भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 769

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७४७

बहूको ग्रहण किया और उसे अनिरुद्धके महलमें पहुँचाया ॥ १२ ॥
देवकी रोहिणी चैव रुक्मिण्यथ विदर्भजा ।
दृष्ट्वानिरुद्धं रोदन्त्यः स्नेहहर्षसमन्विताः ॥ १३ ॥
देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी और शुभाङ्गी आदि स्त्रियाँ अनिरुद्धको देखकर स्नेह और हर्षसे विह्वल हो रोने लगीं ॥ १३ ॥
रेवती रुक्मिणी चैव गृहमुल्यं प्रवेशयत् ।
वधूर्वर्धसि दिष्ट्या त्वमनिरुद्धस्य दर्शनात् ॥ १४ ॥
रेवती और रुक्मिणीने अनिरुद्धको उनके श्रेष्ठ भवनमें पहुँचाया और प्रद्युम्नपत्नी शुभाङ्गीसे कहा—'बहू ! आज तुम अपने पुत्र अनिरुद्धको देखकर अभ्युदयशालिनी हुई हो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है' ॥ १४ ॥
ततस्तूर्यप्रणादैस्ता वरनार्यः शुभाननाः ।
क्रियामारेभिरे कर्तुमुषा च गृहसंस्थिता ॥ १५ ॥
तदनन्तर सुन्दर मुखवाली वे सुन्दरी स्त्रियाँ नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ कुलाचारका सम्पादन करने लगीं और उषा घरके भीतर विराजमान हुई ॥ १५ ॥
ततो हर्म्यतलस्था सा वृष्णिपुङ्गवसंस्थिता ।
रमते सर्वसदृशैरुपभोगैर्वरानना ॥ १६ ॥
सुमुखी उषा अट्टालिकामें वृष्णिपुङ्गव अनिरुद्धके साथ रहकर अपने योग्य समस्त उपभोगोंके द्वारा आनन्दपूर्वक समय बिताने लगी ॥ १६ ॥
चित्रलेखा च सुश्रोणी अप्सरारूपधारिणी ।
आपृच्छथ च सखीवर्गमुषां च त्रिदिवं गता ॥ १७ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली अप्सरारूपधारिणी चित्रलेखा उषा तथा अन्य सखियोंसे विदा ले स्वर्गलोकको चली गयी ॥ १७ ॥
गतासु तासु सर्वासु सखीष्वसुरसुन्दरी ।
मायावत्या गृहं नीता प्रथमं सा निमन्त्रिता ॥ १८ ॥
उन सब सखियोंके चले जानेपर असुरसुन्दरी उषाको सबसे पहले मायावतीने निमन्त्रित किया और वह उसे अपने घरमें ले गयी ॥ १८ ॥
सा तु प्रद्युम्नगृहिणी स्नुषां दृष्ट्वा सुमध्यमा ।
वासोभिरन्नपानैश्च पूजयामास सुन्दरीम् ॥ १९ ॥
प्रद्युम्नरती सुमध्यमा मायावतीने उस सुन्दरी पुत्रवधू- को देखकर अन्न, पान और वस्त्र आदिके द्वारा उसका सत्कार किया ॥ १९ ॥
ततः क्रमेण सर्वास्ता वधूमूषां यदुस्त्रियः ।
आचारमनुपश्यन्त्यः स्वधर्ममुपचक्रिरे ॥ २० ॥
तदनन्तर यदुकुलकी सभी स्त्रियोने अपने कुलाचारपर दृष्टि रखकर क्रमशः बहू उषाको बुलाया और स्वधर्मका पालन किया ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया कुरुकुलोद्वह ।
यथा बाणो जितः संख्ये जीवन्मुक्तश्च विष्णुना ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुकुलधुरन्धर जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें जिस प्रकार बाणासुर- को जीता और जीवित छोड़ दिया, यह सब प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ २१ ॥
द्वारकायां ततः कृष्णो रेमे यदुगणैर्वृतः ।
अन्वशासन्महीं कृत्स्नां परया संयुतो मुदा ॥ २२ ॥
तदनन्तर यादवोंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकामें सुखपूर्वक रहने लगे। वे परमानन्दसे सम्पन्न होकर समस्त भूमण्डलका अनुशासन करते थे ॥ २२ ॥
एवमेषोऽवतीर्णो वै पृथिवीं पृथिवीपते ।
विष्णुर्यदुकुलश्रेष्ठो वासुदेवेति विश्रुतः ॥ २३ ॥
पृथिवीनाथ ! इस प्रकार ये भगवान् विष्णु पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर यदुकुलशिरोमणि वासुदेवके नामसे विख्यात हुए थे ॥ २३ ॥
एतैश्च कारणैः श्रीमान् वसुदेवकुले प्रभुः ।
जातो वृष्णिषु देवक्यां यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २४ ॥
इन्हीं सब कारणोंसे श्रीमान् भगवान् विष्णु वृष्णिवंशके अन्तर्गत वसुदेवकुलमें देवकीदेवीके गर्भसे प्रकट हुए । जिसके विषयमें तुमने मुझसे प्रश्न किया था ॥ २४ ॥
निवृत्ते नारदप्रश्ने यन्मयोक्तं समासतः ।
श्रुतास्ते विस्तराः सर्वे ये पूर्वं जनमेजय ॥ २५ ॥
जनमेजय ! नारदजीके प्रश्नका उत्तर मिल जानेसे जब वह प्रश्न निवृत्त हो गया, उस समय मैंने उसके विषयमें संक्षेपसे जो कुछ कहा था, वे सारी बातें तुम पहले विस्तार-पूर्वक सुन चुके हो * ॥ २५ ॥
विष्णोस्तु माथुरे कल्पे यन्न्र ते संशयो महान् ।
वासुदेवगतिश्चैव सा मया समुदाहृता ॥ २६ ॥
भगवान् विष्णुके मधुरामें होनेवाले अवतारके विषयमें तुम्हे महान् संदेह था, उसके समाधानके लिये मैंने वासुदेवके स्वरूपका एवं वासुदेव ही सबकी परम गति (आश्रय) हैं, इस सिद्धान्तका भलीभाँति प्रतिपादन कर दिया ॥ २६ ॥
आश्चर्यं चैव नान्यद् वै कृष्णश्चाश्चर्यसंनिधिः ।
सर्वेष्वाश्चर्यकल्पेषु नास्त्याश्चर्यमवैष्णवम् ॥ २७ ॥
श्रीकृष्णके सिवा दूसरी कोई आश्चर्यकी वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण ही आश्चर्यके अधिष्ठान या समुद्र हैं। समस्त आश्चर्य-


* विष्णुपर्वके एक सौ दसवें अध्यायमें धन्योपाख्यान आया है, उसमें सबसे बढकर धन्य कौन है ? यह नारदजीकी जिज्ञासा निवृत्त हुई है, उसीकी ओर यहां संकेत किया गया है।