विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 812, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः [ ७८९
वह पुरुष परलोकके भी सुखका परित्याग करके ब्रह्मानन्दसे सम्पन्न होता है, फिर तो वह राग-द्वेषादिके कारण हीनावस्थाको नहीं प्राप्त होता और न कहीं उसकी आसक्ति ही होती है ॥ ३९ ॥
आगतिं च गतिं चैव निधनं सम्भवं तथा ।
भूतेभ्यो वेत्ति सर्वज्ञः परां सिद्धिमूपागतः ॥ ४० ॥
वह सर्वज्ञ एवं परम सिद्धिको प्राप्त होकर समस्त प्राणियोंको प्राप्त होनेवाले आवागमन और जन्म-मरणको जानता है, परंतु स्वयं उनके चक्करमें नहीं पड़ता है ॥ ४० ॥
आत्मनो गतयश्चैव तथा विषयगोचरम् ।
पुरस्तात् कर्मनिर्वृत्तेः पदे ब्रह्मा प्रतिष्ठितः ॥ ४१ ॥
ब्रह्मवेत्ता पुरुष अपनी गतियों (मुक्तिके उपायों) को तथा भूत, वर्तमान और भविष्यके विषयोंको भी जानता है और कर्मोंके भावी फलभोगोंकी निवृत्ति हो जानेसे परमपदमें प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ४१ ॥
चित्तग्रन्थींश्च मनसा रुन्ध्यात् पूर्वाश्च यातनाः ।
भिद्यमानाः प्रलोभेन वायुभिन्नमिवार्णवम् ॥ ४२ ॥
अतः विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह चित्तको बाँधनेवाले काम आदि दोषों तथा प्रबल लोभसे अनेक शाखाओंमें विभक्त होनेवाली उन पूर्ववासनाओंका भी निरोध करे, जो वायुसे विक्षुब्ध होनेवाले समुद्रकी भाँति मनुष्यको क्षोभमें डाल देती हैं ॥ ४२ ॥
पच्यते हृदयं नीतं परेभ्यो ज्ञानचक्षुषा ।
ब्रह्मप्रोक्तमिवात्मा वै विमुक्तो देहबन्धनात् ॥ ४३ ॥
इस प्रकार वासनाओंका निरोध करनेवाले पुरुषकी काम आदि दोषोंसे मलिन हुई बुद्धि ज्ञानाग्निसे तपकर शुद्ध हो जाती है । वह ज्ञान वेदोंमें बताया गया है । जिससे जीवात्मा इस शरीरमें रहते हुए ही उसके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४३ ॥
सृजेदपि परं लोकं संहरेदपि विद्यया ।
तेजोमूर्तिरिवाविद्वन्मिह लोकं च संसृजेत् ॥ ४४ ॥
तेजोमूर्ति योगी स्वाभिमानी पुरुषकी भाँति योगविद्याके प्रभावसे दूसरे लोककी सृष्टि और संहार भी कर सकता है । वह विश्वामित्र आदिकी भाँति इस लोकका भी पूर्णरूपसे निर्माण कर सकता है ॥ ४४ ॥
तिर्यग्योनीं गतांश्चैव कर्मभिर्नियमोपमैः ।
तान्यपि प्रतिमुच्येत ब्रह्मयुक्तेन चेतसा ॥ ४५ ॥
वह योगी बेड़ीके समान बाँधनेवाले कर्मोंके कारण पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें पड़े हुए जीवोंको भी ब्रह्ममें लगाये हुए अपने चित्तके संकल्पमात्रसे मुक्त कर सकता है तथा उन कर्मोंका बन्धन भी खोल सकता है ॥ ४५ ॥
अक्षरं च क्षरं चैव योगकर्माभिविद्यते ।
न क्षरं विद्यते तत्र यद् ब्रह्म कर्मभिर्ध्रुवम् ॥ ४६ ॥
योगनामक साधना क्षर और अक्षर (भोग और मोक्ष) दोनोंको व्याप्त करके स्थित होती है, अर्थात् योगीको भोग और मोक्ष दोनों सुलभ होते हैं । परंतु जो अविनाशी ब्रह्म है, उसमें कर्मोंद्वारा उपलक्षित क्षर (क्षणभंगुर जगत् एवं उसके भोग) की सत्ता नहीं है ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
सप्तदशोऽध्यायः
मैनाककी स्थिति, मेरुपृष्ठपर परमात्मासे ब्रह्माजीका प्राकट्य, मेरुकी विशालता, ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टि, ब्रह्म और ब्रह्माके स्वरूपका वर्णन, गङ्गाका प्रादुर्भाव, सोमकी उत्पत्ति, धर्मके पाद, योग-साधना, ऐश्वर्यसे हानि, वेदोंका प्राकट्य, यज्ञपुरुषका वर्णन, योगवेत्ताकी महिमा, चित्तकी उपलब्धिमें कारण, मोक्षसम्बन्धी कर्म करनेका विधान और कर्मफलके त्यागसे मुक्ति
वैशम्पायन उवाच
पृथिव्यां यत् कृतं छिद्रं तपतेन विवर्धता ।
तस्मिन्न्यस्तोऽथ मैनाकः स्वभावविहितोऽचलः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बढ़ते हुए सूर्यने पृथ्वीमें जो छिद्र कर दिया था, उसमें स्वभावतः रचे गये मैनाकपर्वतको स्थापित किया गया ॥ १ ॥
पर्वभिः पर्वतत्वं च लभते नाम संज्ञितम् ।
अचलादचलत्वं च स्वभावान्मेरुरेव सः ॥ २ ॥
उसपर बहुत-से पर्व (कामनापूरक चिन्तामणि, कल्पवृक्ष और कामधेनु आदि) हैं, इसलिये उसे 'पर्वत' संज्ञा प्राप्त हुई है। वह अविचल होनेके कारण 'अचल' कहलाता है तथा स्वभावसे ही मेरुके समान स्थित है ॥ २ ॥