विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
भ विषयपर्व ] दशमोऽध्यायः ७७१
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! आत्मस्वरूपको प्रकाशित करनेवाले तपसे सम्पन्न, सर्वसमर्थ, रजोगुणरहित महातेजस्वी, महाबाहु, अविनाशी, भगवान् नारायण हरिने इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के एकार्णवमय हो जानेपर सम्पूर्ण जलको आच्छादित करके उसमें शयन किया। ये वे ही भगवान् हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुष अविनाशी ब्रह्मके रूपमें जानते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालका आश्रय लेकर वहाँ सोये थे ॥ १-३ ॥
पुरुषो यज्ञ इत्येवं यत्परं परिकीर्तितम् ।
यच्चान्यत् पुरुषाख्यं स्यात्सर्वं तत्पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥
जिस परम तत्त्वको यज्ञपुरुषके नामसे कहा गया है तथा पुरुष नामसे प्रसिद्ध जो अन्य वस्तुएँ हैं, वे सब पुरुषोत्तम श्रीहरि ही हैं ॥ ४ ॥
ये च यज्ञपरा विप्रा ऋत्विजा इति संज्ञिताः ।
आत्मदेहात् पुरा भूता यज्ञेभ्यः श्रूयतां तदा ॥ ५ ॥
यज्ञमें तत्पर रहनेवाले जो ब्राह्मण ऋत्विज् कहलाते हैं, वे उन्हीं परमात्मा श्रीहरिके श्रीविग्रहसे पूर्वकालमें प्रकट हुए थे। उस समय उन्होंने उनको किस तरह प्रकट किया, यह बताता हूँ; सुनो ॥ ५ ॥
ब्रह्माणं परमं वक्त्रादुद्गातारं च सामगम् ।
होतारमथ चाध्वर्युं बाहुभ्यामसृजत् प्रभुः ॥ ६ ॥
उन भगवान्ने सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा और सामगान करनेवाले उद्गाताको अपने मुखसे उत्पन्न किया, होता और अध्वर्युकी सृष्टि अपनी दोनों भुजाओंसे की ॥ ६ ॥
ब्राह्मणो ब्राह्मणाच्छांसं सम्प्रस्तारं च सर्वशः ।
तन्मित्रं वरुणं सृष्ट्वा प्रतिष्ठातारमेव च ॥ ७ ॥
वेदाध्ययन करनेके कारण ब्राह्मणाच्छांसी नामवाला ब्राह्मण उन्हींसे प्रकट हुआ। उन्होंने प्रस्तोता और मैत्रावरुण नामक प्रशास्ताकी सृष्टि करके प्रतिप्रस्थाताको उत्पन्न किया ॥
उदरात् प्रतिहर्त्तारं पोतारं चैव भारत ।
अच्छावाकं मनोरूभ्यां नेष्टारं चैव भारत ॥ ८ ॥
भारत ! उन्हीं भगवान्ने उदरसे प्रतिहर्त्ता और पोताकी सृष्टि की। भरतनन्दन ! उन्होंने मन और ऊरुसे अच्छावाक् और नेष्टाको उत्पन्न किया ॥ ८ ॥
पाणिभ्यामथ चाग्नीध्रं सुब्रह्मण्यं च यज्ञियम् ।
ग्रावाणमथ बाहुभ्यामुन्नेतारं च यज्ञियम् ॥ ९ ॥
दोनों हाथोंसे अग्नीध्र और यज्ञसम्बन्धी सुब्रह्मण्यको उत्पन्न किया। भुजाओंसे ग्रावस्तोता और यज्ञसम्बन्धी उन्नेता-की सृष्टि की ॥ ९ ॥
एवमेवैष भगवान् षोडशैताञ्जगत्पतिः ।
प्रवक्तॄन् सर्वयज्ञानामृत्विजोऽसृजदुत्तमान् ॥ १० ॥
इस प्रकार इन जगदीश्वर भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण यज्ञकर्मोंका उपदेश देनेवाले सोलह उत्तम ऋत्विजोंकी सृष्टि की ॥ १० ॥
तदेष वै वेदमयः पुरुषो यज्ञसम्मितः ।
वेदाश्च तन्मयाः सर्वे साङ्गोपनिषदक्रियाः ॥ ११ ॥
ये ही वेदमय और यज्ञसम्मित पुरुष हैं। छहों अङ्गों, उपनिषदों और कर्मकाण्डसहित सम्पूर्ण वेद भी इन्हींके स्वरूप हैं ॥ ११ ॥
स्वपितेकार्णवे चैव यदाश्चर्यमभूत्तदा ।
श्रूयते तद् यथावृत्तं मार्कण्डेयो यदन्वभूत् ॥ १२ ॥
जब वे एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय जो आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, उसे मुनिवर मार्कण्डेय-जीने ठीक-ठीक अनुभव किया था—ऐसा सुना जाता है ॥
जीर्णो भगवतस्तस्य कुक्षावेव महामुनिः ।
बहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव वरतेजसा ॥ १३ ॥
महामुनि मार्कण्डेय उन भगवान् श्रीहरिके उदरमें ही जवानसे बूढ़े हो गये थे। उन भगवान्के ही उत्तम तेजसे मार्कण्डेयजीको अनेक सहस्र वर्षोंकी आयु प्राप्त हुई थी ॥
इति तीर्थप्रसङ्गेन पृथिवीतार्थगोचरः ।
आश्रमानपि पुण्यांश्च तीर्थान्यायतनानि च ॥ १४ ॥
देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च ।
जपहोमरतः क्षान्तस्तपो घोरं समाश्रितः ॥ १५ ॥
इस तरह वे तीर्थयात्राके प्रसंगसे भगवान्के उदरमें ही भूमण्डलके तीर्थोंमें विचरते रहे। उन्होंने वहाँ पवित्र आश्रमों, तीर्थों, देवालयों, देशों, विचित्र राष्ट्रों और नाना प्रकारके नगरोंका दर्शन किया। तत्पश्चात् वे घोर तपस्याका आश्रय ले जप और होममें संलग्न होकर अत्यन्त दुर्बल हो गये ॥
मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनैर्वक्त्राद् विनिःसृतः ।
निष्क्रामन्तं न चात्मानं जानीते देवमायया ॥ १६ ॥
इसके बाद एक दिन मार्कण्डेयजी धीरे-से भगवान्के मुखसे बाहर निकल आये। देवमायासे मोहित होकर वे अपना निकलना नहीं जान सके ॥ १६ ॥
निष्क्रान्तस्तस्य वदनादेकार्णवमथो गतः ।
सर्वतस्तमसाच्छन्नं मार्कण्डेयो निरीक्षते ॥ १७ ॥
भगवान्के मुखसे निकलकर मार्कण्डेयजी एकार्णवके जलमें आ गये, फिर तो उन्होंने अपने-आपको सब ओरसे अन्धकार-से आच्छन्न देखा ॥ १७ ॥
तस्योत्पन्नं भयं तीव्रं संशयश्चात्मजीविते ।
देवदर्शनसंहृष्टो विस्मयं चागमत् परम् ॥ १८ ॥
अब उनके मनमें बड़ा भारी भय हुआ। अपने जीवनके लिये भी संशय उत्पन्न हो गया, परंतु भगवान्के दर्शनसे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। वे बड़े विस्मयमें पड़ गये थे ॥ १८ ॥
७७२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
संचिन्तयति मध्यस्थो मार्कण्डेयोऽतिशङ्कितः ।
किंस्विन्नुवेदिदं चिन्ता मोहः स्वप्नोऽनुभूयते ॥ १९ ॥
वे मार्कण्डेय मुनि अत्यन्त शङ्कित हो मध्यस्थकी भाँति इस प्रकार विचार करने लगे—'मेरी यह चिन्ता क्या है ? मुझे मोह हो गया है या स्वप्नका अनुभव हो रहा है ? ॥ १९ ॥
व्यक्तमन्यतमो भावो ह्येतेषां भविता मम ।
न हीदृशमसंदिष्टमयुक्तं सत्यमर्हति ॥ २० ॥
'निश्चय ही मेरा यह भाव चिन्ता, मोह और स्वप्नमेंसे ही कोई हो सकता है; क्योंकि ऐसी असम्बद्ध और अयुक्त बात कभी सत्य नहीं हो सकती ॥ २० ॥
नष्टचन्द्रार्कपवने छन्नपर्वतभूतले ।
कतमः स्यादयं लोक इति चिन्ताव्यवस्थितः ॥ २१ ॥
'जहाँ चन्द्रमा, सूर्य और वायुका दर्शन नहीं होता, पर्वत और भूतल आच्छन्न हो गये हैं, ऐसा यह कौन-सा लोक है?' इसी चिन्तामें डूबे हुए मार्कण्डेयजी खड़े रहे ॥ २१ ॥
अपश्यच्चापि पुरुषं शयानं पर्वतोपमम् ।
तोयाढ्यमिव जीमूतं मध्ये मग्नं महार्णवे ॥ २२ ॥
वहाँ उन्होंने महासागरके मध्यमें मग्न होकर सोये हुए एक पर्वताकार पुरुषको भी देखा, जो सजल जलधरके समान जान पड़ता था ॥ २२ ॥
तपन्तमिव तेजोभीर्भासन्तंमिव वर्चसा ।
जाग्रन्तमिव गाम्भीर्यादुच्छ्वसन्तमिव पन्नगम् ॥ २३ ॥
वह पुरुष अपने तेजसे तप-सा रहा था । अपनी दीप्तिसे उद्भासित-सा होता था । गम्भीरताके कारण जागता-सा जान पड़ता था और सर्पके समान उच्छ्वास ले रहा था ॥ २३ ॥
स देवं प्रष्टुमायाति को भवानिति विस्मयात् ।
तथैव च शनैर्भूयो मुनिः कुक्षिं प्रवेशितः ॥ २४ ॥
वे मुनि आश्चर्यसे चकित होकर ज्यों ही भगवान्के पास यह पूछनेके लिये आये कि आप कौन हैं ? त्यों ही फिर धीरेसे भगवान्के उदरमें पहुँचा दिये गये ॥ २४ ॥
स प्रविष्टः पुनः कुक्षौ मार्कण्डेयः सुनिभ्रितः ।
तथैव चरते भूयो विजानन् स्वप्नदर्शनम् ॥ २५ ॥
पुनः उनकी कुक्षिमें प्रवेश करनेपर मार्कण्डेयजी सुस्थिर हुए । वे एकार्णवकी घटनाको स्वप्नदर्शन समझते हुए फिर इधर-उधर विचरने लगे ॥ २५ ॥
स तथैव यथापूर्वं पृथिवीमटते पुनः ।
पुण्यतीर्थानि पूतानि निरैक्षद् दिवि भूतले ॥ २६ ॥
वे पहलेकी ही भाँति पृथिवीपर घूमने और भूतल तथा स्वर्गके पवित्र पुण्यतीर्थोंका दर्शन करने लगे ॥ २६ ॥
ऋतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणैः ।
पश्यते देवकुक्षिस्थान् यज्ञियाञ्छतशो द्विजान् ॥ २७ ॥
उन्होंने भगवान्के उदरमें स्थित हुए सैकड़ों यज्ञ-सम्बन्धी ब्राह्मणों और उत्तम दक्षिणाके साथ समाप्त होनेवाले यज्ञोंके अनुष्ठानमें लगे हुए यजमानोंको देखा ॥ २७ ॥
सद्वृत्तमाश्रिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः ।
चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग् यथोद्दिष्टपदानुगाः ॥ २८ ॥
ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंके लोग सदाचारका पालन करते थे । ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रम उत्तम रीतिसे शास्त्रोक्त मर्यादाका अनुसरण करते थे ॥ २८ ॥
वर्षाणां शतसाहस्रं मार्कण्डेयो महामुनिः ।
विचरन् पृथिवीं कृत्स्नां न च कुक्ष्यन्तमैक्षत ॥ २९ ॥
महामुनि मार्कण्डेय एक लाख वर्षोंतक सारी पृथ्वीपर विचरते रहे, परंतु कहीं भी उन्हें भगवान्के उदरका अन्त नहीं दिखायी दिया ॥ २९ ॥
ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद् विनिःसृतः ।
सुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरीक्षते ॥ ३० ॥
यथा चैकार्णवजले नीहारेण वृतान्तरे ।
अव्यक्तभीषणे लोके सर्वभूतविवर्जिते ॥ ३१ ॥
तदनन्तर किसी दिन वे फिर भगवान्के मुखसे बाहर निकल गये । वहाँ अव्यक्त एवं भीषण जगत्में जहाँ समस्त प्राणियोंका अभाव था, उन्होंने एकार्णवके जलमें, जिसका भीतरी भाग कुहरेसे घिरा हुआ था, वरगदकी शाखापर एक बालकको सोते देखा ॥ ३०-३१ ॥
स भूयो विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः ।
बालमादित्यसंकाशं न शक्नोत्युपसर्पितुम् ॥ ३२ ॥
फिर वे आश्चर्यचकित और कौतूहलयुक्त होकर खड़े रह गये । उस सूर्यके समान तेजस्वी बालकके पास न जा सके ॥ ३२ ॥
सोऽचिन्तयदथैकान्ते स्थित्वा सलिलसंनिधौ ।
पूर्वदृष्टमिदं नेति शङ्कितो देवमायया ॥ ३३ ॥
उन्होंने जलके समीप एकान्तमें खड़े होकर सोचा कि—मैंने पहले कभी ऐसा आश्चर्य नहीं देखा था; यह विचार आते ही वे देवमायाके प्रभावसे शङ्कित हो गये ॥ ३३ ॥
अगाधे सलिलस्तम्भे मार्कण्डेयः प्लवन् मुनिः ।
न शान्तिं लभते तत्र श्रमात् संत्रस्तविक्लवः ॥ ३४ ॥
अगाध एवं सुस्थिर जलवाले एकार्णवमें तैरते हुए मार्कण्डेय मुनि श्रमसे भयभीत हो रहे थे, उन्हें वहाँ तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३४ ॥
तथैव भगवान् हंसो गतो योगेन बालताम् ।
बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः ॥ ३५ ॥
इतनेहीमें योगसे बालकरूप हुए हंसस्वरूप भगवान् पुरुषोत्तमने मेघके समान गम्भीर स्वरमें कहा ॥ ३५ ॥
भविष्यपर्व ] दशमोऽध्यायः [ ७७३
श्रीभगवानुवाच
मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि चान्तिकम् ।
मार्कण्डेय मुने धीर बालस्त्वं श्रमपीडितः ॥ ३६ ॥
श्रीभगवान् बोले— बेटा ! डरो मत ! डरनेकी आवश्यकता नहीं है; यहीं मेरे निकट चले आओ ! धीर मुनि मार्कण्डेय ! तुम बालक हो, अतः श्रमसे पीड़ित हो रहे हो ॥ ३६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
को मां नाम्ना कीर्तयंते तपः परिभवन् मम ।
बहुवर्षसहस्रायुर्घर्षयंश्चैव मे वयः ॥ ३७ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा— कौन मेरी तपस्या तथा अनेक सहस्र वर्षोंकी आयुवाली अवस्थाका तिरस्कार करता हुआ मुझे नाम लेकर पुकार रहा है ॥ ३७ ॥
न ह्येष समुदाचारो देवेष्वपि समाहितः ।
मां ब्रह्मापि स विश्वेशो दीर्घायुरिति भाषते ॥ ३८ ॥
देवताओंके यहाँ भी यह आचार प्रचलित नहीं है, साक्षात् लोकनाथ ब्रह्माजी भी मुझे दीर्घायु कहते हैं (मेरा नाम नहीं लेते हैं) ॥ ३८ ॥
कस्तपो घोरशिरसो ममाद्य त्यक्तजीवितः ।
मार्कण्डेयेति मां प्रोक्त्वा मृत्युमीक्षितुमिच्छति ॥ ३९ ॥
किसने अपने जीवनका मोह त्याग दिया है, जो आज मुझ घोरशिराके तपका तिरस्कार करता हुआ मुझे मार्कण्डेय कहकर अपनी मौत देखना चाहता है ॥ ३९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाभाषते क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः ।
अथैनं भगवान् भूयो बभाषे तत्परायणम् ॥ ४० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जब महामुनि मार्कण्डेय क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोल रहे थे, उस समय भगवान्ने पुनः अपने शरणागत भक्त इन महर्षिसे यों कहा ॥ ४० ॥
श्रीभगवानुवाच
अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः ।
आयुःप्रदाता पौराणः किमर्थं नोपसर्पसि ॥ ४१ ॥
श्रीभगवान् बोले— वत्स ! मैं तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हृषीकेश हूँ । तुम्हें दीर्घायु प्रदान करनेवाला पुरातन पुरुष मैं ही हूँ । तुम मेरे पास क्यों नहीं आते हो ॥ ४१ ॥
मां पुत्रकामः प्रथमं पिता ते ह्यङ्गिरा मुनिः ।
पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रमुपाश्रितः ॥ ४२ ॥
पूर्वकालमें पुत्रकी इच्छावाले तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने तीव्र तपस्याका आश्रय लेकर सर्वप्रथम मेरी ही आराधना की थी ॥ ४२ ॥
ततस्त्यां घोरशिरसं दहनोपमतेजसम् ।
दत्तवानहमात्मेष्टं महर्षिममितायुषम् ॥ ४३ ॥
तब मैंने अग्नि-तुल्य तेजस्वी अपरिमित आयुवाले, अपने परम प्रिय, महर्षि तुझ घोरशिराको उन्हें पुत्ररूपमें प्रदान किया ॥ ४३ ॥
तन्न नोत्सहते चान्यो यो न भूतो ममात्मकः ।
द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगधर्मिणम् ॥ ४४ ॥
ऐसी स्थितिमें जो मुझसे अभिन्न नहीं हुआ है, वह दूसरा कोई भूत अचेतन होनेके कारण एकार्णवमें रहकर क्रीड़ा करनेवाले मुझ योगधर्मी परमात्माका दर्शन करनेका साहस नहीं कर सकता ॥ ४४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रसन्नवदनो विस्मयोत्फुल्लोचनः ।
मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः ॥ ४५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयके मुखपर प्रसन्नता छा गयी, उनके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे, उन्होंने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़ लिये ॥ ४५ ॥
नामगोत्रं ततः श्रुत्वा दीर्घायुर्लोकपूजितः ।
अथाकरोन्नमस्कारं प्रणतः शिरसा प्रभुम् ॥ ४६ ॥
उन लोकपूजित दीर्घायु महर्षिने भगवान्के मुखसे अपने नाम और गोत्रको सुनकर उनके चरणोंमें सिर झुका दिया और प्रणतभावसे नमस्कार किया ॥ ४६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
इच्छेऽहं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ ।
यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान् ॥ ४७ ॥
मार्कण्डेय बोले— अनघ ! आप इस एकार्णवके मध्यमें जो बालकरूप धारण करके शयन कर रहे हैं, आपकी इस मायाको मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ ॥ ४७ ॥
किंसंज्ञः कश्च भगवाँल्लोके विज्ञायसेऽनघ ।
तर्कये त्वां महाभूतं न भूतमिह तिष्ठति ॥ ४८ ॥
निष्पाप परमेश्वर ! सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश और श्रीसे सम्पन्न आप कौन हैं ? और किस नामसे लोकमें जाने जाते हैं ? मैं अनुमान करता हूँ कि आप कोई महान् भूत हैं, क्योंकि कोई साधारण भूत यहाँ नहीं ठहर सकता ॥ ४८ ॥
श्रीभगवानुवाच
अहं नारायणो ब्रह्मा सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।
सर्वभूतोद्भवकरः सर्वभूतविनाशनः ॥ ४९ ॥
७७४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे
श्रीभगवान् बोले—मुने ! मैं नारायण, समस्त देहधारियोंकी उत्पत्तिका कारणभूत ब्रह्मा, सम्पूर्ण भूतोंका उद्भव करनेवाला तथा समस्त भूतोंका संहार करनेमें समर्थ (रुद्र) हूँ ॥ ४९ ॥
अहमैन्द्रे पदे शक्र ऋतूनामपि वत्सरः।
अहं युगे युगाक्षश्च युगस्यावर्त एव च ॥ ५० ॥
मैं ही शक्र नामसे प्रसिद्ध होकर इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुआ हूँ। मैं ही ऋतुओंका स्वामी संवत्सर हूँ। मैं ही प्रत्येक युगमें युगाक्ष और युगावर्त कहलाता हूँ ॥ ५० ॥
अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि च।
भुजगानामहं शेषस्तार्क्ष्योऽहं सर्वपक्षिणाम् ॥ ५१ ॥
मैं ही सम्पूर्ण प्राणी और समस्त देवता, सर्पोंमें शेष तथा सारे पक्षियोंमें गरुड़ भी मैं ही हूँ ॥ ५१ ॥
अहं सहस्रशीर्षा द्यौर्यः पादैरभिसंवृतः।
आदित्यो यज्ञपुरुषो देवो यज्ञमयो मखः।
अहमग्निर्हव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः ॥ ५२ ॥
मैं सहस्रों मस्तकोंसे युक्त विराट् पुरुष हूँ। मैं ही वह आकाश या स्वर्ग हूँ, जो मेरे चरणचिह्नोंसे व्याप्त है। मैं ही सूर्यदेव, यज्ञपुरुष तथा तपोयज्ञ, योगयज्ञ आदि अनेक प्रकारके यज्ञोंसे सम्पन्न होनेवाला मख (महायज्ञ) भी मैं ही हूँ। मैं ही देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाला अग्निदेव हूँ। जल-जन्तुओंका पालक अविनाशी वरुण भी मैं ही हूँ ॥ ५२ ॥
यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्।
बहुजन्मनिरुद्धात्मा ब्राह्मणो यतिरुच्यते ॥ ५३ ॥
भूमण्डलमें स्वधर्मानुष्ठानरूप तपसे विशुद्ध अन्तःकरण-वाले पुरुषोंमेंसे जो अनेक जन्मोंतक चित्तवृत्तियोंका निरोध-रूप योग साधनेवाला ब्रह्मवेत्ता संन्यासी है, वह जिस ब्रह्म-का स्वरूप बताया जाता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ ॥ ५३ ॥
ज्ञानवान् दृष्टविश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः।
कृतान्तः सर्वभूतानां विक्षेपां कालसंज्ञितः ॥ ५४ ॥
जिसने विश्वात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वह ज्ञानी मैं ही हूँ। मैं ही योगियोंमें परम योगवेत्ता हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंका अन्त करनेवाला कृतान्त एवं समस्त लोकोंका काल हूँ ॥ ५४ ॥
अहं कर्म क्रिया जीवः सर्वेषां धर्मदर्शनः।
निष्क्रियः सर्वभूतेषु स्वात्मज्योतिः सनातनः ॥ ५५ ॥
मैं ही कर्म, क्रिया, जीव और सबको धर्मके स्वरूप या फलका दर्शन करानेवाला हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित, निष्क्रिय (साक्षी) आत्मज्योतिसे प्रकाशित सनातन परमात्मा हूँ ॥ ५५ ॥
प्रधानं पुरुषो देवोऽहमाद्यस्त्वक्षयोऽव्ययः।
अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम् ॥ ५६ ॥
मैं ही प्रकृति, पुरुष और देवता हूँ। मैं ही सबका आदिकारण, अक्षय एवं अव्यय परमेश्वर हूँ। मैं ही सम्पूर्ण आश्रमोंमें निवास करनेवाले पुरुषोंका धर्म और तप हूँ ॥ ५६ ॥
अहं हयशिरो देवः क्षीरोदे यो महार्णवे।
ऋतं सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः ॥ ५७ ॥
मैं ही भगवान् हयग्रीव हूँ। जिन्होंने महान् क्षीरसागरमें प्रकट हो वेदोंकी रक्षा की थी। ऋत और परम सत्य भी मैं ही हूँ। एकमात्र मैं ही प्रजापति हूँ ॥ ५७ ॥
अहं सांख्यमहं योगमहं तत्परमं पदम्।
अहमिज्यो भवश्चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः ॥ ५८ ॥
मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही परमपद हूँ। मैं ही पूजनीय, मैं ही भव (शिव) और मैं ही विद्याओंका अधिपति हूँ ॥ ५८ ॥
अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।
अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश।
अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः ॥ ५९ ॥
मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही भूमि और मैं ही आकाश हूँ। जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ भी मैं ही हूँ। मैं ही वर्षा, मैं ही सोम, मैं ही मेघ और मैं ही सूर्य हूँ ॥ ५९ ॥
क्षीरोदः सागरश्चाहं समुद्रो वडवामुखः।
वह्निः संवर्तको भूत्वा पिवंस्तोयमयं हविः ॥ ६० ॥
मैं ही क्षीरसागर समुद्र और बड़वामुख अग्नि हूँ। मैं ही संवर्तक अग्नि होकर जगत्के जलरूपी हविष्यको पी लेता हूँ ॥ ६० ॥
अहं पुराणं परमं तथैवेह परायणम्।
अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः ॥ ६१ ॥
मैं ही परम पुरातन ब्रह्म हूँ। मैं ही यहाँ सबका परम आश्रय हूँ। मैं ही भूत, भविष्य और वर्तमान जगत्की उत्पत्तिका कारण हूँ ॥ ६१ ॥
यत्किञ्चित् पश्यसे चैव यच्छृणोषि च किंचन।
यच्चानुभवसे लोके तत् सर्वं मामकं स्मृतम् ॥ ६२ ॥
तुम इस लोकमें जो कुछ देखते, जो कुछ सुनते और जो कुछ अनुभव करते हो, वह सब मेरा ही स्वरूप माना गया है ॥ ६२ ॥
विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृजेयं चाद्य पश्य माम्।
युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत् ॥ ६३ ॥
पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और आज भी
भविष्यपर्व ] एकादशोऽध्यायः ७७५
मैं ही सृष्टि करूँगा। तुम मुझे देखो। मार्कण्डेय ! प्रत्येक युग (कल्प) में सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि मैं ही करूँगा ॥
तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय ।
शुश्रूषुर्मम धर्मेप्सुः कुक्षौ चर सुखी भव ॥ ६४ ॥
मार्कण्डेय ! यह सारा जगत् सम्पूर्णरूपसे मेरा ही स्वरूप है—ऐसा समझो । अब तुम धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर मेरे धर्मकी प्राप्तिके लिये उत्सुक हो मेरे उदरमें विचरण करो और सुखी हो जाओ ॥ ६४ ॥
मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवाश्च ऋषिभिः सह ।
व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छापराजितम् ॥ ६५ ॥
ब्रह्माजी मेरे ही शरीरमें स्थित हैं। ऋषियोंसहित देवता भी मेरी देहमें ही हैं। तुम मुझे व्यक्त जगत्स्वरूप, अव्यक्त योगरूप परमात्मा तथा किसीसे भी पराजित न होनेवाला विष्णु समझो ॥ ६५ ॥
अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव सर्वशः ।
त्रिपदश्चैव परस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ॥ ६६ ॥
मैं एकाक्षर मन्त्र अकार, त्र्यक्षर मन्त्र प्रणव तथा त्रिपद मन्त्र गायत्री हूँ। तथा मैं ही धर्म, अर्थ एवं कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्ति करानेवाला (और मोक्षकी भी) प्राप्ति करानेवाला परमात्मा हूँ ॥ ६६ ॥
वक्त्रे व्याहृतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम् ।
प्रवेशयामास ततो जठरं विश्वरूपधृक् ॥ ६७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार महामुनि व्यासने इस वेदान्तप्रसिद्ध परमतत्त्वका पुराणोंमें वर्णन किया है । विश्वरूपधारी भगवान् बालमुकुन्दने महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें डालनेके लिये उन्हें शीघ्र ही अपने पास बुलाया और उन्हें अपने उदरमें घुसा दिया ॥ ६७ ॥
ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः ।
रराम सुखमासाद्य शुश्रूषुर्हंसमव्ययम् ॥ ६८ ॥
तत्पश्चात् भगवान्के उदरमें प्रविष्ट हुए मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय हंसस्वरूप अविनाशी परमात्माकी आराधनाके लिये उत्सुक हो सुखपूर्वक विचरने लगे ॥ ६८ ॥
तदक्षरं विविधमथाश्रितो वपु-
र्महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे ।
शनैश्चरन्प्रभुरपि हंससंज्ञितो-
ऽसृजज्जगद्विसृजति कालपर्यये ॥ ६९ ॥
चन्द्रमा और सूर्यसे रहित उस एकार्णवमें अनेक प्रकारके स्वरूपका आश्रय लेनेवाले हंस-नामधारी भगवान्, जो अक्षरब्रह्मरूप हैं, धीरे-धीरे विचरने लगे । फिर सृष्टिकाल आनेपर उन्होंने ही जगत्की सृष्टि की तथा सदा ही विविध भौतिक वस्तुओंकी वे सृष्टि करते रहते हैं ॥ ६९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमेतत् पुराणेषु वेदान्ते च महामुनिः ।
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे मार्कण्डेयकर्तृकभगवद्दर्शने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें मार्कण्डेयजीको भगवान्का दर्शनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
परमात्माके द्वारा भूतोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीको प्रकट करनेके लिये उनकी नाभिसे एक महान् पद्मका प्रादुर्भाव
वैशम्पायन उवाच
आपवः स विभुर्भूत्वा कारयामास वै तपः ।
छादयित्वाऽऽत्मनो देहमात्मना कुम्भसम्भवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वे हंससंज्ञक परमात्मा कुम्भयोनि ब्रह्मर्षि वसिष्ठ होकर अपनी कुम्भजनित देहको अपने आत्मा (समष्टिके अभिमानी चेतन) से आच्छादित करके तपस्या करने लगे ॥ १ ॥
ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने ।
महतां पञ्चभूतानां विश्वभूतो व्यचिन्तयत् ॥ २ ॥
उस समय उन अत्यन्त शक्तिशाली विश्वरूप महात्माने भौतिक जगत् तथा उसके उपादानभूत पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टिका विचार किया ॥ २ ॥
तस्य चिन्तयतस्तत्र तपसा भावितात्मनः ।
निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे ॥ ३ ॥
ईषत्संक्षोभयामास सोऽर्णवं सलिले स्थितः ।
सोऽनन्तरोर्मिणा सूक्ष्ममथ च्छिद्रमभूत्तदा ॥ ४ ॥
आकाशरहित जलस्वरूप सूक्ष्म गुफामें जगत्के लीन हो जानेपर वहाँ उस समय तपस्यासे भावित अन्तःकरणवाले वे परमेश्वर जब इस प्रकार चिन्तन कर रहे थे, तब सलिल-राशिमें स्थित हुए उन्होंने उस एकार्णवमें कुछ क्षोभ (हलचल) उत्पन्न कर दिया । तदनन्तर उनके मनमें जो सृष्टि-विषयक संकल्पकी दूसरी तरंग उठी, उससे उस जलमें सूक्ष्म छिद्र (आकाश या अवकाश) प्रकट हो गया ३-४
तत्र शब्दगतिर्भूत्वा मारुतद्रवसम्भवः ।
स लब्ध्वाऽऽन्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः ॥ ५ ॥
| ७७६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तदनन्तर जो संकल्पकी पुनः तीसरी तरंग उठी, उससे उस आकाशमें शब्दकी गति हुई अर्थात् वे ईश्वर ही वहाँ शब्दरूपसे गतिशील हुए। उनके इस प्रकार गतिशील होनेमें वायुका वेग ही कारण था। यदि कहें उस समय वहाँ वायु कहाँ थी तो इसका उत्तर सुनो—वे ईश्वर वह छिद्र या अवकाश पाते ही अक्षोभ्य होकर भी स्वयं वायुरूपमें प्रकट हो वहाँ बढ़ने लगे (तात्पर्य यह है कि आकाशके अनन्तर उत्पन्न हुई वायु शब्द और गतिकी अभिव्यक्तिमें कारण हुई) ॥ ५ ॥
विवर्धता बलवता तेन संक्षोभितोऽर्णवः। अन्योन्यवेगाभिहता ममन्थुश्चोर्मयो भृशम् ॥ ६ ॥
उस बढ़ती हुई प्रबल वायुसे वह एकार्णवका जल सब ओरसे क्षुब्ध हो उठा। उसमें बहुत-सी तरंगें उठकर परस्पर वेगसे टकराती हुई उस महासागरको मथने लगीं ॥ ६ ॥
महार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन् नम्भसि मध्यति। कृष्णवर्त्मा समभवत् प्रभुर्वैश्वानरोऽर्चिमान् ॥ ७ ॥
उस क्षुब्ध महासागरका जल जब इस प्रकार मथा जाने लगा, तब उससे ज्वालामालाओंसे युक्त शक्तिशाली कृष्णवर्त्मा अग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ७ ॥
तत्र संशोषयामास पावकः सलिलं बहु। क्षयाज्जलनिधेश्छिद्रमभवन्निःसृतं नभः ॥ ८ ॥
उस अग्निने वहाँ फैली हुई अगाध जलराशिको सोख लिया। उस जलराशिके क्षीण हो जानेसे वहाँका स्थान खाली हो गया और आकाश निकल आया ॥ ८ ॥
आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः। आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः ॥ ९ ॥
अमृतरसके समान मधुर एवं पवित्र जल परमात्माके तेजसे प्रकट हुआ है। उस जलमें जो छिद्र प्रकट हुआ, उससे आकाशका आविर्भाव हुआ और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥
आज्यसंघर्षणोद्भूतं पावकं चाज्यसम्भवम्। दृष्ट्वा प्रीतियुतो देवो महाभूतादिभावनः ॥ १० ॥
घीके समान द्रवस्वरूप जो जल है, उसके पारस्परिक संघर्षसे पृथ्वीका प्रादुर्भाव हुआ। उस पृथ्वी या पार्थिव शरीरमें जठरानलका प्राकट्य हुआ, जो परम्परया जलसे ही उत्पन्न है। उसे देखकर महाभूतोंके आदिकारण परमात्मदेव बहुत प्रसन्न हुए ॥ १० ॥
दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थतत्त्ववित्। ब्रह्मणो जन्म स हितं बहुरूपो विचिन्वति ॥ ११ ॥
लोकसृष्टिके प्रयोजन और तत्त्वको जाननेवाले अनेक रूपधारी वे भगवान् प्रत्येक कल्पमें इस प्रकार भूतोंका प्राकट्य देखकर सृष्टि-विस्तारके लिये हितकर ब्रह्माजीके जन्मका चिन्तन करते हैं (अर्थात् मानसिक संकल्पसे ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं) ॥ ११ ॥
चतुर्युगादिसंख्यान्ते सहस्रयुगपर्यये। यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥ बहुजन्मनिरुद्धात्मा ब्राह्मणो यतिरुत्तमः। ज्ञानवान् दृष्टविश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः ॥ १३ ॥
एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है (और इसी दिनसे वे सौ वर्षोंतक जीवित रहते हैं)। वे ब्रह्मा पूर्वकल्पमें इस पृथ्वीपर तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले द्विजराजोंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मके उपासक, यत्नशील, अनेक जन्मोंतक चित्त-वृत्तियोंका निरोध करनेवाले, ज्ञानवान्, विश्वात्माका साक्षात्कार करनेवाले और योगियोंमें सर्वश्रेष्ठ योगवेत्ता रहे होते हैं ॥ १२-१३ ॥
तं योगवन्तं विश्वेशं सम्पूर्णैश्वर्यविक्रमम्। देवो ब्रह्मणि विश्वे च नियोजयति योगवित् ॥ १४ ॥
योगवेत्ता विश्वेश्वरदेव उन योगवान्, सबके लिये उपास्य तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य और विक्रमसे सम्पन्न ब्रह्माजीको वेद और जगत्की परम्परा बनाये रखनेके कार्यमें नियुक्त करते हैं॥
ततस्तस्मिन् महातोये हविषो हरिरच्युतः। स्वपन् क्रीडंश्च विविधं मोदते चैष पावकिः ॥ १५ ॥
ब्रह्माजीको नियुक्त करनेके अनन्तर भगवान् श्रीहरि अपने स्वरूपभूत उस महान् जलमें अच्युतरूपसे स्थित होते हैं और ये नियुक्त हुए तैजस ब्रह्मा प्राणियोंके कर्मवश उनके कर्मोंसे उपरत होनेपर सोते तथा सबके कर्मोंके उद्भव होनेपर नाना प्रकारसे क्रीडाएँ करते हुए आनन्दमग्न होते हैं ॥१५॥
पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा। सहस्रपत्रं विरजो भास्कराभं हिरण्मयम् ॥ १६ ॥
उस समय जब कि ब्रह्माके जन्मका समय उपस्थित हुआ था, भगवान् श्रीहरिने अपनी नाभिसे एक सहस्रदल कमल प्रकट किया, जो रजोगुण या रजसे रहित सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय था ॥ १६ ॥
हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभं सुगन्धिनं शरदमलार्कतेजसम्। विराजते कमलमुदारवर्चसं महात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम् ॥ १७ ॥
महात्मा श्रीहरिके शरीरसे प्रकट हो अत्यन्त मनोहर
भविष्यपर्व ] द्वादशोऽध्यायः [ ७७७
दिखायी देनेवाला वह अतिशय कान्तिमान्, सुगन्धित कमल बड़ी शोभा पा रहा था । वह आगकी प्रज्वलित शिखाके समान अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो रहा था । उसका तेज शरत्कालके निर्मल सूर्यकी भाँति उद्भासित होता था ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे महापद्मोत्पत्तौ एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें महापद्मकी उत्पत्तिविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः
नारायणके नाभिकमलके दलोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना
वैशम्पायन उवाच
अथ योगविदां श्रेष्ठं सर्वभूतमनोमयम् ।
स्रष्टारं सर्वभूतानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम् ॥ १ ॥
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते ।
सर्वतेजोगुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्युते ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर आपस्वरूप परमात्माने अनेक योजन विस्तृत, सम्पूर्ण तेजोगुणोंसे सम्पन्न और पार्थिव लक्षणोंसे युक्त उस हिरण्मय कमलमें योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, सम्पूर्ण भूतोंके मनमें स्थित, सब ओर मुखवाले तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा ब्रह्माजीको स्थापित कर दिया ॥ १-२ ॥
तच्च पद्मं पुराणाज्ञाः पृथिवीरुहमुत्तमम् ।
नारायणाङ्कसम्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः ॥ ३ ॥
पुराणोंके ज्ञाता महर्षिगण पृथ्वी ( शरीर ) से उत्पन्न होनेवाले उस उत्तम कमलको नारायणके अङ्गसे प्रकट हुआ बताते हैं ॥ ३ ॥
या तु पद्मासना देवी पृथिवीं तां प्रचक्षते ।
ये गर्भसाराङ्कुरस्तान् दिव्यान् पर्वतान् विदुः ॥ ४ ॥
वह पद्म जिस देवीका आसन है, उसे पृथ्वी कहते हैं तथा उस कमलके भीतरी भागमें जो पाषाणमय होनेके कारण सुदृढ़ और अङ्कुरकी भाँति ऊँचे उठे हुए भाग हैं, उन्हें दिव्य पर्वत माना गया है ॥ ४ ॥
हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च ।
कैलासं मुञ्जवन्तं च तथाद्रिं गन्धमादनम् ॥ ५ ॥
पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च ।
उदयं कन्दरं चैव विन्ध्यमस्तं च पर्वतम् ॥ ६ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—हिमवान्, मेरु, नील, निषध, कैलास, मुञ्जवान्, गन्धमादन, पवित्र त्रिकूट, कमनीय मन्दराचल, उदयाचल, कन्दराचल, विन्ध्याचल और अस्ताचल ॥ ५-६ ॥
एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम् ।
आश्रमाः पुण्यशीलानां सर्वकामयुताद्रयः ॥ ७ ॥
ये सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न पर्वत, देवताओं, सिद्धों और पुण्यशील महात्माओंके आश्रम हैं ॥ ७ ॥
एतेषामन्तरो देशो जम्बूद्वीप इति स्मृतः ।
जम्बूद्वीपस्य संख्यानं याज्ञिया यत्र चक्रिरे ॥ ८ ॥
इनके बीचका देश जम्बूद्वीप माना गया है। जहाँ याज्ञिकोंने यज्ञ किया है, उसी प्रदेशको जम्बूद्वीपकी संज्ञा या ख्याति प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥
गर्भाद् यत् स्रवते तोयं देवामृतरसोपमम् ।
दिव्यतीर्थशतापाङ्गस्तस्ता दिव्याः सरितः स्मृताः ॥ ९ ॥
उस कमलके गर्भसे जो देवताओंके अमृतरसके समान जल झरता है, उस जलको बहानेवाली दिव्य सरिताएँ मानी गयी हैं। सैकड़ों दिव्य तीर्थ उनके अपाङ्ग हैं ॥ ९ ॥
यान्येतानि तु पद्मस्य केसराणि समन्ततः ।
असंख्याताः पृथिव्यां तु विश्वे ते धातुपर्वताः ॥ १० ॥
उस पद्मके चारों ओर जो ये केसर हैं, वे ही भूमण्डलके सारे धातुपर्वत हैं, जिनकी गणना असम्भव है ॥ १० ॥
यानि पद्मस्य पत्राणि भूरीण्यूर्ध्वं नराधिप ।
ते दुर्गमाः शैलचिता म्लेच्छदेशा विकल्पिताः ॥ ११ ॥
नरेश्वर ! उस कमलके जो बहुत-से उपरी दल हैं, वे ही पर्वतोंसे भरे हुए दुर्गम म्लेच्छ देश कहे गये हैं ॥ ११ ॥
यान्यधः पद्मपत्राणि वासार्थे तानि भागशः ।
दैत्यानामुरगाणां च पातालं तन्महात्मनाम् ॥ १२ ॥
उक्त कमलके जो नीचेके पत्र हैं, वे पृथक्-पृथक् निवासके लिये चुन लिये गये हैं। उन्हींको महामना दैत्यों और सर्पोंका वासस्थान पाताल कहा गया है ॥ १२ ॥
तेषामधोगतं यत्तदुदकेत्यभिसंज्ञितम् ।
महापातकर्म्माणो मज्जन्ते यत्र मानवाः ॥ १३¹ ॥
उन पद्मपत्रोंके नीचे जो उदक नामक स्थान है, उसमें महापातकयुक्त कर्म करनेवाले मनुष्य डूबते हैं ॥ १३ ॥
¹ १. उद् उत्कृष्टं अकं दुःखं यत्र तत् उदकम् ( जहाँ उत्कृष्ट अर्थात् महान् अक-दुःख हैं, वह स्थान उदक है ) —इस व्युत्पत्तिके अनुसार नरकको ही यहाँ उदक कहा गया है ।
| ५७८ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पद्मस्यान्ते कुशं यत्तदेकार्णवजलं महत् ।
प्रोक्तास्ते दिक्षु संघाताश्चत्वारो जलसागराः ॥ १४ ॥
उस कमलके अन्तमें चारों ओर जो कुश अर्थात् जल है, वही एकार्णवकी अनन्त जलराशि है। उसके चार भाग चारों दिशाओंमें संचित हैं, जो जलके समुद्र कहे गये हैं ॥ १४ ॥
ऋषेर्नारायणस्यायं महापुष्करसम्भवः ।
प्रादुर्भावोऽप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसम्भवः ॥ १५ ॥
नारायण ऋषिकी नाभिसे यह महान् पद्मका प्राकट्य हुआ है, इसीलिये उसके इस प्रादुर्भावको पुष्करसम्भव (पुष्करप्रादुर्भाव) नामसे कहा गया है ॥ १५ ॥
एतस्मात् कारणात् तज्ज्ञैः पुराणैः परमर्षिभिः ।
यज्ञियैर्वेददृष्टार्थैर्यज्ञे पद्मचिती कृतः ॥ १६ ॥
इसी कारणसे उस पद्मको जाननेवाले पुरातन महर्षियोंने, जो यज्ञपरायण तथा वेदार्थके ज्ञाता हैं, यज्ञमें कमलके आकारका कुण्ड निर्माण किया है ॥ १६ ॥
एवं भगवता पद्मे विश्वस्य परमो विधिः ।
पर्वतानां नदीनां च देशानां च विनिर्मितः ॥ १७ ॥
इस प्रकार भगवान्ने उस कमलमें ही विश्वकी व्यावहारिक सृष्टि की है, पर्वतों, नदियों तथा विभिन्न देशोंकी भी रचना की है ॥ १७ ॥
विभुस्तथैवाप्रतिमप्रभावः
प्रभाकरो वै भगवान् महात्मा ।
स्वयं स्वयंभूः शयनेऽसृजत् तदा
जगन्मयं पद्मनिधिं महार्णवे ॥ १८ ॥
अप्रतिम प्रभावशाली, सर्वव्यापी, प्रभापुञ्ज, ऐश्वर्यसम्पन्न, महामना, स्वयम्भू भगवान् नारायणने उस महार्णवके भीतर शयन करते समय स्वयं ही उस जगन्मय पद्मनिधिकी सृष्टि की थी ॥ १८ ॥
इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सर्वभूतोत्पत्तौ द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
मधु और कैटभका ब्रह्माजीके साथ संवाद तथा भगवान् विष्णुके द्वारा वध
वैशम्पायन उवाच
चतुर्युगादिसम्भूतो सहस्रयुगपर्यये ।
विघ्नस्तमसि सम्भूतो मधुर्नाम महासुरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सहस्र युगोंकी ब्रह्माजीकी रात्रि व्यतीत होनेपर चारों युगोंमें जो आदि सत्ययुग आया, उसमें आरम्भ होनेवाली सृष्टिके कार्यमें विघ्नस्वरूप एक महान् असुर उत्पन्न हुआ, जिसका नाम मधु था। वह तमोगुणसे प्रकट हुआ था ॥ १ ॥
तस्यैव च सहायोऽन्यो भूतो रजसि कैटभः ।
तौ रजस्तमसाविष्टौ सम्भूतौ कामरूपिणौ ॥ २ ॥
उसीका सहायक एक दूसरा असुर उत्पन्न हुआ था, जो रजोगुणसे प्रकट हुआ था; उसका नाम कैटभ था। वे दोनों इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे और रजोगुण तथा तमोगुणसे आविष्ट रहते थे ॥ २ ॥
एकार्णवजलं सर्वे क्षोभयन्तौ महासुरौ ।
कृष्णरक्ताम्बरधरौ श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणौ ॥ ३ ॥
सम्पूर्ण एकार्णवके जलमें क्षोभ उत्पन्न करते हुए वे दोनों महान् असुर क्रमशः काले और लाल रंगके वस्त्र धारण करते थे। उनकी भयंकर दाढ़ें सफेद और चमकीली थीं ॥ ३ ॥
उभौ मदकटोद्दग्रौ केयूरवलयोज्ज्वलौ ।
महाविकृतताम्राक्षौ पीनोरस्कौ महाभुजौ ॥ ४ ॥
वे दोनों उत्कट मदसे उद्दण्ड हो रहे थे। बाजू-बंद और कड़े धारण करके उनकी दीप्तिसे दमक रहे थे। उनकी लाल-लाल आँखें बड़ी विकराल थीं। वक्षःस्थल मांससे भरे हुए थे और भुजाएँ लंबी थीं ॥ ४ ॥
महच्छिरःसंहननौ जङ्गमाविव पर्वतौ ।
नीलमेघाभ्रसंकाशावादित्यप्रतिमाननौ ॥ ५ ॥
उनके सिर और शरीर विशाल थे। वे दोनों दो चलते-फिरते पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे। मेघोंकी काली घटाके समान काले दिखायी देते थे। उनके मुख सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ ५ ॥
विद्युदम्भोधताम्राभ्यां कराभ्यामतिभीषणौ ।
पादसंचारवेगाभ्यामुत्क्षिपन्ताविवार्णवम् ॥ ६ ॥
बिजलीसहित मेघोंके समान ताम्रवर्णवाले दोनों हाथोंसे वे अत्यन्त भीषण दिखायी देते थे। अपने पैरोंके चलनेके वेगसे उस महासागरको उछालते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ६ ॥
कम्पयन्ताविव हरिं शयानमरिसूदनम् ।
तौ तत्र विहरन्तौ स्म पुष्करे विद्रवतोमुखम् ॥ ७ ॥
मधु-कैटभ दानवद्वारा एकार्णवमें हलचल (पृष्ठ-संख्या ७७८)
[ भविष्यपर्व ] त्रयोदशोऽध्यायः ७७९
पश्यतां दीप्तवपुषं योगिनां श्रेष्ठमुत्तमम्। नारायणसमाज्ञप्तं सृजन्तमखिलाः प्रजाः। दैवतानि च विश्वानि मानसांश्च सुतानृषीन् ॥ ८ ॥
जलमें सोते हुए शत्रुसूदन श्रीहरिको कम्पित करते हुए-से वे दोनों असुर वहाँ विचर रहे थे। उन्होंने पूर्वोक्त कमलपर सब ओर मुखवाले, तेजस्वी शरीरसे युक्त और योगियोंमें श्रेष्ठ सर्वोत्तम ब्रह्माजीको देखा, जो भगवान् नारायणकी आज्ञासे समस्त प्रजाओंकी, सम्पूर्ण देवताओंकी तथा अपने मानस पुत्र महर्षियोंकी सृष्टि कर रहे थे ॥ ७-८ ॥
ततस्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणमसुरोत्तमौ। दृप्तौ युयुत्सुकौ क्रुद्धौ रोषसंरक्तलोचनौ ॥ ९ ॥
तदनन्तर वे दोनों असुरशिरोमणि बलके घमंडमें भरकर युद्धके लिये उत्सुक हो रोषसे लाल आँखें किये वहाँ ब्रह्माजीसे क्रोधपूर्वक बोले- ॥ ९ ॥
कस्त्वं पुष्करमध्यस्थः सितोष्णीषश्चतुर्मुखः। आवामगणयन् मोहादास्से त्वं विगतज्वरः ॥ १० ॥
'अरे ! तू कौन है, जो मोहवश हम दोनोंको कुछ भी न गिनता हुआ श्वेत पगड़ी और चार मुँह धारण किये इस कमलके मध्यभागमें निश्चिन्त होकर बैठा है ? ॥ १० ॥
एह्यावयोर्बाहुयुद्धं प्रयच्छ कमलोद्भव। आवाभ्यामतिवीराभ्यां न शक्यं स्थातुमाहवे ॥ ११ ॥
'कमलोद्भव पुरुष ! आ। हमें बाहुयुद्धका अवसर दे। हम दोनों अत्यन्त वीर हैं। हमारे साथ तू युद्धमें नहीं टिक सकता है ॥ ११ ॥
कस्त्वं कश्चोद्भवस्तुभ्यं केन वासीह चोदितः। कः स्रष्टा कश्च वै गोप्ता केन नाम्नाभिधीयसे ॥ १२ ॥
'बता ! तू कौन है ? तुझे उत्पन्न करनेवाला कौन है ? किसने तुझे यहाँ सृष्टिके कार्यमें लगाया है ? तेरा स्रष्टा और संरक्षक कौन है ? तू किस नामसे पुकारा जाता है' ? ॥ १२ ॥
ब्रह्मोवाच
यः क इत्युच्यते लोके ह्यविज्ञातः सहस्रशः। तत्सम्भवं योगवन्तं किं मां नाभ्यवगच्छथः ॥ १३ ॥
ब्रह्माजीने कहा-जो लोकमें 'क' नामसे कहे जाते हैं। जिन्हें सहस्रों प्रयत्न करके भी किसीने पूर्णरूपसे नहीं जाना है। मैं उन्हीं परमात्मासे उत्पन्न और योगशक्तिसे सम्पन्न हूँ। क्या तुम दोनों मुझे नहीं जानते ? ॥ १३ ॥
मधुकैटभावूचतुः
नावयोः परमं लोके किंचिदस्ति महामते। आवाभ्यां छाद्यते विश्वं तमसा रजसा तथा ॥ १४ ॥
आच्छादित करनेवाले रजोगुण और तमोगुणसे हम दोनों प्रकट हुए हैं; अतः) हम दोनों अपने स्वरूपभूत तमोगुण और रजोगुणके द्वारा इस विश्वको आच्छादित करते हैं ॥ १४ ॥
रजस्तमोमयावावां यतीनां दुःखलक्षणौ। छलकौ धर्मशीलानां दुस्तरौ सर्वदेहिनाम् ॥ १५ ॥
हम दोनों क्रमशः रजोमय और तमोमय हैं। यत्नशील साधकोंको दुःख देना हमारा काम है। हम धर्मशील पुरुषोंको छलते हैं। हमें लाँघ जाना सभी देहधारियोंके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ १५ ॥
आवाभ्यां मुह्यते लोक उच्छ्रिताभ्यां युगे युगे। आवामर्थश्च कामश्च यशः सर्वपरिग्रहाः ॥ १६ ॥
हम प्रत्येक युगमें उन्नत हो सारे संसारको मोहमें डाल देते हैं। अर्थ, काम, यश और समस्त परिग्रह हम दोनों ही हैं ॥ १६ ॥
सुखं यत्र मुदो यत्र यत्र श्रीः सन्नतिर्नयः। एषां यत्काङ्क्षितं चैव तत्तदावां विचिन्तय ॥ १७ ॥
जहाँ सुख है, आनन्द है। जहाँ श्री, सन्नति और नय है तथा इन सबके द्वारा जो-जो अभिलषित वस्तु है, वह-वह हम दोनों ही हैं। ऐसा चिन्तन कर ॥ १७ ॥
ब्रह्मोवाच
यत् तद् योगवतां श्रेष्ठं यच्च पूर्वं मयार्चितम्। तत् समाधाय गुणवान् सत्त्वे चास्मि प्रतिष्ठितः ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले-जो योगयुक्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं और जिनकी पहले मैंने आराधना की है, उन्हीं परमात्माको हृदयमें धारण करके मैं सत्त्वमें प्रतिष्ठित हूँ। गुणवान् हूँ—सृष्टिके साधनभूत त्रिगुणात्मक वस्तुओंका मेरे पास संग्रह है ॥ १८ ॥
यत्परं योगयुक्तानामक्षरं सत्त्वमेव च। रजस्तमश्चैव यत्स्रष्टा जीवसम्भवः ॥ १९ ॥ यतो भूतानि जायन्ते सात्त्विकानीतराणि च। स एव युद्ध्वा समरे वशी वां शमयिष्यति ॥ २० ॥
जो योगियोंके परम तत्त्व हैं, अविनाशी सत्त्व हैं, रजोगुण और तमोगुणके स्रष्टा हैं तथा जीवोंकी उत्पत्तिके कारण हैं, जिनसे सात्त्विक और असात्त्विक सभी भूत उत्पन्न होते हैं, सबको वशमें रखनेवाले वे ही परमात्मा समरभूमिमें युद्ध करके तुम दोनोंको शान्त कर देंगे ॥ १९-२० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः शयानं श्रीमन्तं बहुयोजनविस्तृतम्। पद्मनाभं हृषीकेशं प्रणम्यावोचतामुभौ ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! तदनन्तर वहाँ अनेक योजन विस्तृत शरीर धारण करके सोये हुए सबकी इन्द्रियोंके प्रेरक श्रीमान् भगवान् पद्मनाभको प्रणाम करके वे दोनों मधु और कैटभ उनसे इस प्रकार बोले- ॥ २१ ॥
७८० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
जानीवस्त्वां विश्वयोनिमेकं पुरुषसत्तमम्। तवोपानहेत्वर्थमिदं नौ विद्धि कारणम्॥ २२॥ 'प्रभो! हम आपको जानते हैं, आप समस्त विश्वकी उत्पत्तिके एकमात्र स्थान और पुरुषोत्तम हैं। हम दोनोंकी जो यह सृष्टि हुई है, इसे आप अपनी उपासनाके लिये ही समझें॥ २२॥
अमोघदर्शनं सत्यं यतस्त्वां विदुरीश्वरम्। ततस्त्वामभितो देव काङ्क्षावः प्रतिवीक्षितुम्॥ २३॥ 'देव! ज्ञानी पुरुष आपका दर्शन अमोघ बताते हैं, आपको सत्यस्वरूप ईश्वर समझते हैं, इसलिये हम दोनों समीप आकर आपका दर्शन करना चाहते हैं॥ २३॥
तदिच्छावो वरं दत्तं त्वया ह्यावामरिंदम। अमोघं दर्शनं देव नमस्तेऽस्त्वजितंजय॥ २४॥ 'शत्रुदमन! हम दोनों आपके दिये हुए वरकी अभिलाषा रखते हैं। जो किसीसे भी हारा नहीं है, उसपर भी विजय पानेवाले देव! आपका दर्शन अमोघ है, आपको नमस्कार है'॥ २४॥
श्रीभगवानुवाच तानिच्छथो द्रुतं ब्रूतं वरानसुरसत्तमौ। दत्तायुषौ मया भूयस्त्वहो जीवितुमिच्छथः॥ २५॥ श्रीभगवान् बोले--असुरशिरोमणियो! जल्दी बोलो, तुम कौन-कौनसे वर लेना चाहते हो? अहो! मैंने तुम्हें जितनी आयु दी थी, उससे भी अधिक कालतक जीवित रहना चाहते हो? आश्चर्य है!॥ २५॥
तस्माद् यदेष वां यत्नस्तत् प्राप्नुतं महाबलौ। वध्यौ भवन्तौ तु स्यातां तावित्येवाग्रवीद्धरिः। उभावपि महात्ानावूर्जितौ क्षतवर्जितौ॥ २६॥ महाबली असुर इसका फल प्राप्त करो। तुम दोनों मेरे वध्य हो जाओ। इस प्रकार श्रीहरिने उन दोनोंसे कहा। तब वे दोनों आघातरहित महान् बलशाली महाकाय असुर उनसे यों बोले॥ २६॥
मधुकैटभावूचतुः यस्मिन् न कश्चिन्मृतवांस्तस्मिन् देशे विभो वधम्। इच्छावः पुत्रतां यातुं तव चैव सुराधिप॥ २७॥ मधु और कैटभने कहा-प्रभो! सुरेश्वर! जिस देशमें अबतक कोई मरा न हो, उसीमें आप हमारा वध करें, यह हम दोनोंकी इच्छा है। साथ ही हम आपका पुत्र होना चाहते हैं॥ २७॥
श्रीभगवानुवाच वाढं सुतौ मे प्रवरौ भविष्ये कल्पसम्भवे। भविष्यथो न सन्देहः सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम्॥ २८॥ श्रीभगवान् बोले-बहुत अच्छा, तुम दोनों भविष्य कल्पमें मेरे श्रेष्ठ पुत्र होओगे, इसमें संदेह नहीं है। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ॥ २८॥
वैशम्पायन उवाच वरं प्रदायाथ महासुराभ्यां सनातनॊ विश्ववरोत्तमो विभुः। रजस्तमोभ्यां भवभावनोभौ ममन्थ तावूरुतले सुरारिहा॥ २९॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! देव-द्रोहियोंका दमन करनेवाले एवं विश्वमें सबसे श्रेष्ठ सर्वव्यापी सनातन पुरुष नारायणदेवने रजोगुण और तमोगुणके मूर्तिमान् स्वरूप उन दोनों महान् असुरोंको ऐसा वर देनेके अनन्तर उन्हें अपनी जाँघोंपर रखकर मथ डाला। वे दोनों विश्वविधाता ब्रह्माजीके समान ही शक्तिशाली थे॥ २९॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि मधुकैटभवप्रदाने त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें मधु और कैटभको वरदानविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥
चतुर्दशोऽध्यायः
ब्रह्माजीके तीन पुत्रोंको परम पदकी प्राप्ति, फिर उनके द्वारा मैथुनी सृष्टिका विस्तार, दक्ष-कन्याओंकी संततिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
स्थित्वा तस्मिंस्तु कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
ऊर्ध्वबाहुर्महाबाहुस्तपो घोरं समाश्रितः॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-उस समय ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु ब्रह्माजी उस कमलपर खड़े हो दोनों बाँहें ऊपर उठाकर घोर तपस्यामें लग गये॥ १॥
ज्वलन्निव च तेजस्त्री भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः। बभासे सर्वधर्मज्ञः सहस्रांशुरिवांग्शुमान्॥ २॥
[ भविष्यपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः ७८१
वे तेजसे प्रज्वलित-से हो रहे थे और अपनी प्रभाओंसे अन्धकारका निवारण करते थे । सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता ब्रह्माजी उस समय सहस्र किरणोंवाले अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २ ॥
अथान्यद्रूपमास्थाय शम्भुर्नारायणोऽव्ययः। द्विधा कृत्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानमचिन्त्यात्मा सनातनः॥३। आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः। सांख्याचार्यश्च मतिमान् कपिलो ब्राह्मणो वरः ॥ ४ ॥ देवर्षिभिस्तु तावेतौ ब्रह्म ब्रह्मविदां वरौ। उभावपि महात्मानावूर्जितौ क्षेत्रतत्परौ ॥ ५ ॥ तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम् । परापरविशेषज्ञौ पूजितौ परमर्षिभिः ॥ ६ ॥
तदनन्तर कल्याणकारी एवं अविनाशी अचिन्त्यस्वरूप सनातनदेव भगवान् नारायण दूसरा रूप धारण कर अपने आपको ही दो स्वरूपोंमें व्यक्त करके महातेजस्वी, महायशस्वी योगाचार्य नारायण तथा परम बुद्धिमान् श्रेष्ठ ब्राह्मण सांख्याचार्य कपिलके रूपमें वहाँ पधारे । ये दोनों महात्मा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, शक्तिशाली तथा क्षेत्र ( शरीरं या अध्यात्मतत्त्व ) के चिन्तनमें तत्पर थे । देवर्षियोंद्वारा इनकी स्तुति की जा रही थी । वहाँ आकर उन दोनोंने अमिततेजस्वी ब्रह्माजीको ब्रह्मका उपदेश दिया । वे दोनों ही पर और अवर, पुरुष और प्रकृति अथवा कारण तथा कार्यकी विशेषता ( अन्तर ) को जाननेवाले थे । बड़े-बड़े ऋषियोंने उनका वहाँ पूजन किया ॥ ३-६ ॥
बहुत्वाद्दृढपादश्च विश्वात्मा जगतः स्थितिः । ग्रामणीः सर्वलोकानां ब्रह्मा लोकगुरुर्वरः ॥ ७ ॥
उन्होंने इस प्रकार कहा—लोक बहुत हैं, अतः उन समस्त लोकोंके नेता और गुरु ब्रह्माजी सबसे श्रेष्ठ हैं । वे ही सम्पूर्ण विश्वके आत्मा तथा जगत्की प्रतिष्ठा हैं । उनके विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय नामक पाद सुदृढ़ हैं ॥ ७ ॥
तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा तिस्रो व्याहृतयो जपन् । त्रीनिमान् कृतवाँल्लोकान् यथाह ब्राह्मणी श्रुतिः॥ ८ ॥
उन दोनोंकी यह बात सुनकर भूः भुवः स्वः—इन तीनों व्याहृतियोंका जप करते हुए ब्रह्माजीने इन तीनों लोकोंकी सृष्टि की, जैसा कि ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति कहती है ॥ ८ ॥
पुत्रं भूसंज्ञकं चैव समुत्पादितवान् प्रभुः। ततोऽग्रे तद्गतस्नेहो ब्रह्मा मानसमव्ययम् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने पहले भूनामक मानस पुत्रको उत्पन्न किया, जो अव्यय ( विकाररहित ) था । उनके मनमें उस पुत्रके प्रति बड़ा स्नेह था ॥ ९ ॥
सोत्पन्नस्त्वग्रे ब्रह्माणमुवाच मानसः सुतः। करोमि किं ते साहाय्यं ब्रवीतु भगवानिति ॥ १० ॥
पहले उत्पन्न हुए उस मानसिक पुत्रने ब्रह्माजीसे पूछा—‘भगवन् ! बताइये ! मैं आपकी क्या सहायता करूँ' ॥ १० ॥
ब्रह्मोवाच
य एष कपिलो नाम ब्रह्मा नारायणस्तथा । वदते वरदस्तां तु तत्कुरुष्व महामते ॥ ११ ॥
ब्रह्माजीने कहा—महामते ! ये जो कपिल नामक ब्रह्मा तथा वरदायक नारायण हैं, ये तुमसे जो कुछ कहें, वही करो ॥
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मणोक्तस्तदा भूयः संशयं समुपस्थितः । शुश्रूषुरस्मि युवयोः किं कुर्मीति कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर भूनामक पुत्रको यह संशय हुआ कि मेरे पिताजीसे भी बढ़कर कौन है ? तथापि उन दोनोंके पास गया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला, 'मैं आप दोनोंका सेवक हूँ, कहिये ! क्या सेवा करूँ ?' ॥ १२ ॥
परमेश्वरावूचतुः
यत् सत्यमक्षरं ब्रह्म ह्यष्टादशनिधं स्मृतम् । यत् सत्यममृतं चैव परं तत् समुपास्स्व ॥ १३ ॥
वे दोनों परमेश्वर बोले—जो सत्य एवं अविनाशी ब्रह्म है, उसके अठारह पाश माने गये हैं। (इन पाशोंसे मुक्त होनेके लिये ) जो सत् एवं अमृत परम तत्त्व है, उसका तुम निरन्तर चिन्तन करते रहो ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतद् वचो निशम्यासौ स ययौ दिशमुत्तराम् । गत्वा च तत्र ब्रह्मत्वमगमज्ज्ञानचक्षुषा ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उनकी यह बात सुनकर वह ब्रह्माजीका भूनामक मानस पुत्र उत्तर दिशाको चला गया, वहाँ जाकर वह ज्ञानदृष्टिसे विचार करके ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया ॥ १४ ॥
ततो ब्रह्मा भुवनाम द्वितीयमसृजत् प्रभुः। संकल्पयित्वा च पुनर्मनसैव महामनाः ॥ १५ ॥
१. यहाँ सांख्य और योगमतके आचार्योंने अपने-अपने मतमें माने गये आठ और दस पाशोंको एकत्र करके उनकी अठारह संख्या बतायी है । सांख्यमतमें आठ प्रकारके पाश यों हैं, १-पाँच कर्मेन्द्रियाँ, २-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, ३-अन्तःकरणचतुष्टय, ४-पञ्चविध प्राण, ५-आकाश आदि पञ्च महाभूत, ६-काम, ७-कर्म और ८ वीं अविद्या । ये पुर्यष्टक कहलाते हैं । इनमेंसे अविद्या-को छोड़कर और प्रकृति, पुरुष तथा ईश्वरको जोड़कर दस पाश योगमतमें स्वीकार किये गये हैं ।
| १७८२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तत्र महामनस्वी भगवान् ब्रह्माने पुनः मनसे ही संकल्प करके भुवर् नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की ॥ १५ ॥
ततः सोऽप्यब्रवीद् वाक्यं किं कुर्मोति पितामहम्।
पितामहसमाज्ञातो ब्रह्माणौ समुपस्थितः ॥ १६॥
तब उसने भी पितामह ब्रह्माजीसे वही बात कही कि 'मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?' फिर ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर वह पूर्वोक्त दोनों ब्रह्माओं (कपिल और नारायण) की सेवामें उपस्थित हुआ ॥ १६ ॥
ब्रह्माभ्यां सहितः सोऽथ भूयो भागवतीं गतः।
प्राप्तश्च परमं स्थानं स तयोः पार्श्वमागतः ॥ १७॥
उन दोनोंके पास आकर वह पुनः उनके साथ ही भागवती गति परम पदको प्राप्त हो गया ॥ १७॥
तस्मिन्नपि गते पुत्रं तृतीयमसृजत् प्रभुः।
मोक्षोपायेति कुशलं भूर्भुवर्नाम तं विभुः ॥ १८ ॥
उसके भी चले जानेपर वैभवशाली भगवान् ब्रह्माने 'भूर्भुवर्' नामक तीसरे पुत्रको उत्पन्न किया, जो मोक्षसाधनमें अत्यन्त कुशल था ॥ १८ ॥
आससाद स तद्धर्मं तयोरेवागमद् गतिम्।
एवं पुत्रांस्त्रयोऽप्येते उक्ताः शम्भौर्महात्मनः ॥ १९॥
वह भी अपने पूर्वजोंके ही धर्मको प्राप्त हुआ और उसने भी उन्हींकी गति प्राप्त की। इस प्रकार ब्रह्माजीके इन तीनों पुत्रोंको उन कल्याणकारी महात्मा कपिल एवं नारायणने उपदेश दिया (और मुक्त किया ) था ॥ १९ ॥
तान् गृहीत्वा सुतांस्तस्य प्रययौ स्वां गतिं तथा।
नारायणोऽथ भगवान् कपिलश्च यतीश्वरः ॥ २०॥
ब्रह्माजीके उन तीनों मानस पुत्रोंको साथ लेकर वे भगवान् नारायण और यतीश्वर कपिल अपने स्वरूपको प्राप्त हुए ॥ २०॥
यं कालं तौ गतौ मुक्तौ ब्रह्मा तत्कालमेव तु।
तेपे घोरतरं भूयः स तपः संशितव्रतः ॥ २१ ॥
जिस समय वे कपिल और नारायण अपने स्वरूपको प्राप्त एवं मुक्त हुए, उसी समय कठोर व्रतका पालन करने-वाले ब्रह्माजीने पुनः घोरतर तपस्या प्रारम्भ की ॥ २१ ॥
न रराम ततो ब्रह्मा प्रभुरेकस्तपश्चरन् ।
शरीरार्द्धमथो भार्यां समुत्पादितवाञ्छुभाम् ॥ २२॥
उस समय अकेले तपस्या करते हुए भगवान् ब्रह्माजी जब उसमें रम न सके, तब उन्होंने एक शुभलक्षणा भार्या उत्पन्न की, जो उनके शरीरका आधा भाग थी ॥ २२॥
तपसा तेजसा चैव वर्चसा नियमेन च।
सदृशीमात्मनो भार्यां समर्थां लोकसर्जने ॥ २३ ॥
तप, तेज, कान्ति और नियमकी दृष्टिसे उन्होंने सर्वथा अपने अनुरूप भार्याकी सृष्टि की थी, जो लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ थी ॥ २३॥
तया सह ततस्तत्र रेमे ब्रह्मा तपोमयः।
सृजन् प्रजापतीन् सर्वान् सागरान् सरितस्तथा ॥ २४॥
तत्र तपोमय जीवन व्यतीत करनेवाले ब्रह्माजी वहाँ उसके साथ रमण करने लगे। उस समय उन्होंने समस्त प्रजापतियों, सागरों और सरिताओंकी सृष्टि की थी ॥ २४॥
ततोऽसृजद् वै त्रिपदां गायत्रीं वेदमातरम्।
अकरोश्चैव चत्वारो वेदान् गायत्रिसम्भवान् ॥२५॥
तत्पश्चात् ब्रह्माजीने वेदमाता त्रिपदा गायत्रीकी सृष्टि की, फिर गायत्रीसे प्रकट हुए चारों वेदोंका संकलन किया ॥
आत्मार्थे चासृजत् पुत्राँल्लोककर्तॄन् पितामहः।
विश्वे प्रजानां पतयो येभ्यो लोका विनिःसृताः ॥ २६ ॥
इसके बाद पितामह ब्रह्माने अपने लिये भी अनेक लोक-स्रष्टा पुत्र उत्पन्न किये। वे सब-के-सब प्रजापति थे, जिनसे समस्त लोकोंका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ २६ ॥
विश्वेशं प्रथमं नाम महातपसमात्मजम् ।
सर्वाश्रमसमं पुण्यं नाम्ना धर्मं स सृष्टवान् ॥ २७ ॥
उनके प्रथम पुत्रका नाम विश्वेश था, वह महातपस्वी हुआ। फिर उन्होंने धर्म नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की, जो सभी आश्रमोंमें श्रेष्ठ और पवित्र माना गया है ॥ २७ ॥
दक्षं मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम् ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् ब्रह्माजीने दक्ष, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, गौतम, भृगु, अङ्गिरा और मनुको उत्पन्न किया ॥ २८ ॥
अथर्वभूता इत्येते ख्याता ब्रह्ममहर्षयः।
त्रयोदशसुतानां तु ये वंशा वै महर्षिणाम् ॥ २९ ॥
ये विख्यात ब्रह्मर्षि अथर्वस्वरूप कहे गये हैं। ब्रह्माजी-के ये तेरह पुत्र महर्षि हैं। इनके जो वंश हैं (उनका वर्णन किया जाता है) ॥ २९ ॥
अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका मुनिः।
प्रबोधा सुरसा क्रोधा विनता कद्रुरेव च ॥ ३० ॥
दक्षस्यैता दुहितरः कन्या द्वादश भारत।
नक्षत्राणि च भद्रं ते सप्तविंशतिरुर्जिताः ॥ ३१ ॥
भारत ! तुम्हारा कल्याण हो। अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, मुनि, प्रबोधा, सुरसा, क्रोधा, विनता और कद्रू -ये दक्षप्रजापतिकी बारह कन्याएँ हैं। जो सत्ताईस तेजस्वी नक्षत्र हैं।' वे भी दक्षकी ही कन्याएँ हैं ॥ ३०-३१ ॥
भविष्यपर्व] चतुर्दशोऽध्यायः [७८३
मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तपसा निर्मितः प्रभुः। तस्मै कन्या द्वादशेमा दक्षस्ता अन्वमन्यत ॥ ३२ ॥
मरीचिके पुत्र प्रभावशाली कश्यप हुए, जिनकी तपस्या-द्वारा सृष्टि की गयी थी। दक्षने अपनी ये बारह कन्याएँ उन्हींको ब्याह दीं ॥ ३२ ॥
नक्षत्राख्यानि सोमाय वसवे दत्तवानृषिः। रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि जनमेजय ॥ ३३ ॥
जनमेजय ! रोहिणी आदि जो सारी पुण्यनक्षत्रस्वरूपा कन्याएँ थीं, उन्हें महर्षि दक्षने सोम नामक वसुको ब्याह दिया ॥ ३३ ॥
लक्ष्मीः कीर्तिस्तथा साध्या विश्वा कामानुगा शुभा । देवी मरुत्वती चैव ब्रह्मणा निर्मिता पुरा ॥ ३४ ॥
लक्ष्मी, कीर्ति, साध्या, इच्छानुसार विचरनेवाली शुभ लक्षणा विश्वा और देवी मरुत्वती—इन पाँच कन्याओंको पूर्वकालमें ब्रह्माजी (दक्ष प्रजापति) ने उत्पन्न किया था ॥
एताः पञ्च वरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय भारत । दत्ता धर्माय भद्रं ते ब्रह्मणा दृष्टधर्मणा ॥ ३५ ॥
भारत ! तुम्हारा कल्याण हो, धर्मदर्शी ब्रह्मा (दक्ष) ने ये पाँच श्रेष्ठ कन्याएँ सुरश्रेष्ठ धर्मको दे दीं ॥ ३५ ॥
या रूपादर्द्धमयी पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी । सुरभिः सा तु गौर्भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजीकी जो इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाली अर्द्धाङ्गरूपा पत्नी थी, उसका नाम सुरभि था। वह गायका रूप धारण करके ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ ३६ ॥
ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुने लोकपूजितः। लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय भारत ॥ ३७॥
भारत ! तब लोकसृष्टिके हेतुको जाननेवाले लोकपूजित ब्रह्माजीने गौओंकी उत्पत्तिके लिये सुरभिके साथ मैथुन किया ॥ ३७ ॥
जज्ञे चैकादश सुतान् विपुलान् धर्मसंहितान् । रक्तसंध्याभ्रसदृशान् दहनोपमतेजसः ॥ ३८ ॥
उसके गर्भसे उन्होंने ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये, जो हृष्ट-पुष्ट, धर्मपरायण, संध्याकालके लाल बादलोंके समान कान्तिमान् तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी थे ॥ ३८ ॥
ते रुदन्तो द्रवन्तश्च भगवन्तं पितामहम् । रोदनाद् रावणाच्चैव ततो रुद्रा इति स्मृताः ॥ ३९ ॥
वे रोते और दौड़ते हुए भगवान् ब्रह्माजीके पास गये। रोदन करने और दौड़नेके कारण वे रुद्र कहलाये ॥ ३९ ॥
निर्ऋतिश्चैव सर्पश्च तृतीयो ह्यज एकपात् । मृगव्याधः पिनाकी च दहनोऽथेश्वरश्च वै ॥ ४० ॥
अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापराजितः । सेनानीश्च महातेजा रुद्रा एकादश स्मृताः ॥ ४१ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—निर्ऋति, सर्प, तीसरे अजैकपात्, मृगव्याध, पिनाकी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, भगवान् कपाली, अपराजित तथा महातेजस्वी सेनानी। ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं ॥ ४०-४१ ॥
तस्यामेव सुरभ्यां तु जज्ञे गोवृषभस्तथा । अकृष्टपच्य तथा माषाः सिकताः प्रश्रयोऽक्षताः ॥ ४२ ॥ अजाश्चैव तु वत्साश्च तथैवामृतमुत्तमम् । ओषध्यः प्रवरा याश्च सुरभ्यां ताः समुत्थिताः ॥ ४३ ॥
उसी सुरभिके गर्भसे साँड़का जन्म हुआ। बिना जोते-बोये होनेवाले अनाज, उड़द, सिकता (लोणी शाक), प्रश्रि, अक्षत(धान, जौ आदि); बकरे, बछड़े, उत्तम अमृत तथा श्रेष्ठ ओषधियाँ—इन सबका प्राकट्य सुरभिसे ही हुआ है ॥ ४२-४३ ॥
धर्माल्लक्ष्म्युद्भवः कामः साध्या साध्यान् व्यजायत । भवं च प्रभवं चैवमीशानं सुरभी तथा ॥ ४४ ॥ अरुन्धत्यारुणी चैव विश्वावसुवलभ्रूवौ । महिषश्च तनूजश्च विज्ञातमनसावपि ॥ ४५ ॥ मत्सरश्च विभूतिश्च सर्वाः सुरभिसूनवः ।
धर्मसे लक्ष्मीके गर्भसे कामकी उत्पत्ति हुई। साध्याने साध्य देवताओंको जन्म दिया। ब्रह्माजीकी पत्नी सुरभीने भव, प्रभव और ईशानको उत्पन्न किया। अरुन्धती, आरुणी, विश्वावसु, बलध्रुव, विज्ञात हृदयवाले, महिष और तनूज, मत्सर और विभूति—ये सब सुरभिकी संतानें हैं ॥ ४४-४५ १/२ ॥
सुपर्वतं विषं नागं साध्या लोकनमस्कृता ॥ ४६ ॥ वासवानुगता देवी जनयामास वै सुतान् ।
विश्ववन्दिता देवी साध्याने इन्द्रका अनुसरण करके सुपर्वत, विष और नाग नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥
धरं वै प्रथमं देवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम् ॥ ४७ ॥ विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम् । पञ्चमं पर्वतं चैव योगेन्द्रं तदनन्तरम् ॥ ४८ ॥ सप्तमं च ततो वायुमष्टमं निर्ऋतिं वसुम् । धर्मस्यापत्यमित्येवं सुरभ्यां समजायत ॥ ४९ ॥
(धर्मकी एक पत्नीका नाम सुरभि भी था।) उस सुरभिने प्रथम धर्म, द्वितीय अविनाशी ध्रुव, तृतीय विश्वावसु, चतुर्थ सोमेश्वर, पञ्चम पर्वत, छठे योगेन्द्र, सातवें वायु और आठवें निर्ऋति नामक वसुको उत्पन्न किया। इस प्रकार सुरभीसे धर्मकी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ४७-४९ ॥
विश्वेदेवास्तु विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः। सुधर्मा च महाबाहुः शङ्खपाच्च महाबलः ॥ ५० ॥
७८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
दक्षश्चैव महाबाहुर्वपुष्मांश्च तथैव च। चाक्षुषस्य मनोरेते तथानन्तमहीरणौ ॥ ५१ ॥
सुना जाता है कि धर्मसे विश्वाके गर्भसे विश्वेदेवोंकी उत्पत्ति हुई है। महाबाहु सुधर्मा, महाबली शङ्खपात्, महाबाहु दक्ष, वपुष्मान्, अनन्त तथा महीरण—ये चाक्षुष मनुके पुत्र हैं (जो विश्वेदेव बनकर उत्पन्न हुए थे) ५०-५१
विश्वावसुस्सुपर्वाणौ विष्टरश्च महायशाः। रुरुश्च ऋषिपुत्रो वै भास्करप्रतिमद्युतिः ॥ ५२ ॥
इनके सिवा विश्वावसु, सुपर्वा, महायशस्वी विष्टर तथा सूर्यके समान तेजस्वी ऋषिपुत्र रुरु भी (विश्वेदेव हुए थे) ॥ ५२ ॥
विश्वेदेवान् देवमाता विश्वेशाञ्जनयत् सुतान्। मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयच्छुभान् ॥ ५३ ॥
इन सामर्थ्यशाली विश्वेदेवोंको देवमाता विश्वाने पुत्र-रूपमें उत्पन्न किया था। मरुत्वतीने मरुत्वान् नामवाले शुभलक्षण देवताओंको जन्म दिया ॥ ५३ ॥
अग्निं चक्षुर्हविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च। अमरं शरवृष्टिं च संक्षयं च महाभुजम् ॥ ५४ ॥ विरजं चैव शुक्रं च विश्वावसुविभावसू। अश्मन्तं चित्ररश्मिं च तथा निष्कुपितं नृपम् ॥ ५५ ॥ हूयमानं च हूतिं च चारित्रं बहुपन्नगम्। बृहन्तं च बृहद्रूपं तथैव परतापनम् ॥ ५६ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—अग्नि, चक्षु, हवि, ज्योति, सावित्र, मित्र, अमर, शरवृष्टि, महाबाहु संक्षय, विरज, शुक्र, विश्वावसु, विभावसु, अश्मन्त, चित्ररश्मि, राजा निष्कुपित, हूयमान, हूति, चारित्र, बहुपन्नग, बृहन्त, बृहद्रूप तथा परतापन ॥ ५४–५६ ॥
मरुत्वत्यां पुरा धर्माज्जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम्। अदित्यां जज्ञिरे राजन्नादित्याः कश्यपादथ। इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणोऽशोऽर्यमा रविः॥ ५७ ॥ पूषा मित्रश्च वरदो मनुः पर्जन्य एव च। इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः ॥ ५८ ॥
पूर्वकालमें धर्मसे मरुत्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र और उत्पन्न हुए थे। राजन् ! कश्यपसे अदितिके गर्भसे बारह आदित्य उत्पन्न हुए, जिनके नाम यों हैं—इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अंश, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, वरदायक मनु और पर्जन्य-ये बारह आदित्य श्रेष्ठ देवता हैं ॥ ५७-५८ ॥
आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम्। रूपश्रेष्ठं बलश्रेष्ठं त्रिदिवे रूपिणां वरम् ॥ ५९ ॥
आदित्यके सरस्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र उत्पन्न हुए, जो रूप और बलमें श्रेष्ठ थे। वे स्वर्गके रूपवान् पुरुषों-में सबसे उत्तम थे ॥ ५९ ॥
दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान् व्यजायत। काला नु कालकेयांश्च ह्यसुरान् राक्षसांस्तथा ॥ ६० ॥
दनुने दानवोंको जन्म दिया। दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया। कालाने कालकेयों, असुरों तथा राक्षसोंको पैदा किया ॥ ६० ॥
दनायुषायास्तनया व्याधयश्चाधयस्तथा। सिंहिका ग्रहमाता च गन्धर्वजननी मुनिः ॥ ६१ ॥
दनायुषाके पुत्र आधि और व्याधि हुए; सिंहिका राहु-ग्रहकी माता और मुनि गन्धर्वोंकी जननी हुई ॥ ६१ ॥
प्रबोधाप्सरसां माता सुरसायां सरीसृपाः। क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचाश्चैव भारत ॥ ६२ ॥
भारत ! प्रबोधा अप्सराओंकी माता हुई । सुरसाके गर्भसे सर्प हुए । क्रोधासे सम्पूर्ण भूतों और पिशाचोंका जन्म हुआ ॥ ६२ ॥
तथा यक्षगणांश्चैव गुह्यकाश्च विशाम्पते। चतुष्पदानि सर्वाणि ऋते गावस्तु सौरभाः ॥ ६३ ॥
प्रजानाथ ! यक्षगण, गुह्यक तथा समस्त चौपाये भी क्रोधाके ही पुत्र हैं। परंतु सुरभिकी संतानभूत गौओंको क्रोधाके पुत्रोंमें नहीं गिनना चाहिये ॥ ६३ ॥
अरुणो गरुडश्चैव विनतायां व्यजायत। महीधरान् सर्पनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत ॥ ६४ ॥
अरुण और गरुड़ विनताके गर्भसे उत्पन्न हुए। देवी कद्रूने पृथ्वीको धारण करनेवाले सर्पों और नागोंको जन्म दिया ॥
एवं विवृद्धिमगमन् विश्वे लोकाः परस्परम्। तदा पौष्करके राजन् प्रादुर्भावे महात्मनः ॥ ६५ ॥
राजन् ! महात्मा श्रीहरिके उस पुष्कर-प्रादुर्भावके समय इस प्रकार समस्त लोक एक दूसरेके सहयोगसे वृद्धिको प्राप्त हुए ॥ ६५ ॥
पुराणे पौष्करं चैव मया द्वैपायनाच्छ्रुतम्। कथितं तेन पूर्वेण यत् कृतं परमर्षिभिः ॥ ६६ ॥
मैंने गुरुदेव द्वैपायनके मुखसे पुराणमें यह पुष्कर-प्रादुर्भावका प्रसङ्ग सुना है। पहले महर्षियोंने जो कुछ किया था, वह सब उन्होंने मुझसे कहा था ॥ ६६ ॥
यश्चेदमग्र्यं प्रथमं पुराणं सदाप्रमत्तः पठते महात्मा। अवाप्य कामानिह वीतशोकः परत्र स स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥ ६७ ॥
| भविष्यपर्व ] | पञ्चदशोऽध्यायः | ७८५ |
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जो महात्मा पुरुष सावधान होकर इस श्रेष्ठ एवं प्रथम पुराणका सदा पाठ करता है, वह इस जगत्में सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त करके शोकरहित हो पर-लोकमें स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है॥ ६७॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सर्वभूतोत्पत्तौ चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः
जनमेजयके द्वारा महाभारत-वर्णित चरित्रकी प्रशंसा
जनमेजय उवाच
श्रुतं नः परमं ब्रह्मन् स्ववंशचरितं महत् ।
दिव्यमन्योन्यसम्भूतं मानितं बहुभिर्गुणैः ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— ब्रह्मन् ! मैंने अपने वंशके उत्तम, महान् एवं दिव्य चरित्रका वर्णन सुना, जो हमारे पूर्वजोंके परस्पर सहयोगसे सम्भव हुआ था। वह चरित्र अनेक गुणोंसे सम्मानित है ॥ १ ॥
छन्दोभिर्वृत्तसंजातैः समासैश्च सविस्तरैः ।
लघुभिर्मधुराभाषैर्ग्रथितं पदविग्रहैः ॥ २ ॥
वह छन्दःशास्त्रोक्त छन्दों, संक्षेप और विस्तारयुक्त छोटे-छोटे पदों तथा मधुर भाषामें ग्रथित किया गया है॥२॥
त्रिवर्गेणाभिसम्पन्नं धर्मेणार्थेन भोगिनाम् ।
कामेन बहुरूपेण शरीरान्तर्गतेन च ॥ ३ ॥
उसमें धर्म, अर्थ और भोगी पुरुषोंके शरीरके भीतर अनेक रूपसे निवास करनेवाले काम नामक त्रिवर्गका भी वर्णन है ॥ ३ ॥
ब्राह्मणानां प्रभावैश्च योधानां च पराक्रमैः ।
वैरनिर्यातनैश्चैव प्रतिज्ञानां च पारगैः ॥ ४ ॥
इस चरित्रमें ब्राह्मणोंके प्रभावों, योद्धाओंके पराक्रमों, वैरका बदला लेनेकी घटनाओं तथा प्रतिज्ञाके पारगामी पुरुषोंके तदनुरूप प्रयत्नोंका भी उल्लेख है ॥ ४ ॥
रिपुस्तवसुसम्पन्नैर्नानुबन्धः प्रचोदितः ।
वंशयोर्निर्विनाशाय नृपेण द्विज विग्रहात् ॥ ५ ॥
ब्रह्मन् ! जिन लोगोंकी शत्रु भी स्तुति करते थे ऐसे वीर पुरुषोंके चरित्रोंका भी इसमें वर्णन है। राजा (दुर्योधन) ने पाण्डवोंके साथ जो विग्रह छोड़कर प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहीं स्थापित होने दिया, वही दोनों कुलोंके विनाशका कारण हुआ ॥ ५ ॥
ये च तस्मिन् महारेौद्रे संग्रामे निहता नृपाः ।
तेषां सर्वाणि राष्ट्राणि पुत्राः सर्वे प्रपेदिरे ॥ ६ ॥
उस महाभयंकर संग्राममे जो-जो राजा मारे गये थे, उनके समस्त राष्ट्रोंको उन्हींके सभी पुत्रोंने प्राप्त किया ॥ ६ ॥
कौरवः प्रथितो राजा भगवच्छासनानुगः ।
धर्मेश्च बहुधा प्रोक्तस्त्रयाणां वर्णसम्पदाम् ।
शूराणामपि विख्यातः स्वर्गहेतुर्द्विजर्षभ ॥ ७ ॥
द्विजश्रेष्ठ ! कुरुवंशके सुविख्यात राजा युधिष्ठिर भगवान्की आज्ञाके अनुकूल चलते थे । उन्होंने तीनों वर्णोंके लिये धर्मका बारंबार वर्णन किया है। वे शूरवीरोंको स्वर्गकी प्राप्ति करानेके प्रधान हेतुके रूपमें विख्यात हैं॥ ७ ॥
अनुग्रहार्थं भूतानां नोत्सेकाय कथंचन ।
चतुर्णां वर्णसंज्ञानां पृथक्पृथगनेकधा ॥ ८ ॥
उन्होंने किसी तरह अहंकार प्रकट करनेके लिये नहीं, समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये ही चारों वर्णोंके पृथक्-पृथक् अनेक धर्म बताये हैं ॥ ८ ॥
गर्भवासं पतन्तश्च भूतानां सम्प्रबोधिताः ।
पृच्छन्तो देवसंचारं क्षीणे पुण्ये च कर्मणि ॥ ९ ॥
प्राणियोंमेंसे जो लोग गर्भवासमें गिर रहे थे और पुण्यकर्मके क्षीण हो जानेपर पुनः देवलोकमें प्रवेशका उपाय पूछते थे (उन सबके लिये वे पृथक्-पृथक् धर्मका उपदेश देते थे) ॥ ९ ॥
दाने यश्चापि संयोगः स चापि बहुधा कृतः ।
द्वयोः संयोगविहितं मधु वाग्वचनं तयोः ॥ १० ॥
दानमें जो स्वयं लगने और दूसरे लोगोंको भी लगानेका कार्य है, वह भी उन्होंने बहुत बार किया है। जब पाण्डव और श्रीकृष्ण दोनोंका संयोग प्राप्त होता था, तब उनमें बड़ा मधुर वार्तालाप (सत्संग) आरम्भ हो जाता था ॥ १० ॥
न तच्छक्यं मयाऽऽख्यातुं भारताध्ययनं महत्।
एकाह्नेन महान् ब्रह्मन्नपि दिव्येन चक्षुषा ॥ ११ ॥
महान् ब्राह्मणदेव ! महाभारतका जो विशाल अध्ययन है, उसका एक दिनमें दिव्य-दृष्टिसे भी महत्त्व बताना मेरे लिये असम्भव है ॥ ११ ॥
ब्रह्मणोऽहस्तु विस्तारं संक्षेपं च सुसंग्रहम् ।
| ७८६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
श्रोतुमिच्छामि भगवन् महत् कौतूहलं हि मे ॥ १२॥
भगवन् ! मैं ब्रह्माजीके दिन (या यज्ञ) का विस्तार, संक्षेप और उत्तम संग्रह सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे हृदयमें बड़ा कौतूहल है ॥ १२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे जनमेजयवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें जनमेजयका वाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
षोडशोऽध्यायः
सृष्टिविषयक वर्णनके प्रसङ्गमें ज्ञान और योगका विचार
वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वैकमना राजन् पञ्चेन्द्रियसमाहितः।
कथां कथयतो राजन् निर्विकारेण चेतसा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तुम पाँचों इन्द्रियों तथा मनको एकाग्र करके निर्विकार चित्तसे मेरी कही हुई कथा सुनो ॥ १ ॥
ब्रह्मसम्बन्धसम्बद्धमबद्धं कर्मभिर्नृप।
पुरस्ताद् ब्रह्म सम्पन्नं ब्रह्मणो यद्दक्षिणम् ॥ २ ॥
अव्यक्तं कारणं यत् तन्नित्यं सदसदात्मकम्।
निष्कलः पुरुषस्तस्मात् सम्बभूवात्मयोनिनः ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! जो वेदके सम्बन्धसे अर्थात् वेदमूलक होनेके कारण सबसे सम्बन्ध रखता है, तथापि जो किसीके कर्मोंसे बँधा हुआ नहीं है, ब्रह्मा या ब्रह्मवेत्तासे पहलेसे ही जो सबमें अनुगत, नित्यसिद्ध है, दक्षिणाप्रधान यज्ञ आदिसे ऊपर उठा हुआ है और जो अव्यक्त, सबका कारण, नित्य तथा सदसत्स्वरूप है, वह परब्रह्म परमात्मा ही निष्कल पुरुष है, उसीसे स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुए ॥ २-३ ॥
दिव्यो दिव्येन वपुषा सर्वभूतपतिर्विभुः।
अचिन्त्यश्चाव्ययश्चैव युगानां प्रभवोऽव्ययः ॥ ४ ॥
वे ब्रह्माजी स्वयं तो दिव्य हैं ही, दिव्य शरीरसे भी संयुक्त हैं। वे समस्त प्राणियोंके पालक, प्रभु, अचिन्त्य, निर्विकार, युगोंकी उत्पत्तिके कारण और अविनाशी हैं ॥४॥
अभूतश्चाप्यजातश्च सर्वत्र समतां गतः।
अव्यक्तात् परं यत् तन्नारायणविदो विदुः ॥ ५ ॥
वे अभूत अर्थात् स्वयम्भू हैं, उनका किसी दूसरेसे जन्म नहीं हुआ है—इसलिये अजन्मा हैं, उनका सर्वत्र समान भाव है। जो अव्यक्तसे परे परमात्मतत्त्व है, उसे नारायणके स्वरूपको जाननेवाले उनके उपासक ही जानते हैं ॥ ५ ॥
सर्वतःपाणिपादं तं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ६ ॥
उसके सब ओर हाथ और पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं तथा उसके सब ओर कान हैं, वह लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ ६ ॥
असतश्च सतश्चैव विज्ञेयं तत्र कारणम्।
अव्यक्तो व्यक्तरूपस्थश्चरन्नपि न दृश्यते ॥ ७ ॥
उसीको असत् और सत्का कारण जानना चाहिये, वह अव्यक्त है; व्यक्त रूपोंमें स्थित होकर विचर रहा है, तो भी किसीको दिखायी नहीं देता ॥ ७ ॥
विकारपुरुषोऽव्यक्तो ह्यरूपी रूपमाश्रितः।
चरत्यचिन्त्यः सर्वेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ ८ ॥
विकारयुक्त अर्थात् क्षर पुरुष रूपवान् है, जिसका अव्यक्त एवं रूपहीन चिन्मय पुरुष परमात्माने आश्रय ले रखा है। जैसे लकड़ियोंमें आग गूढ़रूपसे छिपी हुई है, उसी प्रकार वे अचिन्त्य परमात्मा समस्त भूतोंमें गूढ़रूपसे स्थित होकर विचरते हैं ॥ ८ ॥
भूतभव्योद्भवो नाथः परमेष्ठी प्रजापतिः।
प्रभुः सर्वस्य लोकस्य नाम चास्येति तत्त्वतः ॥ ९ ॥
वे ही भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिके कारण हैं, सबके स्वामी एवं संरक्षक हैं, परमेष्ठी प्रजापति तथा सर्वलोकप्रभु आदि इनके यथार्थ नाम हैं ॥ ९ ॥
अपदान्तु पदो जातस्तस्मान्नारायणोऽभवत्।
अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नो ब्रह्मयोगेन कामतः ॥ १० ॥
अपद अर्थात् निर्गुण निराकारसे पद अर्थात् सगुण साकार रूपमें प्रकट हुए वे परमात्मा नार अर्थात् जलको अयन अर्थात् निवासस्थान बनानेके कारण नारायण नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पहले अव्यक्त थे; फिर ब्रह्मयोगसे इच्छानुसार संकल्प करके व्यक्तभावको प्राप्त हुए ॥ १० ॥
ब्रह्मभावे च तं विद्धि सशब्दं लब्धवान् प्रभुः।
प्रभुः सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्येतरस्य च ॥ ११ ॥
उन्हींको ब्रह्मरूपमें स्थित हुआ समझो। उन्हीं प्रभुने ब्रह्मा नाम प्राप्त किया। वे स्थावर-जङ्गम रूप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं ॥ ११ ॥
भविष्यपर्व ] | षोडशोऽध्यायः | ७८७
अहं त्विति स होवाच प्रजाः स्रक्ष्यामि भारत ।
प्रभवः सर्वभूतानां यस्य तन्तुरिमाः प्रजाः ॥ १२ ॥
भारत ! उन्होंने पहले-पहल यह संकल्प प्रकट करते हुए कहा कि मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा, अतः वे ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं। यह सारी प्रजा उन्हींकी संतान है ॥१२॥
स्वभावाज्जायते सर्वं स्वभावाच्च तथाभवत् ।
अहंकारः स्वभावाच्च तथा सर्वमिदं जगत् ॥ १३ ॥
स्वभावसे ही सबकी उत्पत्ति होती है, स्वभावसे ही परमात्मा पूर्वोक्तरूपमें प्रकट हुआ, स्वभावसे ही अहंकार तथा यह सारा जगत् प्रकट हुआ है ॥ १३ ॥
सर्वव्यापी निरालम्बो ह्यग्राह्योऽथ जयो ध्रुवः ।
एष ब्रह्ममयो ज्योतिर्ब्रह्मशब्देन शब्दितः ॥ १४ ॥
यह सर्वव्यापी, आश्रयरहित, इन्द्रियातीत, जयस्वरूप, अविनाशी ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप परमात्मा ही ब्रह्म नामसे प्रतिपादित होता है ॥ १४ ॥
अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नः पञ्चभिः क्रतुलक्षणैः ।
धारयन् ब्रह्मणो व्यक्तं विविधं चिन्तितं त्वरन् ॥ १५ ॥
वह स्वरूपसे अव्यक्त होनेपर भी संकल्पसे प्रकट हुए पाँच सूक्ष्मभूतरूप उपाधियोंसे व्यक्तभाव (पुरुषशरीर) को प्राप्त हुआ और वेदसे ज्ञात हुए विविध संकल्पित जगत्को हृदयमें धारण करके उसकी सृष्टिके लिये उतावला हो उठा ॥ १५ ॥
अथ मूर्तिं समाधाय स्वभावाद् ब्रह्मचोदितः ।
ससर्ज सलिलं ब्रह्म येन सर्वमिदं ततम् ॥ १६ ॥
जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है, उस ब्रह्म तथा स्वभावसे प्रेरित हो शरीर धारण करके ब्रह्माने जलकी सृष्टि की ॥ १६ ॥
वायुं पूर्वमथो दृष्ट्वा यो धातुर्धातुसत्तमः ।
धारणाद् धातृशब्दं च लभते लोकसंज्ञितम् ॥ १७ ॥
जलकी सृष्टिसे पहले वायुको स्थित देख जगद्विधाता परमेश्वरके अधीन रहनेवाले जो मरीचि आदि धाता हैं, उनमें सबसे श्रेष्ठ ब्रह्माने सबको धारण करनेके कारण लोक-प्रसिद्ध धाता नाम प्राप्त किया ॥ १७ ॥
तदेतद् वायुसम्भूतं कृत्स्नं जगदभूत् पुरा ।
एतद् देवैरतिक्रान्तं पूर्वमेव सरस्वति ॥ १८ ॥
इस प्रकार यह सारा जगत् पहले वायुसे ही प्रकट हुआ और पहलेसे ही समुद्रमें स्थित है, देवता इसे लाँघकर ऊपरको उठ चुके हैं ॥ १८ ॥
पृथक्त्वं गमितं तोयं पृथिवीशब्दमिच्छता ।
घनत्वाच्च द्रवत्वाच्च निखिलेनोपलभ्यते ॥ १९ ॥
पृथिवी शब्दके वाच्यार्थ भूमिकी (उसपर सम्पूर्ण जगत्की स्थितिके लिये) अभिलाषा करनेवाले ब्रह्माजीने जलको उससे भिन्न अवस्थामें पहुँचा दिया। एक (जल) के द्रव-पदार्थ होनेसे और दूसरी (पृथ्वी) के घनीभूत होनेसे दोनोंका भेद स्पष्ट है। पृथ्वी और जलके इस अन्तरको प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ १९ ॥
फलत्वात् सीदमाना च सलिले सलिलोद्भवा ।
व्याजहार शुभां वाणीं समन्तात् पूरयन्निव ॥ २० ॥
जलसे प्रकट हुई पृथ्वी उसका फल या कार्यरूप होनेके कारण अपने कारणभूत जलमें जब डूबने और गलने लगी, तब उसकी अधिष्ठात्रीदेवीने सब ओरके आकाशको गुँजाते हुए-से यह शुभ वाणी कही—॥ २० ॥
ऊर्ध्वेऽहं स्थातुमिच्छामि संसीदाम्युद्धरस्व माम् ।
गम्भीरे तोयविवरे मूर्तिविक्षोभितान्तरम् ॥ २१ ॥
'अहो ! जलकी इस गहरी गुफामें मैं डूबती और गलती जा रही हूँ। अपने शरीरकी कठोरता या घनीभूततासे मेरा अन्तःकरण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा है, अतः मैं जलके ऊपर स्थित होना चाहती हूँ, कोई आकर मेरा उद्धार करो' ॥२१॥
ततो मूर्तिधरा देवी सर्वभूतप्ररोहिणी ।
यथायोगेन सम्भूता सर्वत्र विषयैषिणी ॥ २२ ॥
तदनन्तर समस्त भूतोंको अङ्कुरित करनेवाली पृथ्वीदेवी मूर्तिमती होकर प्रकट हुई और अपने ठहरनेके लिये स्थान चाहती हुई पूर्वोक्त कारणसे सब ओर मुँह करके अपनी रक्षाके लिये पुकारने लगी ॥ २२ ॥
श्रुत्वा च गदितं तस्या गिरं तां च सुभाषिताम् ।
वराहरूपमास्थाय निपपात महार्णवे ॥ २३ ॥
उसके मुखसे निकली हुई उस सुभाषित वाणीको सुनकर भगवान् श्रीहरि वाराहरूप धारण करके उस महासागरमें कूद पड़े ॥ २३ ॥
उद्धृत्य सोऽवनिं तोयात्कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
समाधौ प्रलयं गत्वा प्रलीनो न च दृश्यते ॥ २४ ॥
जलसे पृथ्वीको ऊपर उठाकर वह अत्यन्त दुष्कर कर्म करके वे भगवान् समाधिमें लयको प्राप्त अथवा लीन हो अदृश्य हो गये, अपने मूलस्वरूपमें प्रतिष्ठित हो गये ॥ २४ ॥
यत्तद् ब्रह्ममयं ज्योतिराकाशमिति संज्ञितम् ।
तत्र ब्रह्मा समुद्भूतः सर्वभूतपितामहः ॥ २५ ॥
श्रीहरिका वह स्वरूप परब्रह्म एवं चिन्मय प्रकाशरूप है, श्रुतिमें उसे आकाश नाम दिया गया है, उसीसे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ २५ ॥
अद्यापि मनसा धात्रा धार्यते सर्वयोनिना ।
ज्ञानयोगेन सूक्ष्मेण प्रजानां हितकाम्यया ॥ २६ ॥
| ७८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
आज भी सबकी उत्पत्तिके स्थानभूत वे जगदाधार परमेश्वर प्रजाजनोंके हितकी कामनासे सूक्ष्म ज्ञानयोगद्वारा मनसे (शेष, कूर्म आदि रूपसे) इस पृथ्वीको धारण करते हैं॥ २६ ॥
भित्त्वा तु पृथिवीमध्यमुपयाति समुद्रवम्।
तपनस्तूर्ध्वमतिष्ठन् रश्मिभिः स हसन्निव॥ २७॥
ऊपर रहकर सबको ताप देनेवाले सूर्यदेव अपनी सब ओर फैली हुई किरणोंद्वारा हँसते हुए-से पृथ्वीके मध्यभाग-का भेदन करके उसके उत्पादक जलके पासतक पहुँच जाते हैं॥ २७॥
तस्य मण्डलमध्यात्तु निःसृतं सोममण्डलम्।
स सनातनजो ब्रह्मा सौम्यं सोमत्वमन्वगात् ॥ २८॥
इस प्रकार अत्यन्त तापके कारण सूर्यमण्डलके मध्य-भागसे सोममण्डलका प्रादुर्भाव हुआ। सनातन परमात्मासे प्रकट हुआ वह सोममण्डलका अभिमानी चेतन ब्राह्मण है और सौम्यभाव एवं सोमत्वको प्राप्त है ॥ २८ ॥
सोममण्डलपर्यन्तात् पवनः समजायत ।
तदक्षरमयं ज्योतिस्तेजोभिरभिवर्द्धयन् ॥ २९॥
उक्त सोममण्डलके मुखसे जो निःश्वास वायु प्रकट हुई वही अक्षरमय वेदरूप ज्योति है, जो अपने ज्ञानमय प्रकाशसे समस्त जगत्की वृद्धि अथवा विस्तार करता हुआ सब अर्थों-का प्रकाशक है॥ २९॥
स तु योगमयाज्ज्ञानात् स्वभावाद् ब्रह्मसम्भवात् ।
सृजते पुरुषं दिव्यं ब्रह्मयोनिं सनातनम्॥ ३०॥
वह ब्रह्मा पुरुष योगमय ज्ञान एवं ब्रह्मजनित स्वभावसे सनातन ब्रह्मयोनिरूप दिव्य पुरुषकी सृष्टि करता है॥ ३० ॥
द्रवं यत् सलिलं तस्य घनं यत् पृथिवी भवत् ।
छिद्रं यच्च तदाकाशं ज्योतिर्यच्चक्षुरेव तत् ॥ ३१ ॥
उस पुरुषका जो द्रव है, वही जल है। उसका घनीभाव ही पृथ्वोरूपमें परिणत होता है। उसका जो छिद्र है, वही आकाश है तथा जो नेत्र है; वही तेज है ॥ ३१ ॥
वायुना स्पन्दते चैनं संघाताज्ज्योतिसम्भवः ।
पुरुषात् पुरुषो भावः पञ्चभूतमयो महान् ॥ ३२ ॥
भूतात्मा वै समे तस्मिंस्तस्मिन् देहे सनातनः ।
गुहायां निहितं ज्ञानं योगाद् यज्ञज्ञः सनातनः ॥ ३३ ॥
पुरुष अर्थात् ईश्वरसे प्राप्त हुआ जो पुरुषभाव (चैतन्य) है, वही वायुके सहयोगसे इस शरीरको चेष्टाशील बनाता है। इस प्रकार पाँच भूतोंके संघात रूप शरीरको प्राप्त होकर जब चेतन उसमें निवास करता है, तब वहाँ इन्द्रिय-रूपी ज्योतियों और जठरानलका प्राकट्य होता है। पाँचों भूतोंसे निर्मित जो विराट् शरीर है, उसमें भी वही अन्तर्यामी भूतात्मा निवास करता है। विभिन्न प्रकारके जो शरीर हैं, वे सभी उसके लिये सम हैं, अतः वह सनातन परमात्मा उन सबमें अनादि कालसे विराजमान है। वह ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सबकी बुद्धिरूप गुहामें स्थित है तथा वह सनातन परमेश्वर ही योगबलसे अपने स्वरूपभूत उस ज्ञानका साक्षात्कार करने-वाला है ॥ ३२-३३ ॥
तपनस्यैव तद्रूपं योऽग्निर्वसति देहिनाम्।
शरीरे नित्यशो युक्तं धातुभिः सह संगतः ॥ ३४ ॥
देहधारियोंके शरीरमें जो अग्निका वास है, वह अग्नि सूर्यका ही स्वरूप है। इसी प्रकार पाँचों भूतोंसे सदा संयुक्त रहनेवाले शरीरमें उन भूतोंसे मिला हुआ जो जीवात्मा है, वह उस सनातन परमात्माका ही अंश है ॥ ३४ ॥
स्वभावात् क्षयमायाति स्वभावाद् भयमेति च।
स्वभावाद्विन्दते शान्तिं स्वभावाच्च न विन्दति ॥ ३५॥
वह जीवात्मा क्षयशील धातुओंके साथ संगत है, अतः अपने स्वरूपको भूलकर उस मोहयुक्त स्वभावसे ही क्षयको प्राप्त होता है (वह नित्य अक्षय होनेपर भी अज्ञानवश देहके क्षयसे अपनेको क्षयशील मानता है)। उस स्वभावसे ही उसे अपने स्वरूप और ऐश्वर्यके नाशका भय प्राप्त होता है। स्वभावसे ही वह शरीरकी स्वस्थतासे शान्तिका अनुभव करता है और उसके अस्वस्थ हो जानेपर स्वभावतः उसे शान्ति नहीं मिलती है॥ ३५ ॥
इन्द्रियैरतिमूढात्मा मोहितो ब्रह्मणः पदे ।
सम्भवं निधनं चैव कर्मभिः प्रतिपद्यते ॥ ३६॥
इन्द्रियोंके वेगसे अत्यन्त मूढचित्त हुआ मानव ब्रह्मपद (परमात्माके स्वरूप) की ओरसे मोहित (ज्ञानशून्य) हो जाता है और कर्मोंसे बँधा रहकर जन्म-मरणको प्राप्त होता रहता है ॥ ३६ ॥
यावत् तद् ब्रह्मविषयं नोपयाति ह तत्त्वतः ।
तावत् संसारमाप्नोति सम्भवांश्च पुनः पुनः ॥ ३७॥
जवतक तत्त्वज्ञानके द्वारा वह ब्रह्मानन्दके साम्राज्यमें नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे संसार तथा उसमें बारंबार जन्म-मरणकी प्राप्ति होती रहती है ॥ ३७ ॥
इन्द्रियैर्व्यतिरिक्तो वै यदा भवति योगवित् ।
तदा ब्रह्मत्वमापन्नः प्रलयाग्रे प्रतिष्ठति ॥ ३८ ॥
जब योगवेत्ता पुरुष योगबलसे अपनेको इन्द्रियोंसे पृथक् उनका नियन्ता समझ लेता है, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दमें प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ३८ ॥
प्रतिषिद्धममुं लोकं ब्रह्मवान् स भवत्युत ।
न च रागव्ययैर्याति न च सज्जति कर्हिचित् ॥ ३९॥
भविष्यपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः [ ७८९
वह पुरुष परलोकके भी सुखका परित्याग करके ब्रह्मानन्दसे सम्पन्न होता है, फिर तो वह राग-द्वेषादिके कारण हीनावस्थाको नहीं प्राप्त होता और न कहीं उसकी आसक्ति ही होती है ॥ ३९ ॥
आगतिं च गतिं चैव निधनं सम्भवं तथा ।
भूतेभ्यो वेत्ति सर्वज्ञः परां सिद्धिमूपागतः ॥ ४० ॥
वह सर्वज्ञ एवं परम सिद्धिको प्राप्त होकर समस्त प्राणियोंको प्राप्त होनेवाले आवागमन और जन्म-मरणको जानता है, परंतु स्वयं उनके चक्करमें नहीं पड़ता है ॥ ४० ॥
आत्मनो गतयश्चैव तथा विषयगोचरम् ।
पुरस्तात् कर्मनिर्वृत्तेः पदे ब्रह्मा प्रतिष्ठितः ॥ ४१ ॥
ब्रह्मवेत्ता पुरुष अपनी गतियों (मुक्तिके उपायों) को तथा भूत, वर्तमान और भविष्यके विषयोंको भी जानता है और कर्मोंके भावी फलभोगोंकी निवृत्ति हो जानेसे परमपदमें प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ४१ ॥
चित्तग्रन्थींश्च मनसा रुन्ध्यात् पूर्वाश्च यातनाः ।
भिद्यमानाः प्रलोभेन वायुभिन्नमिवार्णवम् ॥ ४२ ॥
अतः विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह चित्तको बाँधनेवाले काम आदि दोषों तथा प्रबल लोभसे अनेक शाखाओंमें विभक्त होनेवाली उन पूर्ववासनाओंका भी निरोध करे, जो वायुसे विक्षुब्ध होनेवाले समुद्रकी भाँति मनुष्यको क्षोभमें डाल देती हैं ॥ ४२ ॥
पच्यते हृदयं नीतं परेभ्यो ज्ञानचक्षुषा ।
ब्रह्मप्रोक्तमिवात्मा वै विमुक्तो देहबन्धनात् ॥ ४३ ॥
इस प्रकार वासनाओंका निरोध करनेवाले पुरुषकी काम आदि दोषोंसे मलिन हुई बुद्धि ज्ञानाग्निसे तपकर शुद्ध हो जाती है । वह ज्ञान वेदोंमें बताया गया है । जिससे जीवात्मा इस शरीरमें रहते हुए ही उसके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४३ ॥
सृजेदपि परं लोकं संहरेदपि विद्यया ।
तेजोमूर्तिरिवाविद्वन्मिह लोकं च संसृजेत् ॥ ४४ ॥
तेजोमूर्ति योगी स्वाभिमानी पुरुषकी भाँति योगविद्याके प्रभावसे दूसरे लोककी सृष्टि और संहार भी कर सकता है । वह विश्वामित्र आदिकी भाँति इस लोकका भी पूर्णरूपसे निर्माण कर सकता है ॥ ४४ ॥
तिर्यग्योनीं गतांश्चैव कर्मभिर्नियमोपमैः ।
तान्यपि प्रतिमुच्येत ब्रह्मयुक्तेन चेतसा ॥ ४५ ॥
वह योगी बेड़ीके समान बाँधनेवाले कर्मोंके कारण पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें पड़े हुए जीवोंको भी ब्रह्ममें लगाये हुए अपने चित्तके संकल्पमात्रसे मुक्त कर सकता है तथा उन कर्मोंका बन्धन भी खोल सकता है ॥ ४५ ॥
अक्षरं च क्षरं चैव योगकर्माभिविद्यते ।
न क्षरं विद्यते तत्र यद् ब्रह्म कर्मभिर्ध्रुवम् ॥ ४६ ॥
योगनामक साधना क्षर और अक्षर (भोग और मोक्ष) दोनोंको व्याप्त करके स्थित होती है, अर्थात् योगीको भोग और मोक्ष दोनों सुलभ होते हैं । परंतु जो अविनाशी ब्रह्म है, उसमें कर्मोंद्वारा उपलक्षित क्षर (क्षणभंगुर जगत् एवं उसके भोग) की सत्ता नहीं है ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
सप्तदशोऽध्यायः
मैनाककी स्थिति, मेरुपृष्ठपर परमात्मासे ब्रह्माजीका प्राकट्य, मेरुकी विशालता, ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टि, ब्रह्म और ब्रह्माके स्वरूपका वर्णन, गङ्गाका प्रादुर्भाव, सोमकी उत्पत्ति, धर्मके पाद, योग-साधना, ऐश्वर्यसे हानि, वेदोंका प्राकट्य, यज्ञपुरुषका वर्णन, योगवेत्ताकी महिमा, चित्तकी उपलब्धिमें कारण, मोक्षसम्बन्धी कर्म करनेका विधान और कर्मफलके त्यागसे मुक्ति
वैशम्पायन उवाच
पृथिव्यां यत् कृतं छिद्रं तपतेन विवर्धता ।
तस्मिन्न्यस्तोऽथ मैनाकः स्वभावविहितोऽचलः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बढ़ते हुए सूर्यने पृथ्वीमें जो छिद्र कर दिया था, उसमें स्वभावतः रचे गये मैनाकपर्वतको स्थापित किया गया ॥ १ ॥
पर्वभिः पर्वतत्वं च लभते नाम संज्ञितम् ।
अचलादचलत्वं च स्वभावान्मेरुरेव सः ॥ २ ॥
उसपर बहुत-से पर्व (कामनापूरक चिन्तामणि, कल्पवृक्ष और कामधेनु आदि) हैं, इसलिये उसे 'पर्वत' संज्ञा प्राप्त हुई है। वह अविचल होनेके कारण 'अचल' कहलाता है तथा स्वभावसे ही मेरुके समान स्थित है ॥ २ ॥