विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 792, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७७० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तृण, दिव्य विमान, नाना प्रकारके नगर, पुण्य आश्रम, दिव्य शोभासे सम्पन्न मन्दिर तथा अन्य जो-जो आश्रय लेने योग्य स्थान थे--उन सबको दग्ध कर डाला ॥११-१२॥
भस्मीभूतांस्ततः सर्वांल्लोकाँल्लोकगुरुर्हरिः।
भूयो निर्वापयामास जलयुक्तेन कर्मणा ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् लोकगुरु श्रीहरिने भस्मीभूत हुए उन समस्त लोकोंको पुनः जलका संयोग करानेवाले उपायसे बुझा दिया ॥
सहस्रदृङ्महातेजा भूत्वा कृष्णो महाघनः।
दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम् ॥ १४ ॥
सहस्रों नेत्रोंवाले उन महातेजस्वी श्रीकृष्णने महान् मेघ बनकर दिव्य जलरूपी हविष्यसे पृथ्वीको तृप्त किया ॥ १४ ॥
ततः क्षीरनिकाशेन स्वादुना परमाम्भसा।
शिवेन पुण्येन मही निर्वाणमगमत् परम् ॥ १५ ॥
दूधके समान स्वादिष्ट उत्तम कल्याणकारी एवं पवित्र उस जलसे वह जलती हुई पृथ्वी पूर्णतः शान्त हो गयी १५
ते नगा जलसंछन्नाः पयसः सर्वतोधराः।
एकार्णवजला भूत्वा सर्वसत्त्वविवर्जिताः ॥ १६ ॥
वे पर्वत और वृक्ष आदि जलसे आच्छादित हो सब ओरसे जल-ही-जल धारण किये रहे और एकार्णवके जलमें विलीन होकर सब प्रकारके प्राणियोंसे शून्य हो गये ॥१६॥
महाभूतान्यपि च तं प्रविष्टान्यमितौजसम्।
नष्टार्कपवनाकाशे सूक्ष्मे जनविवर्जिते ॥ १७ ॥
संशोषयित्वा पीत्वा च वसत्येकः सनातनः।
पौराणं रूपमास्थाय किमप्यमितबुद्धिमान् ॥ १८ ॥
पाँचों महाभूत भी उन अमित बलशाली भगवान् विष्णुमें प्रविष्ट हो गये। जब सूर्य, वायु और आकाशका भी सूक्ष्म परमात्मतत्त्वमें लय हो गया, जीव-जन्तुओंका सर्वथा अभाव हो गया, तब वे एकमात्र अमित बुद्धिमान् सनातन पुरुष श्रीहरि अपने किसी अनिर्वचनीय पुरातन रूपका आश्रय ले पहलेके जलका शोषण और पान करके उस दिव्य एकार्णवके जलमें निवास करने लगे ॥ १७-१८ ॥
एकार्णवजले ह्यासीद् योगी योगमुपागतः।
अयुतानां सहस्राणि गतान्येकार्णवेऽम्भसि ।
न चैनं कश्चिद्व्यक्तं व्यक्तं वेदितुमर्हति ॥ १९ ॥
वे योगी श्रीहरि योगका आश्रय ले एकार्णवके जलमें रहने लगे; वहाँ रहते हुए उनके सहस्रों अयुतवर्ष व्यतीत हो गये। इन अव्यक्त परमेश्वरको कोई भी व्यक्तरूपसे नहीं जान सकता ॥ १९ ॥
जनमेजय उवाच
एकार्णवविधिः कोऽयं यश्चैव परिकीर्तितः।
क एष पुरुषो नाम कियोगः कश्च योगवान् ॥ २० ॥
जनमेजयने पूछा—जिसका यहाँ वर्णन किया है, इस एकार्णवकी विधि(अवधि)क्या है? अर्थात् भगवान् उसमें कबतक निवास करते हैं? यह पुरुष कौन है? इसके योगका स्वरूप क्या है? और योगवान् (योगेश्वर) कौन है?॥२०॥
वैशम्पायन उवाच
एतावन्तमसौ कालमेकार्णवविधिं प्रति।
करिष्यतीमं भगवानिति कश्चिन्न बुध्यते ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—वे भगवान् इतने समयतक एकार्णव-विधिको पालन करेंगे अर्थात् इतने समयतक ही एकार्णवके जलमें रहेंगे, यह कोई नहीं जानता ॥ २१ ॥
न वै माता न च द्रष्टा न ज्ञाता नैव पार्श्वगः।
न स्वावगच्छते कश्चिदृते तं देवमीश्वरम् ॥ २२ ॥
(यह पुरुष अनिर्वचनीय है) न तो वह प्रमाता है, न द्रष्टा है, न ज्ञाता है और न तटस्थ ही है; इन सबसे सर्वथा विलक्षण है। उसे उस परमेश्वरदेवके सिवा दूसरा कोई नहीं जान सकता (इसलिये उसका योग भी अनिर्वचनीय है) ॥ २२ ॥
नभः क्षितिं पवनमथ प्रकाशयन्
प्रजापतिं भुवनचरं सुरेश्वरम्।
पितामहं श्रुतिनिलयं महामुनिं
शशास भूः शयनमरोचयत् प्रभुः॥ २३ ॥
जिन्होंने आकाश, पृथ्वी और वायुको प्रकाशित करते हुए समस्त भुवनोंमें विचरनेवाले, सुरेश्वर, प्रजापति वेदनिष्ठ महामुनि पितामह ब्रह्माको भी ज्ञानका उपदेश दिया, वे सबकी उत्पत्तिके कारणभूत भगवान् योगवान् (योगेश्वर) हैं; उन्होंने ही एकार्णवके जलमें शयन करना पसंद किया ॥२३॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पुष्करप्रादुर्भावे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥९॥
दशमोऽध्यायः
एकार्णवमें भगवान् और मार्कण्डेयजीका संवाद
वैशम्पायन उवाच
एवमेकार्णवीभूते शेते लोके महाद्युतिः।
प्रच्छाद्य सलिलं सर्वं हरिनारायणः प्रभुः ॥ १ ॥
महतो रजसो मध्ये महार्णवसमस्य वै।
विरजस्को महाबाहुरक्षरं ब्रह्म यं विदुः ॥ २ ॥
आत्मरूपप्रकाशेन तपसा संवृतः प्रभुः।
त्रिकमास्थाय कालं तु ततः सुष्वाप सोऽव्ययः ॥ ३ ॥