विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 772, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७५० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उन्हें जाते देख मानिनी भी गर्भिणी अवस्थामें ही उनके पीछे-पीछे चल दी। उस सुन्दर भौंहोंवाली रानीने मार्गमें ही एक वनके भीतर बालकको जन्म दिया, जिसके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे ॥ ९ ॥
कुमारं तं परित्यज्य भर्तारं चान्वगच्छत ।
पतिव्रता महाभागा द्रौपदीव पुरा पतीन् ॥ १० ॥
जैसे पूर्वकालमें पतिव्रता महाभागा द्रौपदीने सब कुछ छोड़कर महाप्रस्थानके पथपर पाँचों पतियोंका अनुसरण किया था, उसी प्रकार मानिनी उस नवजात शिशुको छोड़कर पतिके पीछे चली गयी ॥ १० ॥
स तु राजकुमारोऽसौ गिरिकुञ्जे रुरोद ह ।
छायार्थं तस्य मेघास्तु प्रादुरासन् समन्ततः ॥ ११ ॥
वह राजकुमार पर्वतके कुञ्जमें पड़ा-पड़ा रोने लगा। उस समय उसपर छाया करनेके लिये चारों ओर मेघ प्रकट हो गये ॥ ११ ॥
अविष्ठायाश्च पुत्रौ द्वौपिप्पलादश्च कौशिकः ।
दृष्ट्वा कृपान्वितौ गृह्य तं प्रक्षालयतां जलैः ।
निघृष्टौ तस्य तौ पार्श्वौ शिलायां रुधिरप्लुतौ ॥ १२ ॥
अविष्ठाके दो पुत्र पिप्पलाद और कौशिकने उसे देखकर दयासे द्रवित हो उठा लिया और जलसे नहलाया। उस समय उस बालकके दोनों पार्श्वभाग पत्थरपर घिस जानेसे लहूलुहान हो रहे थे ॥ १२ ॥
अजश्यामौ तु पार्श्वौ तावुभावपि समाहितौ ।
तथैव तु समारूढौ अजपार्श्वस्ततोऽभवत् ॥ १३ ॥
उस बालकके वे दोनों पार्श्व बकरेके समान काले हो गये थे और उसी रूपमें वे हृष्टपुष्ट हो गये, इसलिये वह बालक अजपार्श्व नामसे विख्यात हुआ ॥ १३ ॥
ततोऽजपार्श्व इति तौ चक्राते तस्य नाम ह ।
स तु वेमकशालायां द्विजाभ्यामभिवर्धितः ॥ १४ ॥
इसीलिये पिप्पलाद और कौशिकने उसका नाम अजपार्श्व रखा और वेमकमुनिके घरमें उन दोनों ब्राह्मणोंने उसका पालन-पोषण किया ॥ १४ ॥
वेमकस्य तु भार्या तमुद्वहत् पुत्रकारणात् ।
वेमक्याः स तु पुत्रोऽभूद् ब्राह्मणौ सचिवौ च तौ ॥ १५ ॥
वेमककी पत्नी वेमकीने पुत्रके लिये उस बालकका विवाह कर दिया। वह बालक तथा उसके सहायक वे दोनों ब्राह्मण वेमकीके पुत्ररूपमें प्रसिद्ध हुए ॥ १५ ॥
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च युगपत्तुल्यजीविनः ।
स एष पौरवो वंशः पाण्डवानां प्रतिष्ठितः ॥ १६ ॥
उन तीनोंके पुत्र और पौत्र एक ही कालमें हुए और समान कालतक जीवित रहे, इस प्रकार यह पौरव तथा पाण्डववंश भूतलमें प्रतिष्ठित हुआ ॥ १६ ॥
श्लोकोऽपि चात्र गीतोऽयं नाहुषेण ययातिना ।
जरासंक्रमणे पूर्वे भृशं प्रीतेन धीमता ॥ १७ ॥
पूर्वकालमें पुरूके शरीरमें अपनी वृद्धावस्थाका संचार करते समय अत्यन्त प्रसन्न हुए बुद्धिमान् नहुषकुमार ययातिने इस पौरववंशके विषयमें यह श्लोक भी गाया था—॥ १७ ॥
अचन्द्रार्कग्रहा भूमिर्भवेद्वापि न संशयः ।
अपौरवा न तु मही भविष्यति कदाचन ॥ १८ ॥
'यह सम्भव है कि कभी भूमि चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहोंके प्रकाश एवं प्रभावसे रहित हो जाय, परंतु वह पौरववंशसे शून्य कभी नहीं होगी; इसमें संशय नहीं है' ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पाण्डववंशप्रतिष्ठाकीर्तने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाके कथनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
राजा जनमेजयका अश्वमेध यज्ञ करनेका विचार, व्यासजीका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार, आपने पाण्डवोंको राजसूय यज्ञ करनेसे क्यों नहीं रोका—यह जनमेजयका प्रश्न और उसके उत्तरमें व्यासजीद्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन
शौनक उवाच
| उक्तोऽयं हरिवंशस्ते पर्वाणि निखिलानि च ।<br>यथा पुरोक्तानि तथा व्यासशिष्येण धीमता ॥ १ ॥ | तत् कथ्यमानममितमितिहाससमन्वितम् ।<br>प्रीणात्यस्मानमृतवत् सर्वपापविनाशनम् ॥ २ ॥ |
| **शौनकने पूछा—**सूतनन्दन ! पूर्वकालमें व्यासजीके बुद्धिमान् शिष्य वैशम्पायनजीने जैसा वर्णन किया था, उसके अनुसार आपने यह हरिवंश और इसके सारे पर्व कह सुनाये ॥ १ ॥ | आपके मुखसे कहा जाता हुआ यह अनुपम ग्रन्थ, जो इतिहाससे युक्त और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, हम लोगोंको अमृतके समान तृप्ति प्रदान करता है ॥ २ ॥ |
सुश्रूषाद्यतया धीर मनो ह्लादयतीव नः ।
जनमेजयस्तु नृपतिः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।