विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७६८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
यह त्रेतायुगकी स्थिति बतायी गयी, जिसका निर्माण साक्षात् भगवान्ने ही किया है। अब द्वापरकी जो चेष्टा है, उसको भी तुम्हें सुन लेना चाहिये ॥ ९ ॥
द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां कुरुसत्तम ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्तिता ॥ १० ॥
कुरुश्रेष्ठ ! द्वापर युग दो हजार दिव्य वर्षोंका होता है और उसकी संध्या चार सौ वर्षोंकी बतायी गयी है ॥ १० ॥
तत्राप्यर्थपरा विप्रा ज्ञानिनो रजसाऽऽवृताः ।
शठा नैकृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते कुरुपुङ्गव ॥ ११ ॥
कुरुपुङ्गव ! उस युगमें भी अर्थपरायण, ज्ञानी, रजोगुणसे आच्छन्न, शठ, दुष्टता करनेवाले और क्षुद्र ब्राह्मण आदि पैदा होते हैं ॥ ११ ॥
द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्यामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः ।
विपर्ययं शनैर्यान्ति कृते ये धर्मसेतवः ॥ १२ ॥
उस समय धर्म दो ही पैरोंसे स्थित होता है, किंतु अधर्म तीन पैरोंसे खड़ा होकर क्रमशः उत्थान करने लगता है। सत्ययुगमें जो धर्मकी मर्यादाएँ बँधी होती हैं, वे धीरे-धीरे इस युगमें आकर उलट जाती हैं ॥ १२ ॥
ब्राह्मण्यभावा नश्यन्ति तथास्तिक्यं विशीर्यते ।
व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये ॥ १३ ॥
ब्राह्मणत्वके भाव नष्ट हो जाते हैं, आस्तिकताकी दीवार ढह जाती है, द्वापरयुगके अन्तमें कलि-धर्मका सम्मिश्रण हो जानेके कारण लोग व्रत और उपवास छोड़ देते हैं ॥ १३ ॥
तथा वर्षसहस्रं तु वर्षाणां द्वे शते तथा ।
संध्यया सह संख्यातं क्रूरं कलियुगं स्मृतम् ॥ १४ ॥
क्रूर कलियुग अपनी दो सौ वर्षोंकी संध्याके साथ एक हजार दिव्यवर्षोंका बताया गया है ॥ १४ ॥
तत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्मः पादविग्रहः ।
कामनिष्ठास्तमश्छन्ना जायन्ते तत्र मानवाः ॥ १५ ॥
उस युगमें अधर्म अपने चारों पैरोंसे सम्पन्न होता है, किंतु धर्मका शरीर एक ही पैरसे टिका रहता है। उस युगके मनुष्य प्रायः कामपरायण और तमोगुणसे आच्छन्न होते हैं ॥ १५ ॥
नैवोपवासकृत् कश्चिन्न च साधुर्न सत्यवाक् ।
आस्तिको ब्रह्मवक्ता वा नरो भवति वै तदा ॥ १६ ॥
कलिकालमें प्रायः कोई मनुष्य उपवास करनेवाला, साधु, सत्यवादी, आस्तिक तथा ब्रह्मज्ञानका उपदेश करनेवाला नहीं होता है ॥ १६ ॥
अहंकारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः ।
विप्राः शूद्रसमाचाराः शूद्रास्त्वाचारलक्षणाः ॥ १७ ॥
कलियुगके ब्राह्मण अहंकारके वशीभूत तथा स्नेहबन्धनसे शून्य हो शूद्रोंके समान आचारवाले हो जायेंगे और शूद्र सदाचारका पालन करेंगे ॥ १७ ॥
दूषकास्त्वाश्रमाणां च वर्णानां चैव संकराः ।
अगम्यास्वभिरंस्यन्ते वर्तन्त्येवं कलौ युगे ॥ १८ ॥
लोग आश्रमोंको कलङ्कित करेंगे, वर्णसङ्कर उत्पन्न होकर अगम्या स्त्रियोंके साथ रमण करेंगे, कलियुगमें प्रायः लोगोंका ऐसा ही बर्ताव होता है ॥ १८ ॥
एवं द्वादशसाहस्रं तदेकं युगमुच्यते ।
तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ १९ ॥
इस प्रकार बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग कहलाता है। यहाँ इकहत्तर चतुर्युगोंका एक मन्वन्तर कहा जाता है (इतने समयके बाद एक मनु नष्ट हो जाते हैं) ॥
त्रय्यां चैव न संदेहो युगान्ते जनमेजय ।
दिव्यं द्वादशसाहस्रं युगं तु कवयो विदुः ।
एतत्सहस्रपर्यन्तं तदह्नो ब्राह्ममुच्यते ॥ २० ॥
जनमेजय ! युगान्त (प्रलय) कालमे समस्त चराचर जगत्का नाश हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। तीनों वेदोंमें भी इसका वर्णन मिलता है। ज्ञानी पुरुष बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग मानते हैं। इस चतुर्युगकी जब एक सहस्र आवृत्ति हो जाती है, तब उसे ब्रह्माका एक दिन कहते हैं ॥ २० ॥
ततोऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव देहिनाम् ।
शरीरनिर्वृत्तिं दृष्ट्वा रुद्रः संहारबुद्धिमान् ॥ २१ ॥
देवतानां च सर्वेषां ब्राह्मणानां महीपते ।
दैत्यानां मानवानां च यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ॥ २२ ॥
देवर्षीणां ब्रह्मर्षीणां तथा राजर्षिणामपि ।
किंनराणामप्सरसां भुजङ्गानां तथैव च ॥ २३ ॥
पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव भारत ।
तिर्यग्योनिगतानां च सत्त्वानां मृगपक्षिणाम् ॥ २४ ॥
महाभूतपतिर्देवः पञ्चभूतानि भूतकृत् ।
जगत्संहरणार्थाय कुरुते वैशसं महत् ॥ २५ ॥
पृथ्वीनाथ ! तदनन्तर ब्रह्माजीका वह दिन बीतनेपर समस्त देहधारियोंकी शारीरिक सुखमे आसक्ति देखकर संहारकुशल रुद्रदेव समस्त देवताओं, ब्राह्मणो, दैत्यों, मनुष्यों, यक्षों, गन्धर्वो, राक्षसों, देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों, किन्नरों, अप्सराओं, सर्पों, पर्वतों, नदियों, पशुओं, तिर्यग्योनिमें पड़े हुए जीवों, मृगों तथा पक्षियोंका भी महान् संहार करते हैं, महाभूतोंके पति वे भूतस्रष्टा भगवान् सारे भूतों एवं जगत्का संहार करनेके लिये ही उनकी सृष्टि करते हैं ॥ २१–२५ ॥