भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 793

भ विषयपर्व ] दशमोऽध्यायः ७७१


वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! आत्मस्वरूपको प्रकाशित करनेवाले तपसे सम्पन्न, सर्वसमर्थ, रजोगुणरहित महातेजस्वी, महाबाहु, अविनाशी, भगवान् नारायण हरिने इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के एकार्णवमय हो जानेपर सम्पूर्ण जलको आच्छादित करके उसमें शयन किया। ये वे ही भगवान् हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुष अविनाशी ब्रह्मके रूपमें जानते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालका आश्रय लेकर वहाँ सोये थे ॥ १-३ ॥

पुरुषो यज्ञ इत्येवं यत्परं परिकीर्तितम् ।
यच्चान्यत् पुरुषाख्यं स्यात्सर्वं तत्पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥

जिस परम तत्त्वको यज्ञपुरुषके नामसे कहा गया है तथा पुरुष नामसे प्रसिद्ध जो अन्य वस्तुएँ हैं, वे सब पुरुषोत्तम श्रीहरि ही हैं ॥ ४ ॥

ये च यज्ञपरा विप्रा ऋत्विजा इति संज्ञिताः ।
आत्मदेहात् पुरा भूता यज्ञेभ्यः श्रूयतां तदा ॥ ५ ॥

यज्ञमें तत्पर रहनेवाले जो ब्राह्मण ऋत्विज् कहलाते हैं, वे उन्हीं परमात्मा श्रीहरिके श्रीविग्रहसे पूर्वकालमें प्रकट हुए थे। उस समय उन्होंने उनको किस तरह प्रकट किया, यह बताता हूँ; सुनो ॥ ५ ॥

ब्रह्माणं परमं वक्त्रादुद्गातारं च सामगम् ।
होतारमथ चाध्वर्युं बाहुभ्यामसृजत् प्रभुः ॥ ६ ॥

उन भगवान्ने सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा और सामगान करनेवाले उद्गाताको अपने मुखसे उत्पन्न किया, होता और अध्वर्युकी सृष्टि अपनी दोनों भुजाओंसे की ॥ ६ ॥

ब्राह्मणो ब्राह्मणाच्छांसं सम्प्रस्तारं च सर्वशः ।
तन्मित्रं वरुणं सृष्ट्वा प्रतिष्ठातारमेव च ॥ ७ ॥

वेदाध्ययन करनेके कारण ब्राह्मणाच्छांसी नामवाला ब्राह्मण उन्हींसे प्रकट हुआ। उन्होंने प्रस्तोता और मैत्रावरुण नामक प्रशास्ताकी सृष्टि करके प्रतिप्रस्थाताको उत्पन्न किया ॥

उदरात् प्रतिहर्त्तारं पोतारं चैव भारत ।
अच्छावाकं मनोरूभ्यां नेष्टारं चैव भारत ॥ ८ ॥

भारत ! उन्हीं भगवान्ने उदरसे प्रतिहर्त्ता और पोताकी सृष्टि की। भरतनन्दन ! उन्होंने मन और ऊरुसे अच्छावाक् और नेष्टाको उत्पन्न किया ॥ ८ ॥

पाणिभ्यामथ चाग्नीध्रं सुब्रह्मण्यं च यज्ञियम् ।
ग्रावाणमथ बाहुभ्यामुन्नेतारं च यज्ञियम् ॥ ९ ॥

दोनों हाथोंसे अग्नीध्र और यज्ञसम्बन्धी सुब्रह्मण्यको उत्पन्न किया। भुजाओंसे ग्रावस्तोता और यज्ञसम्बन्धी उन्नेता-की सृष्टि की ॥ ९ ॥

एवमेवैष भगवान् षोडशैताञ्जगत्पतिः ।
प्रवक्तॄन् सर्वयज्ञानामृत्विजोऽसृजदुत्तमान् ॥ १० ॥

इस प्रकार इन जगदीश्वर भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण यज्ञकर्मोंका उपदेश देनेवाले सोलह उत्तम ऋत्विजोंकी सृष्टि की ॥ १० ॥

तदेष वै वेदमयः पुरुषो यज्ञसम्मितः ।
वेदाश्च तन्मयाः सर्वे साङ्गोपनिषदक्रियाः ॥ ११ ॥

ये ही वेदमय और यज्ञसम्मित पुरुष हैं। छहों अङ्गों, उपनिषदों और कर्मकाण्डसहित सम्पूर्ण वेद भी इन्हींके स्वरूप हैं ॥ ११ ॥

स्वपितेकार्णवे चैव यदाश्चर्यमभूत्तदा ।
श्रूयते तद् यथावृत्तं मार्कण्डेयो यदन्वभूत् ॥ १२ ॥

जब वे एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय जो आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, उसे मुनिवर मार्कण्डेय-जीने ठीक-ठीक अनुभव किया था—ऐसा सुना जाता है ॥

जीर्णो भगवतस्तस्य कुक्षावेव महामुनिः ।
बहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव वरतेजसा ॥ १३ ॥

महामुनि मार्कण्डेय उन भगवान् श्रीहरिके उदरमें ही जवानसे बूढ़े हो गये थे। उन भगवान्के ही उत्तम तेजसे मार्कण्डेयजीको अनेक सहस्र वर्षोंकी आयु प्राप्त हुई थी ॥

इति तीर्थप्रसङ्गेन पृथिवीतार्थगोचरः ।
आश्रमानपि पुण्यांश्च तीर्थान्यायतनानि च ॥ १४ ॥
देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च ।
जपहोमरतः क्षान्तस्तपो घोरं समाश्रितः ॥ १५ ॥

इस तरह वे तीर्थयात्राके प्रसंगसे भगवान्के उदरमें ही भूमण्डलके तीर्थोंमें विचरते रहे। उन्होंने वहाँ पवित्र आश्रमों, तीर्थों, देवालयों, देशों, विचित्र राष्ट्रों और नाना प्रकारके नगरोंका दर्शन किया। तत्पश्चात् वे घोर तपस्याका आश्रय ले जप और होममें संलग्न होकर अत्यन्त दुर्बल हो गये ॥

मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनैर्वक्त्राद् विनिःसृतः ।
निष्क्रामन्तं न चात्मानं जानीते देवमायया ॥ १६ ॥

इसके बाद एक दिन मार्कण्डेयजी धीरे-से भगवान्के मुखसे बाहर निकल आये। देवमायासे मोहित होकर वे अपना निकलना नहीं जान सके ॥ १६ ॥

निष्क्रान्तस्तस्य वदनादेकार्णवमथो गतः ।
सर्वतस्तमसाच्छन्नं मार्कण्डेयो निरीक्षते ॥ १७ ॥

भगवान्के मुखसे निकलकर मार्कण्डेयजी एकार्णवके जलमें आ गये, फिर तो उन्होंने अपने-आपको सब ओरसे अन्धकार-से आच्छन्न देखा ॥ १७ ॥

तस्योत्पन्नं भयं तीव्रं संशयश्चात्मजीविते ।
देवदर्शनसंहृष्टो विस्मयं चागमत् परम् ॥ १८ ॥

अब उनके मनमें बड़ा भारी भय हुआ। अपने जीवनके लिये भी संशय उत्पन्न हो गया, परंतु भगवान्के दर्शनसे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। वे बड़े विस्मयमें पड़ गये थे ॥ १८ ॥