भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 810

भविष्यपर्व ] | षोडशोऽध्यायः | ७८७

अहं त्विति स होवाच प्रजाः स्रक्ष्यामि भारत ।
प्रभवः सर्वभूतानां यस्य तन्तुरिमाः प्रजाः ॥ १२ ॥
भारत ! उन्होंने पहले-पहल यह संकल्प प्रकट करते हुए कहा कि मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा, अतः वे ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं। यह सारी प्रजा उन्हींकी संतान है ॥१२॥

स्वभावाज्जायते सर्वं स्वभावाच्च तथाभवत् ।
अहंकारः स्वभावाच्च तथा सर्वमिदं जगत् ॥ १३ ॥
स्वभावसे ही सबकी उत्पत्ति होती है, स्वभावसे ही परमात्मा पूर्वोक्तरूपमें प्रकट हुआ, स्वभावसे ही अहंकार तथा यह सारा जगत् प्रकट हुआ है ॥ १३ ॥

सर्वव्यापी निरालम्बो ह्यग्राह्योऽथ जयो ध्रुवः ।
एष ब्रह्ममयो ज्योतिर्ब्रह्मशब्देन शब्दितः ॥ १४ ॥
यह सर्वव्यापी, आश्रयरहित, इन्द्रियातीत, जयस्वरूप, अविनाशी ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप परमात्मा ही ब्रह्म नामसे प्रतिपादित होता है ॥ १४ ॥

अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नः पञ्चभिः क्रतुलक्षणैः ।
धारयन् ब्रह्मणो व्यक्तं विविधं चिन्तितं त्वरन् ॥ १५ ॥
वह स्वरूपसे अव्यक्त होनेपर भी संकल्पसे प्रकट हुए पाँच सूक्ष्मभूतरूप उपाधियोंसे व्यक्तभाव (पुरुषशरीर) को प्राप्त हुआ और वेदसे ज्ञात हुए विविध संकल्पित जगत्‌को हृदयमें धारण करके उसकी सृष्टिके लिये उतावला हो उठा ॥ १५ ॥

अथ मूर्तिं समाधाय स्वभावाद् ब्रह्मचोदितः ।
ससर्ज सलिलं ब्रह्म येन सर्वमिदं ततम् ॥ १६ ॥
जिसने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है, उस ब्रह्म तथा स्वभावसे प्रेरित हो शरीर धारण करके ब्रह्माने जलकी सृष्टि की ॥ १६ ॥

वायुं पूर्वमथो दृष्ट्वा यो धातुर्धातुसत्तमः ।
धारणाद् धातृशब्दं च लभते लोकसंज्ञितम् ॥ १७ ॥
जलकी सृष्टिसे पहले वायुको स्थित देख जगद्विधाता परमेश्वरके अधीन रहनेवाले जो मरीचि आदि धाता हैं, उनमें सबसे श्रेष्ठ ब्रह्माने सबको धारण करनेके कारण लोक-प्रसिद्ध धाता नाम प्राप्त किया ॥ १७ ॥

तदेतद् वायुसम्भूतं कृत्स्नं जगदभूत् पुरा ।
एतद् देवैरतिक्रान्तं पूर्वमेव सरस्वति ॥ १८ ॥
इस प्रकार यह सारा जगत् पहले वायुसे ही प्रकट हुआ और पहलेसे ही समुद्रमें स्थित है, देवता इसे लाँघकर ऊपरको उठ चुके हैं ॥ १८ ॥

पृथक्त्वं गमितं तोयं पृथिवीशब्दमिच्छता ।
घनत्वाच्च द्रवत्वाच्च निखिलेनोपलभ्यते ॥ १९ ॥
पृथिवी शब्दके वाच्यार्थ भूमिकी (उसपर सम्पूर्ण जगत्‌की स्थितिके लिये) अभिलाषा करनेवाले ब्रह्माजीने जलको उससे भिन्न अवस्थामें पहुँचा दिया। एक (जल) के द्रव-पदार्थ होनेसे और दूसरी (पृथ्वी) के घनीभूत होनेसे दोनोंका भेद स्पष्ट है। पृथ्वी और जलके इस अन्तरको प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ १९ ॥

फलत्वात् सीदमाना च सलिले सलिलोद्भवा ।
व्याजहार शुभां वाणीं समन्तात् पूरयन्निव ॥ २० ॥
जलसे प्रकट हुई पृथ्वी उसका फल या कार्यरूप होनेके कारण अपने कारणभूत जलमें जब डूबने और गलने लगी, तब उसकी अधिष्ठात्रीदेवीने सब ओरके आकाशको गुँजाते हुए-से यह शुभ वाणी कही—॥ २० ॥

ऊर्ध्वेऽहं स्थातुमिच्छामि संसीदाम्युद्धरस्व माम् ।
गम्भीरे तोयविवरे मूर्तिविक्षोभितान्तरम् ॥ २१ ॥
'अहो ! जलकी इस गहरी गुफामें मैं डूबती और गलती जा रही हूँ। अपने शरीरकी कठोरता या घनीभूततासे मेरा अन्तःकरण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा है, अतः मैं जलके ऊपर स्थित होना चाहती हूँ, कोई आकर मेरा उद्धार करो' ॥२१॥

ततो मूर्तिधरा देवी सर्वभूतप्ररोहिणी ।
यथायोगेन सम्भूता सर्वत्र विषयैषिणी ॥ २२ ॥
तदनन्तर समस्त भूतोंको अङ्कुरित करनेवाली पृथ्वीदेवी मूर्तिमती होकर प्रकट हुई और अपने ठहरनेके लिये स्थान चाहती हुई पूर्वोक्त कारणसे सब ओर मुँह करके अपनी रक्षाके लिये पुकारने लगी ॥ २२ ॥

श्रुत्वा च गदितं तस्या गिरं तां च सुभाषिताम् ।
वराहरूपमास्थाय निपपात महार्णवे ॥ २३ ॥
उसके मुखसे निकली हुई उस सुभाषित वाणीको सुनकर भगवान् श्रीहरि वाराहरूप धारण करके उस महासागरमें कूद पड़े ॥ २३ ॥

उद्धृत्य सोऽवनिं तोयात्कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
समाधौ प्रलयं गत्वा प्रलीनो न च दृश्यते ॥ २४ ॥
जलसे पृथ्वीको ऊपर उठाकर वह अत्यन्त दुष्कर कर्म करके वे भगवान् समाधिमें लयको प्राप्त अथवा लीन हो अदृश्य हो गये, अपने मूलस्वरूपमें प्रतिष्ठित हो गये ॥ २४ ॥

यत्तद् ब्रह्ममयं ज्योतिराकाशमिति संज्ञितम् ।
तत्र ब्रह्मा समुद्भूतः सर्वभूतपितामहः ॥ २५ ॥
श्रीहरिका वह स्वरूप परब्रह्म एवं चिन्मय प्रकाशरूप है, श्रुतिमें उसे आकाश नाम दिया गया है, उसीसे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ २५ ॥

अद्यापि मनसा धात्रा धार्यते सर्वयोनिना ।
ज्ञानयोगेन सूक्ष्मेण प्रजानां हितकाम्यया ॥ २६ ॥