भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 787

भविष्यपर्व ] सप्तमोऽध्यायः ७६५


विजयति वसुधां च राजवृत्ति- र्धनमतुलं लभते द्विषञ्जयं च । विपुलमपि धनं लभेच्च वैश्यः सुगतिमियाच्छ्रवणाच्च शूद्रजातिः ॥ १० ॥

क्षत्रियवृत्तिसे रहनेवाला पुरुष इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणसे भूमण्डलपर विजय पाता, अनुपम धनका भागी होता और शत्रुओंको परास्त कर देता है। वैश्य प्रचुर धन प्राप्त करता है और शूद्र जातिका पुरुष इसके श्रवणसे उत्तम गति पा लेता है ॥ १० ॥

पुराणमेतच्चरितं महात्मा- मधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् । विहाय दुःखानि विमुक्तसङ्गः स वीतरागो विचरेद् वसुन्धराम् ॥ ११ ॥

महात्माओंके चरित्रसे युक्त इस पुराणका अध्ययन करके मनुष्य नैष्ठिकी बुद्धि प्राप्त कर लेता है तथा वह दुःखोंका परित्याग करके आसक्तिशून्य एवं वीतराग होकर भूमण्डलपर विचरता रहता है ॥ ११ ॥

इत्येतदाख्यानमुदाहृतं वै प्रतिस्सरन्तो द्विजमण्डलेषु । स्थैर्येण धैर्येण पुनः स्मरन्तः सुखं भवन्तोऽनुचरन्तु लोकम् ॥ १२ ॥

मेरेद्वारा कहे गये इस आख्यानका ब्राह्मणोंके समाजमें चिन्तन एवं प्रवचन करते हुए आपलोग स्थिरता और धीरतापूर्वक इसका बारंबार स्मरण करें और संसारमें सुखपूर्वक विचरें ॥ १२ ॥

इति चरितमिदं महात्माना- मृषिकृतमद्भुतवीर्यकर्मणाम् । कथितमिदं हि समासविस्तरैः किमपरमिच्छसि किं ब्रवीमि ते ॥ १३ ॥

अद्भुत बल-पराक्रमवाले महात्माओंका यह चरित्र, जिसे महर्षि व्यासने ग्रन्थका रूप दिया है, मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ कह सुनाया। शौनकजी ! अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ? मैं आपसे क्या कहूँ ? ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि भविष्यान्तग्रन्थार्थप्रकाशो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें भविष्यान्तग्रन्थके अर्थका प्रकाशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


सप्तमोऽध्यायः

पुष्कर-प्रादुर्भावके विषयमें जनमेजयका प्रश्न और वैशम्पायनजीका उत्तर—

भगवान् नारायणकी महिमाका प्रतिपादन

जनमेजय उवाच

प्रभावं पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि । पुष्करे वै यथोद्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा ॥ १ ॥ एतदाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते । शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरभिजायते ॥ २ ॥

जनमेजयने पूछा—योगवेत्ताओंके स्वामी वैशम्पायनजी ! आप समुद्रके जलमे शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावका वर्णन कीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि पुष्करमें—भगवान्‌के नाभिकमलमें पहले देवताओं और ऋषियोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई, इस सम्पूर्ण रहस्यपर प्रकाश डालिये; क्योंकि भगवान् श्रीहरिकी कीर्तिका श्रवण करनेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है (अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती है) ॥

कियन्तं चैव कालं वै शयिता पुरुषोत्तमः । किमर्थं च तथा शेते कश्च कालस्य सम्भवः ॥ ३ ॥

भगवान् पुरुषोत्तम कितने समयतक और किसलिये एकार्णवके जलमें शयन करते हैं तथा कालकी उत्पत्तिका कारण क्या है ? ॥ ३ ॥

कियता चैव कालेन प्रबुध्यति सुराधिपः। कथमुत्थाय भगवानसृजन्निखिलं जगत् ॥ ४ ॥

सुरेश्वर विष्णु कितने समयमे जागते हैं और उस योगनिद्रासे उठकर वे भगवान् किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करते हैं ? ॥ ४ ॥

के प्रजापतयस्तात आसन् पूर्वे महामुने। कथं निर्मितांश्चैव चित्रं लोकं सनातन ॥ ५ ॥

तात ! महामुने ! पूर्वकालमे कौन-कौन-से प्रजापति थे और सनातन श्रीहरिने इस विचित्र जगत्‌की सृष्टि किस प्रकार की थी ? ॥ ५ ॥

कथमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥ ६ ॥ नष्टानलानिले लोके नष्टाकाशमहीतले । केवलं गहनीभूते महाभूतविपर्यये ॥ ७ ॥ प्रभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः । आस्ते सुरगुरुश्रेष्ठो विधिमादाय कं मुने ॥ ८ ॥

मुने ! उस भयानक एकार्णवमे जब कि समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवताओं और असुरोंका भी पता नहीं