भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 789

भविष्यपर्व ] अष्टमोऽध्यायः [ ७६७

यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं और शान्तभावसे उन्हींको पाना चाहते हैं ॥ २२ ॥
यो वक्ता यश्च वक्तव्यो यश्चाहं तद् ब्रवीमि वः ।
इदं शृणुत यच्छ्रेयो यच्चान्यत् परिजल्पथ ॥ २३ ॥
याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ गहराः ।
विश्वं विश्वपतिर्देवाः सर्वे नारायणात्मकम् ॥ २४ ॥
जो वक्ता (वाणीका प्रवर्तक) है, जो वक्तव्य विषय है तथा जो वक्तापनका अभिमान रखनेवाले मुझ जीवात्मा-के रूपमें भी विद्यमान है, उसके स्वरूपका मैं तुम्हारे समक्ष प्रतिपादन करता हूँ, तुम इसे सुनो। जो मुख्य श्रेय (मोक्ष) है तथा तुमलोग जिस स्वर्ग आदि दूसरे श्रेयकी चर्चा करते हो, जो भाँति-भाँतिकी कथाएँ हैं तथा जो गहन श्रुतियाँ हैं, वह सब भगवान् नारायणका स्वरूप ही है। यह विश्व, इस विश्वके पालक तथा देवता सब-के-सब नारायणरूप ही हैं ॥ २३-२४ ॥
यत् सत्यं यदनृतमादिमक्षरं वै
यद् भूतं भवति मिथश्च यद् भविष्यम् ।
यत् किंचिच्चरमचराव्ययं त्रिलोके
तत्सर्वं पुरुषवरः प्रभुर्वरिष्ठः ॥ २५ ॥
जो लौकिक सत्य और असत्य है, जो कारण और कार्य है, जो भूत है, जो परस्पर एक-दूसरेके जनक बीज-वृक्ष आदि हैं, जो भविष्य है तथा तीनों लोकोंमें जो कुछ भी चर-अचर और कूटस्थ वस्तु है, वह सब कुछ सर्वश्रेष्ठ पुरुषप्रवर भगवान् नारायण ही हैं ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पुष्करप्रादुर्भावे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥७॥


अष्टमोऽध्यायः

सत्ययुग आदिके परिमाणका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा जनमेजय ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! विद्वान् पुरुष सत्ययुगकी आयुका प्रमाण चार हजार दिव्य वर्ष बताते हैं। उससे दूने सौ अर्थात् आठ सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है ॥ १ ॥

तत्र धर्मश्चतुष्पादो ह्यधर्मः पादविग्रहः ।
स्वधर्मनिरताः सन्तो यजन्ते चैव मानवाः ॥ २ ॥
उस युगमें धर्म अपने चारो चरणोंसे सम्पन्न होता है तथा अधर्मका सारा शरीर एक ही पैरपर स्थित होता है। उस समय अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले साधु पुरुष प्रायः यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का भजन किया करते हैं ॥ २ ॥

स्थिता धर्मपरा विप्रा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः ।
कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवस्तथा ॥ ३ ॥
ब्राह्मण स्वधर्मपालनमें तत्पर रहते हैं, राजालोग राजोचित वृत्तिमें स्थित होते हैं, वैश्य कृषि-कर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र तीनो वर्णोंकी सेवा करते हैं ॥ ३ ॥

सदा सत्यं तपश्चैव धर्मश्चैव विवर्धते ।
सद्गिराचरितं यच्च क्रियते ख्यायते च यत् ॥ ४ ॥
उस युगमें सत्य, तप और धर्मकी सदा ही वृद्धि होती है। साधु पुरुष जिसका आचरण करते हैं, उसीका दूसरोंको उपदेश देते हैं ॥ ४ ॥

एतत् कृतयुगे वृत्तं सर्वेषामेव भारत ।
प्राणिनां धर्मबुद्धीनामपि चेन्नीचयोनिनाम् ॥ ५ ॥
भारत ! सत्ययुगमें सभी धर्मबुद्धि प्राणियोंका, वे नीच योनि या नीच कुलमें क्यों न उत्पन्न हुए हों, ऐसा ही बर्ताव होता है ॥ ५ ॥

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्तिता ॥ ६ ॥
यहाँ तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है। उसकी संध्या उससे दुगुने सौ (अर्थात् छः सौ) वर्षोंकी बतायी गयी है ॥ ६ ॥

द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः ।
तत्र सत्यं च सत्त्वं च कृते सर्वं प्रवर्तते ॥ ७ ॥
उस युगमें धर्म तीन पैरोंसे और अधर्म दो पैरोंसे स्थित होता है। सत्ययुगमें सत्य और सत्त्वगुण सब अविकलरूपसे विद्यमान रहते हैं ॥ ७ ॥

त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णा लौल्येन संयुताः ।
चातुर्वर्ण्यस्य चैकृत्याद् यान्ति दौर्बल्यमाश्रिताः ॥ ८ ॥
परंतु त्रेतामे लोलुपता (कर्मफलकी स्पृहा) से युक्त होनेके कारण सभी वर्ण विकारको प्राप्त होते हैं और चारों वर्णोंमे विकृति आनेसे सब लोग दुर्बल हो जाते हैं ॥ ८ ॥

एष त्रेतायुगविधिर्विहितो देवनिर्मितः ।
द्वापरस्यापि या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि ॥ ९ ॥


१. तप, शौच, दया और सत्य ये धर्मके चार चरण हैं।