विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 814, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें. भविष्यपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः ७९१
एतद्धितमिति प्रोक्तं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
यदेकं ब्रह्मणः पादं दिष्टत्वं गमितं पदम् ॥ १८॥
वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणोंने इस तरह निष्काम-भावसे किये गये कर्मको ही हितकारक बताया है। जिस पदंको दिष्ट—प्रारब्ध या पूर्वकृत कर्मका फल बताया गया है, वह विश्व ब्रह्म ( परमात्मा ) का एक पाद ( लेशमात्र अंश ) है* ॥ १८ ॥
बहुत्वाद् विप्रभावानां विश्वशब्दः प्रयुज्यते ।
ब्राह्मणैर्ब्रह्म भूतात्मा सत्यव्रतपरायणैः ॥ १९ ॥
विश्वको जिसका एक पाद बताया गया है, वह ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका नित्यसिद्ध आत्मा है ( उसे सकाम कर्मोंद्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता ) तो भी वेदाम्यासी विप्रोंके भावोंकी विविधताके कारण सत्यव्रतमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मण इन्द्र, मित्र, वरुण आदि सारे शब्द जिसमें वाचकरूपसे प्रतिष्ठित हैं, उस विश्व शब्दका यज्ञोंमें विनियोग करते हैं। ( उन सकाम यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवोंके ही लोकोंकी प्राप्ति होती है, जो मोक्ष या भगवत्प्राप्तिके सामने नितान्त तुच्छ है। अतः मुमुक्षु पुरुषोंको निष्काम कर्मोंद्वारा ही परमात्माकी आराधना करनी चाहिये ) ॥ १९ ॥
विश्वरूपं मनोरूपं बुद्धिरूपं च मानयन् ।
एवं द्वन्द्वं स भगवान् प्रथमं मिथुनं सृजत् ॥ २० ॥
विश्वरूप ( स्थूल ) और मनोरूप ( सूक्ष्म )—ये दोनों केवल बुद्धिमात्ररूप हैं । ऐसा जानते हुए उन भगवान् ब्रह्माने पहले स्त्री-पुरुषरूप जोड़ेकी सृष्टि की ॥ २०॥
स एव भगवान् विश्वो देव्या सह सनातनः।
विधाय विपुलान् भोगान् ब्रह्मा चरति सानुगः ॥ २१ ॥
वे ही विश्वरूप सनातन भगवान् ब्रह्मा अपनी शक्ति-स्वरूपा देवीके साथ विपुल भोगोंकी रचना करके अपने अनुगामी कश्यप आदिके साथ उन्हें आचरण ( उपयोग ) में लाते हैं ॥ २१ ॥
स एष भगवान् ब्रह्मा नित्यं ब्रह्मविदां वरः ।
निर्वाणपदगन्तृणामकिंचनपथैषिणाम् ॥ २२ ॥
अकिंचनपथ ( संन्यासमार्ग ) पर जानेकी इच्छावाले जो मोक्षरूपी गन्तव्यपदके यात्री हैं, उन ब्रह्मवेत्ताओंके लिये जो सदा वरणीय परमात्मा हैं, वे यह भगवान् ब्रह्मा ही हैं ॥ २२ ॥
सोमात् सोमः समुत्पन्नो धारासलिलविग्रहात् ।
ययाभिषिक्तो भूतानामाधिपत्ये महेश्वरः ॥ २३ ॥
अद्भुत ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न परमेश्वरसे ओषधियोंके स्वामी सोम उत्पन्न हुए । उस समय इस सोमके उत्पादक उस परमेश्वरका स्वरूप ऊर्ध्वलोकसे गिरती हुई जलधारा ही थी, जिसने भगवान् महेश्वरको भूतनाथके पदपर अभिषिक्त किया ॥ २३ ॥
अभिषिच्य च भूतेशं कृत्वा कर्म स्वभावतः।
नदति स्म तदा नादं तेन सा ह्युच्यते नदी ॥ २४ ॥
वह जलधारा उस समय स्वाभाविकरूपसे भूतनाथ महेश्वरका अभिषेक करके इस महान् कर्मका सम्पादन करनेके पश्चात् कलकलनाद करने लगी। उसके कारण वह नदी कहलाती है ॥ २४ ॥
सा ब्रह्मलोकं सम्भाव्य अभिभूय सहस्रधा ।
गां गता गगनाद् देवी सप्तधा प्रससार च ॥ २५ ॥
ब्रह्मलोकका महत्त्व बढ़ाकर मार्ग रोकनेवाले पर्वतोंके सहस्रों टुकड़े करके वह देवी गगनसे भूतळपर अवतीर्ण हुई । अतः 'गां गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका नाम गङ्गा हुआ । वह सात धाराओंमें विभक्त होकर सब ओर फैली ॥ २५ ॥
सहस्रधा च राजेन्द्र बहुधा च पुनः पुनः ।
इमं लोकममुं चैव भावयन् क्षरसम्भवम् ॥ २६ ॥
राजेन्द्र ! वह भगवती गङ्गा अनेकानेक नदियों और तीर्थोंके रूपमें सहस्रोंकी संख्यामें विभक्त हुई हैं और बारंबार विभूतिभेदसे अनेकानेक रूप धारण करती हैं । उन गङ्गासे प्रकट हुए सोमदेव अन्न आदिके पौधोंको बढ़ाकर इस भौतिक लोककी और अपनी सुधामयी किरणोंसे परलोककी भी पुष्टि एवं रक्षा करते हैं ॥ २६ ॥
ततो भूतानि रोहन्ति महाभूतफलानि च ।
ततः सर्वे क्रियारम्भाः प्रवर्तन्ते मनीषिणाम् ॥ २७ ॥
इस लोककी वृद्धि होनेसे जरायुज आदि प्राणी बढ़ते हैं । पृथ्वी, जल और तेज—इन तीनों महाभूतोंके जो व्रीहि आदि फल हैं, उनकी भी वृद्धि होती है । फिर उन व्रीहि आदि फलों और मनुष्य आदि प्राणियोंसे मनीषी पुरुषोंकी समस्त क्रियाओंका यथायोग्य आरम्भ होता है ॥ २७ ॥
चतुर्भिर्वदनैस्तस्य मुखपद्माद् विनिःसृता ।
तदाक्षरमयी सिद्धिर्दिष्टत्वं समुपागता ॥ २८ ॥
उन परमेश्वरके मुखारविन्दसे जो चारों वेदोंके रूपोंमें अक्षर ब्रह्ममयी सिद्धि प्रकट हुई, वही उपदेश-भावको प्राप्त हुई है ॥ २८ ॥
* श्रुति भी कहती है कि 'पादोऽस्य विश्वाभूतानि' इत्यादि । अर्थात् सम्पूर्ण भूत या समस्त भौतिक जगत् इस परमात्माका एक पाद ( लघुतम अंश ) है ।
१. गङ्गा, यमुना, सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी-ये ही उसकी सात धाराएँ हैं । ( वन० ८५ । ८८ )