विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७६६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
रहता, नाग और राक्षस भी कालके गालमें चले जाते हैं, अग्नि, वायु, आकाश और भूतलका भी कुछ पता नहीं चलता, महाभूतोंमें भारी उलट-फेर हो जाता है और संसार एक गहन गुफाके समान प्रतीत होता है, महाभूतोंके अधिपति महान् कर्म करनेवाले और महातेजस्वी सुरगुरुश्रेष्ठ भगवान् नारायण कैसे और किस विधिका आश्रय लेकर रहते हैं?॥
तन्मे त्वमुपपन्नाय ब्रह्मन्नेतदसंशयम् ।
वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम् ॥ ९ ॥
ब्रह्मन् ! धर्मिष्ठ महर्षे ! मैं शिष्यभावसे आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझसे भगवान् नारायणके यशका इस प्रकार वर्णन कीजिये कि मेरा सारा संशय दूर हो जाय ॥ ९ ॥
प्रादुर्भावं पुरस्कृत्य भूतं भव्यं महात्मनः ।
श्रद्दधानामुपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि ॥ १० ॥
भगवन् ! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपकी बातें सुननेके लिये बैठे हैं, आप हमारे समक्ष महात्मा श्रीहरिके भूत और भविष्य अवतारोंको दृष्टिमें रखकर उनके सुयशका वर्णन कीजिये ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
नारायणयशोज्ञाने या भवेद् भवतः स्पृहा ।
त्वद्वंशानघ पूतस्य कार्यं कुरुकुलर्षभ ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—निष्पाप कुरुकुलश्रेष्ठ जनमेजय ! भगवान् नारायणके यशका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये जो तुम्हें स्पृहा हो रही है, वह तुम्हारे कुलके अनुरूप ही है, ऐसी इच्छाका उदय होना पुण्यकर्मका फल है ॥ ११ ॥
शृणुष्वादिपुराणेभ्यो देवताभ्यो यथाश्रुति ।
ब्राह्मणानां च वदतां श्रुतोऽस्माभिर्महात्मनाम् ॥ १२ ॥
हमने पूर्वकालके पुरातन देवताओं तथा प्रवचन करनेवाले महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे श्रुतिके अनुसार भगवान् पद्मनाभके प्रभावका जैसा वर्णन सुना है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १२ ॥
यथा च तपसा दृष्टो बृहस्पतिसमद्युतिः ।
पाराशर्यस्ततः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १३ ॥
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
न विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण भारत ॥ १४ ॥
भारत ! जिनका तपस्याके प्रभावसे दर्शन हुआ है, उन बृहस्पतिके समान तेजस्वी श्रीमान् गुरुदेव पराशरनन्दन द्वैपायन व्यासने इस विषयमें जैसा मुझे उपदेश दिया है और जैसा मैंने सुना है, उसका मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन करता हूँ । केवल ऋषि होनेमात्रसे उनकी कही हुई बातोंको उन्हींकी भाँति ठीक-ठीक समझ लेना मेरे लिये भी सम्भव नहीं है ॥ १३-१४ ॥
कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् ।
विश्वात्मनो यं ब्रह्मापि न वेत्थति तत्त्वतः ॥ १५ ॥
जिन्हें ब्रह्मा भी ठीक-ठीक नहीं जानते, उन विश्वात्माके नारायणनामक परमतत्त्वको कौन जान सकता है ॥ १५ ॥
श्रुतं मे विश्वदेवानां यद् रहस्यं महर्षिणाम् ।
तदिदं सर्वदेवानां तत्त्वतस्तत्त्ववादिनाम् ॥ १६ ॥
जिनकी दृष्टिमें सब कुछ नारायणदेव ही हैं तथा जो स्वभावसे ही परमतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले हैं, उन विश्वेदेवों और महर्षियोंके मुखसे मैंने जो गोपनीय रहस्य सुना है, वह वास्तवमें यह नारायणका यश ही है ॥ १६ ॥
तदध्यात्मविदां चिन्त्यं कारणं चैव कर्मिणाम् ।
अधिदैवं च यद् दैवं तद् दैवमिति संज्ञितम् ॥ १७ ॥
वह नारायण-तत्त्व ही अध्यात्मवेत्ता पुरुषोंके लिये चिन्तनीय वस्तु है, वही कर्मपरायण पुरुषोंका कारणतत्त्व है, वही अधिदैव और दैव है तथा उसीको प्रारब्ध या भाग्य नाम दिया गया है ॥ १७ ॥
यद् भूतर्माधभूतं च यत्परं च महर्षिणाम् ।
यत् सत्यं वेददृष्टं च यत् तद् वेदविदो विदुः ॥ १८ ॥
जो भूत और अधिभूत है, जो महर्षियोंका परम ज्ञेय तत्त्व है, जो सत्य है तथा जिसे वेदोंद्वारा देखा या जाना गया है, उस परमात्मतत्त्वको जो जानते हैं, वे ही वेदवेत्ता हैं।
यः कर्ता कारको बुद्धिर्मनः क्षेत्रज्ञ एव च ।
प्रधानं पुरुषः शास्ता एकस्तदभिभाष्यते ॥ १९ ॥
जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रधान पुरुष और शास्ता है, जो अकेला ही इन शब्दोंद्वारा प्रतिपादित होता है, वह एकमात्र परमात्मा ही उ.ाने योग्य है ॥ १९ ॥
कालः कालं स्वपयति द्रष्टा स्वाधीन एव च ।
प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुवमक्षरमेव च ॥ २० ॥
वही काल बनकर कालको भी सुलाता है अर्थात् वही कालका भी काल है, वही सबका द्रष्टा तथा सर्वथा स्वतन्त्र है, पाँच प्रकारका प्राण भी वही है, वही ध्रुव एवं अक्षर ब्रह्म है ॥ २० ॥
उच्यते विविधैर्भावैस्तत्त्वैश्चानघ तत्परैः ।
स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च ॥ २१ ॥
अनघ ! उनकी उपासनामें तत्पर रहनेवाले पुरुषोंद्वारा विविध भावोंसे उन्हींका प्रतिपादन किया जाता है। वे ही भगवान् सबको बनाते और बिगाड़ते हैं ॥ २१ ॥
योऽस्मान् कारयते कर्म तेनास्म व्याकुलीकृताः ।
यजामहे तमेवेशं तमेवेच्छाम निर्वृताः ॥ २२ ॥
जो हमसे कर्म कराता है, उसीने हमें विधि-निषेधके बन्धनमें बाँधकर व्याकुल कर रखा है । हम उसी ईश्वरका