एक आत्मा हैं, किंतु इस समय दो महाबली स्वरूपोंमें प्रकट हुए हैं ॥ ४८ ॥

तदास्से मूढवत् त्वं किं प्राणेन जहि दानवम् । मूर्ध्नि देवरिपुं देव वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ ४९ ॥ 'देव ! आप किंकर्तव्यविमूढ़की भाँति क्यों चुपचाप बैठे हैं ? बलपूर्वक इस दानवको मार डालिये। अपने वज्र-तुल्य मुक्केसे इस देवद्रोहीके मस्तकपर प्रहार कीजिये' ॥ ४९ ॥

वैशम्पायन उवाच

संस्मारितस्तु कृष्णेन रौहिणेयः पुरातनम् । बलेनापूर्यत तदा त्रैलोक्यान्तरचारिणा ॥ ५० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णने जब इस प्रकार पुरातन रहस्यका स्मरण दिलाया, तब रोहिणीनन्दन बलराम त्रिलोकीके भीतर व्याप्त हुए अनन्त बलसे परिपूर्ण हो गये ॥ ५० ॥

ततः प्रलम्बं दुर्वृत्तं स बद्धेन महाभुजः । मुष्टिना वज्रकल्पेन मूर्ध्नि चैनं समाहनत् ॥ ५१ ॥ तब उन महाबाहु वीरने दुराचारी प्रलम्बासुरके मस्तकपर अपनी बँधी हुई वज्रतुल्य मुष्टिकासे प्रहार किया ॥ ५१ ॥

तस्योत्तमाङ्गं स्वे काये विकपालं विवेश ह । जानुभ्यां चाहतः शेते गतासुर्दानवोत्तमः ॥ ५२ ॥ इससे उसकी खोपड़ी उड़ गयी और शेष मस्तक उसके धड़में ही धँस गया । फिर वह घायल हुआ दानवराज पृथ्वीपर घुटने टेककर गिर पड़ा और प्राणहीन होकर सदाके लिये सो गया ॥ ५२ ॥

जगत्यां विप्रकीर्णस्य तस्य रूपमभूत् तदा । प्रलम्बस्याम्बरस्थस्य मेघस्येव विदीर्यतः ॥ ५३ ॥ जैसे आकाशमे स्थित हुए मेघकी घटा जब छिन्न भिन्न होकर बिखर जाती है, उस समय उसका जैसा रूप दिखायी देता है, पृथ्वीपर टूक-टूक होकर बिखरे हुए प्रलम्बासुरका रूप भी वैसा ही दृष्टिगोचर हुआ ॥ ५३ ॥

तस्य भग्नोत्तमाङ्गस्य देहात् सुस्राव शोणितम् । बहुगैरिकसंयुक्तं शैलशृङ्गादिवोदकम् ॥ ५४ ॥ कटे-फटे मस्तकवाले उस असुरके शरीरसे खूनकी धारा बह चली, मानो पर्वतके शिखरसे अधिक गेरू मिला हुआ जल प्रवाहित हो रहा हो ॥ ५४ ॥

तं निहत्य प्रलम्बं तु संहृत्य बलमात्मनः । पर्यष्वजत वै कृष्णं रौहिणेयः प्रतापवान् ॥ ५५ ॥ इस प्रकार प्रलम्बासुरको मारकर अपने बलको पुनः समेट लेनेके बाद प्रतापी रोहिणीकुमार बलरामने श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया ॥ ५५ ॥