भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 811
७८८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आज भी सबकी उत्पत्तिके स्थानभूत वे जगदाधार परमेश्वर प्रजाजनोंके हितकी कामनासे सूक्ष्म ज्ञानयोगद्वारा मनसे (शेष, कूर्म आदि रूपसे) इस पृथ्वीको धारण करते हैं॥ २६ ॥

भित्त्वा तु पृथिवीमध्यमुपयाति समुद्रवम्।
तपनस्तूर्ध्वमतिष्ठन् रश्मिभिः स हसन्निव॥ २७॥

ऊपर रहकर सबको ताप देनेवाले सूर्यदेव अपनी सब ओर फैली हुई किरणोंद्वारा हँसते हुए-से पृथ्वीके मध्यभाग-का भेदन करके उसके उत्पादक जलके पासतक पहुँच जाते हैं॥ २७॥

तस्य मण्डलमध्यात्तु निःसृतं सोममण्डलम्।
स सनातनजो ब्रह्मा सौम्यं सोमत्वमन्वगात् ॥ २८॥

इस प्रकार अत्यन्त तापके कारण सूर्यमण्डलके मध्य-भागसे सोममण्डलका प्रादुर्भाव हुआ। सनातन परमात्मासे प्रकट हुआ वह सोममण्डलका अभिमानी चेतन ब्राह्मण है और सौम्यभाव एवं सोमत्वको प्राप्त है ॥ २८ ॥

सोममण्डलपर्यन्तात् पवनः समजायत ।
तदक्षरमयं ज्योतिस्तेजोभिरभिवर्द्धयन् ॥ २९॥

उक्त सोममण्डलके मुखसे जो निःश्वास वायु प्रकट हुई वही अक्षरमय वेदरूप ज्योति है, जो अपने ज्ञानमय प्रकाशसे समस्त जगत्की वृद्धि अथवा विस्तार करता हुआ सब अर्थों-का प्रकाशक है॥ २९॥

स तु योगमयाज्ज्ञानात् स्वभावाद् ब्रह्मसम्भवात् ।
सृजते पुरुषं दिव्यं ब्रह्मयोनिं सनातनम्॥ ३०॥

वह ब्रह्मा पुरुष योगमय ज्ञान एवं ब्रह्मजनित स्वभावसे सनातन ब्रह्मयोनिरूप दिव्य पुरुषकी सृष्टि करता है॥ ३० ॥

द्रवं यत् सलिलं तस्य घनं यत् पृथिवी भवत् ।
छिद्रं यच्च तदाकाशं ज्योतिर्यच्चक्षुरेव तत् ॥ ३१ ॥

उस पुरुषका जो द्रव है, वही जल है। उसका घनीभाव ही पृथ्वोरूपमें परिणत होता है। उसका जो छिद्र है, वही आकाश है तथा जो नेत्र है; वही तेज है ॥ ३१ ॥

वायुना स्पन्दते चैनं संघाताज्ज्योतिसम्भवः ।
पुरुषात् पुरुषो भावः पञ्चभूतमयो महान् ॥ ३२ ॥
भूतात्मा वै समे तस्मिंस्तस्मिन् देहे सनातनः ।
गुहायां निहितं ज्ञानं योगाद् यज्ञज्ञः सनातनः ॥ ३३ ॥

पुरुष अर्थात् ईश्वरसे प्राप्त हुआ जो पुरुषभाव (चैतन्य) है, वही वायुके सहयोगसे इस शरीरको चेष्टाशील बनाता है। इस प्रकार पाँच भूतोंके संघात रूप शरीरको प्राप्त होकर जब चेतन उसमें निवास करता है, तब वहाँ इन्द्रिय-रूपी ज्योतियों और जठरानलका प्राकट्य होता है। पाँचों भूतोंसे निर्मित जो विराट् शरीर है, उसमें भी वही अन्तर्यामी भूतात्मा निवास करता है। विभिन्न प्रकारके जो शरीर हैं, वे सभी उसके लिये सम हैं, अतः वह सनातन परमात्मा उन सबमें अनादि कालसे विराजमान है। वह ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सबकी बुद्धिरूप गुहामें स्थित है तथा वह सनातन परमेश्वर ही योगबलसे अपने स्वरूपभूत उस ज्ञानका साक्षात्कार करने-वाला है ॥ ३२-३३ ॥

तपनस्यैव तद्रूपं योऽग्निर्वसति देहिनाम्।
शरीरे नित्यशो युक्तं धातुभिः सह संगतः ॥ ३४ ॥

देहधारियोंके शरीरमें जो अग्निका वास है, वह अग्नि सूर्यका ही स्वरूप है। इसी प्रकार पाँचों भूतोंसे सदा संयुक्त रहनेवाले शरीरमें उन भूतोंसे मिला हुआ जो जीवात्मा है, वह उस सनातन परमात्माका ही अंश है ॥ ३४ ॥

स्वभावात् क्षयमायाति स्वभावाद् भयमेति च।
स्वभावाद्विन्दते शान्तिं स्वभावाच्च न विन्दति ॥ ३५॥

वह जीवात्मा क्षयशील धातुओंके साथ संगत है, अतः अपने स्वरूपको भूलकर उस मोहयुक्त स्वभावसे ही क्षयको प्राप्त होता है (वह नित्य अक्षय होनेपर भी अज्ञानवश देहके क्षयसे अपनेको क्षयशील मानता है)। उस स्वभावसे ही उसे अपने स्वरूप और ऐश्वर्यके नाशका भय प्राप्त होता है। स्वभावसे ही वह शरीरकी स्वस्थतासे शान्तिका अनुभव करता है और उसके अस्वस्थ हो जानेपर स्वभावतः उसे शान्ति नहीं मिलती है॥ ३५ ॥

इन्द्रियैरतिमूढात्मा मोहितो ब्रह्मणः पदे ।
सम्भवं निधनं चैव कर्मभिः प्रतिपद्यते ॥ ३६॥

इन्द्रियोंके वेगसे अत्यन्त मूढचित्त हुआ मानव ब्रह्मपद (परमात्माके स्वरूप) की ओरसे मोहित (ज्ञानशून्य) हो जाता है और कर्मोंसे बँधा रहकर जन्म-मरणको प्राप्त होता रहता है ॥ ३६ ॥

यावत् तद् ब्रह्मविषयं नोपयाति ह तत्त्वतः ।
तावत् संसारमाप्नोति सम्भवांश्च पुनः पुनः ॥ ३७॥

जवतक तत्त्वज्ञानके द्वारा वह ब्रह्मानन्दके साम्राज्यमें नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे संसार तथा उसमें बारंबार जन्म-मरणकी प्राप्ति होती रहती है ॥ ३७ ॥

इन्द्रियैर्व्यतिरिक्तो वै यदा भवति योगवित् ।
तदा ब्रह्मत्वमापन्नः प्रलयाग्रे प्रतिष्ठति ॥ ३८ ॥

जब योगवेत्ता पुरुष योगबलसे अपनेको इन्द्रियोंसे पृथक् उनका नियन्ता समझ लेता है, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दमें प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ३८ ॥

प्रतिषिद्धममुं लोकं ब्रह्मवान् स भवत्युत ।
न च रागव्ययैर्याति न च सज्जति कर्हिचित् ॥ ३९॥