विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 791, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] नवमोऽध्यायः [ ७६९
भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददानो
भूत्वा वायुः संहरन् प्राणिजातम्।
भूत्वा वह्निर्दहते सर्वलोकान्
मेघो भूत्वा भूय एवाभ्यवर्षत् ॥ २६ ॥
अपने दिनके अन्तमें रुद्रस्वरूप भगवान् ब्रह्मा सूर्य होकर समस्त लोकोंके नेत्र छीन लेते हैं, वायु होकर समस्त प्राणियोंके प्राण हर लेते हैं, अग्नि होकर समस्त लोकोंको दग्ध कर देते और मेघ बनकर पुनः बड़ी भारी वर्षा करते हैं (जिससे सब कुछ एकार्णवमें निमग्न हो जाता है) ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पुष्करप्रादुर्भावे कृतादियुगपरिमाणवर्णने अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें युग आदिके प्रमाणका वर्णनविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
प्रलयके पश्चात् एकार्णवके जलमें भगवान् नारायणका शयन
वैशम्पायन उवाच
भूत्वा नारायणो योगी सप्तमूर्तिर्विभावसुः।
गभस्तिभिः प्रदीप्ताभिः संशोषयति सागरान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! योगेश्वर भगवान् नारायण सात मूर्ति (शिखा) वाले अग्निदेवका रूप धारण करके अपनी प्रज्वलित किरणोंद्वारा समुद्रोंका जल सोख लेते हैं ॥ १ ॥
पीत्वार्णवांश्च सर्वान् स नदीः कूपांश्च सर्वशः।
पर्वतानां च सलिलं सर्वं पीत्वा च रश्मिभिः ॥ २ ॥
भित्त्वा सहस्रशश्चैव महीं नीत्वा रसातलम्।
रसातलगर्तं कृत्स्नं पिवते रसमुत्तमम् ॥ ३ ॥
सारे समुद्रों, नदियों, कूपों और पर्वतोंका सम्पूर्ण जल अपनी किरणोंद्वारा पीकर पृथ्वीके सहस्रों टुकड़े करके उसे रसातलमें ले जाकर वे रसातलका भी सारा उत्तम रस पी लेते हैं ॥ २-३ ॥
अप्सु सृजन् क्लेदमन्यद् ददाति प्राणिनां ध्रुवम्।
तत् सर्वमरविन्दाक्ष आदत्ते पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥
जलमें क्लेद (गीलापन) की सृष्टि करते हुए वे प्राणियोंको निश्चितरूपसे और जो कुछ देते हैं, वह सब प्रलयकालमें वे ही कमलनयन पुरुषोत्तम उनसे ले लेते हैं ॥ ४ ॥
वायुश्च बलवान् भूत्वा स विधूयाखिलं जगत्।
प्राणोदयं सुराणां च वायुना कुरुते हरिः ॥ ५ ॥
वे श्रीहरि बलवान् वायु होकर सम्पूर्ण जगत्को कम्पित करते हुए उस वायुके द्वारा ही देवताओंमें प्राणसंचार करते हैं ॥ ५ ॥
ततो देवगणानां च सर्वेषामेव देहिनाम्।
ये चेन्द्रियगुणाः सर्वे ये चान्ये च यतोद्भवाः।
पूर्वं घ्राणं शरीरं च पृथिवीमाश्रिता गुणाः ॥ ६ ॥
तदनन्तर देवताओं तथा समस्त देहधारियोंकी जो सारी इन्द्रियाँ हैं तथा जो अन्य विषय आदि हैं, उनकी जहाँसे उत्पत्ति हुई है, वे उसी कारणतत्त्वमें लीन हो जाते हैं। गन्ध घ्राणेन्द्रिय और शरीर—ये तीनों गुण पृथ्वीके आश्रित हैं ॥ ६ ॥
जिह्वा रसश्च क्लेदश्च संश्रिताः सलिलं गुणाः।
रूपं चक्षुर्विपाकश्च ज्योतिरेवाश्रिता गुणाः ॥ ७ ॥
जिह्वा, रस और क्लेद—ये जलके आश्रित रहनेवाले गुण हैं। रूप, नेत्र और पाक—ये अग्निके आश्रित रहनेवाले गुण हैं ॥ ७ ॥
स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवनं संश्रिता गुणाः।
परमेष्ठिनं वरेण्यं च हृषीकेशं समाश्रिताः ॥ ८ ॥
स्पर्श, प्राण और चेष्टा—ये वायुके आश्रित रहनेवाले गुण हैं। (शब्द, श्रवणेन्द्रिय और आकाश—ये शब्दके आश्रित रहनेवाले गुण हैं।) ये सब-के-सब परमेष्ठी, एवं वरणीय भगवान् हृषीकेशके आश्रित होते हैं ॥ ८ ॥
ततो भगवता तत्र रश्मिभिः परिवारिताः।
वायुना कृष्यमाणाश्च रूपान्योन्यसमाश्रयात् ॥ ९ ॥
फिर भगवान्की प्रेरणासे उनकी किरणोंसे आवेष्टित हो वे देवगण, इन्द्रिय-समुदाय आदि वायुसे आकर्षित हो एक दूसरेके आश्रित होनेसे परस्पर संघर्ष करने लगे ॥ ९ ॥
तेषां संघर्षजोद्भूतः पावकः शतधा ज्वलन्।
अदहन्निखिलांल्लोकानुग्रः संवर्तकोऽनलः ॥ १० ॥
उनके संघर्षसे प्रकट हुई अग्नि सौ-सौ स्थानोंमें जल उठी और महाभयंकर संवर्तक अग्निके रूपमें उद्भासित होने लगी। उसने सम्पूर्ण लोकोंको जलाकर भस्म कर दिया ॥ १० ॥
सम्पर्वतांस्तरून गुल्माल्लतावल्लीस्तृणानि च।
विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च ॥ ११ ॥
आश्रमांश्च तथा पुण्यान् दिव्यान्यायतनौनि च।
यानि चाक्षयणीयानि तानि सर्वाणि सोऽदहत् ॥ १२ ॥
उस संवर्तक अग्निने पर्वत, वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली,