भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 813
७९०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तस्य पृष्ठे सुविस्तीर्णे नगस्य सुमहर्द्धिमान् ।
तस्मिंस्तु पुरुषो व्यक्तो वसति ज्योतिसम्भवः ।
विहितश्च स्वभावेन तेनैव परमात्मना ॥ ३ ॥

उस पर्वतके सुविस्तृत पृष्ठभागपर एक महान् समृद्धिशाली, व्यक्तरूपधारी पुरुष निवास करता है, जो ज्योतिर्मय परमेश्वरसे प्रकट हुआ है। उस परमात्माने स्वभावसे ही इस पुरुषकी सृष्टि की है ॥ ३ ॥

यत् तद् ब्रह्ममयं तेजो निहितं शिरसोऽन्तरे ।
तस्य ज्योतिर्मयं रूपं दीप्तं पुरुषविग्रहम् ॥ ४ ॥

मस्तकवर्ती सहस्रारचक्रमें जो ब्रह्ममय तेज विराजमान है अथवा वेदान्तमें जिस ब्रह्ममय तेजका प्रतिपादन हुआ है, उसीका ज्योतिर्मय स्वरूप इस पुरुषके रूपमें प्रकट होकर प्रकाशित होता है ॥ ४ ॥

वदनादभिनिष्क्रान्तं ज्वलन्तमिव तेजसा ।
चतुर्भिर्वदनैर्युक्तं चतुर्भिंश्च द्विजोत्तमैः ॥ ५ ॥

उसी पुरुषके मुखसे चार मुखों और चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीका प्राकट्य हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-से हो रहे थे ॥ ५ ॥

वक्त्रं ब्रह्म समुद्भूतं ब्रह्मा ब्राह्मणपुङ्गवः ।
तदेवं तन्महद्भूतं पुनर्भावत्वमागतम् ॥ ६ ॥

उनका मुख वेद है, जो परमात्माके निःश्वासरूपसे प्रकट हुआ है। ब्रह्माजी उस वेदके धारण करनेवाले ब्राह्मणशिरोमणि हैं। इस प्रकार वह महान् भूत पुनः पूज्यतमभावको प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥

उद्धता पृथिवी देवी पुरस्तात् सलिलाशयात् ।
ब्रह्मत्वं ब्रह्मणः स्थानादलोको लोकतां गतः ॥ ७ ॥

जिसने पहले महासागरके भीतरसे पृथ्वीदेवीका उद्धार किया था, वही वह महान् भूत है, वही ब्रह्माजीके स्थान मेरुपृष्ठपर जाकर चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ, जो वाराहरूपसे पृथ्वीका उद्धार करके अदृश्य हो गये थे, वे ही भगवान् फिर ब्रह्माजीके रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे ॥ ७ ॥

पदसंधौ ब्रह्मलोकं शृङ्गं मेरोस्तदाभवत् ।
उच्छ्रितं योजनशतं सहस्रशतमेव च ॥ ८ ॥
एवमेव च विस्तारं चतुर्भिर्गुणितं गुणैः ।

उस समय उन भगवान्‌के दोनों चरणोंकी संधिमें जो मेरुपर्वतका शिखर था, वही ब्रह्मलोक हुआ। उसकी ऊँचाई एक लाख एक सौ योजनकी है। इसी प्रकार उसका विस्तार भी इससे चौगुना है ॥ ८ १/२ ॥

अथवा नैव संख्यातुं शक्यं भूतेन केनचित् ।
समाः सहस्रैर्बहुभिरपि दिव्येन तेजसा ॥ ९ ॥

अथवा कोई भी प्राणी कई सहस्र वर्षोंमें दिव्य ज्ञानके द्वारा भी उसके विस्तारकी गणना नहीं कर सकता ॥ ९ ॥

चतुर्भिः पार्श्वविस्तारैः शिलाभिरभिसंवृतैः ।
नगस्य यस्य राजेन्द्र विस्तारैः शतयोजनैः ॥ १० ॥
कोटिकोटीशतगुणैर्गुणितं ब्रह्मवादिभिः ।
योगयुक्तैः सदा सिद्धैर्नित्यं ब्रह्मपरायणैः ॥ ११ ॥

राजेन्द्र ! उसके चारों किनारोंमें चार बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जिनसे उसके विस्तृत पार्श्वभाग घिरे हुए हैं। उन सबके विस्तार सौ-सौ योजन हैं। मेरुपर्वतका विस्तार उन सबसे कोटि-कोटि शतगुना अधिक है—ऐसा नित्यसिद्ध, नित्यब्रह्मपरायण, योगयुक्त ब्रह्मवादी पुरुषोंने निश्चय किया है ॥ १०-११ ॥

मरुद्भिः सह देवेन्द्रै रुद्रैर्वसुभिरेव च ।
आदित्यैर्विश्वसहितै रक्ष रक्ष वसुधाधिपान् ॥ १२ ॥
ररक्ष पृथिवीं चैव भगवान् विष्णुना सह ।
विवस्वद्वरुणाभ्यां च संघातं गमितं नृप ॥ १३ ॥
तेन ब्राह्मेण वपुषा ब्रह्मप्राप्तेन भारत ।

नरेश्वर ! भरतनन्दन ! श्रीविष्णु तथा मरुद्गणों, देवेन्द्रों, रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, विश्वेदेवों एवं विवस्वान् और वरुणके साथ रहकर भगवान् ब्रह्मा उसी ब्रह्म-प्राप्त ब्राह्म शरीरसे भूमि और भूमिपालोंकी रक्षा करते हैं ॥ १२-१३ १/२ ॥

यत् तद् विष्णुमयं तेजः सर्वत्र समतां गतम् ॥ १४ ॥
यत्तद् ब्रह्मेति वै प्रोक्तं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
नियमैर्बहुभिः प्राप्तैः सत्यव्रतपरायणैः ॥ १५ ॥

ब्रह्माजी जिस ब्रह्मको प्राप्त थे, वह ब्रह्म सर्वत्र समभावसे स्थित है, विष्णुमय तेजके रूपमें प्रकाशमान है। बहुत-से नियमोंने जिन्हें अपना अनुगत बना लिया है तथा जो सत्यभाषण एवं ब्रह्मचर्य-व्रतके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन वेदके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणोंने जिसे ब्रह्मके नामसे बताया और जाना है, वही वह ब्रह्म है ॥ १४-१५ ॥

एवमेते त्रयो लोका ब्राह्मेऽहनि समाहिताः ।
अहनि ब्रह्म चाव्यक्तं व्यक्तं प्राणे प्रतिष्ठितम् ॥ १६ ॥

इस प्रकार ये तीनों लोक ब्रह्माके दिनमें स्थित रहते हैं। अव्यक्त ब्रह्म भी ब्रह्माके उस दिनमें प्राणयुक्त शरीरके भीतर जीवात्मारूपसे व्यक्त एवं प्रतिष्ठित होता है ॥ १६ ॥

ब्रह्मणो नियतं कर्म प्रभावेण प्रचोदितम् ।
प्रवर्तमानं भावेन शश्वदच्छलवादिनाम् ॥ १७ ॥

परब्रह्म परमात्माके प्रभाव (निःश्वासरूप वेद) से प्रतिपादित जो नियत (नित्य) कर्म है, वह जिनकी वाणीमें भी कपट नहीं है, ऐसे पुरुषोंद्वारा यदि निरन्तर शुद्धभावसे किया जाय तो हितकारक होता है ॥ १७ ॥