विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 786, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७६४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
षष्ठोऽध्यायः
जनमेजयका संतुष्ट होकर राज्यशासन करना तथा इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणकी महिमा
सौतिरुवाच
एवं स विश्वावसुनानुनीतः
प्रसादमगम्य वपुष्टमायाः।
चकार मिथ्या व्यतिशङ्कितात्मा
शान्तिं परां मानवधर्महृष्टाम् ॥ १ ॥
सौति कहते हैं—अकारण ही जिनके मनमें संदेह उत्पन्न हो गया था, उन राजा जनमेजयको जब विश्वावसुने अनुनयपूर्वक समझाया, तब वे रानी वपुष्टमापर प्रसन्न हो गये और उन्होंने मानवधर्मके आचरणसे हृष्ट-पुष्ट शान्ति धारण की ॥ १ ॥
श्रममभिविनिवर्त्य मानसं स
समभिलपञ्जनमेज्यो यशः स्वम् ।
विषयमनुशशास धर्मवृद्धि-
र्मुदितमना रमयन् वपुष्टमां ताम् ॥ २ ॥
वे राजा जनमेजय मानसिक श्रमको दूर करके अपने लिये उत्तम यशकी अभिलाषा रखते हुए धर्मबुद्धिसे राज्यका शासन तथा प्रसन्नचित्त होकर वपुष्टमाके साथ रमण करने लगे ॥ २ ॥
न हि विरमति विप्रपूजना-
न्न च विनिवर्तति यज्ञदानशीलात् ।
न विषयपरिरक्षणाच्च्युतोऽभू-
न्न च परिगर्हति तां वपुष्टमां च ॥ ३ ॥
वे ब्राह्मणोंके पूजन, आदर-सत्कारसे कभी विरत नहीं होते थे, यज्ञ और दानरूप शीलसे कभी पीछे नहीं हटते थे, राज्यकी रक्षारूप कर्मसे च्युत नहीं होते थे और अपनी रानी वपुष्टमाकी कभी निन्दा नहीं करते थे ॥ ३ ॥
विधिविहितमशक्यमन्यथा हि कर्तुं
यदधिरचिन्तयतपाः पुराब्रवीत् सः।
इति स नृपतिरात्मवांस्तदासौ
तदनुविचिन्त्य बभूव वीतमन्युः॥ ४ ॥
'विधाताके विधानको उलट देना सर्वथा असम्भव है' यह बात जो अचिन्त्य तपस्वी महर्षि व्यासने पहले कही थी, उनके इस कथनपर उन मनस्वी नरेशने बारंबार विचार किया, इससे उनका रोष और खेद जाता रहा ॥ ४ ॥
इदं महाकाव्यमृषेर्महात्मनः
पठन् नृणां पूज्यतमो भवेन्नरः।
प्रकृष्टमायुः समवाप्य दुर्लभं
लभेत सर्वज्ञफलं च केशवम् ॥ ५ ॥
महात्मा महर्षि व्यासजीके इस महाकाव्यका पाठ करनेवाला मानव मनुष्योंमें परम पूजनीय हो जाता है। वह परम उत्तम दुर्लभ आयु पाकर सर्वज्ञतारूप फल और भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥
शतक्रतोः कल्मषविप्रमोक्षणं
पठन्निदं मुच्यति कल्मषान्नरः।
तथैव कामान् विविधान् समश्नुते
ह्यावाप्तकामश्च चिराय नन्दति॥ ६ ॥
इन्द्रके पापको छुड़ानेवाले इस काव्यका पाठ करनेवाला पुरुष स्वयं भी पापसे मुक्त हो जाता है। साथ ही नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित कामनाओंका उपभोग करता और आप्तकाम होकर चिरकालतक आनन्दमें मग्न रहता है ॥ ६ ॥
यथा हि पुष्पप्रभवं फलं द्रुमाः
फलात् प्रजायन्ति पुनश्च पादपाः।
तथा महर्षिप्रभवा इमा गिरः
प्रवर्धयन्ते तमृषिं प्रवर्धिताः॥ ७ ॥
जैसे बढ़े हुए वृक्ष अपने फूलोंसे फलको प्रकट करते हैं और फलसे पुनः वृक्ष उत्पन्न होते एवं बढ़ते हैं, उसी प्रकार महर्षि व्याससे प्रकट हुई उनकी यह वाणी वक्ताओंद्वारा बढ़ायी-प्रचारमें लायी जानेपर उन महर्षिके ही महत्त्वको बढ़ाती है ॥ ७ ॥
पुत्रानपुत्रो लभते सुवर्चस-
श्च्युतः पुनर्विन्दति चात्मनः स्थितिम् ।
व्याधिं न चाप्नोति चिरं स बन्धनं
क्रियां च पुण्यां लभते गुणान्वितः॥ ८ ॥
इस ग्रन्थका पाठ अथवा श्रवण करनेवाला गुणवान् पुरुष यदि पुत्रहीन है तो उसे परम तेजस्वी पुत्र प्राप्त होते हैं, यदि वह धन, धर्म अथवा महत्त्वसे भ्रष्ट हुआ है तो पुनः अपनी उसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है, उसे रोग नहीं होता, वह चिरकालतक बन्धनमें नहीं रहता तथा पुण्यकर्मका फल पाता है ॥ ८ ॥
पतिमभिलभते च सत्सु कन्या
श्रवणमुपेत्य शुभा मुनेस्तु वाचः।
जनयति च सुतान् गुणैरुपेतन्
रिपुजनमर्दनवीर्यशालिनश्च ॥ ९ ॥
महर्षि व्यासकी इस मङ्गलमयी वाणीको सुनकर कुमारी कन्या श्रेष्ठ पुरुषोंमेंसे किसी अभीष्ट पतिको पाती है तथा वह उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एवं शत्रुओंका मर्दन करनेवाले पराक्रमसे सुशोभित अनेक पुत्रोंको जन्म देती है ॥ ९ ॥