भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 771

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

श्रीमहाभारतम्

तस्य खिलभागो हरिवंशः

( तत्र भविष्यपर्व )

प्रथमोऽध्यायः

जनमेजयकी संतति एवं पौरव तथा पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्यं नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥

बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदिजीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण) को और (इन नरनारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे ॥

शौनक उवाच
जनमेजयस्य के पुत्राः पठ्यन्ते लोमहर्षणे ।
कस्मिन् प्रतिष्ठितो वंशः पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १ ॥

**शौनकजीने पूछा—**लोमहर्षणकुमार ! जनमेजयके पुत्र कौन और कितने कहे जाते हैं ? महात्मा पाण्डवोंका वंश किसपर प्रतिष्ठित हुआ ? ॥ १ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
त्वत्तः कथयतः सर्वं वेद्म्यहं तत् परिस्रफुटम् ॥ २ ॥

मैं इसे सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। आपके बतानेसे मैं इन सब बातोंको स्पष्टरूपसे जान लूँगा ॥ २ ॥

सौतिरुवाच
पारीक्षितस्य काश्यायां द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतुः ।
चन्द्रापीडश्च नृपतिः सूर्यापीडश्च मोक्षवित् ॥ ३ ॥

**सौतिने कहा—**शौनकजी ! परीक्षित्कुमार जनमेजयकी पत्नी काशिराजकन्या वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र हुए। उनमेंसे एक थे चन्द्रापीड़, जो राजा हुए और दूसरेका नाम था सूर्यापीड़, जो मोक्षधर्मके ज्ञाता थे ॥ ३ ॥

चन्द्रापीडस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् ।
जनमेजय इत्येतं क्षात्रं भुवि परिश्रुतम् ॥ ४ ॥

चन्द्रापीड़के सौ पुत्र हुए, जो उत्तम धनुर्धर थे। क्षत्रियोंका वह समुदाय जनमेजय (अथवा जानमेजय) के नामसे भूमण्डलमें विख्यात हुआ ॥ ४ ॥

तेषां श्रेष्ठस्तु राजासीत् पुरे वारणसाह्वये ।
सत्यकर्णो महाबाहुर्यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ ५ ॥

उनमें सबसे बड़ा महाबाहु सत्यकर्ण था, जो हस्तिनापुरमें राजा हुआ। वह यज्ञ करनेवाला और उन यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था ॥ ५ ॥

सत्यकर्णस्य दायादः श्वेतकर्णः प्रतापवान् ।
अपुत्रः स तु धर्मात्मा प्रविवेश तपोवनम् ॥ ६ ॥

सत्यकर्णका पुत्र प्रतापी श्वेतकर्ण था, वह धर्मात्मा राजा श्वेतकर्ण पुत्रहीन होनेके कारण तपोवनमें चला गया ॥ ६ ॥

तस्माद् वनगताद् गर्भं यादवी प्रत्यपद्यत ।
सुचारोर्दुहिता सुभ्रूर्मानिनी भ्रातृमालिनी ॥ ७ ॥

वनमें जानेपर उनसे उनकी पत्नी मानिनीने, जो यदुकुलकी कन्या, सुचारुकी पुत्री, सुन्दर भौंहोंवाली तथा अनेक भ्राताओंकी बहिन थी, गर्भ धारण किया ॥ ७ ॥

स तु जन्मनि गर्भस्य श्वेतकर्णः प्रजेश्वरः ।
अन्वगच्छद् गतं पूर्वैर्महाप्रस्थानमच्युतम् ॥ ८ ॥

उस गर्भके जन्मकालमें राजा श्वेतकर्णने उस अच्युत महाप्रस्थानकी यात्रा की, जहाँ उनके पूर्वज पाण्डव जा चुके थे ॥ ८ ॥

सा दृष्ट्वा सम्प्रयातं तं मानिनी पृष्ठतोऽन्वयात् ।
पथि सा सुषुवे सुभ्रूवने राजीवलोचनम् ॥ ९ ॥