भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 768, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 768

७४६ श्रीमहाभारते खिलभाग [ हरिवंशे उस प्रेमभक्तिसे सदा प्रसन्न रहते थे ॥ १४७ ॥ द्वारकामें आकर उत्तम लक्ष्मीसे संयुक्त हुए भगवान् द्वारकां प्राप्य कृष्णस्तु रेमे यदुगणैः सह । श्रीकृष्ण नाना प्रकारके सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंका सद्- विविधान् सर्वकामार्थांश्छ्रिया परमया युतः ॥ १४८॥ पयोग करते हुए यादवोंके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारकाप्रत्यागमने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें पुनरागमनविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥ अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः द्वारकामें उत्सव, उषाका अन्तःपुरमें प्रवेश और सत्कार, श्रीकृष्ण और विष्णुपर्वकी महिमा तथा पर्वका उपसंहार वैशम्पायन उवाच वाद्यन्ति पुरे तत्र नार्यो मदवशं गताः । अथाहुको महाबाहुः कृष्णं प्राह महाद्युतिः । नृत्यन्ते चाप्सरास्तत्र गायन्ति च तथापराः॥ ७ ॥ हर्षोद्रुतफुल्लनयनः श्रूयतां यदुनन्दन ॥ १ ॥ वहाँ नगरकी नारियाँ मदमत्त होकर बाजे बजाने वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर लगीं, कुछ अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और दूसरी गीत महाबाहु महातेजस्वी उग्रसेनने, जिनके नेत्र हर्षसे खिल उठे गाने लगीं ॥ ७ ॥ थे, भगवान् श्रीकृष्णसे कहा-यदुनन्दन ! सुनिये ॥ १ ॥ काश्चित् प्रमुदितास्तत्र काश्चिदन्योन्यमब्रुवन् । एवं गतेऽनिरुद्धस्य क्रियतां महदुत्सवः । नानावर्णावरधराः क्रीडमानास्ततस्ततः ॥ ८ ॥ क्षेमात् प्रत्यागतं दृष्ट्वा सेव्यमाना महामते ॥ २ ॥ कुछ स्त्रियाँ वहाँ आनन्द-विनोदमें मग्न थीं, कुछ उषापि च महाभागा सखीभिः परिवारिता । आपसमें बातें कर रहीं थीं तथा बहुत-सी स्त्रियाँ नाना प्रकार- रमते परया प्रीत्या चानिरुद्धेन संगता ॥ ३ ॥ के वस्त्र धारण किये इधर-उधर भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करती 'महामते ! जब अनिरुद्ध कुशलपूर्वक द्वारका लौट थीं ॥ ८ ॥ आये और उन्हें देख लिया गया, ऐसी दशामें उनके लिये अभियान्ति ततोऽन्योन्यं काश्चिन्मदवशात् स्वयम्। कोई महान् उत्सव रचाया जाय-ऐसा मेरा विचार है। क्रीडन्ति काश्चिदक्षैस्तु हर्षोद्रुतफुल्ललोचनाः ॥ ९ ॥ महाभागा उषा भी सखियोंसे सेवित हो उनसे घिरी रहती है कितनी ही स्त्रियाँ यौवनमदके वशीभूत हो स्वयं ही और अनिरुद्धसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आनन्दपूर्वक परस्पर आलिङ्गन करती थीं और कितनी द्यूतक्रीड़ामें लगी समय बिताती है ॥ २-३ ॥ हुई थीं, उन सबके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे ॥ ९ ॥ कुम्भाण्डदुहिता रामा उषायाः सखिमण्डले । मायूरं रथमारुह्य सखीभिः परिवारिता । प्रवेश्यतां महाभागा वैदर्भी वर्द्धयेत् पुनः ॥ ४ ॥ उषा सम्प्रेषिता देव्या रुद्राण्या प्रतिगृह्यताम् ॥ १० ॥ 'उषाकी सखियोंके समुदायमें जो कुम्भाण्डकी पुत्री इयं चैव कुलश्लाघ्या नाम्नोषा सुन्दरी वरा । रामा है, उसका अन्तःपुरमें प्रवेश कराया जाय और वाणपुत्री तव वधूः प्रतिगृह्णीष्व भामिनीम् ॥ ११ ॥ महाभागा विदर्भनन्दिनी रुक्मिणी पुनः अपनी पुत्रवधूके ( जब पहले-पहल उषाका रथ द्वारपर आया । उस रूपमें उसका अभिनन्दन करें ॥ ४ ॥ समय भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे कहा--) 'देवि ! रुद्र- साम्बाय दीयतां रामा कुम्भाण्डदुहिता शुभा । पत्नी पार्वतीदेवीने सखियोंसे घिरी हुई उषाको मयूरयुक्त शेषाश्च कन्या न्यस्यन्तां कुमाराणां यथाक्रमम् ॥ ५ ॥ रथपर चढ़ाकर यहाँ भेजा है। तुम इसे ग्रहण करो। 'कुम्भाण्डकी शुभलक्षणा कन्या रामा साम्बको विवाह उत्तम कुलकी दृष्टिसे यह हमारे लिये स्पृहणीय है। इस श्रेष्ठ दी जाय और शेष कन्याएँ भी क्रमशः अन्यान्य कुमारोंको एवं सुन्दरी कन्याका नाम उषा है । यह बाणासुरकी पुत्री सौंप दी जायें' ॥ ५ ॥ और तुम्हारी बहू है, तुम इस भामिनीको सादर ग्रहण वर्तते सोत्सवस्तत्र अनिरुद्धस्य वेश्मनि । करो' ॥ १०-११ ॥ गृहे श्रीधन्वनश्चैव शुभस्तत्र प्रवर्त्तते ॥ ६ ॥ ततः प्रतिगृहीता सा स्त्रीभिराचारमङ्गलैः । ( उग्रसेनके ऐसा कहनेपर) अनिरुद्ध और श्रीधन्वाके प्रवेशिता च सा वेश्म अनिरुद्धस्य शोभना ॥ १२ ॥ भवनमें उस शुभ उत्सवका आरम्भ हुआ ॥ ६ ॥ तत्र अन्तःपुरकी स्त्रियोंने मङ्गलाचारपूर्वक उस सुन्दरी