विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| ७४८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मय वस्तुओंमें ऐसा कोई आश्चर्य नहीं है, जो भगवान् विष्णुके अंशसे शून्य हो ॥ २७ ॥
एष धन्यो हि धन्यानां धन्यकृद् धन्यभावनः।
देवेषु तु सदैत्येषु नास्ति धन्यतरोऽच्युतात् ॥ २८ ॥
ये श्रीकृष्ण धन्य हैं, ये ही धन्योंको धन्य बनानेवाले और धन्यभावन हैं, देवताओं तथा दैत्योंमें इन भगवान् अच्युतसे बढ़कर धन्य दूसरा कोई नहीं है ॥ २८ ॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा।
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च ॥ २९ ॥
ये ही आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, आकाश, भूमि, दिशा, जल और तेज हैं ॥ २९ ॥
एष धाता विधाता च संहर्ता चैव नित्यशः।
सत्यं धर्मस्तपश्चैव ब्रह्मा चैव पितामहः ॥ ३० ॥
ये ही धाता, विधाता और नित्यसंहर्ता हैं, सत्य, धर्म, तपस्या तथा पितामह ब्रह्मा. भी ये ही हैं ॥ ३० ॥
अनन्तश्चैव नागानां रुद्राणां शंकरः स्मृतः।
जङ्गमाजङ्गमं चैव जगन्नारायणोद्भवम् ॥ ३१ ॥
ये नागोंमें अनन्त और रुद्रोंमें शङ्कर माने गये हैं। यह समस्त चराचर जगत् इन नारायणदेवसे ही प्रकट हुआ है ॥ ३१ ॥
एतस्माच्च जगत् सर्वं प्रसूयेत जनार्दनात्।
जगच्च सर्वं देवेशे तं नमस्कुरु भारत ॥ ३२ ॥
इन जनार्दनसे ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति होती है। भारत ! देवेश्वर श्रीकृष्णमें ही सम्पूर्ण जगत् विद्यमान है। तुम उन्हें नमस्कार करो ॥ ३२ ॥
पूज्यश्च सततं सर्वैर्देवैरेष सनातनः।
इत्युक्तं बाणयुद्धं ते माहात्म्यं केशवस्य तु ॥ ३३ ॥
ये सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ही सदा सम्पूर्ण देवताओंके लिये पूजनीय हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे बाणासुरके युद्ध और केशवके माहात्म्यका वर्णन किया ॥ ३३ ॥
वंशप्रतिष्ठामतुलां श्रवणादेव लप्स्यसे।
ये चेदं धारयिष्यन्ति बाणयुद्धमनुत्तमम् ॥ ३४ ॥
केशवस्य च माहात्म्यं नाधर्मस्तान् भजिष्यति ।
तुम इसके श्रवणमात्रसे अनुपम वंशप्रतिष्ठा प्राप्त करोगे। जो लोग बाणासुरके इस परम उत्तम युद्धप्रसंग और केशवके माहात्म्यको अपने मनमें धारण करेंगे, उनके पास अधर्मका प्रवेश नहीं होगा ॥ ३४३ ॥
एषा तु वैष्णवी चर्चा मया कात्स्न्येन कीर्तिता ॥ ३५॥
पृच्छतस्तात यज्ञेऽस्मिन् निवृत्ते जनमेजय ।
तात जनमेजय ! इस यज्ञकी समाप्तिपर तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने भगवान् विष्णुकी इस सम्पूर्ण लीलाका वर्णन किया है ॥ ३५३ ॥
आश्चर्यपर्व निखिलं यो हीदं धारयेन्नरः ॥ ३६ ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
नरेश्वर ! जो इस सम्पूर्ण आश्चर्यमय पर्वको धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ३६३ ॥
कल्य उत्थाय यो नित्यं कीर्तयेत् सुसमाहितः ॥ ३७ ॥
न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च।
जो प्रतिदिन सबेरे उठकर एकाग्रचित्त हो इसका कीर्तन करता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३७३ ॥
ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ ३८॥
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः कामानवाप्नुयात् ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुर्लभेत सः ॥ ३९॥
इस प्रसंगका अपने अधिकारके अनुसार पाठ या श्रवण करनेसे ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता होता है, क्षत्रिय-को युद्धमें विजय प्राप्त होती है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शूद्र अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है। उसे किसी भी अशुभ या अमङ्गलकी प्राप्ति नहीं होती तथा वह दीर्घायु होता है ॥ ३८-३९ ॥
सौतिरुवाच
इति पारिक्षितो राजा वैशम्पायनभाषितम् ।
श्रुतवानचलो भूत्वा हरिवंशं द्विजोत्तमाः ॥ ४० ॥
विप्रवरो ! इस प्रकार परीक्षित्के पुत्र राजा जनमेजय-ने स्थिरचित्त होकर वैशम्पायनके द्वारा कहे गये हरिवंशका श्रवण किया ॥ ४० ॥
एवं शौनक संक्षेपाद् विस्तरेण तथैव च।
प्रोक्ता वै सर्ववंशास्ते किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४१ ॥
शौनक ! इस प्रकार मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ सभी वंशोंका वर्णन किया है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उदाहरणसमाप्तौ अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उदाहरणके प्रसंगकी समाप्तिविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥
विष्णुपर्व सम्पूर्ण ॥ २ ॥
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमहाभारतम्
तस्य खिलभागो हरिवंशः
( तत्र भविष्यपर्व )
प्रथमोऽध्यायः
जनमेजयकी संतति एवं पौरव तथा पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाका वर्णन
नारायणं नमस्कृत्यं नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥
बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदिजीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण) को और (इन नरनारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे ॥
शौनक उवाच
जनमेजयस्य के पुत्राः पठ्यन्ते लोमहर्षणे ।
कस्मिन् प्रतिष्ठितो वंशः पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १ ॥
**शौनकजीने पूछा—**लोमहर्षणकुमार ! जनमेजयके पुत्र कौन और कितने कहे जाते हैं ? महात्मा पाण्डवोंका वंश किसपर प्रतिष्ठित हुआ ? ॥ १ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
त्वत्तः कथयतः सर्वं वेद्म्यहं तत् परिस्रफुटम् ॥ २ ॥
मैं इसे सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। आपके बतानेसे मैं इन सब बातोंको स्पष्टरूपसे जान लूँगा ॥ २ ॥
सौतिरुवाच
पारीक्षितस्य काश्यायां द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतुः ।
चन्द्रापीडश्च नृपतिः सूर्यापीडश्च मोक्षवित् ॥ ३ ॥
**सौतिने कहा—**शौनकजी ! परीक्षित्कुमार जनमेजयकी पत्नी काशिराजकन्या वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र हुए। उनमेंसे एक थे चन्द्रापीड़, जो राजा हुए और दूसरेका नाम था सूर्यापीड़, जो मोक्षधर्मके ज्ञाता थे ॥ ३ ॥
चन्द्रापीडस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् ।
जनमेजय इत्येतं क्षात्रं भुवि परिश्रुतम् ॥ ४ ॥
चन्द्रापीड़के सौ पुत्र हुए, जो उत्तम धनुर्धर थे। क्षत्रियोंका वह समुदाय जनमेजय (अथवा जानमेजय) के नामसे भूमण्डलमें विख्यात हुआ ॥ ४ ॥
तेषां श्रेष्ठस्तु राजासीत् पुरे वारणसाह्वये ।
सत्यकर्णो महाबाहुर्यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ ५ ॥
उनमें सबसे बड़ा महाबाहु सत्यकर्ण था, जो हस्तिनापुरमें राजा हुआ। वह यज्ञ करनेवाला और उन यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था ॥ ५ ॥
सत्यकर्णस्य दायादः श्वेतकर्णः प्रतापवान् ।
अपुत्रः स तु धर्मात्मा प्रविवेश तपोवनम् ॥ ६ ॥
सत्यकर्णका पुत्र प्रतापी श्वेतकर्ण था, वह धर्मात्मा राजा श्वेतकर्ण पुत्रहीन होनेके कारण तपोवनमें चला गया ॥ ६ ॥
तस्माद् वनगताद् गर्भं यादवी प्रत्यपद्यत ।
सुचारोर्दुहिता सुभ्रूर्मानिनी भ्रातृमालिनी ॥ ७ ॥
वनमें जानेपर उनसे उनकी पत्नी मानिनीने, जो यदुकुलकी कन्या, सुचारुकी पुत्री, सुन्दर भौंहोंवाली तथा अनेक भ्राताओंकी बहिन थी, गर्भ धारण किया ॥ ७ ॥
स तु जन्मनि गर्भस्य श्वेतकर्णः प्रजेश्वरः ।
अन्वगच्छद् गतं पूर्वैर्महाप्रस्थानमच्युतम् ॥ ८ ॥
उस गर्भके जन्मकालमें राजा श्वेतकर्णने उस अच्युत महाप्रस्थानकी यात्रा की, जहाँ उनके पूर्वज पाण्डव जा चुके थे ॥ ८ ॥
सा दृष्ट्वा सम्प्रयातं तं मानिनी पृष्ठतोऽन्वयात् ।
पथि सा सुषुवे सुभ्रूवने राजीवलोचनम् ॥ ९ ॥
| ७५० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उन्हें जाते देख मानिनी भी गर्भिणी अवस्थामें ही उनके पीछे-पीछे चल दी। उस सुन्दर भौंहोंवाली रानीने मार्गमें ही एक वनके भीतर बालकको जन्म दिया, जिसके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे ॥ ९ ॥
कुमारं तं परित्यज्य भर्तारं चान्वगच्छत ।
पतिव्रता महाभागा द्रौपदीव पुरा पतीन् ॥ १० ॥
जैसे पूर्वकालमें पतिव्रता महाभागा द्रौपदीने सब कुछ छोड़कर महाप्रस्थानके पथपर पाँचों पतियोंका अनुसरण किया था, उसी प्रकार मानिनी उस नवजात शिशुको छोड़कर पतिके पीछे चली गयी ॥ १० ॥
स तु राजकुमारोऽसौ गिरिकुञ्जे रुरोद ह ।
छायार्थं तस्य मेघास्तु प्रादुरासन् समन्ततः ॥ ११ ॥
वह राजकुमार पर्वतके कुञ्जमें पड़ा-पड़ा रोने लगा। उस समय उसपर छाया करनेके लिये चारों ओर मेघ प्रकट हो गये ॥ ११ ॥
अविष्ठायाश्च पुत्रौ द्वौपिप्पलादश्च कौशिकः ।
दृष्ट्वा कृपान्वितौ गृह्य तं प्रक्षालयतां जलैः ।
निघृष्टौ तस्य तौ पार्श्वौ शिलायां रुधिरप्लुतौ ॥ १२ ॥
अविष्ठाके दो पुत्र पिप्पलाद और कौशिकने उसे देखकर दयासे द्रवित हो उठा लिया और जलसे नहलाया। उस समय उस बालकके दोनों पार्श्वभाग पत्थरपर घिस जानेसे लहूलुहान हो रहे थे ॥ १२ ॥
अजश्यामौ तु पार्श्वौ तावुभावपि समाहितौ ।
तथैव तु समारूढौ अजपार्श्वस्ततोऽभवत् ॥ १३ ॥
उस बालकके वे दोनों पार्श्व बकरेके समान काले हो गये थे और उसी रूपमें वे हृष्टपुष्ट हो गये, इसलिये वह बालक अजपार्श्व नामसे विख्यात हुआ ॥ १३ ॥
ततोऽजपार्श्व इति तौ चक्राते तस्य नाम ह ।
स तु वेमकशालायां द्विजाभ्यामभिवर्धितः ॥ १४ ॥
इसीलिये पिप्पलाद और कौशिकने उसका नाम अजपार्श्व रखा और वेमकमुनिके घरमें उन दोनों ब्राह्मणोंने उसका पालन-पोषण किया ॥ १४ ॥
वेमकस्य तु भार्या तमुद्वहत् पुत्रकारणात् ।
वेमक्याः स तु पुत्रोऽभूद् ब्राह्मणौ सचिवौ च तौ ॥ १५ ॥
वेमककी पत्नी वेमकीने पुत्रके लिये उस बालकका विवाह कर दिया। वह बालक तथा उसके सहायक वे दोनों ब्राह्मण वेमकीके पुत्ररूपमें प्रसिद्ध हुए ॥ १५ ॥
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च युगपत्तुल्यजीविनः ।
स एष पौरवो वंशः पाण्डवानां प्रतिष्ठितः ॥ १६ ॥
उन तीनोंके पुत्र और पौत्र एक ही कालमें हुए और समान कालतक जीवित रहे, इस प्रकार यह पौरव तथा पाण्डववंश भूतलमें प्रतिष्ठित हुआ ॥ १६ ॥
श्लोकोऽपि चात्र गीतोऽयं नाहुषेण ययातिना ।
जरासंक्रमणे पूर्वे भृशं प्रीतेन धीमता ॥ १७ ॥
पूर्वकालमें पुरूके शरीरमें अपनी वृद्धावस्थाका संचार करते समय अत्यन्त प्रसन्न हुए बुद्धिमान् नहुषकुमार ययातिने इस पौरववंशके विषयमें यह श्लोक भी गाया था—॥ १७ ॥
अचन्द्रार्कग्रहा भूमिर्भवेद्वापि न संशयः ।
अपौरवा न तु मही भविष्यति कदाचन ॥ १८ ॥
'यह सम्भव है कि कभी भूमि चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहोंके प्रकाश एवं प्रभावसे रहित हो जाय, परंतु वह पौरववंशसे शून्य कभी नहीं होगी; इसमें संशय नहीं है' ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पाण्डववंशप्रतिष्ठाकीर्तने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाके कथनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
राजा जनमेजयका अश्वमेध यज्ञ करनेका विचार, व्यासजीका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार, आपने पाण्डवोंको राजसूय यज्ञ करनेसे क्यों नहीं रोका—यह जनमेजयका प्रश्न और उसके उत्तरमें व्यासजीद्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन
शौनक उवाच
| उक्तोऽयं हरिवंशस्ते पर्वाणि निखिलानि च ।<br>यथा पुरोक्तानि तथा व्यासशिष्येण धीमता ॥ १ ॥ | तत् कथ्यमानममितमितिहाससमन्वितम् ।<br>प्रीणात्यस्मानमृतवत् सर्वपापविनाशनम् ॥ २ ॥ |
| **शौनकने पूछा—**सूतनन्दन ! पूर्वकालमें व्यासजीके बुद्धिमान् शिष्य वैशम्पायनजीने जैसा वर्णन किया था, उसके अनुसार आपने यह हरिवंश और इसके सारे पर्व कह सुनाये ॥ १ ॥ | आपके मुखसे कहा जाता हुआ यह अनुपम ग्रन्थ, जो इतिहाससे युक्त और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, हम लोगोंको अमृतके समान तृप्ति प्रदान करता है ॥ २ ॥ |
सुश्रूषाद्यतया धीर मनो ह्लादयतीव नः ।
जनमेजयस्तु नृपतिः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।
[ भविष्यपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ७५१
सौते किमकरोत् पश्चात् सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ३ ॥
धीर सूतकुमार ! सुखपूर्वक सुनने-सुनानेके योग्य होनेके कारण यह कथा हमारे मनको परम आह्लाद प्रदान करती है। इस। उत्तम आख्यानको सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् कौन-सा कार्य किया ? ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयस्तु स नृपः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।
यदारभत् तदाख्यास्ये सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ४ ॥
सूतपुत्र उग्रश्रवाने कहा—शौनकजी ! यह उत्तम कथा सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् जो कार्य आरम्भ किया, उसका वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥
तस्मिन् सत्रे समाप्तेऽथ राजा पारिक्षितस्तदा ।
यष्टुं स वाजिमेधेन सम्भारानुपचक्रमे ॥ ५ ॥
सर्पसत्र समाप्त होनेपर राजा जनमेजयने अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आवश्यक सामग्री जुटानी आरम्भ की ॥ ५ ॥
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यानाहूयेदमुवाच ह।
यक्ष्येऽहं वाजिमेधेन हय उत्सृज्यतामिति ॥ ६ ॥
फिर उन्होंने ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यको बुलाकर इस प्रकार कहा—'मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा, आपलोग अश्व छोड़िये' ॥ ६ ॥
ततोऽस्य विज्ञाय चिकीर्षितं तदा
कृष्णो महात्मा सहसाऽऽजगाम ।
पारिक्षितं द्रष्टुमदीनसत्त्वं
द्वैपायनः सर्वपरावरज्ञः ॥ ७ ॥
जनमेजय क्या करना चाहते हैं, इस बातको जानकर उस समय सबके भूत और भविष्यको जाननेवाले महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, उदारचेता परीक्षित्कुमार जनमेजयसे मिलनेके लिये सहसा वहाँ आये ॥ ७ ॥
पारिक्षितस्तु नृपतिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् ।
अर्घ्यपाद्यासनं दत्त्वा पूजयामास शास्त्रतः ॥ ८ ॥
उन महर्षिको आया देख राजा जनमेजयने अर्घ्य, पाद्य और आसन देकर शास्त्रविधिके अनुसार उनका पूजन किया॥
तौ चोपविष्टावभितः सदस्यास्तस्य शौनक ।
कथा बहुविधाश्चित्राश्चक्राते वेदसंहिताः ॥ ९ ॥
शौनक ! फिर वे दोनों यथायोग्य आसनोंपर बैठे। उनके आस-पास राजाके दूसरे सदस्य भी बैठ गये। तत्पश्चात् उन दोनोंने नाना प्रकारकी विचित्र कथाएँ एक दूसरेके प्रति कहीं, जो वेदोंमे वर्णित हैं ॥ ९ ॥
ततः कथान्ते नृपतिर्नोदयामास तं मुनिम् ।
पितामहं पाण्डवानामात्मनः प्रपितामहम् ॥ १० ॥
कथा वार्ताके अन्तमें राजा जनमेजयने पाण्डवोंके पितामह और अपने प्रपितामह मुनिवर व्याससे कहा—॥ १० ॥
महाभारतमाख्यानं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम् ।
निमेषमात्रमपि मे सुखश्राव्यतया गतम् ॥ ११ ॥
'महर्षे ! महाभारत नामक इतिहास अनेक अर्थोंसे भरा हुआ है; इसमें श्रुतियोंके अर्थका विस्तार है, फिर भी यह सुनने-सुनानेमें इतना सुखद है कि मेरा कई दिनोंका समय एक निमेषके समान बीत गया है ॥ ११ ॥
विभूतिविस्तारकरं सर्वेषां वै यशस्करम् ।
त्वया सुविहितं ब्रह्मञ्छङ्खे क्षीरमिवार्हितम् ॥ १२ ॥
'ब्रह्मन् ! यह इतिहास सबके लिये ऐश्वर्यका विस्तार करनेवाला और यशस्कर है, आपने इसकी इतनी सुन्दर रचना की है, मानो क्षीरसमुद्रको शङ्खमें भर दिया हो ॥ १२ ॥
अमृतेन तु तृप्तिः स्याद् यथा स्वर्गसुखेन च ।
तथा तृप्तिं न गच्छामि शृण्वेमां भारतीं कथाम् ॥ १३ ॥
'जैसे अमृत पीनेसे तृप्ति नहीं होती तथा जैसे स्वर्गीय सुखसे जी नहीं भरता है, उसी प्रकार इस भारती कथाको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ( अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ रही है ) ॥ १३ ॥
अनुमान्य तु सर्वज्ञं पृच्छामि भगवन्नहम् ।
हेतुः कुरूणां नाशस्य राजसूयो मतो मम ॥ १४ ॥
'भगवन् ! आप सर्वज्ञ हैं, मैं आपकी अनुमति लेकर कुछ पूछ रहा हूँ, मुझे ऐसा मालूम होता है कि-राजसूय यज्ञ ही कौरवोंके विनाशका कारण हुआ है ॥ १४ ॥
दुःसहानां यथा ध्वंसो राजन्यानामुपप्लवे ।
राजसूयं तथा मन्ये युद्धार्थमुपकल्पितम् ॥ १५॥
'महाभारतयुद्धमे जिस प्रकार दुःसह ( अजेय ) राजाओंका विनाश हुआ है, उसे देखते हुए मै यही मानता हूँ, राजसूयकी कल्पना युद्धके लिये ही हुई है ॥ १५ ॥
राजसूयस्तु सोमेन श्रूयते पूर्वमाहृतः ।
तस्यान्ते सुममहद् युद्धमभवत् तारकामयम् ॥ १६ ॥
'सुना जाता है कि पूर्वकालमे सोमने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया था, उनके उस यज्ञके अन्तमें तारकामय नामक महान् युद्ध हुआ था ॥ १६ ॥
आहृतो वरुणेनाथ तस्यान्ते सुमहाक्रतोः ।
देव।सुरं महायुद्धं सर्वभूतक्षयावहम् ॥ १७ ॥
'तदनन्तर वरुणने वह यज्ञ किया, उनके उस महायज्ञके अन्तमें देवताओं और असुरोंके बीच बड़ा भारी संग्राम हुआ, जो सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाला था ॥ १७ ॥
हरिश्चन्द्रश्च राजर्षिः क्रतुमेनमुपाहरत् ।
तत्राप्याडीवकं नाम युद्धं क्षत्रियनाशनम् ॥ १८ ॥
७५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश
‘इसके बाद राजर्षि हरिश्चन्द्रने इस यज्ञका अनुष्ठान किया, उनके यज्ञके अन्तमें आडीवक-नामक महान् युद्ध हुआ, जो क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला था ॥
ततोऽनन्तरमार्येण पाण्डवेनातिदुस्तरः । महाभारत आरम्भः सम्भृतोऽग्निरिव क्रतुः ॥ १९ ॥
‘उसके बाद श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने उस अत्यन्त दुस्तर और अग्निके समान भयंकर यज्ञका आयोजन किया, जिसका आरम्भ महाभारत-युद्धको उपस्थित करनेमें कारण हुआ ॥ १९ ॥
तदस्य मूलं युद्धस्य लोकक्षयकरस्य तु । राजसूयो महायज्ञः किमर्थं न निवारितः ॥ २० ॥
‘अतः इस लोकविनाशकारी युद्धका जो मूल कारण था, उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान आपने क्यों नहीं रोक दिया था ? ॥ २० ॥
राजसूयो ह्यसंहार्थो यज्ञाङ्गैश्च दुरत्ययैः । मिथ्या प्रणीते यज्ञाङ्गे प्रजानां संक्षयो ध्रुवः ॥ २१ ॥
‘राजसूय यज्ञको सर्वाङ्गपूर्णरूपसे सम्पन्न करना असम्भव है, क्योंकि उस यज्ञके अङ्गभूत साधन दुर्लभ हैं । यदि यज्ञाङ्ग-का सम्यक् रूपसे सम्पादन न होनेके कारण उसमें वैगुण्य आ गया तो प्रजाजनोंका नाश अवश्यंभावी है ॥ २१ ॥
भवानपि च सर्वेषां पूर्वेषां नः पितामहः । अतीतानागतज्ञश्च नाथश्चादिकरश्च नः ॥ २२ ॥
‘आपभी हमारे समस्त पूर्वजोंके पितामह हैं, आपको भूत और भविष्यत्कालका ज्ञान है, आप हमारे कुलके रक्षक और हमारे पूर्वजोंके जन्मदाता हैं ॥ २२॥
ते कथं भवता नेत्रा बुद्धिमन्तश्च्युता नयात् । अनाथा ह्यपराध्यन्ते कुनेतारश्च मानवाः ॥ २३ ॥
‘आप-जैसे नेताके रहते हुए बुद्धिमान् पाण्डव नीतिमार्गसे भ्रष्ट कैसे हो गये ? क्योंकि जो मनुष्य अनाथ हैं और जिनके नेता अच्छे नहीं हैं, वे ही अपराध कर बैठते हैं (पाण्डवोंको तो आप-जैसा श्रेष्ठ नेता मिला था और वे आपको पाकर सनाथ थे, तो भी उनसे यह भूल क्यों हुई ?)’ ॥ २३ ॥
व्यास उवाच
कालेन विपरीतास्ते तव पूर्वपितामहाः । न मां भविष्यं पृच्छन्ति न चापृष्टो ब्रवीम्यहम् ॥ २४ ॥
व्यासजी बोले—जनमेजय ! तुम्हारे पूर्वपितामह पाण्डव कालकी प्रेरणासे विपरीत अवस्थाको प्राप्त हो गये थे, वे मुझसे भविष्य नहीं पूछते थे और मैं बिना पूछे किसीको कोई बात बताता नहीं हूँ ॥ २४ ॥
सामर्थ्यं च न पश्यामि भविष्यस्य निवर्तने । परिहर्तुं न शक्या हि कालेन विहिता गतिः ॥ २५ ॥
भविष्यको पलट देनेकी शक्ति मैं किसीमें नहीं देखता हूँ; क्योंकि कालने जिस गतिका विधान किया है, उसका परिहार असम्भव है ॥ २५ ॥
त्वया त्विदमहं पृष्टो वक्ष्याम्यागन्तु भावि यत् । अतश्च बलवान् कालः श्रुत्वापि न करिष्यसि ॥ २६ ॥
तुमने इस विषयको मुझसे पूछा है, इसलिये मैं तुम्हारे लिये आनेवाले भविष्यका वर्णन करूँगा, परंतु काल इससे भी बलवान् है, तुम मेरे मुखसे भविष्यके कर्तव्यको सुनकर भी उसका पालन नहीं करोगे ॥ २६ ॥
न संरम्भान्न चारम्भान्न वै स्थास्यसि पौरुषे । लेखा हि काललिखिताः सर्वथा दुरतिक्रमाः ॥ २७ ॥
संरम्भ (उत्तेजना) और आरम्भ (उद्योग) के कारण तुम पौरुषमें स्थिर नहीं रह सकोगे; क्योंकि कालके लिखे हुए लेखको लाँघ जाना सर्वथा कठिन है ॥ २७ ॥
अश्वमेधः क्रतुः श्रेष्ठः क्षत्रियाणां परिश्रुतः । तेन भावेन ते यज्ञं वासवो धर्षयिष्यति ॥ २८ ॥
क्षत्रियोंके लिये अश्वमेध यज्ञ सबसे श्रेष्ठ सुना गया है, उसके इस महत्त्वके कारण इन्द्र द्वेषवश तुम्हारे उस यज्ञको भ्रष्ट कर देंगे ॥ २८ ॥
यदि तच्छक्यते राजन् परिहर्तुं कथंचन । दैवं पुरुषकारेण मा यजेथाश्च तं क्रतुम् ॥ २९ ॥
राजन् ! यदि तुम पुरुषार्थसे किसी प्रकार दैवके विधानका निवारण कर सको तो तुम कदापि इस यज्ञका अनुष्ठान न करना ॥ २९ ॥
न चापराधः शक्रस्य नोपाध्यायगणस्य ते । तव वा यजमानस्य कालोऽत्र दुरतिक्रमः ॥ ३० ॥
इसमें न इन्द्रका अपराध है, न तुम्हारे उपाध्यायगणका और न तुम-जैसे यजमानका ही; यहाँ काल ही दुर्लङ्घ्य है ॥ ३० ॥
तस्य संस्थाकृतमिदं कालस्य परमेष्ठिनः । यथा दृष्टं प्रजासर्गे गमिष्यति युगक्षये ॥ ३१ ॥
यह जो भावी कलंक है, वह कालरूप ब्रह्माजीकी इच्छासे अश्वमेध यज्ञको भविष्यमे बंद करा देनेके लिये संघटित किया जानेवाला है, फिर तो कलियुगमे सारी प्रजा प्रायः असर्ग अर्थात् विनाशको ही प्राप्त होगी (यज्ञ आदि-के अनुष्ठानसे प्रजामें जो दीर्घजीवित्व आता था, उसका धीरे-धीरे अभाव हो जायगा) । यह बात ज्ञानदृष्टिसे देखी गयी है ॥ ३१ ॥
तथा यज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजातयः । तत्प्रणेयं निबोधध्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३२ ॥
इसके सिवा ब्राह्मणलोग यज्ञोंके फल बेचने लगेंगे, अतः तुम यह जान लो कि चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी कालके ही अधीन है ॥ ३२ ॥
भविष्यपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ७५३
जनमेजय उवाच
निवृत्तावश्वमेधस्य किं निमित्तं भविष्यति।
श्रुत्वा परिहरिष्यामि भगवन् यदि मन्यसे ॥ ३३ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन् ! अश्वमेध यज्ञकी निवृत्तिमें कौन-सा कारण उपस्थित होगा। यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे सुनकर उसका परिहार करूँगा ॥ ३३ ॥
व्यास उवाच
निमित्तं भविता तत्र ब्रह्मकोपकृतं प्रभो।
यतेथाः परिहर्तुं त्वमित्येतद् भद्रमस्तु ते ॥ ३४ ॥
व्यासजीने कहा— प्रभो ! ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारे मनमें क्रोध होगा, जिससे उस यज्ञको बंद करनेका निमित्त स्वयं बन जायगा। तुम इसके परिहारके लिये प्रयत्न करना, यही मुझे कहना है, तुम्हारा कल्याण हो ॥ ३४ ॥
त्वया वृत्तं क्रतुं चैव वाजिमेधं परंतप।
क्षत्रिया नाहरिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ ३५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश ! तुम्हारे द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञको जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक भावी पीढ़ीके क्षत्रिय नहीं करेंगे ॥ ३५ ॥
जनमेजय उवाच
निवृत्तावश्वमेधस्य ब्रह्मशापाग्नितेजसा।
अहं निमित्तमिति मे भयं तीव्रं तु जायते ॥ ३६ ॥
जनमेजय बोले— भगवन् ! ब्राह्मणकी शापाग्निके तेजसे अश्वमेधयज्ञकी निवृत्ति होगी और मैं उसमें निमित्त बनूँगा, यह जानकर मुझे बड़ा भारी भय हो रहा है ॥
कथं ह्यकीर्त्या युज्येत सुकृती मह्विधो जनः।
लोकान्नुच्छेते गन्तुं खं सपाश इव द्विजः ॥ ३७ ॥
मेरे-जैसा पुण्यात्मा पुरुष कैसे अपयशसे युक्त होगा और जैसे जालमे बँधा हुआ पक्षी आकाशमे नहीं उड़ सकता उसी प्रकार अपयशसे कलङ्कित हुआ मुझ जैसा पुरुष लोगोंके सामने जानेका साहस कैसे कर सकेगा ? ॥ ३७ ॥
यथा ह्यनागतमिदं दृष्टमत्र प्रणाशनम्।
यद्यस्ति पुनरावृत्तिर्यज्ञस्याश्वासयस्व माम् ॥ ३८ ॥
जिस तरह आपने यहाँ इस यज्ञके भावी विनाशको देखा है, उसी प्रकार यदि इसकी पुनरावृत्ति भी सम्भव हो तो उसे बताकर मुझे आश्वासन दीजिये ॥ ३८ ॥
व्यास उवाच
उपात्तयज्ञो देवेषु ब्राह्मणेष्ूपपत्स्यते।
तेजसा व्याहृतं तेजस्तेजस्येवावतिष्ठते ॥ ३९ ॥
व्यासजीने कहा— राजन् ! अश्वमेध यज्ञका उपसंहार हो जानेपर वह देवताओं और ब्राह्मणोंमें ज्ञानरूपसे स्थित रहेगा, क्योंकि तेजसे अभिभूत हुआ तेज तेजमें ही स्थित होता है ॥ ३९ ॥
औद्भिद्जो भविता कश्चित् सेनानीः काश्यपो द्विजः।
अश्वमेधं कलियुगे पुनः प्रत्याहरिष्यति ॥ ४० ॥
भूमिको खोदनेसे कोई सेनानी नामक कश्यपवंशी ब्राह्मण प्रकट होगा, जो कलियुगमें पुनः अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेगा ॥ ४० ॥
तदन्ते तत्कुलीनश्च राजसूयमपि क्रतुम्।
आहरिष्यति राजेन्द्र श्वेतग्रहमिवान्तकः ॥ ४१ ॥
राजेन्द्र ! उस यज्ञके अन्तमें उसी कुलमें उत्पन्न हुआ दूसरा पुरुष राजसूययज्ञका भी अनुष्ठान करेगा; ठीक उसी तरह जैसे प्रलयकाल श्वेतग्रह (उत्पातग्रह) की सृष्टि करता है ॥ ४१ ॥
यथाबलं मनुष्याणां कर्तॄणां दास्यते फलम्।
युगान्तद्वारमृषिभिः संवृतं विचरिष्यति ॥ ४२ ॥
यज्ञ करनेवाले मनुष्योंको श्रद्धादि रूप बलके अनुसार ही वह यज्ञ फल देगा, फिर ऋषियोंद्वारा सुरक्षित युगान्तकालके द्वारपर लोग विचरण करेंगे ॥ ४२ ॥
तदा प्रभृति हास्यन्ति नॄणां प्राणाः पुराकृतीः।
न निवर्तिष्यते लोके वृत्तान्तावर्तनेष्विह ॥ ४३ ॥
तभीसे मनुष्योंकी इन्द्रियाँ पुरातन कृत्यों शिष्टाचारोंका परित्याग कर देंगी। जगत्के भीतर लोगोंके बर्तावोंमें पहिले-जैसा वृत्तान्त (आचार-विचार) सर्वथा नहीं रहेगा ॥ ४३ ॥
तदा सूक्ष्मो महोदर्को दुस्तरो दानमूलवान्।
चातुराश्रम्यशिथिलो धर्मः प्रविचालिष्यति ॥ ४४ ॥
उस समय सूक्ष्म धर्म भी महान् फल देनेवाला होगा, परंतु अधिक विघ्नोंके कारण उस धर्मको पूरा करना कठिन होगा। उस धर्मका मूल दान होगा। उन चारों आश्रमोंके शिथिल हो जानेसे धर्म भी अपने स्वरूपसे विचलित हो जायगा ॥ ४४ ॥
तदा ह्यल्पेन तपसा सिद्धिं प्राप्स्यन्ति मानवाः।
धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ४५ ॥
जनमेजय ! उस युगान्त अर्थात् कलियुगमें मनुष्य थोड़ी-सी तपस्यासे भी सिद्धि प्राप्त कर लेंगे। उस समय कुछ धन्य पुरुष ही धर्मका आचरण करेंगे ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि जनमेजयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें जनमेजयका प्रश्नविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
७५४ ] श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तृतीयोऽध्यायः
व्यासजीद्वारा कलियुगकी स्थितिका वर्णन
जनमेजय उवाच
आसन्नं विप्रकृष्टं वा यदि कालं न विद्महे ।
तस्माद् द्वापरसंविद्धं युगान्तं स्पृहयाम्यहम् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा—महर्षे! हमारे मोक्षका काल निकट है या दूर, यह हमलोग नहीं जानते; अतः जिसने द्वापरको अधर्मकी अधिकतासे दूषित कर दिया है, उस युगान्त अर्थात् कलियुगका वर्णन मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
प्राप्ता वयं तु तत् कालमनया धर्मतृष्णया ।
आदद्यात् परमं धर्मं सुखमल्पेन कर्मणा ॥ २ ॥
कलियुगमें मनुष्य थोड़े-से आयाससे किये जानेवाले सत्कर्मद्वारा सुखपूर्वक महान् धर्मके फलकी प्राप्ति कर सकता है, इस प्रकार इस धर्मविषयक लोभसे हमलोगोंने उस कलिकालमें जन्म ग्रहण किया है ॥ २ ॥
शौनक उवाच
प्रजासमुद्वेगकरं युगान्तं समुपस्थितम् ।
प्रणष्टधर्मे धर्मज्ञ निमित्तैर्वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
शौनकजीने कहा—धर्मज्ञ सूतनन्दन ! प्रजाको उद्वेगमें डालनेवाला और धर्मको नष्ट कर देनेवाला कलियुग उपस्थित हो गया है, आप इसके भावी लक्षण बताते हुए इसका वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
पृष्ट एवं भविष्यस्य गतिं तत्त्वेन चिन्तयन् ।
युगान्ते सर्वभूतानां भगवानब्रवीत् तदा ॥ ४ ॥
सौतिने कहा—शौनक ! राजा जनमेजयने भी ऐसा ही प्रश्न किया था। उसके उत्तरमें कलियुगमें समस्त प्राणियोंके भविष्यकी गतिका तत्त्वतः विचार करके भगवान् व्यासने उस समय इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
व्यास उवाच
अरक्षितारो हर्तारो बलिभागस्य पार्थिवाः ।
युगान्ते प्रभविष्यन्ति स्वरक्षणपरायणाः ॥ ५ ॥
व्यासजी बोले—राजन् ! कलियुगमें प्रजाओंकी रक्षा न करते हुए उनसे कर लेनेवाले राजा उत्पन्न होंगे, जो सदा अपने शरीरमात्रकी रक्षामें संलग्न रहेंगे ॥ ५ ॥
अक्षत्रियाश्च राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः ।
शूद्राश्च ब्राह्मणाचारा भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ६ ॥
कलियुगमें जो क्षत्रिय नहीं हैं, ऐसे लोग भी राजा होंगे। ब्राह्मणलोग शूद्रोंके आश्रित होकर जीविका चलायेंगे और शूद्र ब्राह्मणोंके-से आचारका पालन करनेवाले होंगे ॥ ६ ॥
काण्डे स्पृष्टाः श्रोत्रियाश्च निष्क्रियाणि हवींष्यथ ।
एकपङ्क्त्यामशिष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ७ ॥
जनमेजय ! कलियुगमें धनुष-बाण धारण करनेवाले (क्षत्रियवृत्तिसे जीनेवाले) ब्राह्मण और श्रोत्रिय ब्राह्मण दोनों एक पंक्तिमें बैठकर पञ्चयज्ञोंसे रहित हविष्य भोजन करेंगे ॥ ७ ॥
शिल्पवन्तोऽनृतपरा नरा मद्यामिषप्रियाः ।
मित्रभार्या भविष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ८ ॥
जनमेजय ! कलियुगमें मनुष्य शिल्प कर्म करनेवाले, असत्यवादी, मदिरा और मांसके प्रेमी तथा पत्नीको ही मित्र माननेवाले होंगे ॥ ८ ॥
राजवृत्तिस्थिताश्चौरा राजानश्चौरशीलिनः ।
भृत्याश्चानिर्दिष्टभुजो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ९ ॥
युगान्तकाल (कलियुग) में चोर राजोचितवृत्तिसे रहेंगे और राजाओंका स्वभाव चोरोंके समान हो जायगा तथा सेवक उन वस्तुओंका भी उपभोग करेंगे—जिन्हें भोगने-के लिये उन्हें स्वामीकी ओरसे आज्ञा नहीं मिली है ॥ ९ ॥
धनानि श्लाघनीयानि सतां वृत्तम्पूजितम् ।
अकुत्सना च पतिते भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १० ॥
कलियुगमे धन ही सबके लिये स्पृहणीय होंगे, सत्पुरुषों-के आचार-व्यवहारका आदर नहीं होगा और धर्मसे पतित हुए मनुष्यके प्रति निन्दाका भाव रखनेवाले कोई न होंगे ॥ १० ॥
प्रणष्टचेतना मर्त्या मुक्तकेशा विचूलिनः ।
ऊनषोडशवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नराः सदा ॥ ११ ॥
मनुष्य धर्म और अधर्मके विवेकसे रहित होंगे, विधवाएँ तथा संन्यासी परस्पर समागम करके बच्चे पैदा करेंगे। सोलह वर्षसे कम अवस्थावाले मनुष्य भी सदा संतानोत्पादन करेंगे ॥ ११ ॥
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
प्रमदाः केशशूलाश्च भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १२ ॥
कलियुगमें जनपदके लोग अन्न बेचेंगे, चौराहोंपर द्विज लोग वेदोंका विक्रय करेंगे और युवती स्त्रियाँ मूल्य लेकर व्यभिचार करनेवाली होंगी ॥ १२ ॥
सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति सर्वे वाजसनेयिनः ।
शूद्रा भोवादिनश्चैव भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १३ ॥
भविष्यपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ७५५
उस समय सब लोग ब्रह्मवादी हो जायेंगे (ब्रह्मवादकी आड़ लेकर कर्म-भ्रष्ट हो जायेंगे), दूसरी शाखाओंका लोप हो जानेके कारण सभी अपनेको वाजसनेयी शाखाका बतलायेंगे और शूद्र अपनेसे बड़ोंके सम्मानमें केवल भो (अजी) कहनेवाले होंगे ॥ १३ ॥
तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजातयः।
ऋतवश्च भविष्यन्ति विपरीता युगक्षये ॥ १४ ॥
युगान्तकालमें ब्राह्मणलोग तप और यज्ञके फल बेचनेवाले होंगे। उस समय सभी ऋतुएँ विपरीत स्वभावकी हो जायँगी ॥ १४ ॥
शुक्लदन्ताऽजिताक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः।
शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति शाक्यबुद्धोपजीविनः ॥ १५ ॥
शूद्रलोग शाक्यवंशी बुद्धके मतका आश्रय लेकर (अर्थात् वेददूषक नास्तिक बनकर) वेद-विरोधी धर्मका आचरण करेंगे। वे दाँत सफेद किये रहेंगे, आँखोंमें अञ्जन लगायेंगे और मूँड मुड़ाकर गेरुआ वस्त्र धारण कर लेंगे ॥ १५ ॥
श्वापदप्रचुरत्वं च गवां चैव परिक्षयः।
स्वादूनां विनिवृत्तिश्च विद्यादन्तगते युगे ॥ १६ ॥
अन्तिम युग अर्थात् कलियुगमें कुत्ते, भेड़िये आदि हिंसक प्राणियोंकी अधिकता होगी; गौओंका ह्रास होता चला जायगा और उत्तम रसोंका अभाव हो जायगा ॥ १६ ॥
अन्त्या मध्ये निवत्स्यन्ति मध्याश्चान्तनिवासिनः।
तथा निम्नं प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति युगक्षये ॥ १७ ॥
कलियुगमें अन्त्यज या म्लेच्छ मध्यदेशमें निवास करेंगे और मध्यदेशके निवासी म्लेच्छ देशमें रहने लगेंगे तथा सारी प्रजा नीच मार्गका अनुसरण करने लगेगी ॥ १७ ॥
तथा द्विहायना दम्यास्तथा पल्वलकर्षकाः।
चित्रवर्षी च पर्जन्यो युगे क्षीणे भविष्यति ॥ १८ ॥
युगकी समाप्तिके समय दो वर्षके बछड़े गाड़ी और हलमें जोते जानेके योग्य समझे जायँगे तथा वे ही गड्ढों और तलैयोंकी भूमि जोतेंगे और मेघ विचित्र वर्षा करनेवाला होगा (अर्थात् ऐसी वर्षा होगी कि हलमें जोते हुए बैलका एक सींग भीगेगा और दूसरा सूखा रह जायगा) ॥ १८ ॥
सर्वे चौरकुले जाताश्चोरयानाः परस्परम्।
स्वल्पेनाढ्या भविष्यन्ति यत्किंचित्प्राप्य दुर्गताः ॥ १९ ॥
सभी चोरकुलमें पैदा होंगे और आपसमें एक दूसरेको लूटेंगे। थोड़े धनसे ही धनी हो जायेंगे और थोड़ा-सा ही कष्ट पाकर दुर्गतिमें पड़ जायँगे ॥ १९ ॥
न ते धर्मं करिष्यन्ति मानवा निर्गते युगे।
ऊषार्कबहुला भूमिः पन्थानस्तस्करावृताः ॥ २० ॥
युगकी समाप्तिके समय मनुष्य धर्माचरण नहीं करेंगे, भूमि प्रायः ऊसर हो जायगी और राह-बाट बटमारोंसे घिरे रहेंगे ॥ २० ॥
सर्वे वाणिज्यकाश्चैव भविष्यन्ति कलौ युगे।
पितृदत्तानि देयानि विभजन्ते सुतास्तदा।
हरणाय प्रपत्स्यन्ते लोभानृतविरोधिताः ॥ २१ ॥
कलियुगमें सभी व्यापार करनेवाले होंगे, पिताकी दी हुई देय-वस्तुओं (आभूषणादि) को भी (जो शास्त्रके अनुसार बाँटने योग्य नहीं हैं) पुत्र उस समय आपसमें बाँट लेंगे तथा लोभ और असत्यसे प्रेरित हो विरोधी बनकर लोग दूसरोंकी सम्पत्ति हर लेनेका भी प्रयत्न करेंगे ॥ २१ ॥
सौकुमार्ये तथा रूपे रत्ने चोपक्षयं गते।
भविष्यन्ति युगान्ते च नार्यः केशैरलंकृताः ॥ २२ ॥
कलियुगमें सुकुमारता, रूप तथा सुवर्ण आदि रत्नोंके क्षीण हो जानेके कारण नारियाँ भाँति-भाँतिके सँवारे हुए केशोंसे ही अलंकृत होंगी ॥ २२ ॥
निर्विहारस्य भूतस्य गृहस्थस्य भविष्यति।
युगान्ते समनुप्राप्ते नान्या भार्यासमा गतिः ॥ २३ ॥
युगान्तकाल आनेपर हार, चन्दन, दिव्य आस्तरण आदि भोग-सामग्रीसे रहित हुए गृहस्थके लिये भार्याके समान दूसरी कोई गति नहीं होगी ॥ २३ ॥
कुशीलानार्यभूयिष्ठं वृथारूपसमन्वितम्।
पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं तद् युगान्तस्य लक्षणम् ॥ २४ ॥
जब प्रजावर्गमें नीच दुराचारियोंकी संख्या अधिक हो, सब लोग व्यर्थ रूप बनाने लगें, पुरुष थोड़े हों और स्त्रियोंकी संख्या बहुत अधिक हो जाय, तब वही युगान्तकालका लक्षण है ॥ २४ ॥
बहुयाचनको लोको न दास्यति परस्परम्।
अविचार्य ग्रहीष्यन्ति दानं वर्णान्तरात् तथा ॥ २५ ॥
उस समय लोकमें याचकोंकी संख्या बढ़ जायगी, सभी लोग आपसमें किसीको कुछ नहीं देंगे और लोग बिना विचारे ही दूसरे वर्णोंसे दान ग्रहण करेंगे ॥ २५ ॥
राजचौराग्निदण्डात्तैं जनः क्षयमुपैष्यति।
सस्यनिष्पत्तिरफला तरुणा वृद्धशीलिनः।
ईह्यासुखिनो लोका भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २६ ॥
राजा, चोर और अग्निके दण्डसे पीड़ित हुई प्रजा धीरे-धीरे नष्ट हो जायगी, खेती निष्फल होगी और नौजवानोंका स्वभाव बूढ़ोंके समान हो जायगा (अर्थात् वे उत्साह, बल
| ७५६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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और पुरुषार्थसे रहित हो जायँगे ), कलियुगमें प्रायः सभी लोग तृष्णाके कारण सुखसे वञ्चित रहेंगे ॥ २६ ॥
वर्षासु वाताः परुषा नीचाः शर्करवर्षिणः ।
संदिग्धः परलोकश्च भविष्यति युगक्षये ॥ २७ ॥
युगान्तकाल आनेपर वर्षा ऋतुमें वायु रूखी, नीच (दुःखदायक) तथा रेत एवं कंकड़ बरसानेवाली होगी। परलोकके विषयमें सबको संशय बना रहेगा ॥ २७ ॥
आत्मनश्च दुराचारा ब्रह्मद्वेषणतत्पराः ।
आत्मानं बहु मन्यन्ते मन्युरेवाभ्ययाद् द्विजान् ॥ २८ ॥
उस समयके दुराचारी मनुष्य आत्मा और ब्रह्मकी निन्दा करनेमें तत्पर होंगे, वे अपने आपको ही सबसे बढ़कर मानेंगे और ब्राह्मणोंमें क्रोधका ही आवेश होगा ॥ २८ ॥
वैश्याचाराश्च राजन्या धनधान्योपजीविनः ।
युगापक्रमणे सर्वे भविष्यन्ति द्विजातयः ॥ २९ ॥
क्षत्रिय वैश्योंके आचारका पालन करनेवाले तथा धन-धान्यके व्यवसायसे जीविका चलानेवाले होंगे। कलियुगमें धर्ममर्यादाके भङ्ग होनेसे सब लोग द्विज बन जायँगे ॥ २९ ॥
अप्रवृत्ताः प्रपत्स्यन्ते समयाः शपथस्तथा ।
ऋणं सविनयभ्रंशं युगे क्षीणे भविष्यति ॥ ३० ॥
युगान्तकालमें परस्पर की हुई प्रतिज्ञाओं और शपथोंका पालन नहीं होगा, वे यों ही समाप्त हो जायँगी तथा विनयशील सज्जन पुरुष भी ऋण नहीं चुकाना चाहेंगे, फिर दुर्जनोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ३० ॥
भविष्यत्यफलो हर्षः क्रोधश्च सफलो नृणाम् ।
अजाश्चैषोपरोत्स्यन्ते पयसोऽर्थे युगक्षये ॥ ३१ ॥
कलियुगमें मनुष्योंका हर्ष निष्फल और क्रोध सफल होगा। दूधके लिये घरोंमें गौएँ नहीं, बकरियाँ बाँधी जायँगी ॥
अशास्त्रविदुषां पुंसामेवमेव स्वभावतः ।
अप्रमाणं वदिष्यन्ति नीतिं पण्डितमानिनः ॥ ३२ ॥
शास्त्रोंका ज्ञान न रखनेवाले मूढ़ मनुष्योंका यों ही अपनी इच्छाके अनुसार निर्णय होगा (वे अपनी इच्छासे जो कुछ कहेंगे, उसीको शास्त्रसम्मत बतायेंगे), अपनेको पण्डित माननेवाले वे मूर्ख मानव अप्रामाणिक बात कहेंगे और उसे नीतिके अनुकूल बतायेंगे ॥ ३२ ॥
शास्त्रोक्तस्याप्रवक्तारो भविष्यन्ति युगक्षये ।
सर्वे सर्वं हि जानन्ति वृद्धाननुपसेव्य वै ॥ ३३ ॥
युगान्तकालमें शास्त्रोक्त बातको बतानेवाले नहीं रहेंगे, बड़े-बूढ़ोंका सेवन किये बिना ही सब लोग सब कुछ जाननेका दावा करेंगे ॥ ३३ ॥
न कश्चिदकविर्नाम युगान्ते समुपस्थिते ।
न क्षत्राणि नियोक्ष्यन्ते विकर्मस्था द्विजातयः ।
चौरप्रायाश्च राजानो युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३४ ॥
युगान्त उपस्थित होनेपर कोई भी ऐसा न होगा जो अपनेको कवि (सर्वज्ञ) न मानता हो। ब्राह्मणलोग शास्त्रविपरीत कर्ममें स्थित होनेके कारण क्षत्रियोंको धर्ममें नहीं नियुक्त करेंगे। उस समयके राजा प्रायः चोर होंगे ॥ ३४ ॥
कुण्डावृषा नैकृतिकाः सुरापा ब्रह्मवादिनः ।
अश्वमेधेन यक्ष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ३५ ॥
जनमेजय ! युगान्तकालमें कुण्डा (पतिके जीते-जी जार पुरुषके संयोगसे उत्पन्न की गयी कन्या) में गर्भाधान करनेवाले, कपटी और शराबी मनुष्य ब्रह्मवादी बनकर अश्वमेध यज्ञ करेंगे ॥ ३५ ॥
अयाज्यान् याजयिष्यन्ति तथाभक्ष्यस्य भक्षिणः ।
ब्राह्मणा धनतृष्णार्ता युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर धनकी तृष्णासे पीड़ित हुए ब्राह्मण यज्ञके अनधिकारियोंसे भी यज्ञ करायेंगे और अभक्ष्य वस्तु (मांस आदि) का भक्षण करेंगे ॥ ३६ ॥
भोशब्दमभिधास्यन्ति न च कश्चित् पठिष्यति ।
एकशङ्खास्तदा नार्यो गवेधुकपिनड्काः ॥ ३७ ॥
सब लोग सबके लिये भो (ऐ ! अरे ! अजी ! इत्यादि) का ही उच्चारण करेंगे, कोई भी पढ़ेगा नहीं, उस समय स्त्रियोंके पास एकमात्र शंखके ही आभूषण होंगे, वे अपनेको गवेधुक नामक तृणविशेषसे अलंकृत करेंगी ॥ ३७ ॥
नक्षत्राणि वियोगीनि विपरीता दिशस्तथा ।
संध्यारागोऽथ दिग्दाहो भविष्यत्यवरे युगे ॥ ३८ ॥
अन्तिम युगमें नक्षत्र शास्त्रोक्त ग्रहसंयोग आदिसे रहित होंगे, दिशाएँ विपरीत प्रतीत होंगी, उनमें संध्याकालके समान लाली छायी रहेगी और वहाँ निरन्तर दाह (जलन या तपन) बना रहेगा ॥ ३८ ॥
पितॄन् पुत्रा नियोक्ष्यन्ति वध्वः श्वश्रूश्च कर्मसु ।
वियोनिषु चरिष्यन्ति प्रमदासु नरास्तथा ॥ ३९ ॥
पुत्र पिताओंको और बहुएँ सासोंको आज्ञा देकर काममें लगायेंगी। मनुष्य पशुयोनि या दूसरे वर्णकी स्त्रियोंके साथ भी समागम करेंगे ॥ ३९ ॥
वाक्छरैस्तर्जयिष्यन्ति गुरुंश्छिष्यास्तथैव च ।
मुखेषु च प्रयोक्ष्यन्ति प्रमत्ताश्च नरास्तदा ॥ ४० ॥
शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे छेदते हुए उन्हें डाँट बतायेंगे तथा कामोन्मत्त पुरुष मुखोंमें भी मैथुन करेंगे ॥
अकृतान्नाणि भोक्ष्यन्ति नराश्चैवाग्निहोत्रिणः ।
भिक्षां बलिमदत्त्वा च भोक्ष्यन्ति पुरुषाः स्वयम् ॥ ४१ ॥
| भविष्यपर्व ] | चतुर्थोऽध्यायः | ७५७ |
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अग्निहोत्री मनुष्य भी अग्रग्रास निकाले बिना ही भोजन करेंगे, यति आदिको भिक्षा और देवता आदिके लिये बलि (भोजनका ग्रास या उपहारसामग्री) दिये बिना ही लोग स्वयं भोजन कर लेंगे ॥ ४१ ॥
पतीन् सुप्तान् वञ्चयित्वा गमिष्यन्ति स्त्रियोऽन्यतः।
पुरुषाश्च प्रसुप्तासु भार्यासु च परश्रियम् ॥ ४२ ॥
सोये हुए पतियोंको धोखा देकर स्त्रियाँ दूसरोंके पास चली जायँगी, इसी तरह पुरुष भी अपनी स्त्रियोंके सो जानेपर परायी स्त्रियोंके साथ समागम करेंगे ॥ ४२ ॥
नाप्याधितो नाप्यरुजो जनः सर्वोऽभ्यसूयकः।
न कृतप्रतिकर्ता च युगे क्षीणे भविष्यति ॥ ४३ ॥
उस समय कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं होगा, जो शारीरिक रोग और मानसिक पीड़ासे ग्रस्त न हो, सब लोग दूसरोंके दोष देखनेवाले होंगे। युगान्तकालमें कोई भी उपकारका बदला देनेवाला नहीं होगा ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कलियुगवर्णने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कलियुगका वर्णनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
कलियुगका वर्णन
जनमेजय उवाच
एवं विलुलिते लोके मनुष्याः केन पालिताः।
निवत्स्यन्ति किमाचाराः किमाहारविहारिणः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! इस प्रकार अनाचारसे कलङ्कित हुए जगत्में मनुष्य किससे सुरक्षित हो निवास करेंगे? उनके आचार तथा आहार-विहार कैसे होंगे? ॥ १ ॥
किंकर्माणः किमीहन्तः किंप्रमाणाः किमायुषः।
कां च काष्ठां समासाद्य प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ २ ॥
उनका कर्म क्या होगा? वे कैसी चेष्टा करेंगे? उनके शरीरकी लंबाई या ऊँचाई कितनी होगी? उनकी आयु कितने वर्षोंकी होगी? तथा वे किस सीमातक पहुँचकर सत्ययुग प्राप्त करेंगे? ॥ २ ॥
व्यास उवाच
अत ऊर्ध्वं च्युते धर्मे गुणहीनाः प्रजास्ततः।
शीलव्यसनमासाद्य प्राप्स्यन्ते ह्रासमायुषः ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**जनमेजय! इसके बाद धर्मके नष्ट हो जानेपर गुणहीन हुई सारी प्रजा अपना शील खोकर अल्पायु हो जायगी ॥ ३ ॥
आयुर्हान्या बलग्लानिर्बलग्लान्या विवर्णता।
वैवर्ण्याद् व्याधिसम्पीडा निर्वेदो व्याधिपीडनात् ॥ ४ ॥
आयुकी हानि होनेसे उनका बल क्षीण हो जायगा, बलके क्षीण होनेसे उनकी अङ्गकान्ति फीकी पड़ जायगी, कान्तिमें विकार आनेसे उनके शरीरमें रोगजनित पीड़ा होगी तथा रोगजनित पीड़ासे उनके मनमें निर्वेद (वैराग्यपूर्ण खेद) होगा ॥ ४ ॥
निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाद् धर्मशीलता।
एवं गत्वा परां काष्ठां प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ ५ ॥
निर्वेदसे उन्हें आत्मबोध प्राप्त होगा, उस बोधसे उनमें धर्मशीलता आयेगी और इस प्रकार धर्मशीलताकी चरम सीमाको पहुँचकर वे सत्ययुग प्राप्त कर लेंगे ॥ ५ ॥
उद्देशतो धर्मशीलाः केचिन्मध्यस्थतां गताः।
विमर्षशीलाः केचित् तु हेतुवादकुतूहलाः ॥ ६ ॥
(कलियुगमे) कुछ लोग लेशमात्र धर्मका पालन करनेवाले होंगे, कुछ लोग धर्मकी ओरसे तटस्थ या उदासीन रहेंगे और कुछ लोग विवेकशील होनेपर भी धर्मके समर्थनमें अच्छी-अच्छी युक्ति देनेके लिये ही उत्सुक रहेंगे, स्वयं उस धर्मका आचरण नहीं करेंगे ॥ ६ ॥
प्रत्यक्षममुमानं च प्रमाणं चेति निश्चिताः।
प्रमाणैकं करिष्यन्ति नेति पण्डितमानिनः ॥ ७ ॥
कुछ लोग दृढ़ निश्चयके साथ केवल प्रत्यक्ष और अनुमानको ही प्रमाण मानेंगे (वेद अथवा शब्दको प्रमाण नहीं मानेंगे); कुछ पण्डितमानी पुरुष एकमात्र प्रत्यक्षको ही प्रमाण मानेंगे, दूसरे किसी प्रमाणको नहीं स्वीकार करेंगे ॥
अप्रमाणं करिष्यन्ति वेदोक्तमपरे जनाः।
तदा मुखभगाश्चैव भविष्यन्ति स्त्रियोऽपराः ॥ ८ ॥
दूसरे लोग वेदोक्त मतको प्रामाणिक नहीं मानेंगे। कलियुगमें कितनी ही स्त्रियाँ मुखसे ही भगका काम लेनेवाली होंगी ॥ ८ ॥
नास्तिक्यपरमास्थापि केचिद् धर्मविलोपकाः।
भविष्यन्ति नरा मूढा मन्दाः पण्डितमानिनः ॥ ९ ॥
कितने ही पण्डितमानी मन्दबुद्धि मूढ़ मानव नास्तिकतामें प्रवृत्त होकर धर्मका लोप करनेवाले होंगे ॥ ९ ॥
तद्भावमात्रे श्रद्धेयाः शास्त्रज्ञानबहिष्कृताः।
दाम्भिकास्ते भविष्यन्ति वादशीलकुतूहलाः ॥ १० ॥
७५८ श्रीमद्भारते खिलभागे [. हरिवंशे
वे वर्तमान कालकी प्रत्यक्ष बातोंपर ही श्रद्धा या विश्वास करनेवाले, शास्त्रज्ञानसे रहित और पाखण्डी होंगे, धर्मकी चर्चा और आचरण दोनों ही उनके लिये आश्चर्यकी वस्तु होंगे (अर्थात् वे धर्मकी चर्चा भी नहीं करेंगे, फिर आचरणकी तो बात ही क्या है?) ॥ १० ॥
तदा विचालते धर्मे जनाः शेषपुरस्कृताः ।
शुभान्येवाचरिष्यन्ति दानसत्यसमन्विताः ॥ ११ ॥
उस समय धर्मके विचलित हो जानेपर लोग भगवत्-स्मरण आदि अवशिष्ट धर्मको सामने रखते हुए दान और सत्यसे संयुक्त हो दया आदि शुभकर्मोंका ही आचरण करेंगे ॥
सर्वभक्षो ह्यसंगुप्तो निर्गुणो निरपत्रपः ।
भविष्यति तदा लोकस्तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥
उस समयके लोग सर्वभक्षी, अजितेन्द्रिय, गुणहीन और निर्लज्ज होंगे, यही कलिकालजनित कषायका लक्षण है ॥ १२ ॥
विप्राणां शाश्वतीं वृत्तिं यदा वर्णावरा जनाः ।
प्रतिपत्स्यन्ति वृत्त्यर्थं तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥
जब क्षत्रिय आदि वर्णोंके लोग जीविकाके लिये ब्राह्मणोंकी सनातन वृत्तिको अपना लेंगे, तब वही कलिके कालुष्यका सूचक होगा ॥ १३ ॥
कषायोपप्लवे लोके ज्ञानविद्याप्रणाशने ।
सिद्धिं स्वल्पेन कालेन यास्यन्ति निरुपस्कृताः ॥ १४ ॥
संसारमें कलिकालके कलुषका उपद्रव बढ़ जानेपर जब ज्ञान (शास्त्रीय बोध) और विद्या (आत्मदर्शन) का लोप हो जायगा, तब परिग्रहशून्य हुए मनुष्य केवल त्यागमात्रसे थोड़े ही समयमें सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर लेंगे ॥ १४ ॥
महायुद्धं महावातं महावर्षे महाभयम् ।
भविष्यति युगे क्षीणे तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १५ ॥
युगान्तकालमें महान् युद्ध, प्रचण्ड आँधी, बड़ी भारी वर्षा और महान् भय उपस्थित होगा, वह कलिकालके कलुषका लक्षण है ॥ १५ ॥
विप्ररूपाणि रक्षांसि राजानः कर्णवेदिनः ।
पृथिवीमुपभोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ १६ ॥
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर यहाँ ब्राह्मणोंके रूपमें राक्षस निवास करेंगे, राजालोग कानोंसे सुनी हुई बातको ही ठीक मानेंगे और चुगलखोरोंके साथ रहकर ही पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥ १६ ॥
निःस्वाध्यायवषट्कारा अनयान्नाभिमानिनः ।
विप्राः क्रव्यादरूपेण सर्वभक्षा वृथाव्रताः ॥ १७ ॥
ब्राह्मण स्वाध्याय और वषट्कारसे दूर हो नीतिशून्य और अभिमानी होकर राक्षसोंके समान सब कुछ भक्षण करेंगे और व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) व्रतका पालन करनेवाले होंगे ॥
मूर्खाः स्वार्थपरा लुब्धाः क्षुद्राः क्षुद्रपरिच्छदाः ।
व्यवहारोपवृत्ताश्च च्युता धर्माच्च शाश्वतात् ॥ १८ ॥
वे मूर्ख, स्वार्थपरायण, लोभी और नीच विचारके होंगे; उनके आश्रित रहनेवाले लोग भी वैसे ही होंगे, वे सनातन धर्मसे भ्रष्ट होकर केवल भोजनाच्छादनादि व्यवहारमें ही तत्पर रहेंगे ॥ १८ ॥
हर्तारः पररत्नानां परदारापहारकाः ।
कामात्मानो दुरात्मानः सोपधाः प्रियसाहसाः ॥ १९ ॥
उस समयके मनुष्य पराये रत्नों और परायी स्त्रियोंका अपहरण करनेवाले होंगे, उन सबके चित्त कामसे कलुषित होंगे, वे दुरात्मा, कपटी और दुःसाहसको पसंद करनेवाले होंगे ॥ १९ ॥
तेषु प्रभवमाणेषु तुल्यशीलेषु सर्वतः ।
अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो बहुरूपिणः ॥ २० ॥
एक समान शीलवाले और प्रभुतासे सम्पन्न वे दुष्ट मनुष्य जब सब ओर फैल जायँगे, तब अनेक रूपधारी एवं आत्माके अभावका प्रतिपादन करनेवाले बहुत-से (वैनाशिक मतावलम्बी) मुनि प्रकट हो जायँगे ॥ २० ॥
उत्पन्ना ये कृतयुगे प्रधानपुरुषाश्रयाः ।
कथायोगेन तान् सर्वान् पूजयिष्यन्ति मानवाः ॥ २१ ॥
सत्ययुगमें ईश्वरका आश्रय लेनेवाले जो भक्त पैदा हो गये हैं, उन सबकी कलियुगके मनुष्य कथावार्ताके प्रसङ्गमें पूजा करेंगे (उनके प्रति आदरका भाव प्रकट करेंगे, परंतु स्वयं उनके जैसा आचरण नहीं करेंगे) ॥ २१ ॥
सस्यचौरा भविष्यन्ति तथा चैलापहारिणः ।
भक्ष्यभोज्यापहाराश्च करण्डानां च हारिणः ॥ २२ ॥
कलिकालके मनुष्य खेतोंमें लगी हुई खेतीकी चोरी करेंगे, दूसरोंके वस्त्र चुरा लेंगे, खाने-पीनेकी वस्तुएँ हड़प लेंगे, कंदों अथवा बाँसकी पिटारियोंको भी उड़ा ले जायँगे ॥ २२ ॥
चौराश्चौरस्य हर्तारो हन्ता हन्तुर्भविष्यति ।
चौरैश्चौरक्षये चापि कृते क्षेमं भविष्यति ॥ २३ ॥
उस समयके चोर चोरके घरमें भी चोरी करेंगे, हत्यारेकी भी हत्या करनेवाले पैदा हो जायँगे, इस प्रकार जब चोरोंके द्वारा चोरोंका विनाश कर दिया जायगा, तब जगत्का कल्याण होगा ॥ २३ ॥
निःसारे क्षुभिते लोके निष्क्रिये व्यन्तरे स्थिते ।
नराः श्रयिष्यन्ति वनं करभारप्रपीडिताः ॥ २४ ॥
जब सारा संसार निर्धन, संध्यावन्दन आदि सत्कर्मोंसे रहित तथा वर्णभेदसे शून्य हो जायगा, उस समय करोंके भारसे अत्यन्त पीड़ित हुए मनुष्य वनका आश्रय लेंगे ॥ २४ ॥
पितृनाज्ञापयिष्यन्ति पुत्राः कर्मणि सर्वशः ।
स्नुषा श्वश्रूस्तथा चैव युगान्ते प्रत्युपस्थिते ॥ २५ ॥
भविष्यपर्व ] चतुर्थोऽध्यायः ७५९
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर पुत्र पिताओंको सभी कर्म करनेके लिये आदेश दिया करेंगे; इसी तरह बहुएँ अपनी सासोंपर हुकम चलाया करेंगी ॥ २५ ॥
वाक्छरैर्दर्दयिष्यन्ति गुरूञ्छिष्याः समन्ततः।
यज्ञकर्मण्युपरते रक्षांसि श्वापदानि च।
कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥ २६ ॥
सब ओर शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे पीड़ित करेंगे। यज्ञकर्म बंद हो जानेपर राक्षस, हिंसक जन्तु तथा कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्योंपर आक्रमण करेंगे ॥ २६ ॥
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं सामग्र्यं चापि बन्धुषु।
उद्देशतो नरश्रेष्ठ भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २७ ॥
नरश्रेष्ठ ! कलियुगमें क्षेम, सुभिक्ष, आरोग्य और भाई-बन्धुओंमें मेल-मिलाप या बन्धु-बान्धवोंकी पूर्णता आदि बातें बहुत कम हो जायेंगी ॥ २७ ॥
स्वयंपालाः स्वयंचौरा युगसम्भारसम्भूताः।
मण्डलैः प्रचलिष्यन्ति देशे देशे पृथक्पृथक् ॥ २८ ॥
उस समयके लोग स्वयं ही रक्षक और स्वयं ही चोर होंगे और युगकी आवश्यकताके अनुरूप उपकरणोंसे सम्पन्न हो पृथक् पृथक् झुंड बनाकर देश-देशमें घूमते फिरेंगे ॥ २८ ॥
स्वदेशेभ्यः परिभ्रष्टा निःसाराः सह बन्धुभिः।
नराः सर्वे भविष्यन्ति तदा कालपरिक्षयात् ॥ २९ ॥
उस समय कालवश अपनी अवनति होनेके कारण सब मनुष्य अपने-अपने देशोंसे निर्वासित होकर बन्धुओंसहित निःसार (निर्धन) हो जायँगे ॥ २९ ॥
तदा स्कन्धे समाधाय कुमारान्विद्रुता भयात्।
कौशिकीं प्रतरिष्यन्ति नराः क्षुद्भयपीडिताः ॥ ३० ॥
उन दिनों भूखके भयसे पीड़ित हुए मनुष्य बच्चोंको कंधेपर रखकर आतंकवश भागकर कोसी नदीको पार कर जायँगे ॥ ३० ॥
अङ्गान्वङ्गान कलिङ्गांश्च काश्मीरानाथ मेकलान्।
ऋषिकान्तर्गिरिद्रोणीः संश्रयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३१ ॥
लोग जीविकाके लिये अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग, काश्मीर, मेकल तथा ऋषिक आदि देशोंके भीतर चले जायँगे और पर्वतकी घाटियोंका आश्रय लेंगे ॥ ३१ ॥
कृत्स्नं वा हिमवत्पादंयैकूलं च लवणाम्भसः।
अरण्येषु च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छगणैः सहः ॥ ३२ ॥
उस समयके मनुष्य म्लेच्छोंके साथ समूचे हिमालयके पादभागमें, लवणसमुद्रके तटपर तथा वनोंमें निवास करेंगे॥
नैव शून्या न चाशून्या भविष्यति वसुंधरा।
गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यन्ति शस्त्रिणः ॥ ३३ ॥
पृथ्वी न तो मनुष्योंसे सूनी होगी और न भरी ही रहेगी। हाथमें शस्त्र लेकर रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए पुरुष भी किसीकी रक्षा नहीं कर सकेंगे ॥ ३३ ॥
मृगैर्मत्स्यैर्विहंगैश्च श्वापदैः सर्पकीटकैः।
मधुशाकफलैर्मूलैर्वर्तयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३४ ॥
कलियुगके धर्मभ्रष्ट मनुष्य मृग, मत्स्य, पक्षी, हिंसक जन्तु, सर्प, कीट, मधु, शाक, फल और मूलसे जीवन-निर्वाह करेंगे ॥ ३४ ॥
चीरं पर्णं च बहुलं वल्कलान्यजिनानि च।
स्वयंकृतानि वत्स्यन्ति यथा मुनिजनास्तथा ॥ ३५ ॥
लोग ऋषि-मुनियोंकी भाँति चिथड़ों, पत्तों, वल्कलों, हिरनके चमड़ों तथा अपने बनाये हुए अन्य वस्त्रोंको धारण करेंगे ॥ ३५ ॥
बीजानामाकृतिं निम्नेष्वीहन्तः काष्ठशङ्कुभिः।
अजैंडकं खरोष्ट्रं च पालयिष्यन्ति यत्नतः ॥ ३६ ॥
कितने ही मनुष्य पर्वतकी कन्दरा आदि निम्न स्थानोंमें रहकर ग्रामीण और जङ्गली बीजों (अनाजों) की प्राप्तिके लिये चेष्टा करते हुए काठके खूँटोंमें बकरों और भेड़ोंको तथा काश्मीर आदि अन्य स्थानोंके लोग गधों और ऊँटोंको बाँधकर उनका यत्नपूर्वक पालन करेंगे ॥ ३६ ॥
नदीस्रोतांसि रोत्स्यन्तितोयार्थे कूलमाश्रिताः।
पक्वान्नव्यवहारेण विपणन्तः परस्परम् ॥ ३७ ॥
तनूरुहैर्यथा जातैः समूलान्तरसंवृतैः।
कलियुगके मनुष्य जलके लिये तटपर आकर नदीके प्रवाहको रोकेंगे। वे आपसमें पके-पकाये अन्नके लेन-देनका व्यवसाय करेंगे। जैसे अपने शरीरसे उत्पन्न हुई संतानोंके निमित्तसे लोग आपसमें लड़ते हैं, उसी प्रकार मूलधनके सहित सूदको छिपानेके कारण आपसमें विवाद करते हुए लोग परस्पर लेन-देनका व्यवहार करेंगे ॥ ३७½ ॥
बह्वपत्याः प्रजाहीनाः कुललक्षणवर्जिताः ॥ ३८ ॥
एवं भविष्यन्ति तदा मनुष्याः कालकारिताः।
उन दिनों कालसे प्रेरित हुए कुछ मनुष्य तो अधिक संतानवाले होंगे और कुछ लोगोंको एक भी संतान नहीं होगी। इसी तरह प्रायः सब लोग कुलोचित शुभ लक्षणोंसे हीन होंगे ॥ ३८½ ॥
हीनाद्धीनां तदा धर्मं प्रजाः समनुवर्त्स्यति ॥ ३९ ॥
आयुस्तत्र च मर्त्यानां परं त्रिंशद् भविष्यति।
उस समयकी प्रजा हीन-से-हीन धर्मका अनुसरण करेगी तथा उन दिनों मनुष्योंकी आयु अधिक-से-अधिक तीस वर्षकी होगी ॥ ३९½ ॥
दुर्बला विषयग्लानि रजसा समभिप्लुताः ॥ ४० ॥
| ७६० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
भविष्यति तदा तेषां रोगैरिन्द्रियसंक्षयः।
आयुःप्रक्षयसंरोधाद् विषादः प्रभविष्यति ॥ ४१ ॥
सब लोग दुर्बल, विषयसेवनके कारण कृश तथा रजो-गुणसे अभिव्याप्त होंगे। उस समय रोगोंके कारण उनकी इन्द्रियाँ क्षीण हो जायँगी, आयुके क्षय एवं निरोधसे उनके मनमें विषाद होगा ॥ ४०-४१ ॥
शुश्रूषवो भविष्यन्ति साधूनां दर्शने रताः।
सत्यं च प्रतिपत्स्यन्ति व्यवहारोपसंक्षयात् ॥ ४२ ॥
फिर वे धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर साधु पुरुषोंके दर्शनमें मन लगानेवाले होंगे; व्यवहार या व्यवसाय क्षीण हो जानेके कारण वे सत्यको अपनायेंगे ॥ ४२ ॥
भविष्यन्ति च कामानामलाभाद् धर्मशीलिनः।
करिष्यन्ति च संकोचं स्वपक्षक्षयपीडिताः ॥ ४३ ॥
कामनाओंकी प्राप्ति न होनेसे धर्मशील बनेंगे और अपने पक्षके विनाशसे पीड़ित हो दुराचारको संकुचित कर देंगे ॥ ४३ ॥
एवं शुश्रूषणे ज्ञाने सत्ये प्राणाभिरक्षणे।
चतुष्पादः प्रवृत्तश्च धर्मः श्रेयोऽभिपत्स्यते ॥ ४४ ॥
इस प्रकार शुश्रूषा, दान, सत्य और प्राणरक्षामें प्रवृत्त हुआ चार चरणोंवाला धर्म श्रेयकी प्राप्ति करायेगा ॥ ४४ ॥
तेषां लब्धानुमानानां गुणेषु परिवर्तताम्।
स्वादु किं न्विति विज्ञाय धर्मं एवं वदिष्यति ॥ ४५ ॥
इस प्रकार जो श्रेयको प्राप्त हुए पुरुष अनुमानसे धर्म और अधर्मके फलको जान गये हैं और शब्दादि विषयोंमें रम रहे हैं, उनके लिये कौन-सी वस्तु स्वादिष्ट या सुखद है—विषयोंमें रमण या धर्मके मार्गपर संचरण, यह संदेह उठाकर तत्त्वका निश्चय करके लोग इस प्रकार कहेंगे ॥ ४५ ॥
यथा हानिः क्रमात् प्राप्ता तथा वृद्धिः क्रमाद् गता।
प्रगृहीते यतो धर्मे प्रवर्त्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ ४६ ॥
जैसे क्रमशः धर्मकी हानि प्राप्त हुई थी, उसी प्रकार क्रमशः उसकी वृद्धि होगी; क्योंकि धर्मको पूर्णतः अपना लेनेपर मनुष्य सत्ययुगको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४६ ॥
साधु वृत्तं कृतयुगे कषाये हानिरुच्यते।
एक एव तु कालः स हीनवर्णो यथा शशी ॥ ४७ ॥
सत्ययुगमें सबका बर्ताव उत्तम होता है और कलियुगमें सदाचारकी हानि बतायी जाती है, जैसे एक ही चन्द्रमा कभी कान्तिसे हीन और कभी कान्तिसे पूर्ण होता है, उसी प्रकार एक ही काल कभी कृतयुग और कभी कलियुगके रूपमें दृष्टिगोचर होता है ॥ ४७ ॥
छन्नो हि तमसा सोमो यथा कलियुगे तथा।
पूर्णश्च तमसा हीनो यथा कृतयुगे तथा ॥ ४८ ॥
जैसे चन्द्रमा अमावास्याको अन्धकारसे आच्छन्न होता है, उसी प्रकार कलियुगमें धर्म आच्छादित हो जाता है और जैसे पूर्णिमाको परिपूर्ण चन्द्रमा अन्धकारसे हीन होता है, उसी प्रकार सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त परिपूर्ण धर्म सर्वथा प्रकाशित होता है ॥ ४८ ॥
अर्थवादः परं ब्रह्म वेदार्थ इति तं विदुः।
अनिर्णीक्तमविज्ञातं दायाद्यमिव धार्यते ॥ ४९ ॥
जो परब्रह्म परमात्मा है, वह भूतार्थवाद है (परब्रह्मके रूपमें वेदके सत्य अर्थका ही प्रतिपादन हुआ) और विद्वान् पुरुष उसीको वेदका मुख्य अर्थ भी मानते हैं। (यदि ऐसी बात है तो वह सर्वव्यापी नित्यसिद्ध परमात्मा सबको प्राप्त क्यों नहीं होता? इसके उत्तरमें कहते हैं—) जैसे पैतृक सम्पत्तिके रूपमें मिला हुआ मलिन सुवर्णखण्ड जबतक उसका मल दूर न हो, तबतक अज्ञात दशामें ही धारण किया जाता है और उसे धारण करके भी मनुष्य अपनेको दरिद्र ही मानता है, उसी प्रकार अन्तःकरणके मलिन होनेसे परमात्मा अज्ञातरूपमें ही धारण किया जाता है; जब अन्तःकरण शुद्ध होता है; तब वह अपने आत्मासे अभिन्न रूपमें प्रकाशित हो उठता है और उसकी अप्राप्तिका भ्रम दूर हो जाता है ॥ ४९ ॥
इष्टवादस्तपो नाम तपो हि स्थावरं कृतम्।
गुणैः कर्माभिनिर्वृत्तिर्गुणांस्तथ्येन कर्मणा ॥ ५० ॥
तप (वर्णाश्रमोचित धर्म) स्वर्गादि अभीष्ट फलोंका प्रतिपादक है, तप स्थावर-अनादि अर्थात् अमोघ फलका साधक है, ऐसा शास्त्रमें निश्चय किया गया है। गुणों (देह-इन्द्रियादि) से कर्मकी सिद्धि होती है और यथार्थ कर्मसे गुणों (देह-इन्द्रियादि) की प्राप्ति होती है (अतः इस शरीर और कर्म आदिके बन्धनोंसे छुटकारा पानेके लिये परमात्माका आश्रय लेना चाहिये) ॥ ५० ॥
आशीस्तु पुरुषं दृष्ट्वा देशकालानुवर्तिनी।
युगे युगे यथाकालमृषिभिः समुदाहृता ॥ ५१ ॥
ऋषियोंने पुरुषकी योग्यताको सामने रखकर प्रत्येक युगमें यथासमय आशिष (कर्मफलकी प्राप्ति) का प्रतिपादन किया है, क्योंकि वह देश-कालका अनुसरण करनेवाली होती है ॥ ५१ ॥
इह धर्मार्थकामानां देवतानां प्रतिक्रिया।
आशिषश्च शुभाः पुण्यास्तथैवायुर्युगे युगे ॥ ५२ ॥
इस मर्त्यलोकमें धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी फल, देवाराधनके फल, शुभ एवं पुण्य आशिष तथा आयु प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी श्रद्धाके तारतम्यके अनुसार होती हैं ॥ ५२ ॥
| भविष्यपर्व ] | पञ्चमोऽध्यायः | ७६१ |
|---|
| यथा युगानां परिवर्तनानि<br>चिरं प्रवृत्तानि विधिस्वभावात्।<br>क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः<br>क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः॥ ५३ ॥ | जैसे विधाताद्वारा नियत किये हुए स्वभावके अनुसार चिरकालसे युगोंके परिवर्तन होते रहते हैं, उसी प्रकार यह जीव जगत् ह्रास और वृद्धिके साथ निरन्तर चक्कर लगाता हुआ कभी क्षण भरके लिये भी स्थिर नहीं रहता ॥ ५३ ॥ |
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कलियुगवर्णने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कलियुगका वर्णनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः
व्यासजी आदिका गमन, जनमेजयके अश्वमेध यज्ञमें इन्द्रका विघ्न डालना, जनमेजयद्वारा इन्द्रको शाप, ब्राह्मणोंका निर्वासन तथा अपनी पत्नीकी भर्त्सना, विश्वावसुका जनमेजयको समझाना
सूत उवाच
इत्येवमाश्वासयतो राजानं जनमेजयम् ।
अतीतानागतं वाक्यमृषेः परिषदा श्रुतम् ॥ १ ॥
**सूतजी कहते हैं—**शौनक ! इस प्रकार राजा जनमेजयको आश्वासन देते हुए महर्षि वेदव्यासका वह भूत, भविष्य-सम्बन्धी वचन उस राजसभाके सभी सदस्योंने सुना ॥ १ ॥
अमृतस्येव संवाहः प्रभा चन्द्रमसो यथा ।
अतर्पयत तच्छ्रोत्रं महर्षेर्वाङ्मयो रसः ॥ २ ॥
महर्षिका वह वाङ्मय रस मानो अमृतका प्रवाह था, चन्द्रमाकी प्रभाके समान मनको आह्लादित करनेवाला था । उसने सबके कानोंको तृप्त कर दिया ॥ २ ॥
धर्मकामार्थसंयुक्तं करुणं वीरहर्षणम् ।
रमणीयं तदाख्यानं कृत्स्नं परिषदा श्रुतम् ॥ ३ ॥
धर्म, काम और अर्थसे युक्त, करुणासे भरी हुई तथा वीरोचित हर्षोत्साहको बढ़ानेवाली वह सम्पूर्ण रमणीय वार्ता वहाँ सारी सभाने सुनी ॥ ३ ॥
केचिदश्रूणि मुमुचुः श्रुत्वा दध्युस्तथापरे ।
इतिहासं तमृषिणा पाणाविव निदर्शितम् ॥ ४ ॥
कुछ लोग आँसू बहाने लगे, कितने ही मनुष्य उस वार्ताको सुनकर ध्यानमग्न हो गये, महर्षि व्यासने उस भावी इतिहासको मानो हाथपर रखकर दिखा दिया था ॥ ४ ॥
सदस्यानु सोऽभ्यनुज्ञाय कृत्वा चापि प्रदक्षिणाम् ।
पुनर्द्रक्ष्याम इत्युक्त्वा जगाम भगवानृषिः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् वे महर्षि भगवान् व्यास सदस्योंकी अनुमति ले उन सबकी परिक्रमा करके 'हम फिर मिलेंगे' ऐसा कहकर वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥
अनुजग्मुस्तदा सर्वे प्रयान्तमृषिसत्तमम् ।
लोके प्रवदतां श्रेष्ठं ये विशिष्टास्तपोधनाः ॥ ६ ॥
उस समय वहाँ जो-जो श्रेष्ठ तपोधन मुनि थे, वे सब जगत्के सभी वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर व्यासको जाते देख उनके पीछे हो लिये ॥ ६ ॥
याते भगवति व्यासे तदा ब्रह्मर्षिभिः सह ।
ऋत्विजः पार्थिवाश्चैव प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥ ७ ॥
ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् व्यासके चले जानेपर उस समय जो अन्य ऋत्विज और राजा थे, वे भी जैसे आये थे उसी तरह लौट गये ॥ ७ ॥
पन्नगानां सुघोराणां कृत्वा तां वैरयातनाम् ।
जगाम रोषमुत्सृज्य राजा विषमिवोरगः ॥ ८ ॥
अत्यन्त भयानक सर्पोंके वैरका वह बदला चुकाकर राजा जनमेजय विषको त्याग कर जानेवाले सर्पकी भाँति रोषको छोड़कर वहाँसे अपने नगरको चले गये ॥ ८ ॥
होत्राग्निदग्धशिरसं परित्राय च तक्षकम् ।
आस्तीकोऽप्याश्रमपदं जगाम स महामुनिः ॥ ९ ॥
हवनकी आगसे जिसका सिर तप गया था, उस तक्षकके प्राण बचाकर महामुनि आस्तीक भी अपने आश्रमको चले गये ॥ ९ ॥
राजापि हास्तिनपुरं जगाम स्वजनावृतः ।
अन्वशासच्च मुदितस्तदा प्रमुदिताः प्रजाः ॥ १० ॥
राजा जनमेजय भी स्वजनोंसे घिरे हुए वहाँसे हस्तिनापुरको गये और आनन्दपूर्वक रहकर सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन एवं संरक्षण करने लगे ॥ १० ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य स राजा जनमेजयः ।
दीक्षितो वाजिमेधेन विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ ११ ॥
कुछ कालके बाद यज्ञोंमें बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले राजा जनमेजयने विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ११ ॥
संज्ञप्तमश्वं तत्रास्य देवी काश्या वपुष्टमा ।
संनिवेशोपगम्याथ विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥
| ७६२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
उस यज्ञमें जो अश्व मारा गया था, उसके पास जाकर काशिराजकन्या महारानी वपुष्टमाने शास्त्रीय विधिके अनुसार शयन किया ॥ १२ ॥
तां तु सर्वांनवद्याङ्गीं चकमे वासवस्तदा ।
संज्ञप्तमश्वमाविश्य तया मिश्रीवभूव सः ॥ १३ ॥
उन दिनों उन सर्वाङ्गसुन्दरी रानीको देवराज इन्द्र प्राप्त करना चाहते थे। वे उस मारे गये अश्वमें आविष्ट हो रानीके साथ संयुक्त हो गये ॥ १३ ॥
तस्मिन् विकारे जनिते विदित्वा तत्त्वतश्च तत् ।
असंज्ञप्तोऽयमश्वस्ते ध्वंसेत्यध्वर्युमब्रवीत् ॥ १४ ॥
उस अश्वमें विकार उत्पन्न हो जानेपर यथार्थरूपसे इस बातको जानकर राजाने अध्वर्युसे कहा—'अहो ! तुम्हारा नाश हो; देखो, तुम्हारा यह अश्व अभी मरा नहीं है' ॥१४॥
अध्वर्युर्ज्ञानसम्पन्नस्तदिन्द्रस्य विचेष्टितम् ।
कथयामास राजर्षेः शशाप स पुरंदरम् ॥ १५ ॥
अध्वर्यु ज्ञानसे सम्पन्न थे, उन्होंने राजर्षि जनमेजयसे इन्द्रकी वह काली करतूत कह सुनायी, तब राजाने इन्द्रको शाप देते हुए कहा ॥ १५ ॥
जनमेजय उवाच
यद्यस्ति मे यज्ञफलं तपो वा रक्षतः प्रजाः ।
फलेनानेन सर्वेण ब्रवीमि श्रूयतामिदम् ॥ १६ ॥
जनमेजय बोले—यदि मेरे यज्ञोंका कुछ फल है अथवा प्रजाकी रक्षा करनेसे मुझमें कुछ तपोबल संचित हुआ है तो उन सबके फलसे मेरी कही हुई बात सत्य हो, मैं उस बातको बता रहा हूँ, आपलोग सुनें ॥ १६ ॥
अद्यप्रभृति देवेन्द्रमजितेन्द्रियमस्थिरम् ।
क्षत्रिया वाजिमेधेन न यक्ष्यन्तीति शौनक ॥ १७ ॥
'आजसे क्षत्रियलोग इस अजितेन्द्रिय और चञ्चल देवराज इन्द्रका अश्वमेध यज्ञके द्वारा यजन नहीं करेंगे' शौनक ! इस प्रकार उन्होंने इन्द्रको शाप दे दिया ॥ १७ ॥
ऋत्विजश्चाब्रवीत् क्रुद्धः स राजा जनमेजयः ।
दौर्बल्यं भवतामेतद् यदयं धर्षितः क्रतुः ॥ १८ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा जनमेजयने ऋत्विजोंसे कहा—'यह आपलोगोंकी दुर्बलता है, जिससे मेरा यह यज्ञ चौपट कर दिया गया ॥ १८ ॥
विषये मे न वस्तव्यं गच्छध्वं सह बान्धवैः ।
इत्युक्तास्त्यजुर्विप्रास्तं नृपं जातमन्यवः ॥ १९ ॥
'अब आपलोग मेरे राज्यमे न रहें, अपने बन्धु-बान्धवों-के साथ निकल जायें।' उनके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण कुपित हो गये और राजाको छोड़कर चल दिये ॥ १९ ॥
अमर्षादन्वशासच्च पत्नीशालागताः स्त्रियः ।
राजा परमधर्मज्ञस्तामसौ जनमेजयः ॥ २० ॥
यद्यपि वे राजा जनमेजय बड़े धर्मज्ञ थे, तो भी अमर्ष-वश उन्होंने वपुष्टमाके लिये पत्नीशालामें बैठी हुई स्त्रियोंको इस प्रकार आदेश दिया—॥ २० ॥
असतीं वपुष्टमामेतां निर्यातयत मे गृहात् ।
यया मे चरणौ मूर्ध्नि पातितौ रेणुगुण्ठितौ ॥ २१ ॥
'यह वपुष्टमा असती (कुलटा) है, इसे मेरे घरसे निकाल दो। इसने इस कुकृत्यद्वारा मेरे मस्तकपर अपने धूलि-धूसर पैर रख दिये ॥ २१ ॥
शौण्डीर्यं मेऽनया भग्नं यशो मानश्च दूषितः ।
न चैनां द्रष्टुमिच्छामि परिक्लिष्टामिव स्रजम् ॥ २२ ॥
'इस पापिनीने मेरा महत्त्व नष्ट कर दिया, मेरे यश और मानमें धब्बा लगा दिया; मसली हुई फूलकी मालाकी तरह इस अपवित्र हुई नारीको अब मैं देखना भी नहीं चाहता ॥ २२ ॥
न स्वादु सोऽश्नाति नरः सुखं स्वपिति वा रहः ।
अन्वास्ते यः प्रियां भार्यां परेण मृदितामिह ।
पुनर्नैवोपभुञ्जीत श्वावलीढं हविर्यथा ॥ २३ ॥
'जो पर-पुरुषके द्वारा मर्दित हुई अपनी प्यारी भार्याके साथ रहता है, वह न तो स्वादिष्ट अन्न खाता है और न एकान्तमें सुखसे सो ही पाता है। उसे चाहिये कि कुत्तेके चाटे हुए हविष्यकी भाँति पर-पुरुषके समागमसे कलङ्कित हुई भार्याका फिर कभी उपभोग न करे' ॥ २३ ॥
एवमुच्चैः प्रभाषन्तं क्रुद्धं पारीक्षितं नृपम् ।
गन्धर्वराजः प्रोवाच विश्वावसुरिदं वचः ॥ २४ ॥
इस प्रकार क्रोधपूर्वक उच्चस्वरसे बोलते हुए राजा जनमेजयसे गन्धर्वराज विश्वावसुने यह बात कही ॥ २४ ॥
विश्वावसुरुवाच
त्रियज्ञशतयज्वानं वासवस्त्वां न मृष्यते ।
अप्सरास्तेन पत्नी ते विहितेयं वपुष्टमा ॥ २५ ॥
विश्वावसु बोले—राजन् ! आपने तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया है, इसलिये इन्द्र आपके इस उत्कर्षको सहन नहीं कर पाते हैं। इसीलिये उन्होंने एक अप्सराको आपकी इस पत्नी वपुष्टमाके रूपमें परिणत कर दिया था ॥
रम्भानामाप्सरा देवी काशिराजसुता मता ।
सैषा योषिद्वरा राजन् रत्नभूतानुभूयताम् ॥ २६ ॥
जिसे आप काशिराजकी पुत्री रानी वपुष्टमा मानते थे, वह रम्भा नामक अप्सरा थी; अतः राजन् ! यह नारियोंमें श्रेष्ठ वपुष्टमा रमणीरत्न है, आप इसका उप-भोग करें ॥२६॥
भविष्यपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः ७६३
यज्ञे विवरमासाद्य विघ्नमिन्द्रेण ते कृतम्।
यज्वा ह्यसि कुरुश्रेष्ठ समृद्ध्या वासवोपमः॥ २७॥
बिभेत्यभिभवाच्छक्रस्तव क्रतुफलैर्नृप।
तस्मादावर्तितश्चैव क्रतुरिन्द्रेण ते विभो॥ २८॥
इस यज्ञमें कोई छिद्र पाकर इन्द्रने तुम्हारे लिये यह विघ्न उपस्थित किया था। कुरुश्रेष्ठ ! तुम यज्ञकर्ता हो, समृद्धिमें देवराज इन्द्रके समान हो। नरेश्वर ! तुम्हारे यज्ञोंके फलोंसे इन्द्रका पराभव न हो जाय, यही सोचकर वे तुमसे डरते हैं। प्रभो ! इसीलिये इन्द्रने तुम्हारे इस यज्ञमें विघ्न डाला है॥ २७-२८॥
मायैषा वासवेनेह प्रयुक्ता विघ्नमिच्छता।
क्रतोर्विवरमासाद्य संज्ञप्तं ददृशे वाजिनम्॥ २९॥
रतिमिन्द्रेण रम्भायां मन्यसे यां वपुष्टमाम्।
यज्ञमें कोई त्रुटि अथवा छिद्र मिल जानेसे विघ्न डालनेकी इच्छावाले इन्द्रने यह मायाका प्रयोग किया था। उन्होंने घोड़ेको मारा गया देख उसके भीतर प्रवेश करके रम्भाके साथ रमण किया था, जिसे तुम वपुष्टमा समझने लगे थे॥ २९½॥
अथ ते गुरवः शप्तास्त्रियज्ञशतयाजिनः॥ ३०॥
भ्रंशितस्त्वं च विप्राश्च बलादिन्द्रसमादिह।
इधर तुमने अपने उन गुरुजनोंको शाप दे दिया, जिन्होंने तुम्हारे तीन सौ यज्ञ कराये थे। तुम और तुम्हारे ब्राह्मण यहाँ इन्द्रके समान बलसे भ्रष्ट कर दिये गये ॥३०½॥
त्वत्तश्चैव सुदुर्धर्षात् त्रियज्ञशतयाजिनः॥ ३१॥
बिभेति हि सदा त्वत्तो ब्राह्मणेभ्योऽपि वासवः।
एकेन वै तदुभयं तीर्णं शक्रेण मायया॥ ३२॥
तुम तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले अत्यन्त दुर्धर्ष वीर थे, तुमसे और उन ब्राह्मणोंसे भी इन्द्र सदा डरते रहते थे; अतः उन्होंने अकेले ही मायाके प्रयोगद्वारा उन दोनों प्रकारके भयोंको पार कर लिया॥ ३१-३२॥
स एष सुमहातेजा विजिगीषुः पुरंदरः।
कथमन्यैरनाचीर्णं नप्तुर्दारानतिक्रमेत्॥ ३३॥
विजयकी इच्छा रखनेवाले वे महातेजस्वी इन्द्र जिसे दूसरोंने कभी नहीं किया, वह पापकर्म कैसे कर सकते हैं? अपने पोतेकी पत्नीपर बलात्कार उनके द्वारा कैसे सम्भव हो सकता है?॥ ३३॥
यथैव हि परा बुद्धिः परो धर्मः परो दमः।
यथैव परमैश्वर्यं कीर्तितं हरिवाहने।
तथैव त्वयि दुर्धर्षे त्रियज्ञशतयाजिनि॥ ३४॥
हरिवाहन इन्द्रमें जिस प्रकार उत्तम बुद्धि, उत्कृष्ट धर्म, श्रेष्ठ इन्द्रिय-संयम और परम ऐश्वर्य बतलाया गया है, उसी प्रकार तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले तुझ दुर्धर्ष वीरमें वे सभी बातें हैं॥ ३४॥
मा वासवं मा च गुरुमात्मानं मा वपुष्टमाम्।
गच्छ दोषेण कालो हि सर्वथा दुरतिक्रमः॥ ३५॥
अतः तुम इन्द्रमें, गुरु एवं पुरोहितमें, अपनेमें तथा रानी वपुष्टमामें दोषदृष्टि न करो; क्योंकि काल सर्वथा दुर्लङ्घ्य है॥ ३५॥
ऐश्वर्येणाश्वमाविश्य देवेन्द्रेणासि रोपितः।
आनुकूल्येन देवस्य वर्तितव्यं सुखार्थिना॥ ३६॥
देवेन्द्रने अपनी ऐश्वर्य-शक्तिसे अश्वमें प्रवेश करके तुम्हारे हृदयमें रोष उत्पन्न कर दिया था; अतः सुखार्थी मनुष्यको सदा देवताके अनुकूल बर्ताव करना चाहिये ॥३६॥
दुस्तरं प्रतिकूलं हि प्रतिस्रोतः इवाम्भसः।
स्त्रीरत्नमुपभुङ्क्ष्वेमामपापां विगतज्वरः॥ ३७॥
जैसे जलके प्रवाहके प्रतिकूल तैरना कठिन होता है, उसी प्रकार प्रतिकूल देवतासे पार पाना बहुत कठिन है। तुम्हारी रानी निष्पाप हैं, ये रमणियोंमें रत्न हैं, तुम निश्चिन्त होकर इनका उपभोग करो॥ ३७॥
अपापास्त्यज्यमाना वै त्यजेयुरपि योषितः।
अदुष्टास्तु स्त्रियो राजन् दिव्यास्तु सविशेषतः॥ ३८॥
राजन्! यदि निरपराध स्त्रियोंका त्याग किया जाय तो वे भी निष्पाप पतियोंका परित्याग करने लगेंगी। स्त्रियाँ प्रायः अल्प दोषवाली होती हैं, वे विशेषतः दिव्यभावसे सम्पन्न होती हैं॥ ३८॥
भानोः प्रभा शिखा वह्नेर्वेदी होत्रे तथाहूतिः।
परामृष्टाप्यसंसक्ता नोपदुष्यन्ति योषितः॥ ३९॥
जैसे सूर्यकी प्रभा, अग्निकी शिखा, यज्ञकी वेदी और होमकी आहुति दूसरेके स्पर्शसे दूषित नहीं होती, उसी प्रकार स्त्रियाँ भी यदि पर-पुरुषोंमें आसक्त न हों तो वे उनके बलपूर्वक किये गये स्पर्शसे कलङ्कित नहीं होतीं हैं॥ ३९॥
ग्राह्या लालयितव्याश्च पूज्याश्च सततं बुधैः।
शीलवत्यो नमस्कार्याः पूज्याः श्रिय इव स्त्रियः॥ ४०॥
शीलवती स्त्रियाँ विद्वान् पुरुषोंके लिये लक्ष्मीके समान ग्राह्य, लाड़-प्यारके योग्य, सतत आदरणीय, वन्दनीय तथा पूजनीय होती हैं॥ ४०॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि विश्वावसुवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें विश्वावसुका प्रवचनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥५॥
७६४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
षष्ठोऽध्यायः
जनमेजयका संतुष्ट होकर राज्यशासन करना तथा इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणकी महिमा
सौतिरुवाच
एवं स विश्वावसुनानुनीतः
प्रसादमगम्य वपुष्टमायाः।
चकार मिथ्या व्यतिशङ्कितात्मा
शान्तिं परां मानवधर्महृष्टाम् ॥ १ ॥
सौति कहते हैं—अकारण ही जिनके मनमें संदेह उत्पन्न हो गया था, उन राजा जनमेजयको जब विश्वावसुने अनुनयपूर्वक समझाया, तब वे रानी वपुष्टमापर प्रसन्न हो गये और उन्होंने मानवधर्मके आचरणसे हृष्ट-पुष्ट शान्ति धारण की ॥ १ ॥
श्रममभिविनिवर्त्य मानसं स
समभिलपञ्जनमेज्यो यशः स्वम् ।
विषयमनुशशास धर्मवृद्धि-
र्मुदितमना रमयन् वपुष्टमां ताम् ॥ २ ॥
वे राजा जनमेजय मानसिक श्रमको दूर करके अपने लिये उत्तम यशकी अभिलाषा रखते हुए धर्मबुद्धिसे राज्यका शासन तथा प्रसन्नचित्त होकर वपुष्टमाके साथ रमण करने लगे ॥ २ ॥
न हि विरमति विप्रपूजना-
न्न च विनिवर्तति यज्ञदानशीलात् ।
न विषयपरिरक्षणाच्च्युतोऽभू-
न्न च परिगर्हति तां वपुष्टमां च ॥ ३ ॥
वे ब्राह्मणोंके पूजन, आदर-सत्कारसे कभी विरत नहीं होते थे, यज्ञ और दानरूप शीलसे कभी पीछे नहीं हटते थे, राज्यकी रक्षारूप कर्मसे च्युत नहीं होते थे और अपनी रानी वपुष्टमाकी कभी निन्दा नहीं करते थे ॥ ३ ॥
विधिविहितमशक्यमन्यथा हि कर्तुं
यदधिरचिन्तयतपाः पुराब्रवीत् सः।
इति स नृपतिरात्मवांस्तदासौ
तदनुविचिन्त्य बभूव वीतमन्युः॥ ४ ॥
'विधाताके विधानको उलट देना सर्वथा असम्भव है' यह बात जो अचिन्त्य तपस्वी महर्षि व्यासने पहले कही थी, उनके इस कथनपर उन मनस्वी नरेशने बारंबार विचार किया, इससे उनका रोष और खेद जाता रहा ॥ ४ ॥
इदं महाकाव्यमृषेर्महात्मनः
पठन् नृणां पूज्यतमो भवेन्नरः।
प्रकृष्टमायुः समवाप्य दुर्लभं
लभेत सर्वज्ञफलं च केशवम् ॥ ५ ॥
महात्मा महर्षि व्यासजीके इस महाकाव्यका पाठ करनेवाला मानव मनुष्योंमें परम पूजनीय हो जाता है। वह परम उत्तम दुर्लभ आयु पाकर सर्वज्ञतारूप फल और भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥
शतक्रतोः कल्मषविप्रमोक्षणं
पठन्निदं मुच्यति कल्मषान्नरः।
तथैव कामान् विविधान् समश्नुते
ह्यावाप्तकामश्च चिराय नन्दति॥ ६ ॥
इन्द्रके पापको छुड़ानेवाले इस काव्यका पाठ करनेवाला पुरुष स्वयं भी पापसे मुक्त हो जाता है। साथ ही नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित कामनाओंका उपभोग करता और आप्तकाम होकर चिरकालतक आनन्दमें मग्न रहता है ॥ ६ ॥
यथा हि पुष्पप्रभवं फलं द्रुमाः
फलात् प्रजायन्ति पुनश्च पादपाः।
तथा महर्षिप्रभवा इमा गिरः
प्रवर्धयन्ते तमृषिं प्रवर्धिताः॥ ७ ॥
जैसे बढ़े हुए वृक्ष अपने फूलोंसे फलको प्रकट करते हैं और फलसे पुनः वृक्ष उत्पन्न होते एवं बढ़ते हैं, उसी प्रकार महर्षि व्याससे प्रकट हुई उनकी यह वाणी वक्ताओंद्वारा बढ़ायी-प्रचारमें लायी जानेपर उन महर्षिके ही महत्त्वको बढ़ाती है ॥ ७ ॥
पुत्रानपुत्रो लभते सुवर्चस-
श्च्युतः पुनर्विन्दति चात्मनः स्थितिम् ।
व्याधिं न चाप्नोति चिरं स बन्धनं
क्रियां च पुण्यां लभते गुणान्वितः॥ ८ ॥
इस ग्रन्थका पाठ अथवा श्रवण करनेवाला गुणवान् पुरुष यदि पुत्रहीन है तो उसे परम तेजस्वी पुत्र प्राप्त होते हैं, यदि वह धन, धर्म अथवा महत्त्वसे भ्रष्ट हुआ है तो पुनः अपनी उसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है, उसे रोग नहीं होता, वह चिरकालतक बन्धनमें नहीं रहता तथा पुण्यकर्मका फल पाता है ॥ ८ ॥
पतिमभिलभते च सत्सु कन्या
श्रवणमुपेत्य शुभा मुनेस्तु वाचः।
जनयति च सुतान् गुणैरुपेतन्
रिपुजनमर्दनवीर्यशालिनश्च ॥ ९ ॥
महर्षि व्यासकी इस मङ्गलमयी वाणीको सुनकर कुमारी कन्या श्रेष्ठ पुरुषोंमेंसे किसी अभीष्ट पतिको पाती है तथा वह उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एवं शत्रुओंका मर्दन करनेवाले पराक्रमसे सुशोभित अनेक पुत्रोंको जन्म देती है ॥ ९ ॥
भविष्यपर्व ] सप्तमोऽध्यायः ७६५
विजयति वसुधां च राजवृत्ति- र्धनमतुलं लभते द्विषञ्जयं च । विपुलमपि धनं लभेच्च वैश्यः सुगतिमियाच्छ्रवणाच्च शूद्रजातिः ॥ १० ॥
क्षत्रियवृत्तिसे रहनेवाला पुरुष इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणसे भूमण्डलपर विजय पाता, अनुपम धनका भागी होता और शत्रुओंको परास्त कर देता है। वैश्य प्रचुर धन प्राप्त करता है और शूद्र जातिका पुरुष इसके श्रवणसे उत्तम गति पा लेता है ॥ १० ॥
पुराणमेतच्चरितं महात्मा- मधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् । विहाय दुःखानि विमुक्तसङ्गः स वीतरागो विचरेद् वसुन्धराम् ॥ ११ ॥
महात्माओंके चरित्रसे युक्त इस पुराणका अध्ययन करके मनुष्य नैष्ठिकी बुद्धि प्राप्त कर लेता है तथा वह दुःखोंका परित्याग करके आसक्तिशून्य एवं वीतराग होकर भूमण्डलपर विचरता रहता है ॥ ११ ॥
इत्येतदाख्यानमुदाहृतं वै प्रतिस्सरन्तो द्विजमण्डलेषु । स्थैर्येण धैर्येण पुनः स्मरन्तः सुखं भवन्तोऽनुचरन्तु लोकम् ॥ १२ ॥
मेरेद्वारा कहे गये इस आख्यानका ब्राह्मणोंके समाजमें चिन्तन एवं प्रवचन करते हुए आपलोग स्थिरता और धीरतापूर्वक इसका बारंबार स्मरण करें और संसारमें सुखपूर्वक विचरें ॥ १२ ॥
इति चरितमिदं महात्माना- मृषिकृतमद्भुतवीर्यकर्मणाम् । कथितमिदं हि समासविस्तरैः किमपरमिच्छसि किं ब्रवीमि ते ॥ १३ ॥
अद्भुत बल-पराक्रमवाले महात्माओंका यह चरित्र, जिसे महर्षि व्यासने ग्रन्थका रूप दिया है, मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ कह सुनाया। शौनकजी ! अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ? मैं आपसे क्या कहूँ ? ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि भविष्यान्तग्रन्थार्थप्रकाशो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें भविष्यान्तग्रन्थके अर्थका प्रकाशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
पुष्कर-प्रादुर्भावके विषयमें जनमेजयका प्रश्न और वैशम्पायनजीका उत्तर—
भगवान् नारायणकी महिमाका प्रतिपादन
जनमेजय उवाच
प्रभावं पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि । पुष्करे वै यथोद्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा ॥ १ ॥ एतदाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते । शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरभिजायते ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा—योगवेत्ताओंके स्वामी वैशम्पायनजी ! आप समुद्रके जलमे शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावका वर्णन कीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि पुष्करमें—भगवान्के नाभिकमलमें पहले देवताओं और ऋषियोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई, इस सम्पूर्ण रहस्यपर प्रकाश डालिये; क्योंकि भगवान् श्रीहरिकी कीर्तिका श्रवण करनेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है (अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती है) ॥
कियन्तं चैव कालं वै शयिता पुरुषोत्तमः । किमर्थं च तथा शेते कश्च कालस्य सम्भवः ॥ ३ ॥
भगवान् पुरुषोत्तम कितने समयतक और किसलिये एकार्णवके जलमें शयन करते हैं तथा कालकी उत्पत्तिका कारण क्या है ? ॥ ३ ॥
कियता चैव कालेन प्रबुध्यति सुराधिपः। कथमुत्थाय भगवानसृजन्निखिलं जगत् ॥ ४ ॥
सुरेश्वर विष्णु कितने समयमे जागते हैं और उस योगनिद्रासे उठकर वे भगवान् किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं ? ॥ ४ ॥
के प्रजापतयस्तात आसन् पूर्वे महामुने। कथं निर्मितांश्चैव चित्रं लोकं सनातन ॥ ५ ॥
तात ! महामुने ! पूर्वकालमे कौन-कौन-से प्रजापति थे और सनातन श्रीहरिने इस विचित्र जगत्की सृष्टि किस प्रकार की थी ? ॥ ५ ॥
कथमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥ ६ ॥ नष्टानलानिले लोके नष्टाकाशमहीतले । केवलं गहनीभूते महाभूतविपर्यये ॥ ७ ॥ प्रभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः । आस्ते सुरगुरुश्रेष्ठो विधिमादाय कं मुने ॥ ८ ॥
मुने ! उस भयानक एकार्णवमे जब कि समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवताओं और असुरोंका भी पता नहीं
७६६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
रहता, नाग और राक्षस भी कालके गालमें चले जाते हैं, अग्नि, वायु, आकाश और भूतलका भी कुछ पता नहीं चलता, महाभूतोंमें भारी उलट-फेर हो जाता है और संसार एक गहन गुफाके समान प्रतीत होता है, महाभूतोंके अधिपति महान् कर्म करनेवाले और महातेजस्वी सुरगुरुश्रेष्ठ भगवान् नारायण कैसे और किस विधिका आश्रय लेकर रहते हैं?॥
तन्मे त्वमुपपन्नाय ब्रह्मन्नेतदसंशयम् ।
वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम् ॥ ९ ॥
ब्रह्मन् ! धर्मिष्ठ महर्षे ! मैं शिष्यभावसे आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझसे भगवान् नारायणके यशका इस प्रकार वर्णन कीजिये कि मेरा सारा संशय दूर हो जाय ॥ ९ ॥
प्रादुर्भावं पुरस्कृत्य भूतं भव्यं महात्मनः ।
श्रद्दधानामुपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि ॥ १० ॥
भगवन् ! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपकी बातें सुननेके लिये बैठे हैं, आप हमारे समक्ष महात्मा श्रीहरिके भूत और भविष्य अवतारोंको दृष्टिमें रखकर उनके सुयशका वर्णन कीजिये ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
नारायणयशोज्ञाने या भवेद् भवतः स्पृहा ।
त्वद्वंशानघ पूतस्य कार्यं कुरुकुलर्षभ ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—निष्पाप कुरुकुलश्रेष्ठ जनमेजय ! भगवान् नारायणके यशका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये जो तुम्हें स्पृहा हो रही है, वह तुम्हारे कुलके अनुरूप ही है, ऐसी इच्छाका उदय होना पुण्यकर्मका फल है ॥ ११ ॥
शृणुष्वादिपुराणेभ्यो देवताभ्यो यथाश्रुति ।
ब्राह्मणानां च वदतां श्रुतोऽस्माभिर्महात्मनाम् ॥ १२ ॥
हमने पूर्वकालके पुरातन देवताओं तथा प्रवचन करनेवाले महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे श्रुतिके अनुसार भगवान् पद्मनाभके प्रभावका जैसा वर्णन सुना है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १२ ॥
यथा च तपसा दृष्टो बृहस्पतिसमद्युतिः ।
पाराशर्यस्ततः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १३ ॥
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
न विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण भारत ॥ १४ ॥
भारत ! जिनका तपस्याके प्रभावसे दर्शन हुआ है, उन बृहस्पतिके समान तेजस्वी श्रीमान् गुरुदेव पराशरनन्दन द्वैपायन व्यासने इस विषयमें जैसा मुझे उपदेश दिया है और जैसा मैंने सुना है, उसका मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन करता हूँ । केवल ऋषि होनेमात्रसे उनकी कही हुई बातोंको उन्हींकी भाँति ठीक-ठीक समझ लेना मेरे लिये भी सम्भव नहीं है ॥ १३-१४ ॥
कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् ।
विश्वात्मनो यं ब्रह्मापि न वेत्थति तत्त्वतः ॥ १५ ॥
जिन्हें ब्रह्मा भी ठीक-ठीक नहीं जानते, उन विश्वात्माके नारायणनामक परमतत्त्वको कौन जान सकता है ॥ १५ ॥
श्रुतं मे विश्वदेवानां यद् रहस्यं महर्षिणाम् ।
तदिदं सर्वदेवानां तत्त्वतस्तत्त्ववादिनाम् ॥ १६ ॥
जिनकी दृष्टिमें सब कुछ नारायणदेव ही हैं तथा जो स्वभावसे ही परमतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले हैं, उन विश्वेदेवों और महर्षियोंके मुखसे मैंने जो गोपनीय रहस्य सुना है, वह वास्तवमें यह नारायणका यश ही है ॥ १६ ॥
तदध्यात्मविदां चिन्त्यं कारणं चैव कर्मिणाम् ।
अधिदैवं च यद् दैवं तद् दैवमिति संज्ञितम् ॥ १७ ॥
वह नारायण-तत्त्व ही अध्यात्मवेत्ता पुरुषोंके लिये चिन्तनीय वस्तु है, वही कर्मपरायण पुरुषोंका कारणतत्त्व है, वही अधिदैव और दैव है तथा उसीको प्रारब्ध या भाग्य नाम दिया गया है ॥ १७ ॥
यद् भूतर्माधभूतं च यत्परं च महर्षिणाम् ।
यत् सत्यं वेददृष्टं च यत् तद् वेदविदो विदुः ॥ १८ ॥
जो भूत और अधिभूत है, जो महर्षियोंका परम ज्ञेय तत्त्व है, जो सत्य है तथा जिसे वेदोंद्वारा देखा या जाना गया है, उस परमात्मतत्त्वको जो जानते हैं, वे ही वेदवेत्ता हैं।
यः कर्ता कारको बुद्धिर्मनः क्षेत्रज्ञ एव च ।
प्रधानं पुरुषः शास्ता एकस्तदभिभाष्यते ॥ १९ ॥
जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रधान पुरुष और शास्ता है, जो अकेला ही इन शब्दोंद्वारा प्रतिपादित होता है, वह एकमात्र परमात्मा ही उ.ाने योग्य है ॥ १९ ॥
कालः कालं स्वपयति द्रष्टा स्वाधीन एव च ।
प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुवमक्षरमेव च ॥ २० ॥
वही काल बनकर कालको भी सुलाता है अर्थात् वही कालका भी काल है, वही सबका द्रष्टा तथा सर्वथा स्वतन्त्र है, पाँच प्रकारका प्राण भी वही है, वही ध्रुव एवं अक्षर ब्रह्म है ॥ २० ॥
उच्यते विविधैर्भावैस्तत्त्वैश्चानघ तत्परैः ।
स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च ॥ २१ ॥
अनघ ! उनकी उपासनामें तत्पर रहनेवाले पुरुषोंद्वारा विविध भावोंसे उन्हींका प्रतिपादन किया जाता है। वे ही भगवान् सबको बनाते और बिगाड़ते हैं ॥ २१ ॥
योऽस्मान् कारयते कर्म तेनास्म व्याकुलीकृताः ।
यजामहे तमेवेशं तमेवेच्छाम निर्वृताः ॥ २२ ॥
जो हमसे कर्म कराता है, उसीने हमें विधि-निषेधके बन्धनमें बाँधकर व्याकुल कर रखा है । हम उसी ईश्वरका
भविष्यपर्व ] अष्टमोऽध्यायः [ ७६७
यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं और शान्तभावसे उन्हींको पाना चाहते हैं ॥ २२ ॥
यो वक्ता यश्च वक्तव्यो यश्चाहं तद् ब्रवीमि वः ।
इदं शृणुत यच्छ्रेयो यच्चान्यत् परिजल्पथ ॥ २३ ॥
याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ गहराः ।
विश्वं विश्वपतिर्देवाः सर्वे नारायणात्मकम् ॥ २४ ॥
जो वक्ता (वाणीका प्रवर्तक) है, जो वक्तव्य विषय है तथा जो वक्तापनका अभिमान रखनेवाले मुझ जीवात्मा-के रूपमें भी विद्यमान है, उसके स्वरूपका मैं तुम्हारे समक्ष प्रतिपादन करता हूँ, तुम इसे सुनो। जो मुख्य श्रेय (मोक्ष) है तथा तुमलोग जिस स्वर्ग आदि दूसरे श्रेयकी चर्चा करते हो, जो भाँति-भाँतिकी कथाएँ हैं तथा जो गहन श्रुतियाँ हैं, वह सब भगवान् नारायणका स्वरूप ही है। यह विश्व, इस विश्वके पालक तथा देवता सब-के-सब नारायणरूप ही हैं ॥ २३-२४ ॥
यत् सत्यं यदनृतमादिमक्षरं वै
यद् भूतं भवति मिथश्च यद् भविष्यम् ।
यत् किंचिच्चरमचराव्ययं त्रिलोके
तत्सर्वं पुरुषवरः प्रभुर्वरिष्ठः ॥ २५ ॥
जो लौकिक सत्य और असत्य है, जो कारण और कार्य है, जो भूत है, जो परस्पर एक-दूसरेके जनक बीज-वृक्ष आदि हैं, जो भविष्य है तथा तीनों लोकोंमें जो कुछ भी चर-अचर और कूटस्थ वस्तु है, वह सब कुछ सर्वश्रेष्ठ पुरुषप्रवर भगवान् नारायण ही हैं ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पुष्करप्रादुर्भावे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥७॥
अष्टमोऽध्यायः
सत्ययुग आदिके परिमाणका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा जनमेजय ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! विद्वान् पुरुष सत्ययुगकी आयुका प्रमाण चार हजार दिव्य वर्ष बताते हैं। उससे दूने सौ अर्थात् आठ सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है ॥ १ ॥
तत्र धर्मश्चतुष्पादो ह्यधर्मः पादविग्रहः ।
स्वधर्मनिरताः सन्तो यजन्ते चैव मानवाः ॥ २ ॥
उस युगमें धर्म अपने चारो चरणोंसे सम्पन्न होता है तथा अधर्मका सारा शरीर एक ही पैरपर स्थित होता है। उस समय अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले साधु पुरुष प्रायः यज्ञोंद्वारा भगवान्का भजन किया करते हैं ॥ २ ॥
स्थिता धर्मपरा विप्रा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः ।
कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवस्तथा ॥ ३ ॥
ब्राह्मण स्वधर्मपालनमें तत्पर रहते हैं, राजालोग राजोचित वृत्तिमें स्थित होते हैं, वैश्य कृषि-कर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र तीनो वर्णोंकी सेवा करते हैं ॥ ३ ॥
सदा सत्यं तपश्चैव धर्मश्चैव विवर्धते ।
सद्गिराचरितं यच्च क्रियते ख्यायते च यत् ॥ ४ ॥
उस युगमें सत्य, तप और धर्मकी सदा ही वृद्धि होती है। साधु पुरुष जिसका आचरण करते हैं, उसीका दूसरोंको उपदेश देते हैं ॥ ४ ॥
एतत् कृतयुगे वृत्तं सर्वेषामेव भारत ।
प्राणिनां धर्मबुद्धीनामपि चेन्नीचयोनिनाम् ॥ ५ ॥
भारत ! सत्ययुगमें सभी धर्मबुद्धि प्राणियोंका, वे नीच योनि या नीच कुलमें क्यों न उत्पन्न हुए हों, ऐसा ही बर्ताव होता है ॥ ५ ॥
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्तिता ॥ ६ ॥
यहाँ तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है। उसकी संध्या उससे दुगुने सौ (अर्थात् छः सौ) वर्षोंकी बतायी गयी है ॥ ६ ॥
द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः ।
तत्र सत्यं च सत्त्वं च कृते सर्वं प्रवर्तते ॥ ७ ॥
उस युगमें धर्म तीन पैरोंसे और अधर्म दो पैरोंसे स्थित होता है। सत्ययुगमें सत्य और सत्त्वगुण सब अविकलरूपसे विद्यमान रहते हैं ॥ ७ ॥
त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णा लौल्येन संयुताः ।
चातुर्वर्ण्यस्य चैकृत्याद् यान्ति दौर्बल्यमाश्रिताः ॥ ८ ॥
परंतु त्रेतामे लोलुपता (कर्मफलकी स्पृहा) से युक्त होनेके कारण सभी वर्ण विकारको प्राप्त होते हैं और चारों वर्णोंमे विकृति आनेसे सब लोग दुर्बल हो जाते हैं ॥ ८ ॥
एष त्रेतायुगविधिर्विहितो देवनिर्मितः ।
द्वापरस्यापि या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि ॥ ९ ॥
१. तप, शौच, दया और सत्य ये धर्मके चार चरण हैं।