भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 770
७४८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मय वस्तुओंमें ऐसा कोई आश्चर्य नहीं है, जो भगवान् विष्णुके अंशसे शून्य हो ॥ २७ ॥

एष धन्यो हि धन्यानां धन्यकृद् धन्यभावनः।
देवेषु तु सदैत्येषु नास्ति धन्यतरोऽच्युतात् ॥ २८ ॥
ये श्रीकृष्ण धन्य हैं, ये ही धन्योंको धन्य बनानेवाले और धन्यभावन हैं, देवताओं तथा दैत्योंमें इन भगवान् अच्युतसे बढ़कर धन्य दूसरा कोई नहीं है ॥ २८ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा।
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च ॥ २९ ॥
ये ही आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, आकाश, भूमि, दिशा, जल और तेज हैं ॥ २९ ॥

एष धाता विधाता च संहर्ता चैव नित्यशः।
सत्यं धर्मस्तपश्चैव ब्रह्मा चैव पितामहः ॥ ३० ॥
ये ही धाता, विधाता और नित्यसंहर्ता हैं, सत्य, धर्म, तपस्या तथा पितामह ब्रह्मा. भी ये ही हैं ॥ ३० ॥

अनन्तश्चैव नागानां रुद्राणां शंकरः स्मृतः।
जङ्गमाजङ्गमं चैव जगन्नारायणोद्भवम् ॥ ३१ ॥
ये नागोंमें अनन्त और रुद्रोंमें शङ्कर माने गये हैं। यह समस्त चराचर जगत् इन नारायणदेवसे ही प्रकट हुआ है ॥ ३१ ॥

एतस्माच्च जगत् सर्वं प्रसूयेत जनार्दनात्।
जगच्च सर्वं देवेशे तं नमस्कुरु भारत ॥ ३२ ॥
इन जनार्दनसे ही सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति होती है। भारत ! देवेश्वर श्रीकृष्णमें ही सम्पूर्ण जगत् विद्यमान है। तुम उन्हें नमस्कार करो ॥ ३२ ॥

पूज्यश्च सततं सर्वैर्देवैरेष सनातनः।
इत्युक्तं बाणयुद्धं ते माहात्म्यं केशवस्य तु ॥ ३३ ॥
ये सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ही सदा सम्पूर्ण देवताओंके लिये पूजनीय हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे बाणासुरके युद्ध और केशवके माहात्म्यका वर्णन किया ॥ ३३ ॥

वंशप्रतिष्ठामतुलां श्रवणादेव लप्स्यसे।
ये चेदं धारयिष्यन्ति बाणयुद्धमनुत्तमम् ॥ ३४ ॥
केशवस्य च माहात्म्यं नाधर्मस्तान् भजिष्यति ।
तुम इसके श्रवणमात्रसे अनुपम वंशप्रतिष्ठा प्राप्त करोगे। जो लोग बाणासुरके इस परम उत्तम युद्धप्रसंग और केशवके माहात्म्यको अपने मनमें धारण करेंगे, उनके पास अधर्मका प्रवेश नहीं होगा ॥ ३४३ ॥

एषा तु वैष्णवी चर्चा मया कात्स्न्येन कीर्तिता ॥ ३५॥
पृच्छतस्तात यज्ञेऽस्मिन् निवृत्ते जनमेजय ।
तात जनमेजय ! इस यज्ञकी समाप्तिपर तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने भगवान् विष्णुकी इस सम्पूर्ण लीलाका वर्णन किया है ॥ ३५३ ॥

आश्चर्यपर्व निखिलं यो हीदं धारयेन्नरः ॥ ३६ ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
नरेश्वर ! जो इस सम्पूर्ण आश्चर्यमय पर्वको धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ३६३ ॥

कल्य उत्थाय यो नित्यं कीर्तयेत् सुसमाहितः ॥ ३७ ॥
न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च।
जो प्रतिदिन सबेरे उठकर एकाग्रचित्त हो इसका कीर्तन करता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३७३ ॥

ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ ३८॥
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः कामानवाप्नुयात् ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुर्लभेत सः ॥ ३९॥
इस प्रसंगका अपने अधिकारके अनुसार पाठ या श्रवण करनेसे ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता होता है, क्षत्रिय-को युद्धमें विजय प्राप्त होती है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शूद्र अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है। उसे किसी भी अशुभ या अमङ्गलकी प्राप्ति नहीं होती तथा वह दीर्घायु होता है ॥ ३८-३९ ॥

सौतिरुवाच
इति पारिक्षितो राजा वैशम्पायनभाषितम् ।
श्रुतवानचलो भूत्वा हरिवंशं द्विजोत्तमाः ॥ ४० ॥
विप्रवरो ! इस प्रकार परीक्षित्‌के पुत्र राजा जनमेजय-ने स्थिरचित्त होकर वैशम्पायनके द्वारा कहे गये हरिवंशका श्रवण किया ॥ ४० ॥

एवं शौनक संक्षेपाद् विस्तरेण तथैव च।
प्रोक्ता वै सर्ववंशास्ते किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४१ ॥
शौनक ! इस प्रकार मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ सभी वंशोंका वर्णन किया है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ॥ ४१ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उदाहरणसमाप्तौ अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उदाहरणके प्रसंगकी समाप्तिविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥

विष्णुपर्व सम्पूर्ण ॥ २ ॥