विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 773, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ भविष्यपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ७५१
सौते किमकरोत् पश्चात् सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ३ ॥
धीर सूतकुमार ! सुखपूर्वक सुनने-सुनानेके योग्य होनेके कारण यह कथा हमारे मनको परम आह्लाद प्रदान करती है। इस। उत्तम आख्यानको सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् कौन-सा कार्य किया ? ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयस्तु स नृपः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।
यदारभत् तदाख्यास्ये सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ४ ॥
सूतपुत्र उग्रश्रवाने कहा—शौनकजी ! यह उत्तम कथा सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् जो कार्य आरम्भ किया, उसका वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥
तस्मिन् सत्रे समाप्तेऽथ राजा पारिक्षितस्तदा ।
यष्टुं स वाजिमेधेन सम्भारानुपचक्रमे ॥ ५ ॥
सर्पसत्र समाप्त होनेपर राजा जनमेजयने अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आवश्यक सामग्री जुटानी आरम्भ की ॥ ५ ॥
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यानाहूयेदमुवाच ह।
यक्ष्येऽहं वाजिमेधेन हय उत्सृज्यतामिति ॥ ६ ॥
फिर उन्होंने ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यको बुलाकर इस प्रकार कहा—'मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा, आपलोग अश्व छोड़िये' ॥ ६ ॥
ततोऽस्य विज्ञाय चिकीर्षितं तदा
कृष्णो महात्मा सहसाऽऽजगाम ।
पारिक्षितं द्रष्टुमदीनसत्त्वं
द्वैपायनः सर्वपरावरज्ञः ॥ ७ ॥
जनमेजय क्या करना चाहते हैं, इस बातको जानकर उस समय सबके भूत और भविष्यको जाननेवाले महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, उदारचेता परीक्षित्कुमार जनमेजयसे मिलनेके लिये सहसा वहाँ आये ॥ ७ ॥
पारिक्षितस्तु नृपतिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् ।
अर्घ्यपाद्यासनं दत्त्वा पूजयामास शास्त्रतः ॥ ८ ॥
उन महर्षिको आया देख राजा जनमेजयने अर्घ्य, पाद्य और आसन देकर शास्त्रविधिके अनुसार उनका पूजन किया॥
तौ चोपविष्टावभितः सदस्यास्तस्य शौनक ।
कथा बहुविधाश्चित्राश्चक्राते वेदसंहिताः ॥ ९ ॥
शौनक ! फिर वे दोनों यथायोग्य आसनोंपर बैठे। उनके आस-पास राजाके दूसरे सदस्य भी बैठ गये। तत्पश्चात् उन दोनोंने नाना प्रकारकी विचित्र कथाएँ एक दूसरेके प्रति कहीं, जो वेदोंमे वर्णित हैं ॥ ९ ॥
ततः कथान्ते नृपतिर्नोदयामास तं मुनिम् ।
पितामहं पाण्डवानामात्मनः प्रपितामहम् ॥ १० ॥
कथा वार्ताके अन्तमें राजा जनमेजयने पाण्डवोंके पितामह और अपने प्रपितामह मुनिवर व्याससे कहा—॥ १० ॥
महाभारतमाख्यानं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम् ।
निमेषमात्रमपि मे सुखश्राव्यतया गतम् ॥ ११ ॥
'महर्षे ! महाभारत नामक इतिहास अनेक अर्थोंसे भरा हुआ है; इसमें श्रुतियोंके अर्थका विस्तार है, फिर भी यह सुनने-सुनानेमें इतना सुखद है कि मेरा कई दिनोंका समय एक निमेषके समान बीत गया है ॥ ११ ॥
विभूतिविस्तारकरं सर्वेषां वै यशस्करम् ।
त्वया सुविहितं ब्रह्मञ्छङ्खे क्षीरमिवार्हितम् ॥ १२ ॥
'ब्रह्मन् ! यह इतिहास सबके लिये ऐश्वर्यका विस्तार करनेवाला और यशस्कर है, आपने इसकी इतनी सुन्दर रचना की है, मानो क्षीरसमुद्रको शङ्खमें भर दिया हो ॥ १२ ॥
अमृतेन तु तृप्तिः स्याद् यथा स्वर्गसुखेन च ।
तथा तृप्तिं न गच्छामि शृण्वेमां भारतीं कथाम् ॥ १३ ॥
'जैसे अमृत पीनेसे तृप्ति नहीं होती तथा जैसे स्वर्गीय सुखसे जी नहीं भरता है, उसी प्रकार इस भारती कथाको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ( अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ रही है ) ॥ १३ ॥
अनुमान्य तु सर्वज्ञं पृच्छामि भगवन्नहम् ।
हेतुः कुरूणां नाशस्य राजसूयो मतो मम ॥ १४ ॥
'भगवन् ! आप सर्वज्ञ हैं, मैं आपकी अनुमति लेकर कुछ पूछ रहा हूँ, मुझे ऐसा मालूम होता है कि-राजसूय यज्ञ ही कौरवोंके विनाशका कारण हुआ है ॥ १४ ॥
दुःसहानां यथा ध्वंसो राजन्यानामुपप्लवे ।
राजसूयं तथा मन्ये युद्धार्थमुपकल्पितम् ॥ १५॥
'महाभारतयुद्धमे जिस प्रकार दुःसह ( अजेय ) राजाओंका विनाश हुआ है, उसे देखते हुए मै यही मानता हूँ, राजसूयकी कल्पना युद्धके लिये ही हुई है ॥ १५ ॥
राजसूयस्तु सोमेन श्रूयते पूर्वमाहृतः ।
तस्यान्ते सुममहद् युद्धमभवत् तारकामयम् ॥ १६ ॥
'सुना जाता है कि पूर्वकालमे सोमने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया था, उनके उस यज्ञके अन्तमें तारकामय नामक महान् युद्ध हुआ था ॥ १६ ॥
आहृतो वरुणेनाथ तस्यान्ते सुमहाक्रतोः ।
देव।सुरं महायुद्धं सर्वभूतक्षयावहम् ॥ १७ ॥
'तदनन्तर वरुणने वह यज्ञ किया, उनके उस महायज्ञके अन्तमें देवताओं और असुरोंके बीच बड़ा भारी संग्राम हुआ, जो सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाला था ॥ १७ ॥
हरिश्चन्द्रश्च राजर्षिः क्रतुमेनमुपाहरत् ।
तत्राप्याडीवकं नाम युद्धं क्षत्रियनाशनम् ॥ १८ ॥